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Sunday, July 23, 2017

1 कुलीन लोक से मुठभेड़ करती कविताएँ - उमाशंकर सिंह परमार

युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की नई आलोचना-पुस्तक है - 'पाठक का रोजनामचा' जो डायरी विधा में लिखी गई है । उन्हीं के किताब से उसका अध्याय सप्तम है जो सुशील कुमार की कविताई पर केन्द्रित है । यह जितनी समीक्षा है उतनी ही आलोचना। जितनी आलोचना है उतनी ही डायरी , यानि इन विधाओं के अपूर्व संयोजन से इस किताब के सभी पाठ बनते हैं ... तो प्रस्तुत है सप्तम अध्याय  - 

        कुलीन लोक से मुठभेड़ करती कविताएँ
-    (सुशील कुमार के काव्य-संग्रह जनपद झूठ नहीं बोलता पर समीक्षा )
पाठक बहुत ही भुलक्क होता है। वह अपनी आँखों के सामने से गुजरती हर चीज व घटना को याद नहीं  रखता है।  वह उसी घटना का स्मरण रखता है , जिसमें वह डायरेक्ट इन्वाल्व रहता है या जिसे देखकर उसके भीतर तक संवेदना रच बस जाए । रचना भी एक वस्तु की तरह है।  पाठक उससे गुजरता है।  अनुभव अर्जित करता है।  अपने अनुभवों को लेखकीय अनुभवों से जोता है। यदि पाठक और लेखक आपस में तादाम्य नहीं  कर रहे तो समझिए कि पाठक के चित्त में रचना चिरस्थाई नहीं  हो सकती। वह संचारी भाव की तरह क्षणभर के लिए विचलित करेगी और थोड़ी देर बाद अपना प्रभाव समाप्त कर लेगी । यह तभी सम्भव है,  जब कवि आम आदमी की तरह रचना में अपनी उपस्थिति बरकरार रखे | यदि कविता में कवि अनुपस्थित है तो पाठक की चेतना भी अनुपस्थिति हो जाएगी । जब कवि अपने परिवेश और जीवन के विभिन्न क्षणों में अकुलाता है तो बेचैन होता है।  तब वह अपनी अकुलाहट को शब्द देता है।  यही शब्द पाठक को बाँधते हैं।  वह कवि या लेखक की अकुलाहट अपनी अकुलाहट समझता हैं और लेखक के आक्रोश को अपना आक्रोश समझता है।  लेखक के समय और परिवेश को अपना समय और परिवेश समझता है।  यही है लेखक और पाठक का तादाम्यीकरण । इस प्रविधि में आजकल बहुत कवि असफल हैं।  पाठक का माहौल अलग है और कवि का माहौल व वर्गीय यथार्थ अलग है, तो लेखक पाठक के साथ कैसे सम्वाद कर पाएगा ? सम्वाद तभी कायम होगा, जब लेखक और पाठक का आपसी साधारणीकरण होगा ।
            सुशील कुमार का कविता संग्रह “जनपद झूठ नहीं  बोलता” इसी तरह की किताब है,  जो पाठक को बाँधती है।  उसे अपने यथार्थ तक ले जाकर उसका दर्शन कराती है।  । इस किताब की कविताएं पढ़कर कोई यह नहीं  कह सकता कि इन कविताओं के यथार्थ को हमने कभी देखा नहीं  है या हमने कभी भुगता नहीं  है,  या फिर यह यथार्थ हमें प्रभावित नहीं  करता है। किताब का शीर्षक बहुत सटीक है-  जनपद झूठ नहीं  बोलता ।  इसका आशय यही निकालिए कि कविताएं झूठ नहीं  बोलती हैं जो भी इसमें है,  वह हर जगह है।  जो इसमें नहीं  है,  वह कहीं नहीं  है। आदमी अपने परिवेश को और अपने चतुर्दिक घिरे पर्यावरण को किस रूप में देखता है?  वह अपने माहौल का किस तरह चाक्षु विश्लेषण करता है-   यह इस कविता संग्रह में देखा जा सकता है।  
