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Monday, March 20, 2017

0 हिन्दी साहित्य के ‘आउटसाइडर नीलकांत -निर्भय देवयांश

[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। यहाँ साभार प्रकाशित ]  
असल में दुनिया को बेहतर बनाने के ठेके ने धरती को नरक में तब्दील कर दिया। यह ठेकेदारी किसी ने दी और तब किसी ने ली की तरह नहीं है। यह किसी के दिलो-दिमाग की निजी उत्पत्ति है जो दूसरे-तीसरे-चौथे के दिमाग में संभव नहीं हो सकी इसलिए लोग पहले का फॉलोअर या कहें कि अबूझ पहेली की सनसनाहट समझ कर पीछे-पीछे हे लिए या फिर पिछलग्गू बन गये। पिछलग्गू बने लोगों का कसूर ढूंढने से बेहतर यह समझना जरूरी है कि पहले के दिलो-दिमाग में जो बेहतर करने की ठेकेदारी पथा उत्पन्न हुई,  यह दूसरे-तीसरे-चौथे के दिलो-दिमाग में क्यों नहीं उत्पन्न हुई? यदि यह इतना आसान हुआ होता तो शायद धरती पर ठेकेदारी पथा की शुरुआत ही नहीं हुई होती। मसलन न कोई भगवान होता, न कोई धर्म, न कोई राजा, न कोई ज्ञानवान। अति और अतिरिक्त होने के चलते ही यह सब हुआ और हो रहा है, क्योंकि मनुष्य के पास सिर्फ और सिर्फ एक ही काम है मनुष्य होने के लिए जद्दोजहद करना और मनुष्य बने रहना। यह न बनने के चलते ही मनुष्य क्या से क्या हो गया और सुअरी संतुष्टि तक पहुंच गया। इसे समझने के लिए कुछ कारणों को अगर हम जुटाएं तो पाएंगे कि पहले के साथ कुछ विशेष होने के चलते माहौल ‘हनी-हनी' हो गया। मतलब किसी के पास बेहतर परिवेश, तो किसी के पास अति बेहतर सुविधा तो किसी के पास अति पूंजी और खानदानी पहचान तो किसी के पास महादुख और उससे उत्पन्न निजी विचार का मायालोक। भक्तिकाल के कवियों में तुलसी, कबीर, सूर, और जो आपको सूझे रख सकते हैं। यूनान के लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व के दार्शनिकों में सुकरात व अरस्तू को भी रख सकते हैं। प्लेटो की स्थिति इनसे अलग थी, यानि कि जन्म के साथ बहुत नहीं तो कुछ अमीरी लेकर पैदा हुए थे। अपने यहां वेदव्यास और वाल्मीकि के भी किस्से हैं। नाम के चक्कर में न फंसें तो आगे बढ़ने में सुविधा होगी इसलिए हम उसका लाभ उठा ही लें। बहुत अमीर घर में लियो टाल्स्टाय और रवीन्द्रनाथ टैगोर पैदा हुए हैं। बुद्ध का तो कहना ही क्या! वैसे अपने देश में राम से  लेकर कृष्ण और महावीर से लेकर बुद्ध सभी राजे-रजवाड़े के घर में जन्म लेकर अपनी लीला दिखायी और चले गये। याद रहे, छोड़ेगा वही, जिसके पास पहले से अतिरिक्त होगा और जिसके पास नहीं होगा, वो जीवन भर ग्रहण करता चला जाएगा। उसके लिए एक जिन्दगी बहुत कम है, दर्जनों जिन्दगी में दमित वासना की पूर्ति नहीं होती है और होगी! इसलिए जो छोड़ पाए हैं उनका नाम इतिहास के पन्नों में अंकित है और ग्रहण करने वाले युगों-युगों से लाखों-करोड़ों लोग आ-जा रहे हैं और खर-पतवार की तरह मर-खप रहे हैं, पर कहीं कोई नाम लेवा नहीं। सोचना जरूरी है कि हम कैसी जिन्दगी जी रहे हैं जिसमें सिर्फ ग्रहणता की भूख है और छोड़ने के नाम पर स्वार्थ आग में ‘घी-घी' हुआ जाता है! 
आप विश्वास नहीं करेंगे पर आपको करना चाहिए कि मैंने दुनिया में किसी विशेष मस्तिष्क निर्मित ज्ञान को न समझने और न जानने की आकांक्षा संजोयी और न कभी इसके लिए बलवती इच्छा पैदा की, (जिस बच्चे को तीन-चार वर्ष की उम्र में पिताश्री तीन खूबसूरत कहावतों की घूंट बात-बात में पिलाए हों, मसलन- अपने भाग्य बसे बनवारी, मिले मार न खोजे मियां ताड़ी और अप्पन खड़री, अप्पन ताल)। और तब यह बालक मां की चुप्पी या बेबसी को समझकर घर से बाहर निकल दौड़े-दौड़े रामपुर बाजार (बिहार के गया जिले के) कुछ दूरी पर स्थित पहाड़ पर पहुँच जाए और चिल्ला-चिल्ला कर आसमान से पूछे कि- ‘इस दुनिया में मेरा कौन है बताओ' और अपनी ही आवाज गूंज करउसके पास आए जिसकी ध्वनि हो  ‘मैं, मैं, मैं', तो उसे समझने में देर न लगी कि उसका जीवन प्रकृति  के साथ ही कटेगा! घंटों पहाड़ पर रहने के बाद भूख लगती और पहाड़ी बेर खाकर कुछ शांति मिलती, झरने में नहाने का सुख और देर रात तक किसी के आने की उम्मीद छोड़ फिर पहाड़ से नीचे उतर कर पुलिस लाइन के क्वार्टरों में यूं अनींद रात गुजरती। हां, तो मैं कुछ कह रहा था (भटक जाने की मेरी बहुत पुरानी आदत है और अब तो कुछ किया नहीं जा सकता, खैर) हाँ, मूर्खता मैंने खूब की है और उसी अज्ञानता में छलांग जरूर लगा ली, क्योंकि अज्ञानता में पता कहां होता है कि ऐसा करने पर हाथ टूटेगा या पैर या कि दिमाग ही चसक जाएगा (अभी दिमाग बेहद परेशान रहता है, बोलने में खूब कष्ट होता है, नतीजा, लगातार मोबाइल बंद रखने की भयंकर रूप से बाध्यता बन गयी है) ऐसा मैंने कहीं पढ़ा है, शायद चीन के हजारों वर्ष पूर्व के दार्शनिक लाओत्से का कहना है कि प्रकृति  देती नहीं लेती है, माया देती है। माया धरती का मैटर है या कहें पूँजी, क्या फर्क पड़ता है (यानि मनुष्य मस्तिष्क निर्मित मुद्रा और उसका चलन), पर चिंता नहीं। प्रकृति  मेरे लिए सबकुछ है इसलिए बेफिक रहता हूं, चाहे जो हो, सो हो। फिर भटक गया (ऐसा लगता है कि जैसे भटक जाने का दौरा पड़ता है, अगर पड़ने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं)। यानि दिमाग दर्द से दरकने लगे और जीवन फटने लगे। लहक मेरी मूर्खता की छलांग है, इसलिए सब कुछ गंवाना मंजूर है और पाना कुछ भी नहीं (कहीं यह भी पढ़ा कि पाने के लिए बहुत पाप करना पड़ता है और मुल्ला नसरूद्दीन कहते हैं कि गधे को भी बाप कहना पड़ता है)। और जीवन की इस भाग-दौड़ में मैं ईश्वर को कभी नहीं लाता हूं। भरोसा या विश्वास का सवाल नहीं बल्कि अपन उनके लायक ही नहीं हूं। एक लैटिन  उक्ति है-‘ईश्वर ही ईश्वर का सामना करने में समर्थ है,' फिर हम जैसे लोगों की औकात क्या? सुनते हैं कि इस देश में औकात वालों को ईश्वर दर्शन देते हैं! यह भी भगवान ही जाने, इस बात में