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Friday, July 7, 2017

2 'पाठक का रोजनामचा' आलोचना की किताब से उनका पूर्वकथन - "अभिप्राय "

युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की नई आलोचना-पुस्तक है - 'पाठक का रोजनामचा' । उन्हीं के किताब से उनका पूर्वकथन - 

अभिप्राय 
साहित्य को समय के सन्दर्म में देखना समझना केवल साहित्य के लिए नहीं समय को परखने के लिए बेहद जरूरी है । समय और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं । समय और साहित्य को नाभिनालबद्ध करके परखना एवं एवं इतिहास और जीवन की उपजीव्यता का ख्याल कर आज के मनुष्य को साहित्य का केन्द्र समझना और इस समझ को रचनात्मक अनुकृति का स्वरूप देना लेखक का सरोकार होना चाहिए ।मैं समकालीन आलोचना में देख रहा हूँ कि साहित्य के मूल्यांकन में फार्मूलों का बहुत प्रयोग होता है । आधुनिक काल के पूर्व विशेषकर आजादी के पहले की आलोचना शास्त्रीयता से अधिक प्रभावित रही इसमे संस्कृत काव्यशास्त्र के स्वीकृत उपलक्षणों और मूल्यों के आधार पर निर्णय दिए जाते थे । नाटक की आलोचना के लिए दशरूपक आदर्श था तो कविता के लिए मम्मट और विश्वनाथ की स्थापनाओं का आधार ग्रहण करना पडता था । यह प्रवृत्ति बहुत दिन तक रही द्विवेदी युग और उसके बाद तक भी यह काव्यशास्त्र आलोचकों और पाठकों को आतंकित करता रहा है । छायावाद ने पहलीबार आलोचना मूल्य तोडे । पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अनुवादों और पाश्चात्य काव्य सिद्धांतों के अनुप्रयोग ने आलोचना के प्रतिमान बदले तो आचार्य शुक्ल जैसे आलोचक ने दोनो तरह के सिद्धांतों को प्रस्तुत कर कृतिगत व युगगत मूल्यांकन की नींव डाली । शुक्ल के सिद्धांत अपने थे उन्होने प्रतिमान भी गढे और कई किताबों की समीक्षा उनकी सामाजिक उपादेयता के सन्दर्भ में की ।नन्द दुलारे बाजपेयी  , हजारी प्रसाद द्विवेदी , नगेन्द्र , नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने इस पद्धति को विस्तार दिया और अपने अपने विनिर्मित मूल्यों व प्रतिमानों के आधार पर समीक्षाएं लिखीं फिर भी आलोचनात्मक मूल्यों में प्रतिमानों का बोलबाला रहा है । और साहित्य को किसी न किसी समय विशेष के अनुशासन में बाँधकर देखने की प्रवृत्ति हमेशा रही है ।चूँकि हर दश बारह साल में पीढी बदल जाती है ।मगर मूल्य बदलने में समय लगता है । कवि और उसकी कविता के लिए आलोचना का संकट बरकरार रहता है मूल्य पुराने हो जाते हैं और पीढी नयी हो जाती है ।हम प्रतिमान घिस जाते है कविता अनुपयोगी हो जाती है ।यह संकट तब और गहरा हो जाता है जब आलोचक बुजुर्ग हो और कवि नया हो बुजुर्ग आलोचक अपनी पीढी के मूल्यों के आधार पर मूल्यांकन करता है इसलिए अधिकतर नयी पीढी के लेखक खारिज होने लगते है । आज हर लेखक इस सवाल को उठाता है ।  हर युवा की समस्या होती है कि उसकी चर्चा वरिष्ठ आलोचक नही कर रहे हैं । इसलिए  हर एक पीढी की कविता  अपने लिए नया आलोचक भी पैदा करती है । दश साल के अन्तराल में केवल पीढी और कविता का जन्म नही होता है आलोचना मूल्य का भी जन्म होता है आलोचक की पीढी का भी जन्म होता है । यह आलोचक अपने मानक तय करता है और अपने समय का विश्लेषण करता है ।मूल्यों को माँजता है धोता है साफ करता है और नये मानक तैयार करता है ।लेकिन आलोचना का कोई भी मानक तैयार करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आलोचना के मूल्य पीढीगत नही होते है ।आप यदि पीढी के स्तर से आलोचना देखते हैं तो बहुत से युग एवं पीढियाँ खारिज हो जाती हैं और ऐसी आलोचना कभी भी स्थाई आधार नही निर्मित कर पाती है पीढी बीतते ही अपना वजूद खत्म कर लेती है ।