             सुशील यहां जो कुछ अनुभव कर रहे हैं, वह आम आदमी अपने वास्तविक यथार्थ में अनुभव करता है। यहां काल्पनिक और अवास्तविक यथार्थ की रंचमात्र भी सम्भावना नहीं  है।  सुशील झारखंड के रहने वाले हैं।  झारखंड की भौगोलिक स्थिति जीवन के लिए बड़ी  कठिन है।  आम तौर पर पठारी और पथरीली जमीन है।  इस पहाड़ी जमीन में ही खेतीबाड़ी होती है और जंगलों व खनन द्वारा आम जनजीवन संचालित होता है।  । पहाड़ ही खनिज के स्रोत हैं और जन जीवन के आधार हैं, शायद यही कारण है कि जनपद झूठ नहीं  बोलता।  यहाँ पहाड़ का उल्लेख बहुत बार हुआ है।  । सुशील पहाड़ पर बडी आत्मीयता से कविता लिखते हैं । हालांकि पहाड़ कविता के लिए रूढ़ सा है।  लेकिन इसका उपयोग देखा जाए तो सौन्दर्य के आगा के रूप में अधिक हुआ है।  जिन लोगों ने पर्वत व उनके बीच बसे गाँवो और जीवन को नहीं  देखा वह स्वाभाविक है, वह पहाड़ों का सौन्दर्यबोध ही करेगें । सुशील इस परम्परा से थोडा हटकर हैं।  वह पहाड़ों में सौन्दर्य नहीं,  जीवन-बोध देखते हैं । जीवनबोध  ही उनकी कविता का कहन भी है।  उनकी किसी भी कविता में  पहाड़ वस्तुपरक नहीं  है,  जीवन परक है।  एक तरफ आम जनजीवन है।  तो दूसरी तरफ आम जनजीवन को अभिव्यक्त करता हुआ पहाड़ों का जीवन है।  ।प्रकृति और जन दोनो का तादाम्यीकरण हो गया है।  “खाली रहती है।  पहाड़ी  बस्तियाँ दिन भर / बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ / सुनसान माँझी थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता / उधर पूरब में जलता भुनता सूरज ( जनपद झूठ नहीं  बोलता पहाडिया ) यहाँ पहाड़ का सूनापन और आदमी से रहित होना कह रहा है कि पहाड़ों में सबसे बडी समस्या रोजी -रोटी की है, नहीं तो पहाड़ दिन भर सूने न रहते । इसका आशय है कि पहाड़ों के बीच बसे गाँवों के वासिन्दे सारा दिन मजदूरी करते हैं या पहाड़ का सीना चीरकर खेती करते हैं । श्रम हर आदमी के जीवन में होता है।  लेकिन हर आदमी का जीवन श्रम से ही संचालित नहीं होता है।  कोई व्यक्ति श्रम करता है  तो कोई श्रम के हिस्से में अपनी दावेदारी करता है।  पहली कोटि और दूसरी कोटि सनातन है और सर्वव्यापी समस्या है।  आम शहरों और गाँवों में श्रम की लूट उतनी अधिक नहीं  है जितनी की बीह जंगलों और पहाड़ों में लूट की जाती है।  यही कारण है, अपना वाजिब हक न मिल पाने के कारण पहाड़ों के वाशिन्दे केवल श्रम करते हैं।  अपनी छोटी-छोटी खुशियो और अपने वाजिब हक के लिए हर रोज संघर्ष करते हैं | उनका एकमात्र संघर्ष रोटी है  जिसके लिए वह अपने मानव सुलभ वश्यकताओं को भी त्याग देते हैं । सुशील ने इस रोजी-रोटी की समस्या को बड़े फलक पर उतारा है। पहाड़ों की इस समस्या पर अभी तक इतना गम्भीर कविता संग्रह मैने नहीं  देखा जहां सौन्दर्य की बजाय भूख की तडप और इंसानी जज्बात दिखाए जाएं । फूलमनी एक लम्बी कविता है।  