कितनी सच्चाई है। वैसे मैंने कभी यूं ही दो पक्तियां लिखी थीं- ‘मनुष्य, मनुष्य न हो सका, और खुदा की बात करने लगा' और यह भी कि ‘मनुष्य होना क्या कम है, बाकी सब तो खुदाई भ्रम है'। अपने जीवन के साढ़े चार दशकीय उम्र में बस इतना ही जान पाया कि मनुष्य बनने की संभावना बची हुई है और हमें लगातार उसके लिए प्रयास  रत रहना चाहिए। यदि आप विशेष ज्ञान के पीछे नहीं चलेंगे तो संभव है कि बहुत कुछ नहीं पाएंगे। मिलेगा ही नहीं। किन्तु वासनात्मक प्रक्रिया   से उत्पन्न मनुष्य ऐसी संभावना पैदा कर प्रकृति  के सहयोगी होने के पक्ष में नहीं है। उसे वह सबकुछ चाहिए जो उसकी दमित इच्छा कहती है, पल-पल पैदा हो रही वासना हवा भरती है। और हर पल की खुशियां तो आसानी से मिलती नहीं हैं, इसलिए किसी न किसी के पीछे तो चलना ही होगा। बाजार में इसकी भी व्यवस्था है इसलिए चाहतों, पाप्त ज्ञान और बुद्धि की बहुलता के आधार पर खूब सज-संवर, मौज-मस्ती कर सकते हैं। जहां उपलब्धता है वहां लोग जीवन का खूब मजा लूट रहे हैं और जहां नहीं है वहां लोग धू-धू कर जल रहे हैं।  
निश्चित ही इस रास्ते पर चलने में समझौते हैं और बोल देना खतरा है। आउटसाइडर हो जाना है। नीलकांत जी ने आचार्य पवर रामचंद्र शुक्ल पर बोलकर, लिखकर खतरा उठाया और हिन्दी साहित्य के आउटसाइडर हो गये। कुछ बेहतर सोचने के लिए, कुछ बेहतर करने के लिए। ‘रामचंद्र शुक्ल : नई दृष्टि' लिखते वक्त यह उनकी उम्मीद रही होगी कि हिन्दी साहित्य संवाद कर एक कदम आगे बढ़ेगा पर यहां तो पायेदार लोगों ने उन्हें विध्वंसक करार दे दिया। कुछ बेहतर कर सके, कुछ बेहतर सोच सके के लिए इतना ही जानना पर्याप्त है कि अस्सी के आसपास की उम्र में भी खुद हाथ जलाते हैं तो दाना पेट में जाता है। सुविधाओं से बहुत दूर रहने वाले नीलकांत छोटे-बड़े पेड़-पौधों के बीच मनुष्य बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और अंतिम समय तक यही पहचान बनाए रखना चाहते हैं।
नीलकांत दार्शनिक रूसो की तरह यह दावा नहीं करते कि 
   इंसान बनने के लिए 
   मैं खाता हूं फुटपाथ पर
   सोता हूं  
   खुले आकाश के नीचे सतह पर।  
रूसो की तरह यह भी नहीं कहते - ‘मगर मैं क्या करूं, चारों ओर छाया हुआ अन्याय मुझसे सहा नहीं जाता। यह दुनिया राक्षसों से भरी पड़ी है, जो निश्चय ही नरक जाएंगे।'  
और रूसो की तरह यह तो कभी कह ही नहीं सकते- ‘जितना पगाढ़ प्रेम  मैं दे सकता हूं उतनी तीव्रता से प्रेम  करने वाला अभी तक पैदा नहीं हुआ। मुझसे बढ़िया प्रेम  करने वाला दिखाओ, जिसका हृदय मुझसे अधिक कोमल हो, ऐसा बढ़िया आदमी मुझे  दिखाओ।' 
कभी धरती के लोगों को देखकर अमेरिकी कवि वाल्ट व्हिटमैन की तरह नीलकांत जी यह जरूर सोचते होंगे- ‘अब मुझे पता चला, खुली हवा में, गगन तले, धरती पर सोने वाला आदमी, भीतर तक सुंदर क्यों होता है?' दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर के शब्दों में- ‘मनुष्य पृथ्वी पर सही ढंग से सबके साथ रहने की तमीज पैदा करे और फिर विचार या चिंतन के खतरों से टकराए।' 
एक शायर की दो पंक्तियां हैः 
कूदा तिरे घर में कोई यूं धम्म से न होगा,  
वो काम किया हमने कि रूस्तम से न होगा।  
आखिर क्या कारण रहे होंगे कि नीलकांत जी को ‘रामचंद्र शुक्ल नई दृष्टि' किताब लिखने की जरूरत पड़ी होगी। पुस्तक की भूमिका ‘दो शब्द, पृ. सं. 7-8' में कहते हैं- “जलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने प्रेमचंद और कार्ल मार्क्स की जन्मशती और मृत्युशती समारोह के उपरांत आचार्य शुक्ल की जन्मशती मनाने का निर्णय लिया तो इस संबंध में वही हुआ। समारोह का तांता लग गया। कॉलेज, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, सरकारी संस्थान सभी जगहों पर लोग सतर्क हो गये। अध्यापक अपने पुराने नोट्स से रस, छंद, अलंकार, व्याकरण और लोकमंगल जैसे विषयों पर शुक्ल जी के महान योगदान पर लिखा-लिखाया निबंध लेकर दौड़ पड़े। अपने मेज की दराजों और दिमागों में अर्से से जमा रद्दी बेचने का यह अच्छा सुअवसर हाथ लग गया था।'' 
शुक्ल जी की जन्मशती के संदर्भ में एक सौ साल की सृजनशीलता का लेखा-जोखा संभव था, उसके अंतर्संघर्षों का उल्लेख प्रस्तुत  किया जा सकता था और सकारात्मक-नकारात्मक  पक्षों की परख की जा सकती थी। उसके गतिशील पक्षों को प्रगतिशील  संघ के सकारात्मक पक्ष से जोड़कर एक समृद्ध जनवादी विरासत के स्वरूप को प्रस्तुत  करना अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता। किन्तु परिणाम इसके विपरीत निकले। उदारवादी पक्ष के पबल होने के कारण शुक्लशती प्रतिमा पूजन में बदल कर रह गया।  
शुक्ल जी ने सत्ता के सवाल को प्रमुखता दी है और उन्होंने अपने अधिकांश लेखन में दर्शन के क्षेत्र को समाविष्ट किया है। सत्ता के सवाल पर ही किसी विचारक की विश्वदृष्टि का स्वरूप निर्भर करता है। लेकिन साहस जुटाने का अतिरिक्त साहस मुझे विशेषत इसलिए करना पड़ा के निबंध को विभागाध्यक्षों और वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसरों  के सामने पढ़ना था, जो स्वयं तो एक सवाल एक पृष्ठ में पूछते ही हैं, दूसरे उनके लग्गू-भग्गू शोधकामी लोगों की टोली उसी एक सवाल को सौ मर्तबा पूछती है और ताल ठोंक-ठोंक कर उत्तर मांगती है। पुनरावृत्तियों को अनवरत रूप से मुखरित करने में अभ्यस्त इस गुरु-शिष्य परंपरा का सामना अतिरिक्त साहस के बिना कैसे किया जा सकता है। 
सवाल है कि वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसरों , रीडरों आखिर हिन्दी साहित्य की बेहतरी के लिए, बनती-बिगड़ती चीजों को समझने के लिए नीलकांत जी की तरह ही अतिरिक्त साहस  क्यों नहीं जुटा पाते हैं? क्या नौकरी का मोह है, सुविधा छीन जाने का मोह है या फिर कुछ और कारण है जो अभी तक अज्ञात है। क्या इन विधवा प्रश्नों से हिन्दी साहित्य हमेशा जूझता रहेगा? 
