Blogger Widgets
नवीनतम पोस्ट -

Monday, July 17, 2017

2 आत्मसंघर्ष के महत्वपूर्ण कवि : तेजिंदर

[यह समालोचना कवि-कथाकार तेजिन्दर जी केंद्रित अंक पत्रिका *छत्तीसगढ़-मित्र* अप्रैल 2017 में छपी है। ] - सुशील कुमार
"यह कविता नहीं
एक बयान है कि
अब चिड़िया को कविता में
आने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

चिड़ियां, पेड़, बच्चा और मां
- इनमें से कोई भी नहीं आएगा
कविता में
यहां तक कि कविता भी नहीं ।

समय के ऐसे दौर में
जब बादशाह खाता है रेवड़ियाँ
और बाँटता है टट्टी,
मैं हैरान हूं कि
तुम्हें पेड़ और बच्चे याद आ रहे हैं।" (कविता 'बयान' का अंश/ तेजिंदर)
श्री तेजिंदर को आप उपन्यासकार-कहानीकार के रूप में तो जानते होंगे पर शायद कवि के रूप में नहीं। अगर जानते भी हों तो उनकी कविताएँ संभवत: नहीं पढ़ी होंगी। (क्योंकि सोशल मीडिया या ब्लॉग पर उनकी कविताएँ उपलब्ध नहीं,  न 'कविताकोश' जैसे किसी वेबसाईट पर ही लगाई गयी है , और पुस्तक भी फिलहाल उपलब्ध नहीं।) यह हिन्दी साहित्य की विडम्बना कही जाएगी। इस वरिष्ठ साहित्यकार का नाम है – श्री तेजिंदर (गगन)। पैंसठ वर्षीय तेजिंदर गगन के अब तक चार उपन्यास, दो कहानी संग्रह, एक डायरी, एक जीवनी और एक कविता संग्रह "बच्चे अलाव ताप रहे हैं' (1997) आ चुके हैं। कहना चाहूँगा कि मुक्तिबोध, धूमिल और कुमार विकल की काव्य-परंपरा के अत्यंत दृष्टि-सम्पन्न कवि श्री तेजिंदर पिछले तीस वर्षों से ऊपर लेखन-कार्य में रत हैं।
अक्सर यह देखा जाता है कि स्पष्ट पक्षधरता और विचारधारा के बावजूद खराब कविताएँ प्रभूत मात्रा में लिखी जाती हैं, गोया कि परिदृश्य में विचारधारा मात्र के प्रबल पूर्वाग्रह से युत खराब कविताओं की भरमार है। इस स्थिति में तेजिंदर की कविताएँ प्रतिबद्ध विचारधारा के साथ सर्जनात्मक प्रतिभा और काव्यात्मक सार्थकता का बखूबी भान कराती है - वस्तु और रूप दोनों स्तरों पर- और अपना प्रतिमान भी खुद बनाती हैं। ऐसी कविताओं को आलोचकों के प्रतिमानों की जरूरत न हुई , न कभी होगी। कवि की पक्षधरता से आप उनकी कविता के प्रतिमान को स्वयं भलीभाँति समझ सकते हैं। मेरी दृष्टि में इनकी कविताएं संघर्ष और विद्रोह की अनुपम कविताएँ हैं - संघर्षरत, युद्धरत, बेचैन मनुष्य की खालिस कविताएँ। तेजिंदर जी के यहाँ यह संघर्ष जीवन और कविता दोनों स्तरों पर मौजूद है। यहाँ कवि केदारनाथ सिंह या उदय प्रकाश की कविताओं की तरह कोई 'ड्रामेबाजी' या 'फैंटेसी' का स्वप्नलोक नहीं, बल्कि सीधी-सपाट शैली में बिंबों के नायाब प्रयोग से कविताएँ बनावट और बुनावट में समाज के आंतरिक यथार्थ को खोलती हुई इतनी सघन अर्थ-स्फीतियाँ रचती हैं कि पाठक कवि की 'कहन के जादू' से स्वयं सम्मोहित हो जाता है - 'घास खाकर बिच्छू उगलना', 'पेड़ और माँ की वर्दी में सामंती क्रूर चेहरों का रूप बदलना' और 'गिद्ध पर कविता लिखने की कवि की जरूरत का महसूस होना', आदि कुछ ऐसे ही अद्भुत बिम्ब आप उनकी 'बयान' कविता में आगे देखेंगे –
"तुम लिखो यह बयान कि
इस शहर में अब सिर्फ
उन्हीं बच्चों को पैदा होने की छूट दी जाएगी
जो हाथों में तीर कमान लिए पैदा होंगे ।

