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Wednesday, March 7, 2018

1 डी एम मिश्र की गजलों की जनपक्षधरता और समकालीनता – सुशील कुमार

जनधर्मी तेवर के एक प्रतिनिधि गजलकार डी एम मिश्र की गजलों पर मेरा एक लेख " डी एम मिश्र की गजलों की जनपक्षधरता और समकालीनता " हिंदी साहित्‍य की गजल परम्‍परा पर विशेष दखल रखने वाली पत्रिका 'अलाव' संपादक वरिष्‍ठ गजलकार (रामकुमार कृषक जी ) के जनवरी -फरवरी 2018 अंक 51 में प्रकाशित आप मित्रों के अवलोकनार्थ - सुशील कुमार
  
दुष्यंत और अदम गोंडवी के बाद जिस क्षमता और साहस के साथ गजलों के कंटेंट, शिल्प-संरचना,संप्रेषण-शक्ति और भाषागत परिवर्तन पर काम कियागया, उसमें श्री मिश्र का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है। उनकी गजलों का खास गुण उसकी रवानगी है जो गजल-भाषा के बोलचाल की भाषा के काफी करीब होने के कारण लक्षित होता है। मसलन उसे  समझने के लिए डिक्शनरी का सहारा नहीं के बराबर लेना पड़ता है। अतएव जनवादी गजलों की भाषा का जनभाषा में तब्दील होना एक बहुत जरूरी 'फैक्टर' है।जनवादी भाषा की सहजता और रवानगी में उसके उत्कृष्ट कंटेन्ट को देखने के लिए डी एम मिश्र की एक बहुचर्चित गजल गांवों का उत्थान देखकर आया हूँको पढ़िए। इसमें केवल लोकचेतना और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक जड़-व्यवस्था पर प्रतिघात का स्वर ही नहीं है, बल्कि गजल के शिल्प-ज्ञाता यह भी महसूस करेंगे कि भाषाई बरकत और सहजता ने इसकी सम्प्रेषणीयता को कितना प्रभावी बना दिया है! शब्द 'उत्थान', टूटी छान (छप्पर), प्रधान की जगह परधान, लछमिनिया , पति की जगह पती , अंग्रेजी शब्द लॉन, सरकारी स्लोगन - मेरा देश महान -  इत्यादि देशज और जनभाषा में घुले शब्द यहाँ इस कायदे और अनुशासन से आए हैं कियह फन कम ही समकालीन गजलकारों में मिलेंगें। समें गजलकार डॉ डी एम मिश्र बहुत सचेत रहते हैं।देखिए मिश्रजी की यह गजल –
‘’ गाँवों का उत्थान देखकर आया हूँ।
  मुखिया का दालान देखकर आया हूँ।

   मनरेगा की कहाँ मजूरी चली गई,
   सुखिया को हैरान देखकर आया हूँ।‘’

(डी एम मिश्र)

      कविता की तरह हिन्दी गजलों में भी जनवाद के कई लेयर विद्यमान हैं। अक्सर देखा जाता है कि लोग जनवाद के नाम पर नकलची रचनाकार का पर्याय बन जाते हैं जिससे उनकी गजलें अपनी प्रभावोत्पादकता में क्षीण और जेरोक्स कॉपीहो जाती हैं। उसे कला का रूप बिना दिये ही केवल रदीफ़-काफिया और बहर में ला देते हैं। पर कथ्य और कहन में नवीनता नहीं आने के कारण वह जनवादी गजल के नाम पर केवल एक शोर की तरह सुनने में लगता है और अरुचि भी पैदा होती है। आखिर ऐसा क्यों होता है? जबाव साफ है - लोग प्रभूत मात्रा में गजल तो लिख लेते हैं,पर उनमें वजन नहीं पैदा करते। यह बहुत जटिल और श्रमसाध्य कार्य है। समय देकर एक-एक शब्द को गजल की समकालीनता और उसकी अर्थ की कसौटी पर तोलना होता है।
            कवि डी एम मिश्र  ने आधुनिक हिंदी गजल की दुनिया में जो हस्तक्षेप किया है , वह केवल रदीफ़ और काफिया के अनुशासन के कारण प्रतिक्रिया के योग्य नहीं है, बल्कि उसके कंटेंट भी उतनी ही चर्चा के काबिल हैं। पत्थर को प्रार्थना के स्तर तक ले जाने वाली उनकी गजलें, सम्वेदना के उन नूतन शब्दों की आहट हैं जिसमें न केवल मन की आत्मीयता का अविकल विभोर है,बल्कि जनचेतना को एक ऐसा साकार रूप मिलता है जो जितनी हृदयस्पर्शी है,उतनी ही जनपीड़ा को व्यक्त करती हुई, व्यष्टि से समष्टितक प्रवाहित , देखिए कवि डी एम मिश्र की एक और ग़ज़ल-
‘’ प्यार मुझको भावना तक ले गया
  भावना को वन्दना तक ले गया।