क्या यह जानना पाठकों के लिए जरूरी नहीं है कि ‘मृत सौंदर्य का मसीहा' इतना विध्वंसक लेख है, जिसे पढ़ने से मंच ही उड़ जाएगा, तो फिर हिन्दी साहित्य को दो-चार नीलकांत चाहिए, भला एक से कैसे काम चलेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि शुक्ल जी के समर्थक ही बहुत कमजोर हैं जिन्हें कमजोर मंच के सहारे वैतरणी पार करनी है? 
अच्छा छोड़िए, नीलकांत जी को कुछ पल के लिए। मशहूर  दलित लेखक स्वर्गीय ओमपकाश वाल्मीकि अपनी पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' (पृ. सं. 95) में खुलेआम कहते हैं- ‘हिन्दी साहित्य सवर्ण साहित्य है, इसे सिद्ध करने के लिए बहुत ज्यादा शोध की जरूरत नहीं है। रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास ही काफी है। प्रसाद, पंत, महादेवी, निराला, नागार्जुन  भी इसी परिधि में आते हैं। उनकी रचनाओं के जीवन-मूल्य क्या हैं? इनका विश्लेषण और मूल्यांकन होना आवश्यक है। ‘राम की शक्तिपूजा'  किसी प्रगतिशील , मार्क्सवादी, जनवादी विचार को स्थापित करती है? निराला इस रचना में किसी सर्वहारा की चिंता कर रहे हैं या एक कर्मकांडी सामंत की! ‘राम की शक्तिपूजा' की भाषा और शिल्प के मुख्य सरोकार क्या हैं?' 
फिर नीलकांत जी के पास चलें और उनकी दर्जनों आपत्तियों में एक-दो को देखें (वही, पृ.सं. 22) - “इसके विपरीत दिशा में आचार्य शुक्ल का पक्ष अपने समकालीन यथार्थ को भिन्न दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। अतीत और परंपरागत मानदंडों के प्रति उनमें अतिरिक्त भक्ति दिखाई देती है। विकासमान नई सामाजिक वास्तविकताओं के समकालीन रूपों और निष्पाण अवधारणाओं का अंतर्विरोध, उनकी आलोचना दृष्टि को पंगु और निष्किय बनाता जाता है।'' सामंजस्यवाद के नाम पर, शोषक वर्गों और उसके परजीवी निकाय की वकालत करते हुए, आचार्य शुक्ल लगभग नई मनुस्मृति ही लिख डालते हैः 
“ लोक व्यवस्था के भीतर, कुछ विशेष वर्ग के लोग, जैसे शिष्ट विद्वान, धर्मचिंतक, शासन कार्य नियुक्त अधिकारी, देश रक्षा में पाण देने के लिए तैयार वीर इत्यादि औरों से अधिक सम्मान के पात्र होते हैं। इनके प्रति उचित सम्मान न प्रदर्शित करना अपराध है। '' (चिं.म.भा. 1, पृ.78 )।  
नीलकांत जी तो शुक्ल जी की पुस्तक चिंतामणि पर सवाल उठा रहे हैं। मेरे जैसे पाठक के मन में भी यह सवाल उठेगा कि शुक्ल जी का मानस ब्राह्मण जाति में जन्म लेने के आधार पर बनता है या पढ़ने-लिखने से पाप्त बुद्धि की प्रगतिशीलता के आधार पर? मनुस्मृति की सोच को ही अंतिम मानेंगे तो फिर हजारों वर्ष की मानसिक विकास यात्रा की समझ यह कि मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं होना चाहिए। स्वामी करपात्री जी अपनी पुस्तक ‘मार्क्सवाद और रामराज्य' में संकेत देते हैं कि जाति-पांति में भेद, ऊंच-नीच में भेद मिट जाना ही रामराज्य है, मार्क्सवाद है। तो क्या शुक्ल जी समाज की असमानता को बनाए रखना चाहते हैं? किन्तु ऐसा क्यों? वर्गच्युत होने में खतरा है, तो फिर  विज्ञान के अति विस्फोटक समय में अपने प्यारे देश भारत का क्या होगा? बुद्ध ने जब ईश्वर की सत्ता को इनकार किया था तो उनके मन में बड़ा प्रश्न यही था कि मनुष्य और मनुष्य में फर्क क्यों? यदि यह है, तो समझने में कठिनाई नहीं है कि ईश्वर नहीं है। बुद्ध ने तो यहां तक कह दिया कोई आत्मा नहीं है। आदि शंकराचार्य ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या' कहते हैं तो महावीर सिर्फ और सिर्फ निजी आत्मा की बात करते हैं। महावीर के पास भी परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं है। जहां बात इतनी दूर तक पहुंच गयी है, फिर हम कहां अटके हुए हैं! शुक्ल जी जीवन और हिन्दी साहित्य को कहां अटकाए रखना चाहते हैं?  
