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Sunday, January 22, 2017

1 नयी कहानी में भोगवाद - संभोगवाद: डॉ. अजीत प्रियदर्शी

[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। ] -डॉ. अजीत प्रियदर्शी 
 
अखिलेश की कहानियों में छिनरपन- 
नयी कहानी में भोगवाद - संभोगवाद
आजादी के सपनों से मोहभंग, विभाजन की त्रासदी और पारिवारिक टूटन के बीच टूटे हुए सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में सन् पचास के आस-पास लिखना शुरू करने वाले युवा कथाकारों ने ‘अनुभूति की सच्चाई' और ‘अनुभव की प्रमाणिकता' पर बल देते हुए मध्यवर्गीय जीवन की कहानियाँ लिखनी शुरू की। 1950-51 से नये कहानीकारों की नयी कहानियाँ ‘कल्पना', ‘हंस', ‘प्रतीक', ‘कहानी' के साथ अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं। युवा कथाकारों की कहानियों में ‘नयेपन' की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ। लेकिन ‘नयी कहानी' का प्रथम उल्लेख दुष्यन्त कुमार ने फरवरी 1955 की ‘कल्पना' में प्रकाशित अपने आलेख ‘नयी कहानी : परम्परा और प्रयोग' में किया। जनवरी 1957 में ‘कहानी' पत्रिका के ‘नववर्षांक - जनवरी 1957' में प्रकाशित अपने आलेख में नामवर सिंह ने युवा कथाकारों की कहानी को ‘नयी कहानी' न कहकर ‘आज की कहानी' कहा। 1955 में ‘नयी कहानी' चर्चा में आयी और दिसम्बर 1957 में इलाहाबाद के ‘साहित्यकार सम्मेलन' में इसे मान्यता मिल गई। ‘कहानी' तथा ‘नई कहानियाँ' के सम्पादक भैरव प्रसाद गुप्त, नये कहानीकारों की ‘मित्रत्रयी' (मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव) तथा आलोचक नामवर सिंह ने नयी कहानी को प्रतिष्ठित करने में अहम योगदान दिया। मोटे तौर पर, ‘55 से 64' तक के दशक को ‘नयी कहानी दशक' माना जाता है। लेकिन 1960 तक आते-आते ‘नयी कहानी' भी पुरानी और बासी होने लगी। 1961 में प्रकाशित ‘लहर' पत्रिका के ‘नयी कहानी विशेषांक' में देवीशंकर अवस्थी ने स़ाफ कह दिया कि, ‘इधर पिछले दो वर्षों से हिन्दी कहानी के क्षेत्र में बासीपन आने लगा है। लगता है कि पुराने फार्मूले दोहराये जाने लगे हैं... कहानी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली दर्जनों कहानियाँ पढ़िए और लगेगा कि इन्हें पहले कहीं पढ़ चुके हैं।' (‘एकरसता टूटे और बेकली बढ़े', देवीशंकर अवस्थी, लहर, जुलाई 1961), 1962 में नयी कहानी के प्रमुख कथाकार निर्मल वर्मा ने खुद ही ‘कहानी की मृत्यु' की चर्चा की। 
नयी कहानी' का आन्दोलन शुरू में भैरव प्रसाद गुप्त के सम्पादन में इलाहाबाद से निकलने वाली ‘कहानी' पत्रिका द्वारा संचालित होता रहा। 1955 से सन् 60 तक ‘कहानी' पत्रिका के माध्यम से भैरव प्रसाद गुप्त ने विभिन्न भारतीय भाषाओं के महत्त्वपूर्ण कहानीकारों को एक मंच पर लाने का सराहनीय कार्य किया। मई 1960 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से भैरव प्रसाद गुप्त के सम्पादन में ‘नई कहानियाँ पत्रिका का प्रवेशांक निकला। उन्होंने नये कहानीकारों की कहानियों को हाथों-हाथ लिया। इस पत्रिका के प्रबन्ध सम्पादक ओम प्रकाश का मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव से आत्मीय एवं घनिष्ठ सम्बन्ध था। इन दोनों ने ओम प्रकाश जी की म़ार्पत भैरव प्रसाद गुप्त पर अनुचित दबाव डालना शुरू किया। अन्तत गुप्त जी ने सम्पादक पद से त्याग-पत्र दे दिया। उनके त्याग-पत्र देने के बाद कमलेश्वर को ‘नयी कहानियाँ' का सम्पादक बनाया गया और तब यह पत्रिका ‘नयी कहानी' का मुख पत्र बन गई।  