   मैं न साधक हूँ , न कोई संत हूँ
  शब्द को बस साधना तक ले गया।

   अब मुझे क्या और उनसे चाहिए
   एक पत्थर ,प्रार्थना तक ले गया।‘’’
      (डी एम मिश्र)
            गजलों में हर शेर का अपना स्वतंत्र महत्व है। गजलें ज्यादा लंबी भी नहीं होती। इसलिए जो गजलकार रचना के कंटेंटे पर गंभीर होते हैं, वही अपने रदीफ़ और काफिया को सही जनवादी गजलों की बहरों में अर्थपूर्ण तरीके से उतार पाते हैं।
            गजल का पहला क्षण तो उसकी कंटेन्टया अंतर्वस्तु ही होती है। गजलकार के मन में बाह्यसंसार को देखकर जो भावोद्रेक होता है, उसी से गजल की अंतर्वस्तुबनती है। यहाँ गजलकार को कोई खतरा नहीं होता। इसका दूसरा क्षणशिल्प और व्याकरण है जो बहर,रदीफ़ और काफिया का मामला है। सृजन के इन दो क्षणों तक कोई भी गजलगो को गुजरने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती। लेकिन गजल का तीसरा क्षण उसकी अंतर्वस्तु का गजल के नियमों से आबद्ध होकर उसके रूप और प्रभाव निर्धारण का होता है। सृजन का यह क्षण जितना निराला है, उतना ही सम्मोहन-युक्त (हिपनोटिक) और गंभीर । मुक्तिबोध कविता के लिए इस क्षण को बहुत सावधानी से जीने पर बल देते हैं।        
            पर यह भी सही है कि समकालीन हिंदी गजलों में उर्दू ग़ज़लों की मासूमियत को खोजना किसी बंजर या रेगिस्तान में सोते (झरने) की तलाश करने जैसा है। यह नव - छायावादीसौंदर्याकांक्षा ( neo romantic aesthetic desire) उर्दू रवायतों से विरासत में मिला गजल- स्वभाव है जिसकी उम्मीद हिंदी गजलों से भी की जा रही।  पर यह सम्भव नहीं,क्योंकिनदी अपनी उल्टी धार में नहीं जाती।
              हिंदी कविता की तरह हिंदी गजल भी अपनी भाषा और कंटेंट को खुरदुरे यथार्थ के समरूप बहुत कुछ बदल चुकी है, जिसका आपको जरूर आभास हुआ होगा। पाठक समय की नब्ज टटोलकर यह महसूस कर सकते हैं कि लोकजीवन के तनाव और द्वंद्व को सही परिप्रेक्ष्य में देखने के लिए अब गजल में भाषा दुष्यंत की भाषा  से भी आगे की होनी चाहिए। पर हिंदी गजलों में जितने लोकप्रिय दुष्यंत हुए, उतने अदम गोंडवी नहीं हो पाए। खैर, यह पूंजी के साथ सत्ता का खेल है जिस पर हमें यहां बात नहीं करनी है।
            आप पाएंगे कि दुष्यंत जी की गजल की  खासियत यह है कि उन्होंनेउर्दू परम्परा से विद्रोह कर हिंदी गजल के कथ्य, शिल्प ,अधिरचना और भाषा में बदलाव किया जो उर्दू गजलकारों के लिए उस समय एक खुली चुनौती थी। पर जनता ने इसे सीने से इसलिए लगाया क्योंकि दुष्यंत ने गजल की कलात्मकता को उतना ही तोड़ा जितना उस वक्त लोग पचा सकते थे, वरना उसे गजल मानने से ही इनकार कर दिया जाता। इसी कारण कुछ लोग उन्हें आज भी कलावादी गजलकार मानते हैं। पर यह उनकी भूल है। उनकी गजलों में कलात्मकता समय की मांग औऱ उनके सृजन-संघर्ष का हिस्सा थी। हालांकि उनके इस क्रांतिकारी बदलाव का जड़-परंपरावादियों ने विरोध भी किया है, पर दुष्यंत के जनवादी कंटेंट और शिल्प के सामने  टिक न सके बल्कि कहें, परास्त हो गए।  उनमें जो कलात्मकता का पुट और कथ्य की जनवादी गम्भीरता है, उसे कभी नजरन्दाज नहीं किया जा सकता। इसीलिए विरोधी भी बाद में चुप हो गए।
         साफ तौर पर देखा जा सकता हैं कि दुष्यंत की सफलता का मूल कारण कंटेंट में प्रगतिशील तत्वों का कलात्मक समावेशीकरण है। उनकी समृद्ध परम्परा को और धारदार रूप अदम गोंडवी की गजलों में मिली। भाषा भी पहले से रुखड़ी और भेदस हो गई। इन दोनों गजलकारों ने हिंदी गजल के नक्षत्र में उदीयमान तारों की भांति हिंदी जनवादी गजलों की जो नींव रखी उसका प्रसन्न विकास गजलकार डी एम मिश्र  में मिलता है–
कौन कहता है कि वो फंदा लगा करके मरा
इस व्यवस्था को वो आईना दिखा करके मरा।