क्या इस सच को स्व. शिवकुमार मिश्र या चंद्रबली सिंह भी नहीं समझ पाए कि उन्होंने भी नीलकांत जी के ‘मृत सौंदर्य का मसीहा' लेख पर गहरी नाराजगी जाहिर की। तो फिर शुक्लजी किस लोकमंगल का सपना देख रहे हैं? क्या लोक का मंगल राजा की पूजा-अर्चना करने से या फिर वैज्ञानिकता के सहारे आगे बढ़ने से होगा? आदरणीय विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना' (पृ.सं. 52) में लिखते हैं- “विश्व प्रपंच की भूमिका पढ़ने पर इस बात का पता चलता है कि उन्होंने भौतिक विज्ञान, दर्शन, तथा मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने लार्ड केलविन, डार्विन, हक्सले, शेफर, जेम्स हरबर्ट, स्पेन्सर, वाटसन, स्पिनोजा, डेकार्ट, कांट, बर्पले, शेलिंग, हीगेल, शॉपेनहावर, ड्यूरिंग, रीड, स्टिवर्ट, हेमिल्टन, सर आलिवर लाज, ह्मूम, प्लांक तथा अन्य वैज्ञानिकों तथा दार्शनिकों के सिद्धांतों तथा विचारों का तालमेल बिठाने के लिए गीता, वैशेषिकों, नैयायिकों, उपनिषदों, पतंजलि, चरक, सांख्य, वेदान्त, चार्वाक आदि के विचारों को उद्धृत करके उनकी विवेचना की है।  
पसीना छूटने जैसा अध्ययन, पर दिन भर चले ढाई कोस।  
अपने स्वदेशी मिजाज वाले आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी से पूछने का मन करता है कि इतना कुछ शुक्ल जी पढ़ गये पर उन्होंने क्या मार्क्स के विचारों का अध्ययन नहीं किया? तो सुनिए रामस्वरूप चतुर्वेदी अपनी पुस्तक ‘हिंदी गद्य विन्यास और विकास' के पृ.सं. 193 में क्या कहते हैं- “रामचंद्र शुक्ल का समकालीन राजनीति के प्रति रवैया इस बात से भी प्रकट होता है कि अपने लेखन में वे मार्क्स का उल्लेख नहीं करते हैं। वे मार्क्स को अपनी विचार परिधि में स्वीकार नहीं करते हैं।''   
शुक्ल जी चिंतामणि में कहते हैं- “कुशल यही है कि जिनका दिल सही सलामत है, जिनका हृदय मारा नहीं गया है, उनकी दृष्टि अतीत की ओर जाती है। क्यों जाती है, क्या करने जाती है, यह बताते नहीं बनता।'' (चि.म. भाग 1, पृ.171) 
यहीं पर नहीं रुकते हैं शुक्ल जी, आगे कहते हैं- “वर्तमान हमें अन्धा बनाए रहता है, अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूं कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है।'' (वही पृ. 178) 
... तो देश अतीत में जाएगा तो फिर भारत गुलाम हो जाएगा, दलितों के साथ अन्याय होगा। फिर तो यह समझने में दुविधा नहीं है कि शुक्ल जी का तार कहां जुड़ा हुआ है। यह तार है तुलसीदास जी की ये दो पंक्तियां -‘पूजिए विप सकल गुणहीना, यद्यपि न शुद्र परम प्रवीणा।' तो कौटिल्य (अर्थशास्त्र के लेखक) से लेकर बाबा तुलसीदास और आचार्य प्रवर शुक्ल जी तक, जन्म को ही जीवन का आधार मानते हैं। मतलब ब्राह्मण में जन्म लिए हैं तो सब सुख-ऐश्वर्य उन्हीं का! यह काम तो बिना पढ़े-लिखे भी किया जा सकता है। तो सिर्फ धरती पर मनुष्य, मनुष्य नहीं बन सकेगा और यह उपद्रव जारी रहेगा। तब तो रामराज्य आने से रहा!  
प्राच्यवाद के अग्रदूत एडवर्ड सईद बुद्धिधर्मियों से पूछते हैं-“ ‘द गाड दैट फेल्ड' के प्रमाण  को पढ़ना मुझ जैसे लोगों के लिए हतोत्साहित करने वाला है। मैं पूछना चाहता हूं कि बुद्धिधर्मी के रूप में आपने किसी ईश्वर में विश्वास ही क्यों किया? और इसके अतिरिक्त किसने आपको यह कल्पना करने का अधिकार दिया था कि आपका पूर्व का विश्वास और बाद का मोहभंग इतने महत्वपूर्ण थे? मेरे लिए स्वयं में धार्मिक आस्था अवबोध्य है और यह गहरे रूप में व्यक्तिगत होती है-ऐसा तब तक होता है जब किसी नितांत जड़ व्यवस्था में एक पक्ष को मासूम और भला मान लिया जाता है और दूसरे को आत्यंतिक रूप में बुरा, और ऐसी स्थिति में एक प्रक्रिया   जगह लेती है जिसमें राजनीति धार्मिक उत्साह बन जाती है... परिणामस्वरूप नस्ली संहार, सामूहिक संहार और अंतहीन संघर्ष होते हैं, जिनके बारे में सोचना भी भयावह है।'' (साखी, जुलाई-दिसम्बर अंक 2006, एडवर्ड सईद पर केन्द्रित) 
देखिए कितनी पवित्र ईमानदारी है अज्ञेय जी की। वे कहते हैं -“अनेक इतर प्रभावों के रहते भी एक प्रकार  का हिन्दू हूं, तबियत रईसी है लेकिन इस रईसी के पीछे जो संस्कार हैं वह ब्राह्मण के हैं।'' अपने संस्मरणों में अज्ञेय अपने परिवार का जिक करते हुए ब्राह्मणत्व के गौरव भाव का उल्लेख बार-बार करते हैं। तो यह समझने में किसको दिक्कत होगी कि ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' का एंजेडा ही था-धार्मिक आस्था को बनाए रखो और पूंजीवादी व्यवस्था की रक्षा करो। मुद्राराक्षस कहते हैं- “इसी जातिवाद दर्प के चलते रचना को अज्ञेय विशेषाधिकार बनाना चाहते थे और कुछ चुने हुए लोगों की संपदा। अज्ञेय कहते हैं-कुछ अधिक संस्कृत हैं और कुछ कम। संस्कार ब्राह्मण कर्मकांड में एक प्रक्रिया   विशेष है। इसी संस्कार के कारण कुछ लोगों को समाज में  विशेषाधिकार मिलते हैं-‘संस्कारात् द्विज उच्यते'। इसका मतलब यह तो नहीं कि अज्ञेय फांसीसी चिंतक मांटेस्क्यू से बहुत प्रभावित  थे? मांटेस्क्यू ने ऐय्याशी के सिद्धांत पर खूब विचार किया था। उसकी स्थापना थी कि ऐय्याश समृद्ध लोगों के होने से एक लाभ होता है। ऐय्याश समृद्ध अनुपयोगी उत्पादनों के बाजार होते हैं। ऐसे उत्पादन जिनका मानव जीवन को बनाए रखने में कोई इस्तेमाल नहीं होता, ऐय्याश समृद्ध लोगों में खपता है। हम सब इस बात को ऐसे समझ सकते हैं कि कुछ लोग हीरे खरीदते हैं। हीरे न खाए जा सकते हैं न ओढ़े-बिछाए जा सकते हैं। फिर उनका एक बाजार होता है और उनके खरीदार होते हैं। अक्सर रचना को भी कुछ लोग ऐसा ही उत्पादन बनाने की कोशिश करते हैं। तभी तो लेखक गालब्रेथ ने कहा है-“समृद्धि का एक रूप यह सामने आया कि समृद्ध व्यक्ति कला पर बड़ी रकम खर्च करता है। इंजीनियरी और विज्ञान सामाजिक जरूरत हैं, कला ऐय्याशी होती है।'' 
तो लीजिए और देखिए कि शुक्ल जी जरूरत के समय कैसे मैदान छोड़कर भाग खड़े होते हैं। पुरुषोत्तम दास मोदी की पुस्तक ‘अंतरंग संस्मरणों में जयशंकर प्रसाद' में आचार्य पं. सीताराम चतुर्वेदी अपने संस्मरण श्री जयशंकर प्रसाद, पृ. सं. 91' में लिखते हैं- ‘इसी प्रसंग   में एक बार सेंट्रल हिन्दू स्कूल के हिन्दी के पसिद्ध अध्यापक श्रीसांवल जी नागर भी आ पहुंचे। वे पक्के महल में रहते थे। बातचीत के प्रसंग  में उन्होंने कहा कि साहित्य में आजकल बड़ी अराजकता है। उसके सुधार का कोई उपाय निकाल लेना चाहिए और यह काम आप लोग ही कर सकते हैं। जयशंकर प्रसाद  जी ने कहा-“जो बोले सो घी को जाय। आप कोई योजना बना लाइए''। लगभग एक सप्ताह पश्चात प्रेमचंद जी के आवास  पर काशी के साहित्य-महारथियों की बैठक हुई। कुल मिलाकर आठ या दस होंगे। पं. रामचंद्र शुक्ल जी भी निमंत्रित कर लिये गये थे। जब योजना प्रस्तुत  की गई तब आचार्य शुक्ल जी ने अपनी गज्झिन आधी मूंछों के नीचे अपनी स्वाभाविक हल्की मुस्कान फैलाते हुए कहा-“आप लोग लाख योजना बनाइए, पर आपकी मानेगा कौन?'' बस इसी पर सारी योजना ठप हो गई। प्रसाद  जी ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा- “लीजिए, अच्छा हुआ। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। शुक्लजी ने ठीक ही कहा है। हम कौन होते हैं, किसी पर दबाव बनाने वाले।'' और वह सभा जो उखड़ी तो फिर कभी नहीं बैठी। 
तो क्या वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसर शुक्ल जी की तरह ही संवाद और सभा उखाड़ने वाले साबित हो रहे हैं? तब तो किसी न किसी को नीलकांत तो बनना ही पड़ेगा। और न बनिएगा तो काम कैसे चलेगा? 