पिछले तीन चार दशक का इतिहास देखा जाए तो हिन्दी आलोचना के बहुत से आलोचक अप्रासांगिक हो गये हैं रमाकान्त शर्मा , जीवन सिंह अजय तिवारी , पुरुषोत्तम अग्रवाल , जैसे आलोचकों ने के सिद्धांत इतने संकुचित रहे कि वह अपने युग का अतिक्रमण नहीं कर पाए जल्दी उभार हुआ और जल्दी इनकी समाप्ति भी हो गयी ।इसलिए आलोच्य किताब को कभी महज चर्चा व परिचर्चा का साधन न बनाना चाहिए बल्कि आलोचना को समकाल के आगे पीछे देखकर चलने की समूची सभ्यता का विमर्श बनाना चाहिए । इसलिए मै आलोचना मे युगबोध की सिफारिस करता हूँ । हर एक युग का अपना स्वरूप होता युग की समस्याएं होती हैं ।आलोचना का मानक होना चाहिए कि कवि अपने युग के अनुरूप अपने वर्तमान को किस रूप मे ले रहा है । वर्तमान के प्रति उसकी समझ क्या है उसकी प्राथमिकता क्या है वह किन प्रवृत्तियों के पक्ष में हैं किनके खिलाफ है उसकी रचनात्मक प्राथमिकता मे विचारधारा का हस्तक्षेप है कि नही युगानुसार परिघटनाओं के प्रति उसका रवैया क्या रहा । वह किस समस्या को केन्द्रियता प्रदत्त कर रहा है सब कुल मिलाकार कवि का युग और कवि की रचना को विचारधारा व परम्परा के आलोक में देखना चाहिए तभी किसी कृति का सही और स्थाई पाठ किया जा सकता है ।इसके अतिरिक्त यदि रीतिशास्त्रीय मूल्यों व क्लासिकल सिद्धांतों जैसे गाँव का सौन्दर्य बोध , किसान बाला , अहा ग्राम्य जीवन , भावुकता , उच्च कल्पना जैसे मूल्यों को आधार बनाया गया तो युगीन आक्रोश को अभिव्यक्त करने वाली रचनाएं साहित्य के दायरे से बाहर हो जाएंगी ।क्योकी युगीनता ही व्यक्ति का चरित्र बनाती है । आप साहित्य के प्रति जनता के प्रति कितने पक्षधर हैं आपके कर्म आपका आचरण आपके युग मे ही पता चल सकते है । साहित्य के आचरण और व्यक्ति की पक्षधरता को अलग करके नही देखा जाना चाहिए । यदि आप पक्षधर है नही है और आपकी रचना जनवाद से लवरेज है तो आप अधिक दिनों तक अपने इस रचनात्मक छल को नही ढो सकते हैं हर विधा में आप अपने को छिपा सकते हैं कविता मे अपने व्यक्तित्व को छिपाना बडा कठिन होता है । आपका निजी पक्ष भी कविता उजागर कर देती है । इसलिए कवि के युग को ही आलोचना का मानक बनाना चाहिए कवि के व्यवहार उसका समाज उसकी भाषा उसका लोक उसकी अस्मिता उसका पक्ष देखकर ही कविता का पाठ व आलोचना करनी चाहिए ।मैं कृति की स्वतन्त्रता का पक्षधर नही हूं कृति को केवल कृति मानकर आलोचना करने वाले लोगों का युग बीत गया अब तो युग और समय के सन्दर्भ मे लेखक के समूचे पक्ष को देखने की जरूरत है । समग्रता से पढना व कृति को देखना सही निष्कर्ष प्रदत्त करता है इससे कवि के चिन्तन मे समाहित संष्लिष्ट निष्कर्षों की बहुआयामी छटा निकलकर सामने आ जाती है कृति का सामाजिक सरोकार , राजनैतिक पक्ष समकालिक हस्तक्षेप व भविष्य का विजन भी समझ में आ जाता है । क्योंकी ये स्थितियाँ लेखक की रचना प्रक्रिया का अंग होती हैं इनसे लेखक प्रभावित होता है वह इन्ही परिस्थितियों से संघर्ष करता है संवेदित होता जब रचना उत्पन्न होती है वगैर संवेदना के रचना कैसे होगी । कहीं न कहीं संवेदना का स्रोत तो होता ही है । हम संवेदना के स्रोत को आलम्बन भी कह सकते हैं आलम्बन वह विषय है जिससे कृति रचना की प्रेरणा मिलती है ।और जब संवेदना है आलम्बन है तो हम रचना को स्वतन्त्र कैसे मान सकते हैं । पक्षधरता देखना इसलिए जरूरी है कि मान लीजिए लेखक ने किसी पुरस्कार के लिए रचना लिखी हो या किसी लालच या पद और प्रतिष्ठा के लिए लिखी है । जैसा आजकल चल रहा है और पहले भी ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने आए हैं । आज तो कारपोरेट और सत्ता साहित्य पर नियन्त्रण कर रहे हैं ।