नयी कहानी की ‘मित्रत्रयी'- मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव- ने धीरे-धीरे ‘नई कहानी' के आन्दोलन को हाइजैक कर लिया। आत्मचर्चा, आत्म प्रचार और आत्म विज्ञापन के द्वारा उन्होंने अपनी खूब प्रशंसा की और दूसरों से करवाई। इस तरह ये ‘नयी कहानी' की चर्चा के केन्द्र में बने रहे। नामवर सिंह ने इस विवादास्पद मित्रत्रयी को ‘नयी कहानी का झंडाबरदार' कहा और इनमें ‘समझौतावाद' और ‘व्यवसायवाद' लक्षित किया। 1965 के शुरू में ही व्यंग्यात्मक लहज़े में नामवर सिंह ने इन ‘झंडाबरदारों' में ‘नये सृजन की सम्भावना समाप्त' होने की घोषणा की- ‘यह भी एक विडम्बना ही है कि जो कहानीकार आज सहसा ‘नई कहानी' के झंडाबरदार हो उठे हैं, वे दरअसल नई कहानी के ह़कदार ही नहीं रह गए हैं। लगता है, जैसे बाहरी नारा भीतरी खोखल को ढँकने का बहाना भर है। मुट्ठी की पकड़ जिस तरह झंडे पर कसती जा रही है, उससे यही लगता है, जरूर पाँवों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है।' (माया, नववर्षांक 1965, संकलित- कहानी : नयी कहानी, पृष्ठ 190 लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2009) इस मित्रत्रयी की अगुआई में नयी कहानी में विकसित हो रही रोमानी रूझान, व्यावसायिकता, आत्मपरकता, व्यक्तिवादिता और रूपवादी प्रवृत्ति से विक्षुब्ध और किंचित आक्रोशित होकर भैरव प्रसाद गुप्त ने मधुरेश को प्रेषित एक पत्र में लिखा- ‘सच पूछिए तो इन लोगों की बहुत सारी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं। हिन्दी कहानी को इन लोगों ने अपने कपटोपाय से कितना ज़लील और बाज़ारू बना दिया है, देखकर दुःख होता है।' (मधुरेश, आज की हिन्दी कहानी : विचार और प्रतिक्रिया, पृष्ठ 103) 
समूचे ‘नयी कहानी आन्दोलन' पर मित्रत्रयी के काबिज़ होते ही ‘नयी कहानी' का व्यापक फलक सिकुड़ने लगा और वह धीरे-धीरे ‘स्त्राr-पुरूष सम्बन्धों की अभिव्यक्ति' तक सिमटती चली गयी। ‘नयी कहानी' पर व्यक्तिवादी और व्यावसायिक तत्त्वों के हावी होते ही मार्पण्डेय, शेखर जोशी, अमरकान्त, रेणु, शिवप्रसाद सिंह जैसे सही मायने में नयी कहानी के लेखकों को नज़रअन्दाज़ और चर्चा से बाहर कर दिया गया। शिवप्रसाद सिंह ने इस स्थिति से क्षुब्ध होकर लिखा- ‘नयी कहानी शब्द पिछले वर्षों, खासतौर से कमलेश्वर के ‘नयी कहानियाँ' के सम्पादक होने और रहने के काल में व्यापक अर्थ-संकोच के दौर से गुज़रा और कई साहित्येत्तर स्थितियों के कारण नयी कहानी का सम्बन्ध दो-तीन व्यक्तियों के साथ इस कदर जोड़ा जाता रहा, गोया नयी कहानी हिन्दी साहित्य की कोई व्यापक विधा न होकर दो-तीन हमदम दोस्तों के बीच की ‘कॉमन गर्लपेंड' हो।' (आधुनिक परिवेश और नवलेखन, पृष्ठ 174, प्रकाशक : लोकभारती, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1970), ‘नयी कहानी' में अलग-अलग कथा-भूमियों के महत्त्वपूर्ण कथाकारों की पाँच त्रयियाँ साफ देखी जा सकती हैं। रविभूषण ने ‘नयी कहानी' की पाँच त्रयियों को इस तरह रेखांकित किया है- ‘एक ‘मित्रत्रयी'-कमलेश्वर, राकेश और यादव की थी, जिसने ‘जेन्युइन त्रयी'-अमरकान्त, शेखर जोशी और भीष्म साहनी को किनारे किया। एक तीसरी त्रयी-मार्पण्डेय, रेणु और शिवप्रसाद सिंह की थी, जिन्हें आरम्भ में ‘ग्राम कथाकार' कहा गया। चौथी त्रयी- निर्मल, रामकुमार और कृष्ण बलदेव वैद की है और पाँचवीं त्रयी- मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती और उषा प्रियंवदा की।' (पहल 97, पृष्ठ 48) 