ज़ु़ल्म से लड़ने को उसके पास क्या हथियार था
कम से कम गुस्सा तो वो अपना दिखा करके मरा।‘’



(डी एम मिश्र)
            नए मुहावरों और कंटेंट के उदात्तीकरण के साथ जब मिश्र जी हिंदी गजलों में प्रवेश करते हैं तो उनकी ईमानदारी देखते ही बनती है, ऊपर की गजल में आत्महत्या के मुहावरों की कई शक्ल व बानगी दिखाई पड़ती है जोउसी जनवादी गजल का हिस्सा है जो सम्वेदना में आधुनिक होते हुए भी मुनव्वर राना की तरह चौकाने का काम नहीं करती, बल्कि सचाई को गजलकार के पूरे ईमान से सामने लाती हैं। इसलिए इसी गजल में वे आगे कहते हैं कि
मुफ़लिसों की आह से जो हैं तिजोरी भर रहे
उन लुटेरों को हक़ीक़त तो बता करके मरा।

सुन ऐ जालिम अब वो तेरे ही गले की फॉस है
वो सियासत में तेरी भूचाल ला करके मरा ।(डी एम मिश्र)
            कलम की इस हुंकार से उपजी भाषा में जो लोकसौंदर्य गुप्त है , वह लोकचेतना का वह हिस्सा है जिससे अभिजन बतौर अपने संकट देखते हैं। सारी सत्ता की चूलें मानो उसकी आत्महत्या ने हिला दी हो !
मिश्र जी ने गजल की जो भाषा और शिल्प बरती है, उसके साथ गजल का कंटेंटकलाहीन कला(आर्टलेस आर्ट) के साथ आकर जो समकालीनता रचती है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। जब दुष्यंत की पीर पर्वत सी हो गई है तो वहडीएम मिश्र जैसे होनहार और जज़्बीजनवादीगजलगो की गजल से ही वह पिघल सकती है और उन गजलों से ही आगे की गंगा निकल सकती है–
“’’ जामे ज़हर भी पी गया अश्कों में ढालकर
  बैठा था मसीहा मेरा खंज़र निकालकर।

  खेती में जो पैदा किया वो बेचना पड़ा
  बच्चों को अब खिला रहा कंकड़ उबालकर।

  इन्सान के कपड़े पहन के आ गया शैतान
    बेशक मिलाना हाथ उससे पर सँभालकर।‘’  (डी एम मिश्र)
 पर , वहीं कभी – कभी डॉ डी एम मिश्र की गजलों का काव्यात्मक शिल्प लोक की गतिकी के साथ इतने घुलकर उसमें सौंदर्य रचता है कि वह किसी हृदयस्पर्शी संगीत की मानिंद लगता है। मिश्र जी मानव-श्रम के साथ लोकजीवन का जो रूप गठित करते हैं और पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, वह उसकी प्रकृति के साथ अपूर्व संयोजन के कारण उनके गजल में फलित होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह कला का वरन करते हुए कहीं से फुहड़, कामुक या अश्लील नहीं होती।गजल में यह श्रृंगारभाव रीतिवाद से नहीं , बल्कि श्रम से उत्पन्न होता है। बिना वासनासिक्त हुए अपने गजल-पात्र की रूप महिमा को प्रकृति से युज्य कर जीवन के रूपधर्मी सौंदर्य को गजल में नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करना डी एम मिश्र के गजलकार की अपनी विशेषता है, देखिए इस वक्तव्य के अर्थ में मिश्र जी की यह गजल, जो आपको भी पसंद आएगी –