कारपोरेट के पैसों से पत्रिकाएं निकल रही हैं बडे प्रकाशक सत्ता से गठबन्धन करके लाखों रूपये कमा रहे हैं और सत्ता द्वारा प्रायोजित लेखकों को प्रकाशित भी कर रहे हैं फेस्टिवल , आयोजन , बडे बडे समागम करवाए जा रहे झुण्ड के झुण्ड लेखक पाला बदलकर ऐसे आयोजनों मे शिरकत कर रहे हैं और इन्ही ताकतों के इसारे पर चन्द लाभ के लिए अपनी रचनाएं भी लिख रहे हैं ।तो हमे पक्षधरता देखना होगा और इसे भी आलोचना के मूल्यों में जगह देना पडेगा । विचारधारा फैशन नही है वह सरोकार है जीवन देखने और जीने का नजरिया है अगर आप विचारधारा विरोधियों का गुण गान कर रहे हैं और सत्ता द्वारा किए गये कुघातों पर जमीनी प्रतिरोध नही कर रहे हैं केवल रचना मे वामपंथी है तो ऐसे मे रचना भी लेखक की पक्षधरता उजागर कर देती है लेखक की निजता पकड मे आ जाती है । अस्तु आलोचना को एक सधे हुए पाठक की तरह पढते हुए युगीन मूल्यों के अनुरूप देखना चाहिए और आत्मीयता के साथ उन पक्षों का खुलासा करना चाहिए जो लेखकीय व्यक्तित्व और रचना में गुँथे हुए हैं । हम कृति महज रूप या फार्मेट की तरह न लेकर उसे सामाजिक हस्तक्षेप की लेखकीय इमानदारी के रूप मे ग्रहण करें । प्रस्तुत किताब "पाठक का रोजनामचा" एक ऐसी ही किताब है जिसमे समकालीन युवा कथाकारो , कवियों की कुछ पुस्तकों व भक्तिकाल और आदिकाल का युगीन प्रवृत्तियों को लेकर पाठ किया गया ।इसमे रचना द्वारा रचनाकार के व्यक्तित्व व उसकी समय के प्रति सचेष्टता पर बात की गयी है ।इस पुस्तक में संग्रहीत सभी आलेख लगभग प्रकाशित हैं और कुछ नये आलेख भी संग्रहीत हैं ।एक पाठक अपनी समझ के अनुसार कृति और कृतिकार को कैसे परखता है जब किसी अवधारणा या पूर्वदत्त आप्तवाक्य का निषेध करते हुए पाठक केवल कृति को देखता है तो मेरे ख्याल से वह किसी भी किताब का सही पाठ कर रहा होता है । हमे रचनाकार के  व्यक्तित्व व उसकी कृति की सामयिक उपादेयता पर सही सही सोचने का नजरिया प्राप्त होता है यदि हम किसी अवधारणा के सहारे किसी लेखक पर विमर्श करते हैं तो कहीं न कहीं लेखक के मानस व उसकी निजी सोच को उपेक्षित कर रहे होते हैं ।"रोजनामचा" केवल पाठकीय वक्तव्य है । एक पाठक किताब को पढने के बाद जो वक्तव्य देता है वही वक्तव्य इस किताब में हैं । इसलिए अध्यायों में सामन्जस्य नही है । किसी की उपन्यास किसी का कहानी संग्रह तो किसी का कविता संग्रह का विश्लेषण है । एक अध्याय तो ऐसा भी है जिसमे वरिष्ठ आलोचक गणेश पाण्डेय द्वारा सम्पादित नयी सदी की कविता नामक लम्बे निबन्ध पर भी  बात कही गयी है ।मेरे कहने का आशय है विषय विविधता है । इसे रोजनामचा इसी लिए कहा कि यह पाठकीय प्रतिक्रियाओं का संग्रह है । और इसमे तारतम्यता का व विषयपरकता का सूत्र केवल यही है कि इसमे कृति को कृतिकार के व्यक्तित्व व युग को परखते हुए पढा गया है । किसी पूर्वमत अवधारणा आदि का उपयोग नही किया गया है । इसलिए इस किताब के सभी आलेखों में मेरे भीतर के पाठक को भी जाना समझा जा सकता है । अब यह किताब आप सब के हाथ मे हैं । मै पाठक के रूप मे कितना सफल हूं और कितना असफल हूं यह फैसला आपको करना है|
 
                                                                                                        
उमाशंकर सिंह परमार 
                                                                                                       

 बबेरू जनपद बाँदा
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2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार said...

नई आलोचकीय पृष्ठभूमि और चिंतन की बेहतरीन किताब।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-07-2017) को 'पाठक का रोजनामचा' (चर्चा अंक-2661) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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