हम युद्ध के मैदान में है इन दिनों।
यह समय मां और चिड़िया को याद करने का नहीं
घास खा कर
बिच्छू उगलने का है।

वे वर्दियों में है तरह-तरह की
मैं स्पष्ट कर दूं कि
वह पेड़ और माँ की
वर्दी में भी हो सकते हैं
उन्हें पहचानने के लिए
जरूरी है कि
तुम गिद्ध पर कुछ लिखो इन दिनों।"
कहना न होगा कि तेजिंदर जी की कविताएँ देर तक स्मृति में इसलिए भी टिकती है कि अपने संघर्ष या जद्दोजहद में वे बड़बोलेपन का रास्ता अख़्तियार नहीं करते, जो तुरत-फुरत क्रांति चाहने वाले विद्रोही कवियों की प्रदर्शनप्रियता का हिस्सा हो, बल्कि मानव मन को आलोड़ित कर उसकी संवेदना के भीतर भावोद्वेलन पैदा करती हैं। कवि का यह आत्मसंघर्ष घर, परिवार, गाँव, शहर, सड़क, खेत आदि आदमी की रोज़मर्रा की जरूरतों की किल्लत से गुजरता हुआ एक व्यापक जन-विद्रोह का आकार लेता है; जो जाहिर है, ममत्व और प्रेम की कोख से ही पैदा होता है –
"इन शब्दों के अर्थ में
हमारी समूची दुनिया है
और वे उन्हें हमसे छीन ले जाना चाहते हैं।

ये तमाम शब्द हमें संभाल कर रखते हैं
लड़ाई जीत जाने के बाद
प्यार करने के लिए लिए ,
इसलिए कविता में इनका इस्तेमाल
फिलहाल, वर्जित घोषित किया जाता है।"´( 'बयान' कविता का अंतिम अंश )
कवि कुमार विकल की तरह तेजिंदर मानवीय संघर्ष की कठिन प्रक्रिया से पूरी तरह भिज्ञ हैं, इस प्रक्रिया में वे मूल मानवीय रागात्मकताओं और सहज जीवनासक्ति को नहीं भूलते, बल्कि उसका हिस्सा बनकर संघर्ष में शामिल होते हैं। यही आधुनिक कविता के लिए बड़ी बात है जो उसे जीवंत बनाती है। 'नई कविता' के साठ के दशक के अस्तित्ववादी कवियों की तरह तेजिंदर गगन अनास्था, कुंठा, संत्रास, अजनबीपन, परायेपन और मानवीय रिश्तों के भग्नावशेष पर निस्सहाय होकर अपना काव्य-मुहावरा नहीं बनाते हैं, बल्कि ज़िंदगी की टूटन और तकलीफ़ों से लड़ने के लिए अपनी मुहावरा को ताकत देते नजर आते हैं। इस कारण उनकी कविताओं का आवेग हमेशा एक जीवित समाज को लक्ष्य करता है –
"तुम्हारी यह गर्वीली हंसी मुझे बहुत प्यारी लगती है
सोजेलिन खाखा

और मैं तुम्हारे हाथ थामना चाहता हूं
तुम्हारा माथा चूमना चाहता हूं
इसलिए नहीं कि तुम्हें मेरी जरूरत है
और मैं तुम पर कृपा करने आया हूँ
बल्कि इसलिए कि
तुम भूख के घराने का सबसे सुंदर राग हो