बेाझ धान का लेकर वो जब हौले - हौले चलती है
  धान की बाली , कान की बाली दोनों सँग -सँग बजती है।

   किसी और में बात कहाँ वो बात जो चंद्रमुखी में है
   सौ-सौ दीप जलाने को वो इक तीली-सी जलती है।

   खड़ी दुपहरी में भी निखरी इठलाती बलखाती वो
  धूप की लाली, रूप की लाली दोनों गाल पे सजती है।‘’
(डी एम मिश्र)
इसलिए जब तक धरती पर मानव बचा है, उसके उर में गजल एक इच्छा-बीज की तरह जन्म लेती रहेगी, फले-फूलेगी, क्योंकि यह मनुष्य की आदिम छटपटाहट और उसके राग को व्यक्त करने का बहुत माकूल और सशक्त विधा व माध्यम है। लेकिन हिंदी गजल को हिंदी कविता विधा से दूर रखने की संप्रति जो चालें चली जा रहीं, लोकचेतना से जिस तरह अलगा कर उसे देखा जा रहा , उसे एक अलग परम्परा और घराने की बात कहकर संकुचित घेरे में बंद रखा जा रहा, उन्हीं कुप्रवृत्तियों का यह परिणाम है कि कविता भी दिनानुदिन पाठकों से अलग-थलग होती जा रही। खूब कूड़ा-कविताएँ रोज लिखी जा रही । कवि ही आपस में पढ़ रहे, पढ़वा रहे। जनमानस को इन कूड़ा कविताओं से क्या मतलब ?
प्रसंगवश यहाँ गजलगो डी एम मिश्र की ग़ज़ल तमाशा देखेंगेआपके सामने रखना चाहता हूं । आप खुद तय करें कि यह कितनी गज़ल है और कितनी कविता ! यह भी कि , यह ग़ज़ल कविता से कितनी कमजोर या मजबूत है? 
अपनी जनधर्मिता में हिंदी कविताओं के साथ जितनी मजबूती से यह गजल खड़ी है ,उतनी ही समसामयिक प्रवृतियों की वाहक भी है । फिर गजल और कविता को एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी बनाकर कवियों-आलोचकों द्वारा गजल विधा को कविता-विधा में समाहित करने से इतना ऐतराज क्यों ?
आइए यह गजल देखकर इस सवाल को ढूंढें- 

‘’ कोई हिटलरअगर हमारे मुल्क में जनमे तो।
  सनक में अपनी लोगों का सुख-चैन चुरा ले तो।
  अच्छे दिन आयेंगे, मीठे - मीठे जुमलों में,
  बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो।
   मज़लूमों के चिथड़ों पर भी नज़र गड़ाये हो,
  ख़ुद परिधान रेशमी पल-पल बदल के निकले तो।‘’
(डी एम मिश्र)

            अदम गोंडवी की तरह ही डी एम मिश्र की गजलों ने जनवादी गजल कीदुनिया में जो जमीन की निर्मिति की है, वह न केवल मौलिक और प्रामाणिक है, बल्कि जनविद्रोह के नए स्वर भी रचती है जिनमें आज की जिंदगी के संघर्ष की विकल आवाज़ है।हिंदी गजलों को लगातार उचाईयों पर ले जा रहे और उसे लोकचेतना की सही जमीन से युज्य कर रहे डी एम मिश्र आज के एक महत्‍वपूर्ण गजलकार हैं यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं , इसीलिए उनकी गजलें आये दिन स्‍तरीय पत्र – पत्रिकाओं में पढने को मिल जाती हैं।•
– सुशील कुमार
सम्प्रति, सहायक निदेशक,प्राथमिक शिक्षा निदेशालय,
-          स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, एम०डी०आई० भवन (प्रथम तल), पो०- धुर्वा, राँची (झारखंड)-834004

-          मोबाइल नंबर – 7004353450
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1 टिप्पणियाँ:

Bhaskar Choudhury said...

"अच्छे दिन आयेंगे, मीठे - मीठे जुमलों में,
बिन पानी का बादल कोई हवा में गरजे तो।" राजनैतिक एवं जनवादी चेतना से लैस डॉ डी एम मिश्र जी ग़ज़लों पर बेहतरीन समीक्षा. सुशील जी एवं डी एम मिश्र जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ..

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