अब देखिए डॉ. रामविलास शर्मा ने शुक्ल जी द्वारा निरुपित  लोकधर्म के संदर्भ में रूसी व्यवस्था के प्रति व्यक्त आक्रोश पर अपनी वैचारिक प्रतिकिया देते हुए लिखा है-“रूसी क्रान्ति  के बारे में साम्राज्यवादियों ने धुंआधार प्रचार  किया था, उसी को दोहराते हुए लिख डाला है शुक्ल जी ने यह सब। ...शुक्ल जी के विवेचन का यह सबसे कमजोर पहलू है। उन्होंने शुरुआत की थी कबीर आदि का लोकविरोधी रूप दिखाने से, पहुंच गये रूसी क्रान्ति और लेनिन तक और अंत में जनता को ही मूर्ख और जड़ कहने लगे। शुक्ल जी ने शब्द आवेश में लिखे हैं-उनकी मूल विचारधारा से इसका मेल नहीं बैठता। इस आवेश का कारण तुलसी के महत्व का गलत प्रतिपादन करने के जोश में वह अनेक असंगतियों में फंस गये।''  
आश्चर्य है कि डॉ. शर्मा की शुक्ल जी को लेकर कही गयी बातों पर कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘एक पहाड़' रामचंद्र शुक्ल जी तो ‘दूसरे पहाड़' शर्मा जी को समझ कर तथाकथित हस्तक्षेपी लोग चुप्पी ताने हुए हैं! 
डॉ. शर्मा जहां शुक्ल जी की समझ का रहस्यमयी उद्घाटन करते हैं तो मुद्राराक्षस अपनी पुस्तक ‘आलोचना और रचना की उलझनें' के ‘सवर्ण साहित्य और दलित प्रश्न' अध्याय, पृ.सं. 148 में डॉ.  शर्मा की समझ को कठघरे में खड़ा करते हैः- “डॉ. रामविलास शर्मा विख्यात तुलसी भक्त हैं पर जब कुछ लोगों ने उनसे तुलसीदास के घोर दलित विरोधी लेखन पर सवाल किए तो उन्होंने आश्चर्यजनक उत्तर दिएः “काव्य का ढांचा कैसा है, कविता का स्तर कैसा है, उसके गुण-दोष का विवेचन वो नहीं करते।'' यह लगभग वैसा बयान है जैसे कोई यह कहे कि समूचे शहर को जलाने के वक्त नीरो जो बांसुरी बजा रहा था उसकी संगीत मधुरता की पशंसा करनी चाहिए न कि जलने वालों की चीख पुकार की चिंता? 
शुक्ल जी के भतीजे चंद्रशेखर शुक्ल चाचा पर लिखी अपनी पुस्तक में कहते हैं-“अंग्रेजी साहित्य में जो काम  डॉ. जानसन ने वर्ड्सवर्थ को प्रोत्साहित करके किया, वही  काम हिन्दी के लिए चौधरी बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेम घन' ने शुक्ल जी को प्रोत्साहित करके किया।'' 
शुक्ल जी तो हिन्दी के उपन्यासकार और नाटककार बनना चाहते थे फिर यह हिन्दी आलोचना का इतिहास क्यों लिखने लगे? भतीजा चन्द्रशेखर शुक्ल कहते हैं-“शुक्ल जी फरमायशी कार्य करने के विरुद्ध थे। उन्हें सुरुचि के विरुद्ध खटना पड़ता था। नतीजा निकला सन् 1908 से 1928 तक लगभग 22 वर्ष वे नागरी प्रचार णी सभा में शब्द सागर का कार्य करते रहे। सन् 1929 में काशी में हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए गए  और अंत समय तक वहीं रहे। 
तो क्या हिन्दी साहित्य का इतिहास शुक्ल जी द्वारा अरुचि से  किया गया काम है? पिता चन्द्रवली शुक्ल अपने पुत्र से कहते थे कि हिन्दी पढ़ने से उन्नति नहीं हो सकती इसलिए तुम्हें अंग्रेजी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पिता के इतना कहने पर पुत्र शुक्ल भी कहां रुकने वाले थे। महज सोलह वर्ष की उम्र में एडिशन के ‘एसे ऑन इमैजिनेशन' का हिन्दी अनुवाद। कुछ और वर्षों में एडविन आरनाल्ड के पसिद्ध ग्रंथ ‘लाइट ऑफ एशिया', हैकल की पुस्तक ‘रिडल ऑफ द यूनिवर्स' के अनुवाद कर डाले। अंग्रेजी में रचा-बसा मन के विकास का पस्फुटन चिंतामणि में महसूस किया जा सकता है! नीलकांत जी ने जो कुछ लिखा, सुरुचि से लिखा। कोई उनसे फरमायशी लिखा नहीं सकता, क्योंकि उन्होंने नामवर सिंह की तरह ‘कविता के नए प्रतिमान' लिखकर साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने की इच्छा तो स्वप्न में नहीं पाली होगी। 
शुक्ल जी का परिवार बहुत बड़ा था। नौकरी का ही सहारा थी। पिताजी दूसरी शादी के बाद अपने द्वितीयक परिवार में उलझे थे। सो, वहां से सहायता मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। ऊपर से कुछ वर्षों में छह संतानें- केशवचंद्र शुक्ल, दुर्गावती, गोकुलचंद्र, विद्यावती, लीलावती उर्प लल्ला और कलावती। पत्नी सावित्री देवी भी जैसे-तैसे घर चलातीं।  
यह सवाल बाहरी लोगों को सालता रहेगा के हिन्दी साहित्य क्या शिक्षण कैंपस का अड्डा भर है। ठीक ही है, बाहरी लोगों को भला हिन्दी साहित्य की चिंता क्यों होने लगी? कौन महत्व देगा आपको, ज्यादा इधर-उधर करेंगे तो नीलकांत की तरह आउटसाइडर बना दिये जाएंगे।  क्या संभव है कि ‘रामचंद्र शुक्ल नई दृष्टि' पुस्तक कभी विश्वविद्यालय के पाठ्यकम में लग सकती है? कहीं हम दिन में अंधियारी सपना तो नहीं देख रहे हैं?  