तुम्हारी हथेलियों से मुझे डर भी लगता है
क्योंकि मेरे भीतर अपराध-बोध का
एक शहरी कैक्टस है
और मैं अपना चेहरा छिपा लेता हूं बार-बार
तुम्हारी देह, तुम्हारी आवाज, तुम्हारा मौन, तुम्हारे हाथ -
मुझे अच्छे लगते हैं
क्योंकि ये सब
भूख के विरुद्ध तुम्हारी लड़ाई के अलग-अलग हथियार है। “
- कवितांश "समझदार होती आदिवासी युवती के लिए" / तेजिंदर
सच में मुझे तेजिंदर की कविताएं पढ़ते हुए बार-बार कुमार विकल की याद आती है - 'जनता एक बहुमुखी तेज हथियार है /जो अकेली लड़ाइयों को आपस में जोड़ता है (कविता 'मिथक' / कुमार विकल)
जीवन की छोटी-छोटी बातों पर कविता लिखना आसान काम नहीं। कविता बड़बोलेपन , भद्राचरण और आभिजात्य संस्कारों से टूटती है। वह अपनी असली ताकत, अर्थ और क्षमता को खोती है, जबकि वह अपनी अनगढ़ता और श्रमशील लोकजीवन में नई ऊर्जा और ताकत पाती है। बक़ौल मुक्तिबोध, “यह सही है कि जीवन के छिटपुट चित्रों में भी भाव-गंभीरता है तथा सच्चाई होती है (नहीं भी होती है)। फिर भी उससे संतोष नहीं हो पाता। कुछ और चाहिए, और, और, ! – वह चाहिए जो जीवन को उसकी समग्रता में, उसकी सारी विशेषताओं सहित, प्रकट करे। केवल छिटपुट प्रयत्नों में (और उसकी वाहवाही) अब मजा नहीं आता। इसलिए कुछ लोग खोज पर विश्वास करते हैं। सतत अन्वेषण, सतत अनुसंधान के पथ का नाम लेनेवाले लोग कम नहीं। किन्तु अनुसंधान और अन्वेषण का थियोंराइजेशन (theorization, केवल विचारणा, केवल सिद्धान्त-स्थापना) ही किया जाता है। अधिक से अधिक, वह आत्मान्वेषण और आत्मानुसंधान बनकर रह जाता है, जिसके आवेग में दो-चार, पाँच-दस, दस-बीस कविताएँ बनाकर मामला ठप्प हो जाता है। और ऐसी कविताओं में आवृति, पुनरावृति, आवृति-पुनरावृति। फिर वही दुष्चक्र चालू। संक्षेप में, एक घेरा बन गया है, उसमें से निकलना मुश्किल है। (नई कविता: निस्सहाय नकारात्मकता/ ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब /पृ सं -69)।“  यह बात कुमार विकल और तेजिंदर की कविताओं पर समान रूप से लागू होता है। दोनों कवि अपने जीवन के अनुभवों का कच्चा माल कविता में पूंजी की तरह ‘इन्वेस्ट’ करते हैं। जीवन के यथार्थ-चित्रों को कविता में बिलकुल अनौपचारिक-स्वाभाविक  तरीके से रखना और और उसे मूर्त कर जीवन के अंतर्द्वंदों, अंतर्विरोधों और बाह्यांतर दबावों के बीच से निकालकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना और नेपथ्य से यानि बहुत पीछे रहकर अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करना इनकी कविताओं का खास मकसद होता है। संदर्भवश पहले यहाँ कुमार विकल की एक कविता ‘खिड़कियाँ’ देखिए –
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
उनमें रहने वाले बच्चों का
सूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है?

सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान—सा लगता है
जो किसी सुदूर शहर से
कभी—कभार आता है
एकाध दिन के लिए घर में रुकता है
सारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है
और जाते समय
उन सबकी मुठ्ठियों में
कुछ रुपये ठूँस जाता है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
वहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती है
जैसे किसी बच्चे के बीमार पड़ने पर
माँ की कोई सहेली मिजाजपुर्सी के लिए तो आती है
किंतु घर की दहलीज़ से ही
हाल पूछ पर चली जाती है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/
वहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा—/
कुछ इस तरह से होती है/
जिस तरह राखी के कुछ दिनों बाद/
घर के सामने से/
पोस्टमैन के गुज़र जाने के बाद/
पहले पोस्टमैन को कोसती है/
बाद में रसोई में जाकर/
अपने भाई की मजबूरी समझ कर/
बहुत रोती है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/
उनमें रहने वाले बच्चों का /
चाँद के साथ रिश्ता किस तरह का होता है
/वह उन्हें अद्भुत चोर – सा लगता है/
जो हर रात किसी गुप्त दरवाजे से आता है /
उनके हिस्से की रोटियाँ चुराके ले जाता है।“
यथार्थ और जीवन-संघर्ष की इन्हीं कौतुक-वृतियों में पगी तेजिंदर की कविता – ‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ को देखिए –
“बच्चे अलाव ताप रहे हैं
भरी ठंड में

बच्चे आग से नहीं डरते
आग की तपिश है
उनके चेहरों पर 

आग का रंग क्या होता है
उनसे पूछता हूं
भरी ठंड में ताप उनके चेहरों पर है
और वे जवाब देते हैं
आग का रंग ताप होता है

बच्चों को ताप से डर नहीं लगता
वे कहते हैं -  आग से हमारी दोस्ती है
जो ताप बन कर
हमारे भीतर उतरती है
और फिर अलग-अलग आकृतियों में
बाहर निकलती है
कभी गिल्ली-डंडा बनकर 
और कभी टप्पे खाती गेंद की तरह

बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और उनके चेहरों पर ताप है
टप्पे खाता हुआ

मैं हैरान हूं कि हूं कि
वे ताप से से खेलते हैं
जिसे छूते ही
मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं

मैं वापिस बच्चा बनना चाहता हूं
और सड़क किनारे
बच्चों के साथ बैठ
अलाव तापना चाहता हूं
वही सड़क के उस मोड़ पर
जहां बच्चे भी ठंड में
अलाव ताप रहे हैं

अलाव तापते बच्चों की आंखों में
शेर की आंखें हैं
सुंदर और आदिम
आने वाली दुनिया
इन्हीं आंखो पर टिकी है
टेलीविजन के पर्दे पर
या चिड़ियाघरों में कैद शेर देखने वाले बच्चे
जल्दी अंधे हो जाएंगे
बच्चे अगर बचेंगे तो वही
जो शहरी किनारे, गांव की चौखट पर
भरी ठंड में
अलाव ताप रहे होंगे

खत्म हो जाएंगे
बंधुआ और छद्म शेर बच्चे
खत्म हो जाएंगे वे भी
जो खुरदुरे नहीं हैं
पिघल जाएंगे उनके चेहरे जल्द
जिन्हें अलाव तापने की आदत नहीं