इस कविता में श्रम के हक और विस्थापन की समस्या व पहाड़ी  जीवन में व्याप्त जातीय सामन्तवाद पर बड़ी गम्भीर चर्चा की गयी है।  फूलमनी की पिता साहूकार के कर्ज में दबा है।  उसका पति बेरोजगार है।  वह असम कमाने गया है।  फूलमनी को आशा है।  उसका पति पैसा कमाकर लाएगा और हम साहूकार के कर्ज से मुक्त हो जाएगे यह कठिन जीवन है।  इस जीवन को फुलमनी ढो रही है।  यहाँ फूलमनी महज एक प्रतीक है।  । ऐसी हजारों फूलमनी हैं जो हिन्दुस्तान में इससे भी बदतर जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं । देखिए उसकी स्त्रियोचित इच्छाएं किस कदर घुटी और मरी हैं वह क्या चाहती है।  “आएगा सुकुल बेसरा गाँव / असम से कमाकर / तुम्हारे लिए नयी साडी / ब्लाऊज के कटपीस / और रोल गोल्ड के / सुन्दर सुन्दर हार / रंग बिरंगे बाले लेकर ( जनपद झूठ नहीं  बोलता फूलमनी ) । जिस घर का सहारा केवल श्रम हो और श्रम का उचित मूल्य न मिले तो व्यक्ति पलायन करके अन्यत्र गमन कर जाता है। जिसके भी परिवार का सदस्य विस्थापित हो चुका है।  उसके परिवार के सदस्य ऐसे ही स्वपन देखते हैं । यह झूठा बयान नहीं  है।  सच है।  जिसने भी इस जीवन को नजदीक से देखा होगा, वह इस बयान की सच्चाई से इंकार नहीं  कर सकता है। फूलमनी विस्थापित और शोषित जन का प्रतीक बनकर उभरी है।  जो पहाड़ों की कठिन जिजीविषा के साथ-साथ व्यवस्थागत शोषण का भयानक सच उजागर करती है।  सुशील पहाड़ों को कल्पना द्वारा अयथार्थ नहीं  बनाते हैं।  हिन्दी कविता की बहुत बुरी परम्परा है कि कवि समझते हैं कि जितना हम यथार्थ को अमूर्त कर देगें या चमत्कारिक कर देगें, हम उतनी ही महान कविता लिख देगें । यह धारणा गलत है।  केदारनाथ सिंह , ज्ञानेन्द्र पति , जीतेन्द्र श्रीवास्तव , एकान्त श्रीवास्तव , श्री प्रकाश शुक्ल आदि का यथार्थ इसी तरह का विकृत यथार्थ है। तोड़फोड़ शब्दों और प्रयोगों में हो सकती है।  यदि कविता की जरूरत है,  तो खूब तोड़फोड़ करिए।  मगर यथार्थ से तोड़फोड़ अक्षम्य है।  इससे पाठक संवेदनात्मक रूप से जुड नहीं  पाता है। कुछ कवि तो जादुई स्तर तक यथार्थ को ढो ले जाते हैं।  यह भी खेल है।  और कुछ कवि ऐसे होते हैं कि बीस साल पहले का यथार्थ कविता में प्रयोग करते हैं, जैसे एकान्त श्रीवास्तव है।  वह रह कोलकाता में रहे हैं और कविता गाँव पर लिख रहे हैं । बीस पहले देखा और समझा गया गाँव आज कैसे प्रासंगिक होगा ? बीस साल में सब कुछ बदल गया है।  जातिगत मान्यताएं , सामाजिक संरचनाएं , मूल्य , और रहन सहन सब बदल गया है।  ऐसे में याद के सहारे कविता लिखना पाठक के साथ धोखा है।  वह छल को चिन्हित कर लेता है।  सुशील का गाँव आज का गाँव है। इसलिए उनका जनपद झूठ नहीं  बोलता है।  वह वही बोलता है जो आज गाँव में हो रहा है।  जो गाँव में दिख रहा है।  जिस दंश को पहाड़ और पहाड़ी वाशिन्दे आज भुगत रहे हैं, उस दंश को सुशील बड़े गौर से उकेरते हैं |