किन्तु क्या भूलने की जरूरत है कि हिन्दी के भविष्यगामी छात्रों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखते हुए (छात्रोपयोगी) शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने में किन-किन पुस्तकों की मदद ली थी। कुछ नाम इस प्रकार  हैं- मिश्र बन्धु विनोद का हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. किशोरी लाल गुप्त की सरोज सर्वेक्षण विशाल ग्रंथ, बाबू श्यामसुंदर दास की ‘साहित्यालोचन', ‘रूपक रहस्य' और ‘हिन्दी भाषा और साहित्य' (बाबू श्यामसुंदर दास पर शुक्ल जी ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास' में टिप्पणी करते हैं-शिक्षापयोगी तीन पुस्तकें-भाषाविज्ञान, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा साहित्यालोचन-भी आपने लिखीं या संकलित की हैं ), पं. रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, वियोगी हरि जी की ब्रज माधुरी सार, फिर फांसीसी लेखक गार्सा दउ तासी की हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास दो भागों में, शिव सिंह सेंगर का हिन्दी साहित्य का इतिहास, 1878 में इसी को आधार बनाकर सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने हिन्दी साहित्य का पथम इतिहास द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर नाम से अंग्रेजी में लिखा जिसे 1888 में प्रस्तुत  किया गया था। और कितनों की भागीदारी होगी, अब क्या-क्या कहा जाए। 
खुद शुक्ल जी स्वीकार करते हैं-“आई.ए.रिचर्ड्स ने यूरोपीय साहित्य में समीक्षा के नाम पर फैलाये हुए बहुत से अर्थशून्य वाग्जाल को हटाकर शुद्ध विवेचनात्मक समीक्षा का रास्ता निकाला है। हिन्दी साहित्य में भी जो वाग्जाल फैला हुआ है, उसे दूर करना है।'' क्या ऐसे ही मौके पर एक प्रश्न शुक्ल जी से नहीं बनता है-तो फिर प्रेमचंद के घर पर जो बैठक हुई थी उससे आप भाग खड़े क्यों हुए थे?  
क्या नीलकांत जी यही काम शुक्ल जी के वाग्जालों को हटाकर हिन्दी साहित्य को जिंदा बनाने के लिए नहीं करना चाहते हैं?  
तभी तो अतिरिक्त साहस और अतिरिक्त अध्ययन का सहारा लेना पड़ा।   
यदि ऐसी बात नहीं होती तो क्यों डॉ. नामवर सिंह यह लिखने को बाध्य होते- “आचार्य शुक्ल की विश्व दृष्टि कितनी  प्रासंगिक? शीर्षक लेख मिला, आज ही। एक सांस में पढ़ गया। दृष्टि निर्मम, भाषा तल्ख, निर्णय सख्त, फिर भी संपूर्ण निबंध तर्कसंगत और प्रमाण  पुष्ट। बहुत दिनों के बाद ऐसा प्रौढ़ निबंध पढ़ने को मिला। इस निबंध के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा ऋणी हूं। बधाई स्वीकार करो। अनुरोध यही है कि अब इसे कहीं  अन्यत्र पकाशन के लिए न भेजना। इस पर मेरा ही हक है।'' 
अगर नीलकांत जी का लेख इतना असर कर गया कि दिल्ली से लेकर इलाहाबाद और पटना तक हिलने लगा, तो फिर मुक्तिबोध की सलाह पर ही क्यों नहीं विचार संभव हो पा रहा है? 
मुक्तिबोध अपनी पुस्तक ‘समीक्षा की समस्याएं' में लिखते हैं- “डॉ. रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, पकाशचंद्र गुप्त और अमृत राय, डॉ. नामवर सिंह तथा इनके अतिरिक्त यशपाल और नागार्जुन जैसे लेखक, कलाकार क्या कभी इकट्ठा होकर सम्मिलित रूप से काम नहीं कर सकते थे? ... और अगर ये सम्मिलित रूप से, संगठित रूप से काम नहीं कर सकते तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य बाधाओं के अतिरिक्त एक बाधा यह भी है कि ये सब मध्यमवर्गीय व्यक्तिवादी हैं जिन्हें अपनी व्यक्ति सत्ता अन्य बातों से अधिक प्रिय है?'' 
माओत्से तुंग ने यह कहकर क्या भूल कर दी-“हजारों फूलों को खिलने दो, हजारों विचारों को टकराने दो।'' 
आखिर क्या कारण रहा होगा के डॉ. नामवर सिंह ने नीलकांत के लेख की तारीफ की। दिल्ली के कई आचार्य प्रवरों का मानना है कि ऐसा कर नामवर सिंह अपने गुरु हजारीप्रसाद  द्विवेदी को मजबूत दिखाने के लिए एकसाथ रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा को काउंटर कर रहे थे। यानि कि ‘नीलकांत टूल्स' काउंटर के लिए कारगर हथियार बन गया नामवर सिंह के लिए।  
नंदकिशोर आचार्य भी नामवर सिंह की समझ-नासमझ को पकड़ लेते हैं और अपनी पुस्तक ‘साहित्य का स्वभाव' के ‘अपने ही घर में बेघर की आलोचना' अध्याय में कहते हैं-“ऐसा कभी नहीं होता कि हमने स्वयं साहित्य और उसकी प्रक्रिया   को एक संवेदनात्मक प्रमाण  सामग्री की तरह लेते हुए उसके माध्यम से मानवीय नियति को, समय और समाज को मनुष्य की आशा-आकांक्षाओं तथा निराशाओं और पुंठाओं को समझने का प्रयास   किया हो। यदि ऐसा होता तो कोई कारण नहीं था कि आचार्य शुक्ल छायावाद को स्वीकार नहीं कर पाते और छायावाद के आलोचक नयी कविता को, और तब न डॉ. नामवर सिंह जैसे आलोचक को उसी लिरिक की वापसी का आग्रह करना पड़ता जिसकी अप्रासंगिकता की घोषणा कविता के नये प्रतिमान तलाशते हुए वह कर चुके थे।'' 
देखिए, रविभूषण जी भी ‘साम्य' पत्रिका के रामविलास शर्मा एकाग्र अंक में अपने लेख ‘रामविलास शर्मा और इतिहास की शव-साधना' की अंतिम पंक्तियों में नामवर सिंह के बारे में कुछ कह रहे हैं-“रामविलास जी जिन तथ्यों-साक्ष्यों की बिना पर अपनी स्थापनाएं प्रस्तुत  करते हैं, उन्हें चुटकी बजाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। नामवर अब स्वयं दूसरे ही दिन अपनी बातों को झुठलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। हिन्दी में बहस का अभाव है। हिन्दी लेखकों-आलोचकों में फिसलन-विचलन भी है। रामविलास शर्मा में ये सब नहीं था। वे सुविधावादी, संबंधवादी और अवसरवादी नहीं थे।'' 