मित्रत्रयी के दिशा-निर्देश में ‘नयी कहानी' सामाजिकता से हटकर वैयक्तिकता की तरफ अग्रसर हुई। उसमें ‘सामाजिक यथार्थ' की जगह ‘प्रामाणिक अनुभव' और ‘संघर्ष' की बजाय ‘जीना-भोगना' की अभिव्यक्ति होने लगी। वह मध्यवर्गीय स्त्राr-पुरूष सम्बन्धों में आ रही पुंठा, तनाव की और रोमांस के क्षणों के छीजते जाने की कहानी बन गई। शहरी मध्यवर्गीय जीवन में स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों के बनते-बिगड़ते सम्बन्धों की कहानी ही नई कहानी की सर्वप्रमुख धारा बन गई। मोहन राकेश, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा और राजेन्द्र यादव ऐसी ही कहानियाँ लिखने लगे। राजेन्द्र यादव की स्वीकारोक्ति है कि हम लोग मध्यवर्गीय परिवारों के आर्थिक और मानसिक बदलावों को स्त्राr-पुरुष के बदलते समीकरणों में देख रहे थे। वहाँ अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक होती स्त्राr और इस प्रक्रिया में पुरुष के साथ बनते-बिगड़ते सम्बन्ध ही, हमारे कथ्य थे। कहानियाँ प्राय टूटते परिवारों और हताश युवकों के आसपास ही घूमती थीं।' (उद्भावना, सितम्बर-अक्टूबर 2016, पृष्ठ 50-51) 
स्त्राr-पुरुष के कसमसाते सम्बन्ध ही नयी कहानी का प्रमुख कथ्य बन गया और प्रिय थीम साबित हुआ। सन् 1960 के आसपास नयी कहानी के नाम पर स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों की कहानियाँ रूढ़ि की तरह लिखी जाने लगीं। तब लेखक की तंगनज़र और कथाभूमि के तंगदायरे के बारे में खुलकर चर्चा होने लगी। उन दिनों अनेक कथाकारों ने ‘नई कहानी में अभिव्यक्त सेक्स पुंठा' पर अपना क्षोभ व्यक्त किया। उस दौर में छपने वाली नयी कहानियों में ‘अश्लीलता' बहस का मुद्दा बनी। बहुत से कथाकारों, पाठकों, आलोचकों ने चेतावनी के स्वर में कहा कि नयी कहानी की अन्तर्वस्तु को केवल व्यक्ति की पुंठाओं और मनोभावों तक सीमित रखने के अपने खतरे भी हैं। ऐसा करने से अनाचार, दुराचार, पुंठा और निराशा की सर्वव्यापी छाया नयी कहानी को ढँक लेगी। इस चेतावनी के बावजूद, नयी कहानी में कुछ ऐसा ही घटित हुआ। कथाकारों ने निजी दृष्टि से अपने पात्रों के अन्तर में झाँककर उसकी मनोग्रन्थियों, विकृतियों और कुप्रवृत्तियों से पर्दा उठाया। मनोविश्लेषण नयी कहानी का अपरिहार्य अंग बन गया और कई बार नयी कहानी ‘मेरे और नंगी औरत के बीच' (रघुवीर सहाय) की कहानी बन गई। सामाजिक मूल्यों तथा यौन-नैतिकता के बाहरी खोल उतारने के सिलसिले में नये कहानीकारों ने ‘मनुष्य को गिरे हुए मनुष्य के रूप में उकेरना शुरू किया। ‘अनुभूति की सच्चाई' और ‘अनुभूति की प्रमाणिकता' का ढोल पीटकर नये कहानीकार ने मध्यवर्गीय व्यक्ति और उसके सम्बन्धों की नंगई दिखाई। इस क्रम में, उसने अपनी कहानियों में स्त्राr-पुरुष यौन सम्बन्धों का निरावरण अंकन किया।  