              जिन कवियों को पहाड़ पर शोभा निकेतन देखने की बुरी आदत है, उन्हें कम से इस कविता बंदगाँव की घाटियाँ जरूर पढ़नी चाहिए  “यह कैसा मंजर है  कि / शहर के बाबू और महाजन / सरकार और प्रतिपक्ष के लोग / दल-बल के साथ / घाटी में अपनी योजनाएं लेकर /  पहुँच रहे हैं, चिल्ला रहे हैं / नोट पर वोट का खेल खेल रहे हैं / जबकि गांवों और टोलों के लोग / अपनी इज्जत और अपनी जान बचाकर / घाटियाँ छोड रहे हैं / दाना पानी की तलाश में / कहीं और भागकर जा रहे हैं”  ( जनपद झूँठ नहीं  बोलता ) यह मंजर आज का यथार्थ है।  । वैश्विक पूँजी और सत्ता की साझेदारी ने विकास के नाम पर जिस लूट को अंजाम दिया है, उससे केवल पहाड़ और जंगलों का अस्तित्व ही संकट में नहीं है।  मनुष्य के लिए रोटी - रोजी का संकट भी आ गया है। पहाड़ों को तोकर जंगलों को काटकर उनके परम्परागत संसाधनों को नष्ट करके संकट पर संकट पैदा किया जा रहा है। यह जनपद के प्रति कवि का वास्तविक यथार्थ है।  इसमें अतिवादिता कही नहीं  है।  इस कविता संग्रह में सुशील ने केवल व्यवस्था पर तंज नहीं  किया है, वह जीवन से जुडी हर चीज को बड़ी बारीकी से देखते हैं । जनपद के नदी-पहाड़-गाँव चरित्र लूट ही नहीं,  वहां की रीति और नैतिकता पर भी संजीदा ढंग से विमर्श करते हैं । यदि लोक उपस्थित है तो लोक की मनोदशा अनुपस्थित हो, यह सम्भव नहीं  है।  लोकधर्मी कवि लोक को तभी साकार कर सकता है।  जब वह लोक की मनोदशाओं पर भी अपना पक्ष रखे । जिस जनपद को लेकर कवि ने कविता लिखी है।  वह जनपद झूठ न बोले, इसके लिए वह मनोदशाओं और चिन्तन धाराओं की आज के परिप्रेक्ष्य में तहकीकात करते हैं । तहकीकात ही  नहीं  करते बल्कि उगा कर रख देते हैं।  “सुगनी ” इस कविता संग्रह की स्त्री चरित्र है।  सुशील की विशेषता है कि वह जब चरित्रों की बात करते हैं तो उनकी दृष्टि अस्मितामूलक होती है।  वह सामान्य चरित्र का चयन नहीं  करते । उनकी कविताओं में स्त्री और स्त्री मेंभी दलित या आदिवासी चरित्र आते हैं । सगुनी ऐसी ही चरित्र है।  जो दबी कुचली अस्मिताओं से आती है। वह किसी शहरी लडके के प्रेम में पकर अपना गाँव छोड देती है  और शहर में नर्स का काम करने लगती है। इधर गाँव मेंसगुनी का घर छोडकर जाना चरित्रहीनता समझा जाता है।  उसके दरवाजे पर गाँव के लोगों ने जाना छो दिया है।  “सगुनी तुम्हारा इस तरह / उस शहराती अजनबी संग दिल्ली चले जाना / और वहीं नर्श की नौकरी पर रह जाने के फैसले के बाद / गाँव की लडकियों ने दुआर तक आना बन्द कर दिया ( कब लौटेगी सगुनी गाँव )  यह चरित्र है गाँव का । फिर भी सुशील इस नकारात्मक प्रवृत्ति को आत्मीयता से विवेचित करते है।  ऐसा कहीं नहीं प्रतीत होता कि कवि भी गाँव की इस मान्यता के पक्ष में हैं।  मगर कवि का पक्ष गाँव की जनता जरूर है क्योंकि वह जानता है, इस नकारात्मक आदत का मूल कारण जनता नहीं,  व्यवस्था है।  व्यवस्था उसे इन आदतों  में जीने के लिए बाध्य करती है।  । यह सुशील की कविता का बेहद संतुलित पक्ष है कि वह गा्ँव वालों का पक्षपात करते हुए भी सामन्ती मान्यताओं के पक्ष मेंनहीं  जाते हैं । मैने इस बात का उल्लेख पहले भी किया है  कि जो गाँव और गाँव वालों को सुखद कल्पना आलोक में रंगकर देखने के आदी है।  