तो क्या यह समझा जाय कि नामवर सिंह के पास शुक्ल की विश्वदृष्टि और इतिहासदृष्टि पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई थी।  
आदरणीय मैनेजर पांडेय ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि' में नामवर सिंह पर अलग से कोई अध्याय नहीं लिखा है। टुकड़ों-टुकड़ों में बस याद भर कर लेते हैं। यह एक गंभीर सवाल पर जिस पर विचार करना तो बनता है। लेकिन मैनेजर पांडेय के कालक्रम का ज्ञान भी आश्चर्य से भरा अजूबा पैदा करता है। इसी पुस्तक में लिखते हैं-“1967 ईं के सामाजिक- राजनीतिक वातावरण से प्रभावित  रचनाकारों की एक नई पीढ़ी अखिल भारतीय स्तर पर उभर कर सामने आई। हिन्दी में आलोक धन्वा, कुमार विमल, पंकज सिंह, विष्णुचंद्र शर्मा, विजेन्द्र, वेणु गोपाल, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रप्रति, अरुण कमल, ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रमेश उपाध्याय, स्वयं पकाश, जगदीशचंद्र, जगदंबा प्रसाद  दीक्षित आदि की नई पीढ़ी जनवादी रचनाशीलता के नए उत्थान को समृद्ध करने लगी।'' 
आलोक धन्वा इस सूची में पहले कैसे आ गये? क्या विष्णुचंद्र शर्मा और विजेन्द्र से वरिष्ठ कवि हैं आलोक धन्वा? मैंने सच की जानकारी के लिए विष्णुचंद्र शर्मा जी को फोन किया- उन्होंने कहा, क्या बोल रहे हो, आलोक धन्वा मुझसे बहुत जूनियर हैं। अब इन अध्यापकों की आलोचना दृष्टि और सूची पर भला हम और तुम क्या करेंगे? जिन्हें चाहेंगे उठाएंगे और जिन्हें चाहेंगे गिरा देंगे। यही सब हिन्दी साहित्य में दशकों से चल रहा है। आलोक धन्वा भी बातचीत में कहते हैं कि पांडेय जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। इससे तो मेरा ही अपमान हुआ। विष्णुचंद्र शर्मा और विजेन्द्र मुझसे बहुत वरिष्ठ कवि हैं।  
एक सवाल, क्या ये आलोक धन्वा के प्रति मैनेजर पांडेय का मोह है? उसी तरह से शुक्ल जी का भी पंत जी को लेकर बहुत मोह है! यदि नहीं, तो हिन्दी साहित्य का इतिहास में भक्तिकाल   के महत्वपूर्ण कवि तुलसीदास पर 11-12 पेज और छायावाद के कवि पंत जी पर भी 11-12 पेज। निराला पर महज दो-तीन पेज,  आखिर क्यों? गौरतलब है कि मुक्तिबोध भी अपनी आलोचना में निराला का एक-दो बार नाम भर लिए हैं? पर क्यों? ‘कहीं पे निगाहें-कहीं पे निशाना'। अजी, ये पाठक हैं-सब जानते हैं!   
कुछ इसी तरह के कारण रहे होंगे कि नीलकांत जी बार-बार अध्यापकीय आलोचकों द्वारा अस्वीकार किये जाते रहे।  अध्यापकों के पास व्यापक आडम्बर होता है। शिष्यों की मंडली होती है। शिष्यों का कब्जा महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में होता है। वाहवाही-पशंसा का खुला बाजार चलता है। और इस तरह से हिन्दी साहित्य अपना तथाकथित संसार बढ़ाता चलता है। यदि नीलकांत जी के पास भी एक शिष्य मंडली होती तो क्या उनकी स्थिति वैसी ही होती जैसी आज है। पूरी तरह से आउटसाइडर  ‘किन्तु, यही बाहरवाली जान मारे ली'! विष्णुचंद्र शर्मा ने कहा-‘नीलकांत की हिन्दी साहित्य में बहुत उपेक्षा हुई है।' 
विष्णुचंद्र शर्मा की इस बात का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि किसी हिन्दी के लेखक की पुस्तक में नीलकांत जी का नाम ढूंढते रह जाएंगे! और आपको देखने को नहीं मिलेगा। इसलिए जब आदरणीय काशीनाथ सिंह की संस्मराणात्मक पुस्तक ‘याद हो कि न याद हो' में नीलकांत जी का नाम दिखा तो मैं आश्चर्य में पड़ गया। यहां नीलकांत नाम कहीं भूल से तो नहीं आ टपका या इसके पीछे तर्क भी है। 
काशीनाथ जी इस पुस्तक के ‘गरबीली गरीबी वह' नामक अध्याय में लिखते हैं- (यह लगभग 1963 की बात है)। 3 मार्च को इलाहाबाद से मार्कण्डेय आए। तब तक नीलकांत की कुछ कहानियाँ छप चुकी थीं और लोगों का ध्यान भी आकृष्ट कर चुकी थीं। सो, एक तो मार्कण्डेय स्वयं चर्चित कहानीकार, दूसरे नए-नए लिखने वाले दो युवा कहानीकारों के भाइयों ने 60 के बाद की कहानियों पर खूब बातें कीं-एक दिन, दो दिन, तीन दिन। भैया (नामवर सिंह) ने बातें शुरू कीं हम दोनों की कहानियों के संदर्भ में और ये बातें इतनी गंभीर थीं कि मैं चकित। 
शुरू किया था भैया ने हेमिग्ंवे की कहानियों से। उनकी यही खासियत थी। साहित्य या राजनीति की एक अदना से अदना नामालूम-सी चीज या समस्या को उठाकर विश्व-साहित्य या विश्व-राजनीति के मानचित्र पर रख देते थे और तब उसका जायजा लेते थे। संभव है कि वह मानचित्र हमेशा प्रत्यक्ष न दिखाई पड़े, लेकिन वह उनके दिमाग के एक हिस्से की दीवार पर स्थायी रूप से टंगा रहता था। 
नीलकांत जी कोई एक बात या घटना लेते हैं और पीछा करते  हुए उसके अंदर भीतर तक चले जाते हैं। इसके उलटा काशीनाथ जी करते हैं। बाहरी दृश्यों का चित्रण। कांसिस्टेंट चिंतन इनके बस की बात नहीं है। मुझे चिंतन और बोरियत वाली कहानियाँ पसंद नहीं हैं। 
एक भैया के चलते आज काशीनाथ सिंह कहां हैं और एक भैया के चलते नीलकांत जी कहां हैं? यह तो शायद ही किसी को बताने की जरूरत है। बकौल दिनकर-‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास'। मैं अपने पिछले संपादकीय में लिख चुका हूं कि उपेन्द्रनाथ अश्क ने कभी अपने में एक इंटरव्यू में कहा था कि नामवर सिंह को अपने भाई काशीनाथ सिंह को छोड़कर दूसरा कोई कहानीकार नहीं दिखता है। खैर। 
काशीनाथ की पशंसा नामवर सिंह के मुख से मैं भी साथ में शराब पीते हुए सुन चुका हूं।  