बचेंगे केवल वे ही
जो लाल हैं
आग और ईंट की तरह

गाँव की चौखट पर
बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और मैं आश्वस्त हूँ कि
इतनी जल्दी खत्म नहीं होंगी
यह दुनिया।“
दोनों कविताओं में बच्चे उपस्थित हैं। कुमार विकल जिस तह सूरज-चाँद, खिड़की, रोशनी, राखी, चिट्ठी, आदि लोकजीवन के मर्मस्पर्शी संदर्भों से जुड़कर मनुष्य की आर्थिक तंगी और विपन्नता का गहन बोध कराते हैं, आभिजात्य सौंदर्य से अलग लोकचेतना की वर्गीय अभिव्यक्ति को उभार और नई दृष्टि प्रदान करते हैं, उसी प्रकार तेजिंदर भी भरी ठंड में बच्चों के अलाव तापने की बात कर हमारी संवेदना को बहुविध रीति से उद्वेलित करते हैं। सृजन की अंतर्वस्तु और उसके आत्मसंघर्ष में यहाँ अंतर होते हुए भी दोनों में प्रकट वर्गीय वैशिष्ट्य देखने के लायक है। तेजिंदर की कविता में दार्शनिक उठान अधिक है और कुमार विकल में काव्यानुभव और सौंदर्य अधिक। तेजिंदर कहते हैं कि ‘मैं हैरान हूं कि हूं/ कि वे (बच्चे) ताप से खेलते हैं / जिसे छूते ही / मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं’। यह ताप तेजिंदर के बच्चों में भीतर से उठता हुआ अगल-अलग आकृतियों में बाहर आता है, मसलन गिल्ली-डंडे या टप्पे खाते गेंद की तरह। यह कवि के विनोदप्रियता का हिस्सा मात्र नहीं है, बल्कि उस ताप को पाने के लिए तेजिंदर का कवि फिर बचपन में लौटना चाहता है। यहाँ अलाव का ताप जीवन को बचाने का ताप है – ‘बच्चे अगर बचेंगे तो वही/जो शहरी किनारे, गांव की चौखट पर / भरी ठंड में / अलाव ताप रहे होंगे’- इसका द्वन्द्वात्मक संघर्ष उन बच्चों के ताप से है जो अभिजात वर्ग से आते हैं, जो कि समाज का लघु-वर्ग है, सुविधा-सम्पन्न वर्ग। पर जो बच्चे शहर किनारे और गाँव की चौखटों पर कड़ी ठंड मे अलाव ताप रहे  उनके ही चेहरे के ताप, आँखों की लाल चमक और उनके खुरदुरे चेहरे में दुनिया बचाने की कवि की उम्मीद कायम है। दोनों कविताएं अपनी-अपनी तरह से समाज की वर्गीय ढांचों को के अतर्विरोध को पूरी  काव्यात्मक सार्थकता के साथ व्यक्त करती हैं । यही तेजिंदर की कविता की सार्थकता और विशेषता है।
कहना न होगा कि दोनों कवियों ने मिलता-जुलता गहन लोक-चेतस काव्यविवेक का इस्तेमाल किया है जो भिज्ञ यथार्थ को काव्यात्मक बनाने का सायास प्रयत्न करता नहीं दिखता, न कविता को तराशता या परिष्कृत करता है, बल्कि अपनी अनगढ़ शिल्प के साथ पाठकों की चेतना में धँसने का उपक्रम करता है और इस क्रिया-व्यापार मे सफल भी होता है।
आमजन की बेबसी, लाचारी के बीच उसकी ईमानदारी और मानवीय लगाव का बना रहना, जनता के सुख-दुख के अटूट हिस्सेदारी, साहस, सहृदयता, जनप्लावित करुणा आदि ऐसे काव्येतर मूल्य हैं जो कविता में आकार लेकर लोकचेतना को अर्थवत्ता और प्रखरता देते हैं । इनके वगैर कोई साधारण जीवन की अच्छी कविताएँ लिख ही नहीं सकता। यह तेजिंदर के कवि का आत्मसंघर्ष है जो उनकी कविताओं को पठनीय और जनोपयोगी बनाता है। कविता के सुनिश्चित प्रतिमानों में ढली खास शैली और काट की कविताओं में इस तरह का आकर्षण नहीं होता। इसलिए आज ऐसी ही कविताओं की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है जिनमें काव्यात्मक मूल्यों से अधिक मानवीय मूल्य हों और जो पाठको को उसकी संवेदना से नैतिकता से, गहराई से, असल में जोड़े और उसे भीतर तक आलोड़ित भी करे।