नयी कहानी के अनेक कथाकारों ने शहरी मध्यवर्गीय व्यक्ति की एकान्त पुंठाओं और यौन विकृतियों का नग्न चित्रण किया है। अनेक कथाकारों ने भाई-बहन के बीच अकथनीय बातों, पति-पत्नी के अलग-अलग दोस्त रखने और साथ बैठकर एक-दूसरे के पुराने प्रेम सम्बन्धों पर चर्चा के चटख़ारेदार प्रसंगों का वर्णन किया। शहरी जीवन की नयी कहानियों में यह सब इतना अधिक हुआ कि डॉ. इन्द्रनाथ मदान ने चुटकी लेते हुए कहा- ‘नयी कहानियों में शारीरिक और मानसिक समीपता के खुले चित्रण को एक उपलब्धि के रूप में आँका जा सकता है।' (कथन उद्धृत- नयी कहानी की पूर्व पीठिका : रामाश्रय सविता, पृष्ठ 100, सुलभ प्रकाश, लखनऊ, प्रथम संस्करण 1990) अनेक कहानियों में सेक्स पुंठा में छटपटाते पात्रों का खास लक्ष्य ‘परस्त्राrगमन' होता है। बाजार की माँग और जरूरत के हिसाब से स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों को लेकर चटख़ारेदार कहानियाँ खूब लिखी गईं। सेक्स-पुंठित लड़कियों को लेकर कई कहानियाँ सामने आयीं। अनेक कहानियों में बिना किसी सार्थक दृष्टि और कथा संयोजन के, उत्तेजक स्थितियों, देहयष्टि और शारीरिक मिलन के उत्तेजक ब्यौरों को परोसा गया। स्त्राr-पुरुष के अन्तर्मन में गहरे झाँकने के बहाने से कुछ नये कहानीकारों ने बाजार की माँग के अनुरूप अपनी कहानियों में काम-प्रसंगों, युगनद्ध स्थितियों और सम्भोग ब्यौरों को प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि कथ्य और शिल्प की दृष्टि से कमजोर और निम्न स्तर की बाज़ारू कहानियों ने साधारण पाठकों के बीच सनसनी फैलाई और ऐसी कहानियों की माँग बढ़ गई। तब अनेक नयी कथा-लेखिकाओं ने सेक्स का खुलकर अभिधापरक चित्रण किया।  
कमलेश्वर ने जैनेन्द्र, यशपाल और अज्ञेय आदि की कहानियों पर यह आरोप लगाया था कि उनमें ऐसे आदमी का चित्रण हुआ है, जिसने नारी को वासना पूर्ति का क्षेत्र समझा है और ड्राइंग रूम में उसे अपने लिए खड़ा कर लेना चाहा है। इस सत्य से इन्कार नहीं किया जा सकता। लेकिन सत्य यह भी है कि बड़ी तादाद में नये कहानीकारों ने भी इसी आदमी का चित्रण किया है। (श्री सुरेन्द्र, नई कहानी : दशा-दिशा-सम्भावना, पृष्ठ 54, अपोलो पब्लिकेशन, जयपुर, प्रथम संस्करण 1966); ‘भोगे हुए यथार्थ' की अभिव्यक्ति के नाम पर अनेक नये कथाकारों ने अपनी कई कहानियों में ‘भोग का यथार्थ' प्रस्तुत किया। मध्यवर्गीय जीवन के भोगवादी जीवन-दर्शन और जीवन-यथार्थ को प्रस्तुत किया। भोगवादी जीवन यथार्थ की प्रामणिक ( ? ) अभिव्यक्ति के लिए अनेक नये कहानीकारों ने स्त्राr-पुरुष (पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका) के सेक्स जीवन का नग्न चित्रण किया। सच कहा जाय तो उन्होंने सेक्स के कारण स्त्राr-पुरुष के बीच बनते बिगड़ते रिश्ते, सेक्स-पुंठा, सेक्स जीवन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, उससे उत्पन्न दिलचस्पियाँ अथवा ऊब का चित्रण ‘फैशनेबल ढंग से' किया। स्त्राr-पुरूष सम्बन्धों के दायरे में सिमट चुकी ‘नयी कहानी' में सेक्स की अभिव्यक्ति ‘मैनरिज्म' या कथारूढ़ि बन गयी और व्यावसायिक माँग के कारण भी उसमें सेक्स-चित्रण की बाढ़ आ गयी। अनेक नये कहानीकारों ने नारी अंगों का कामोत्तेजक वर्णन ही नहीं किया वरन् सम्भोग का खुला एवं उद्दाम वर्णन किया। इस गिरावट से आहत होकर कमलेश्वर ने पश्चाताप की मुद्रा में स्वीकार किया कि, ‘नयी कहानी ने अपनी त्वरा में कुछ ग़लत रास्ते भी अपनाये, कुछ पुंठित और रुग्ण लेखकों को भी शायद पनाह दी।' (नयी कहानी की भूमिका : कमलेश्वर, पृष्ठ 71, प्रकाशक : शब्दकार, दिल्ली, प्रथम संस्करण 1978)। 