मुझे याद आ रहा है लगभग (13-14) वर्ष पहले 2002-2003 में, उस समय मैं कोलकाता के पभात खबर में उपसंपादक था और अगले वर्ष 2004 में इसी शहर में दैनिक जागरण में आ गया था, जहां 2011 के अगस्त तक रहा। 2003 के पुस्तक मेले में नामवर जी ने मेरी पहली कविता पुस्तक ‘संगीन के साये में लोकतंत्र' और अब तक की वही आखिरी भी है, का विमोचन किया था। निश्चित ही उन्होंने कुछ कहा होगा, उस पर फिर कभी। उस वर्ष काशीनाथ जी भी आए थे। जो फोटो हमारे पास है उसमें वह मौजूद हैं। हाँ, तो कह रहा था कि शराब पीने के दौरान (पत्रकार-लेखक कृपाशंकर चौबे की मौजूदगी में) नामवर जी कह रहे थे-“रचनाकार बहुत दिनों तक याद किया जाता है और आलोचक बहुत जल्द भूला दिया जाता है। काशी युगों तक याद किया जाएगा और मैं दशकों तक। तब तक मैं दो-तीन पेग ले चुका था, सो नामवर जी की हर बात पर लोट-पोट हो रहा था। (उस समय तक शराब के बारे में बहुत नहीं जानता था, आज भी बहुत नहीं जानता हूं)। नामवर जी की बात से असहमति जताते हुए कृपा जी कह रहे थे-“सर, आप हिन्दी साहित्य में हैं और रहेंगे।'' 
दूसरा प्रसंग  भी कोलकाता का ही है। मैं दैनिक जागरण में आया ही था और उसी समय रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक और ममता कालिया भारतीय भाषा परिषद की निदेशक बनकर आयी थीं। काशीनाथ सिंह परिषद के गेस्टहाउस में ठहरे थे। कृपा जी ने मुझे भी बुलाया। मैंने पूछा कि और कौन रहेंगे। उन्होंने कहा-बस तीन-चार लोग। मैं गया तो वाकई तीन से ज्यादा नहीं थे-काशीनाथ जी, कृपा जी और विनोद शर्मा (व्यंग्यकार), चौथा मैं। पीने-खाने का दौर शुरू हुआ। उसी दौरान मैं काशीनाथ की प्रतिनिधि कहानियां पढ़ रहा था, और ‘कविता की नई तारीख' कहानी उस पुस्तक में मुझे बहुत अच्छी लगी थी। मैं सोचा इसी कहानी के साथ दो-तीन घंटे गुजार देना बहुत मुश्किल नहीं होगा। और हुआ भी वही। काशीनाथ जी के साथ कविता की नई तारीख पर ठहाका लगाता रहा। अंतिम पेग ले रहा था तभी रवीन्द्र कालिया आ गये। मुझे काशी जी के साथ शराब पीते देख कालिया जी ने चुटकी ली-काशी, तुम्हारी फॉलोइंग अच्छी है। काशी जी ने कालिया जी से भी कहा, तुम भी लो। उनका जवाब था-अब कहां लेता हूं, तुम तो जानते ही हो, अब देरी ना करो-ममता खाने पर इंतजार कर रही है। इतना सुनते ही मैं बचा-खुचा गटक गया और कुछ समय बाद वहां से निकल गया। संभव है कि मैं इन प्रसंगों को यहां नहीं दे सकता था पर यह इसलिए जरूरी हो गया कि मैं यह समझना चाहता हूं कि क्या ‘शराब की सहृदयता' और ‘साहित्य की सहृदयता' दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ऐसी बात नहीं होती तो मेरे बार-बार के अनुरोध के बाद भी क्या नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी, ज्ञानरंजन और न जाने कितनों से मैंने कहा कि छोटी ही टिप्पणी आप नीलकांत जी पर दें, पर कहीं  से इनकार तो कहीं से आश्वासन ही मिलता रह गया! ...  तो मालूम पड़ा कि ‘शराब की सहृदयता' कुछ पल के लिए है और ‘साहित्य की सहृदयता' असली जंग और तंज है, अरे, छोड़ो भी यार! हिन्दी में कहां तुम सहृदयता लेकर आ टपके और वो भी नीलकांत जी के लिए।  
नीलकांत जी अचानक आउटसाइडर हो गये या परिस्थितियों ने उन्हें ऐसा बनाया, इस पर विचार जरूरी है। प्रश्न उठता है कि कोई आउटसाइडर बनता ही क्यों है? जवाब होगा-परंपरा से चली आ रही सोच का वह पोषक नहीं होगा। समाज में व्यापक पैमाने पर फैली अराजकता के बारे में बोलने में वह संकोच नहीं करेगा। अगर गुरु-शिष्य परंपरा, महिमामंडन के चलते सच बोलना छोड़ दिया जाए, तब तो ग़ड़बड़ी के ठीक होने की उम्मीद बिल्कुल ही नहीं रहेगी। कोई बात नहीं है। नीलकांत जी कभी इनसाइडर हो ही नहीं सकते हैं, इसलिए उन्होंने आउटसाइडर होना स्वीकार किया। उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता, और पड़ता तो पड़ ही गया होता, नहीं पड़ा तो आज भी उसी अंदाजे बयां में जी रहे हैं- “जो घर पूंके आपना-चले हमारे साथ।'' 
चलते-चलाते आदरणीय रमेशचंद्र शाह जी के बहाने रामचंद्र शुक्ल को एक बार फिर से याद कर लिया जाए। शाह जी अपनी पुस्तक ‘आलोचना का पक्ष' के आशुतोष तुम अवढरदानी अध्याय  की शुरुआत करते हैं-(जानसन नहीं रहे। उनका समकक्षी कोई नहीं, चलो बॉजवेल, इस शून्य को भरने के लिए किसी एक ऐसे व्यक्ति के पास जो कहीं से भी उस आदमी का स्मरण हमें दिलाए। क्या तुम्हें दिखाई पड़ता है कहीं ऐसा व्यक्ति? मुझे तो दिखाई नहीं पड़ता। ) एडमंड बर्प (बॉजवेल की पुस्तक ‘द लाइफ ऑफ सेम्युअल जानसन' का उपसंहार) 
“ऑगुस्टस के राज की तारीफ करते हुए इतिहासकार गिब्बन ने कहीं लिखा है कि ‘उसे जो रोम मिला था वह ईंटों से बना रोम था और उसने जो अपने उत्तराधिकारियों को सौंपा, वह संगमरमर का रोम था।' पंडित रामचंद्र शुक्ल के किए-धरे की तारीफ करनी हो तो यह रूपक भी छोटा पड़ेगा क्योंकि उन्हें जिस रोम से साबका पड़ा था, उसकी ईंटें भी उन्हें खुद ही जुटानी पड़ी थीं। ऐसी स्थिति में जब तक कोई साहित्य का बख्तियार खिलजी ही आ के हिन्दी की ईंट से ईंट नहीं बजा देता, तब तक शुक्ल जी के फिर अवतरित होने की गुंजाइश तो नहीं दिखती।'' 
नीलकांत जी आप क्या कहते हैं? 
                  मीर फरमाते हैं- 
                किस किस अदा से रेख्ते मैंने कहे वले, 
                समझा न कोई मेरी जबां इस दयार में।  - निर्भय देवयांश ( - अंक फरवरी-मार्च , 2017  से साभार )
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