तेजिंदर मूलत: उपन्यासकार और कहानीकार हैं, इसलिए इनके कथात्मक शैली-शिल्प का गहरा प्रभाव इनकी काव्यात्मकता पर पड़ा है। कविताओं में कहीं-कहीं फैंटेसी या स्वप्न-लोक का भी आभास होता है पर यह फैंटेसी उदय प्रकाश की कविताओं की तरह दुर्बोधता का वरण नहीं करती। अभिव्यक्ति हमेशा सहज बनी रहती है। न ही किसी वाद का कोई विचार-अभिकथन ही सामने से पाठकों में सायास उत्प्रेरणा को भरने का कार्य करता है। श्रमशील जनता के प्रति उनका आगाध प्रेम है। ‘डर’ कविता में वे उसे काला राजकुमार कहते हैं –
“खुद से पूछता हूँ/
मैं क्यों डरता हूँ, उस काले राजकुमार से /
जिसकी आँखों में /
अभी भी, एक आदिम प्यार है/
मेरे लिए।“  गोया कि, तेजिंदर के कवि को आदिम सौन्दर्य से बहुत लगाव है। उन्हें अलाव तापते बच्चों और श्रमिक, दोनों की आँखों में आदिम प्यार नजर आता है। ‘डर’ कविता में कवि को ऐसा लगता है कि मजदूर वर्ग के ही कपड़े, घर, जमीन , तंख्वाह आदि पर संभ्रांत लोगों ने दखल कर रखा है। दुनिया के बनने में वे शहर और जंगल के बराबर हिस्सेदारी की तरफदारी करते हैं और “जब नगर में होता है / तो अक्सर ही उन्हें / उसके भीतर छिपे जंगल की जरूरत होती है।“ समतामूलक समाज के पैरोकारी में कविता कहीं-कहीं सपाट भी हुई है, पर अपनी अर्थवत्ता को कभी धूमिल और इकहरी नहीं होने देती। यह इनकी सपाट कविताओं की खास विशेषता है। जिन कवियों ने कविता की सपाटबयानी शैली का केवल नकल किया है और विदेशी ढंग को बिना भारतीय परिवेश में ढाले अपनाया है, उनकी कविताएं बोझिल और उबाऊ हो गयी है । आप विष्णु खरे और पवन करण की सपाटबयानी कविताओं में अन्तर्लय और प्रगीतात्मकता का अभाव पाएंगे जो कंटेंट में मजबूत रहने के बावजूद कवितात्मकता में कमजोर मालूम होती है और पाठकों मे अरुचि पैदा करती है।  
आगे आप देखेंगे कि दुनिया को बदलने का स्वप्न तेजिंदर के कवि में इतनी हिलोरें मारता है कि वह घोषणा करना चाहता है कि
“जो कोयला जलने पर लाल नहीं होता,/
उस पर हाँडी चढ़ाना अपराध है। ... /
फिर भी गर्म सलाखों को नहीं छुएंगे /
और दावा करेंगे कि /
ठंडे हाथों से ही बदला जा सकता है।/
यह पूरा परिदृश्य।“
कवि को सदैव उस जंगल की तलाश है जो खो चुका है। वह अपनी आदिम सभ्यता को फिर से पाना चाहता है,  उसी में उसे आदमीयत की महक मिलती है। आधुनिकता की होड़ में हम उसे गंवा चुके हैं। -
“तुम्हारे पाँव जहां थे /
वहाँ कभी जंगल हुआ करता था/
आज कोलतार की सड़क है/
और जंगल तुम खो चुके हो। “
- यह कितना त्रासद समय है कि जंगल की तलाश में तेजिंदर का कवि बार-बार खारिज होता जाता है-
“तुम जहाँ जाते हो/
अपने भीतर एक जंगल समेट लेने की/
असफल कोशिश में/
खारिज हो जाते हो/
और फिर कोलतार से समझौता करने की/
गलती कर लेते हो।“ (कविता – बाजार से लौटते हुए ) ।
तेजिंदर जी की काव्य-भाषा देखकर हम कभी-कभी हैरान होते हैं कि कवि ने कविता की यह “धूमिल” भाषा कितनी काव्य-हठ और श्रम से अर्जित की होगी ! अधिक से अधिक क्रूर होती व्यवस्था के विरुद्ध कविता को एक प्रकार के नैतिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाते हुए तेजिंदर ने क्रुद्ध कवि धूमिल के करीब अपना एक खास मुहावरा विकसित किया है जिसका बड़ा काव्यात्मक महत्व है जो धूमिल से अलग और अधिक संवेदनात्म्क है। इससे उनकी वक्तव्य-शैली की कहन धारदार बन पाई है। यह उनके नैतिक साहस का प्रतीक है जिसमें नया काव्य-विवेक भी उतना ही अपेक्षित होता है, जितनी कविता कि अंतर्वस्तु। वे कविता के वर्जित क्षेत्रों में  बार-बार प्रवेश करने की हठ करते हैं और उनमें अधिकतर सफल भी होते हैं। लेकिन यह भाषा धूमिल की तरह असंयत, अमार्यादित, तीक्ष्ण और बेधक नहीं हैं। यह बुझी हुई राख़ के भीतर सुलगती अंगीठी जैसी है – देखिए कविता “बूढ़ा” -
“जंगल के पेड़ों पर
बार-बार चढ़ता है, एक बूढ़ा
और देखता है
लगातार कागज होता जंगल
बंजर होती जमीन।