उनकी भावुकता सामन्ती मूल्यों के पक्ष में  खड़ा कर देती है।  ऐसा जीतेन्द्र श्रीवास्तव और एकान्त श्रीवास्तव के साथ है। जब भी मूल्यों की बात आती है तो उनकी कविता आधुनिक नहीं  हो पाती है।  गाँव के प्यार में इतने पागल हो जाते हैं कि उचित और अनुचित का विवेक भी नष्ट हो जाता है।  |
            सुशील संस्कारों के साथ-साथ सवालों पर भी गौर फरमाते हैं।  जनपद झूठ नहीं  बोलता गाँव का समूचा काव्यान्तरण हैं ।  इस कविता संग्रह को पढ़ने के बाद गाँव से सम्बन्धित कोई सवाल छूटता नहीं  है।  न ही वह विसरता है। सुशील जब अस्मिताओं की चर्चा करते हैं तो जाति का सवाल भी रखते हैं । हमारे लोकधर्मी कवियों ने कभी अस्मिता के सवालों पर बात नहीं  की है।  लोकधर्मी ही नहीं,  बड़े स्थापित कवि भी जाति के सवाल पर चुप हो जाते हैं - भरत प्रसाद , सुशील कुमार , सन्तोष चतुर्वेदी  जैसे दो चार कवि हैं जिन्होने जाति को भी अपने विमर्श में सम्मिलित किया है, या यह कह सकते हैं कि चरित्र गढ़ते समय वह चरित्र की जाति भी रखते हैं । यह सवाल आज के समय सबसे अहम सवाल है। गाँव में अधिकांश उच्च जातियाँ सामन्ती होती है हालाँकि शोषित सब होते हैं।  पीड़ित  सब होते हैं मगर जातीय ठसक इतनी गहरी होती है कि यह सोच ही वर्गीय अन्तराल का कारण बन जाती है। यदि कोई धनवान है तो जाति के सवाल उतना मायने नहीं  रखते।  लेकिन यदि गरीब तबके से है तो जातिवाद और गरीबी दोनो मिलकर उस व्यक्ति को व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।  जाति व्यवस्था के प्रति कवि का गुस्सा जाहिर कर देता है कि कवि की चिन्ता और बेचैनी दोनो बहुमुखी है।  “अपनी र ही मेहनत मजूरी करना / बाहर लोग हिकारत भरी नजर से देखते हैं / असाम में अब तक हमारे दर्जनों भाइयों को / मौत के घाट उतार दिया गया / मुम्बई से भी हमें खदेडा गया (असम से लौटकर हरिया सोरेन ) हां चरित्रों के माध्यम से तो जाति के सवाल उठाए गये है।  पर कवि  सीधे भी जाति से टकराता है वह महज कवि नहीं  है, न दर्शक कवि है,  न कहन कवि है।  यह गुस्सैल कवि है, जो देखता है,  समझता है इतिहासबोध व व्यवस्था की खामियों से परिचित होकर टकराता भी है।  । जातीयता जब हद से बढ़ती है तो उसकी परिणिति जगतीय हिंसा और नस्लीय हिंसा में होती है। हद तो तब होती है।  जब दूसरे समुदाय के लोगों को  अपने से अलग मानकर उन्हे बाहरी करार दिया जाता है।  अभी हाल के वर्षों मेँ मराठी मानुष का मुद्दा जो कट्टर पंथी मराठी राजनीति का नमूना है।  और असाम में आदिवासियों के साथ ह़िसा इसी जातीयता की पैदाईश है। जातिव्यवस्था और अर्थव्यवस्था ने इस मुल्क के वासिन्दों को किसी काम का नहीं छोड़ा है।  | ऐसे में कवि चुप कैसे रहेगा ? वह अपने स्तर से प्रतिरोध करता है  और करेगा । सुशील इस जातीयता से लगाव नहीं  रखते है।  