बुड्ढा देखता है
एक ठूंठ
अपने भीतर धंसता हुआ।

बंजर होती जमीन
मापने वाला बूढ़ा
मृत्यु से पहले
अंतिम छोर तक की जमीन
माप लेना चाहता है
एक पेड़ की
सूखी टहनियों पर चढ़कर।

अपने भीतर लगातार धँस रहे
ठूंठ से
उसे कोई भय नहीं है।

एक पहाड़ है- अदृश्य
बुड्ढे की पीठ पर

जिसे बहुत ऊंचाई से
जंगल में धकेल देना चाहता है बूढ़ा
ताकि पेड़ हरे हो और हरे और हरे
और इस तरह पूरी पृथ्वी हरी-भरी हो जाए

इंतजार करता है, बुड्ढा
पृथ्वी करवट बदलेगी एक दिन
इन दिनों अपने साथ किए जा रहे
सुलूक के खिलाफ
और उस दिन वह सिर्फ एक बूढ़ा नहीं रहेगा
फैल जाएगा
बंद होती पृथ्वी पर
अपनी पकी हुई देह के साथ
और यह पृथ्वी
उसकी पकी उम्र की फसल के
लहलहाते दानों से
ढक जाएगी अपने हरेपन में ।
हमें लगता है कि तेजिंदर की कवि-क्षमता, काव्य-विधान, कलात्मक संगठन और मानवीय रागात्मकताओं के साथ अंतर्बिद्ध गहरे राजनीतिक आशय वाली कविताओं पर हमारे सुधी आलोचकों का ध्यान अब तक नहीं गया है, उनकी कहीं गंभीरता से चर्चा नहीं की गई है, जिस कारण तेजिंदर ने साहित्य की गद्य विधाओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया है। काव्य-संग्रह ‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ (1997) के बीस वर्षों के अनंतर इनका कोई दूसरा काव्य-संग्रह दृष्टिगत नहीं होना इसका पुष्ट प्रमाण है। यही हिन्दी कविता का वास्तविक परिदृश्य है जो खेदजनक है। पर तेजिंदर अपने समकालीनों में एक अलग तरह के महत्वपूर्ण और बेबाक कवि हैं। एक सोये हुए कवि-मन को फिर से जगाने के लिए इन कविताओं पर गंभीर चर्चा और बहस की शिद्दत से आवश्यकता महसूस की जा रही है।  
@ सुशील कुमार
सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय,
स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,
एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004
ईमेल–sk.dumka@gmail.com
मोबाईल न. –09431310216 / 09006740311

Blogger Tricks

2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (19-07-2017) को "ब्लॉगरों की खबरें" (चर्चा अंक 2671) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

हाल की रचनाओं के लिंक -

हिन्दयुग्म - वार्षिकोत्सव- 2010 >>

- हिन्द युग्म के सौजन्य से राजेन्द्र भवन सभागार, नई दिल्ली-01 में सुशील कुमार के काव्य-संग्रह "तुम्हारे शब्दों से अलग" का विमोचन दि. 05 मार्च, 2011 को हुआ ।