परन्तु वह गाँव से लगाव रखता है।  मगर गाँव की हर व्यवस्था से उसे लगाव नहीं  है।  वह हर संरचना को स्वीकार करने का हवा हवाई और उच्श्रृखंल मामला नहीं  बनाता है। अपना गाँव उसे इसलिए प्रिय है कि वह भारतीय अर्थव्यवस्था और राजव्यवस्था के नक्से में नहीं  आता है। गाँव से आदमी पलायन करता है। जंगल कट जाते हैं। पहाड़ नोच लिए जाते हैं।  श्रम लूट लिए जाता है।  सब कुछ चला जाता है और इसके बदले कुछ भी नहीं  मिलता।  इसलिए वो जनपद के प्रति आत्मीय दिखता है और आत्मीयता दिखाता है। गाँव से गायब होती सुविधाओं का जिक्र उनकी कई कविताओं में आता और पूरे आक्रोश व ताजगी के साथ आता है।  लेकिन इन अभावों की कवि को कोई चिन्ता नहीं  है।  वह बार बार अपने गाँव लौटता है।  अपनी जमीन अपने लोगों और अपनी माँ को याद करता है।  देखिए माँ कविता “दुनिया के टंटो से आजिज आ / लौट आऊंगा तुम्हारे पास जब / तो गोद मेंमेरा सिर धर / अपनी खुरदरी हथेली से / जरा जरा मुझे थपकियाना माँ (माँ/ जनपद झूँठ नहीं  बोलता) समकालीन कविता के परिदृष्य का बहुत बड़ा हिस्सा बनावटी कविताओं का है। शहरीकरण व केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति ने भी कविता का बहुत नुकसान किया है। विश्वविद्यालयों की अन्दरुनी राजनीति व हिन्दी साहित्य को विश्वविद्यालयों का मुहताज हो जाने के कारण गाँव जवार के कवियों द्वारा लिखा गया साहित्य जानबूझकर हासिए पर ढ़केला जा रहा है और खाए-पिए अघाए उच्चवेतन भोगी लोग कविता की ठेकेदारी कर रहे हैं ।ऐसे में स्वाभाविक है कि नकली कविताएं बढेगीं और नकली कविताओं को ही मुख्यधारा का समझा जाएगा । ऐसे में सुशील जैसे हिम्मती आलोचक और गहन बेचैनी की कोख से उत्पन्न कविताओं के सृजक का उभर कर सामने आना आश्वस्तकारी है।  अपनी जमीनी संवेदना और लहदा भाषा के साथ लोक की आत्मीयता और अन्तर्विरोधों का यथार्थ बिम्बांकन करने वाला यह स्वाभिमानी कवि अपनी कविता में लोक की गरिमा को बचाए रखने में बेतरह सफल हुआ है।  । लोक की असलियत व लोक की वास्तविक विसंगतियों का सच उघाड़ कर रख देने में इस कवि का जवाब नहीं  है।  यही कारण है कि सुशील का अभिकल्पित लोक उन जड़ लोकवादियों को रास नहीं
आएगा, जिन्हें भाषा का सौन्दर्य और लोक के रीतिग्रस्त सौन्दर्य ही भाता है। जनपद झूठ नहीं  बोलता कवि की जिम्मेदारियों और उसकी ओर से की जाने वाली कार्यवाहियों का सच्चा दस्तावेज है।  
                                                   उमाशंकर सिंह परमार
                                                      बबेरू / बाँदा
                                                   ९८३८६१०७७६ 
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1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25-07-2017) को वहीं विद्वान शंका में, हमेशा मार खाते हैं; चर्चामंच 2677 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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