नयी कहानी में सेक्स वर्णन के बढ़ते रूझान को लक्ष्य करके नामवर सिंह ने लिखा- ‘पुरानी कहानियों की रोमांटिक भावुकता की कमी को कुछ नये कहानीकार सेक्स-संकेतों से पूरा कर रहे हैं। राजेन्द्र यादव तो खैर पाठकों को सिर्प ‘झटका' देने के लिए ऐसे संकेत देते हैं और मोहन राकेश भी ‘जानवर और जानवर' में फर्प करने के इरादे से ही विवश हैं, लेकिन निर्मल वर्मा जैसे ‘सॉफिस्टिकेटेड' कहानीकार भी जब ‘गर्दन के नीचे फाक के भीतर से ऊपर उठती हुई कच्ची-सी गोलाइयों में मीठी-मीठी सी चुभती हुई सुइयों' का लोभ संवरण नहीं कर पाते, तो इस सुई के उपयोग पर प्रेमचन्द याद आते हैं : ‘सेक्स सुई है, उससे सीने का भी काम लिया जा सकता है और चुभाने का भी। उपयोगितावाद का कला से वैर प्रसिद्ध है। इसलिए नये कलाकार इस सुई का केवल कलात्मक उपयोग कर रहे हैं।' (कहानी : नयी कहानी, वही पृष्ठ 35-36), 24-25-26 दिसम्बर 65 को कलकत्ता में वृहद स्तर पर आयोजित ‘कथा-समारोह' में बोलते हुए जैनेन्द्र जी ने ‘नयी कहानी' के सम्बन्ध में कहा कि, ‘यह भोगवाद की कहानी है। नयी कहानी वाले कहते हैं कि वे ‘भोग' कर लिखते हैं। सिगरेट और शराब पीना और औरत के साथ भोग करना ही इनका अनुभव है।' (कमलेश्वर द्वारा उद्धृत, नयी कहानी की भूमिका, वही पृष्ठ 17)ं। 
नयी कहानी' के खास सिद्धान्तकार, पैरोकार और प्रवक्ता कमलेश्वर को भी नये कहानीकारों की कुछ कहानियों को पढ़कर ऐसा लगा कि, इन लोगों के लिए- ‘औरत एक जिन्स है, ज़िन्दगी महज़ ऐय्याशी है...।' (नयी कहानी की भूमिका, वही, पृष्ठ 24), लेकिन ‘यही सच है' (मन्नू भंडारी), ‘मित्रों मरजानी' (कृष्णा सोबती), ‘ज़िन्दगी और गुलाब के फूल' (उषा प्रियंवदा) आदि कहानियों में सेक्स-चित्रण के सम्बन्ध में कमलेश्वर ने स्पष्टीकरण देते हुए लिखा- ‘सेक्स अब पाप-बोध देने वाली क्रिया नहीं, एक वास्तविक और अनिवार्य आवश्यकता के रूप में स्वीकृत और समादृत है। वह लेखक की पुंठा का चटख़ारा नहीं, पात्रों की भौतिक और दैहिक अनिवार्य आवश्यकताओं की सहज माँग है।' (वही, पृष्ठ 17)। 
निर्मल वर्मा ने कथ्य की नवीनता के नाम पर पश्चिमी जगत् में प्रचलित अस्तित्ववादी दर्शन से प्रभावित होकर नितान्त वैयक्तिक, क्षणवादी, भोग-सम्भोगवादी कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों में पाठकों को चमत्कृत करने वाले कुछ वाक्यों और बिम्बों के सहारे किसी ‘मूड' या स्थिति की निबन्धात्मक प्रस्तुति होती है। उनकी ‘परिन्दे' कहानी को नामवर सिंह ने नयी कहानी की पहली कहानी घोषित किया। ‘परिंदे' कहानी अतीत की स्मृतियों की रोमांटिक भावभूमि से जुड़ी है। उनकी कहानियाँ उच्च और मध्योच्च-वर्गीय जीवन को उकेरती हैं। इसीलिए उनकी कहानियों में संगीत के स्वर-लय, नारी, नृत्य और शराब के भोग-विलास से परिपूर्ण ज़िन्दगी की अभिव्यक्ति हुई है। उनकी ‘सूखा' कहानी में भोग-सम्भोग के लिए लालायित और अतृप्त एक अमीर बूढ़ा दुखी है। उसकी जिन्दगी में बहुत सी औरतें आयीं, किन्तु अब वह नितान्त अकेलापन से ग्रस्त है। एक आत्मग्रस्त, कमीना बूढ़ा अमीर अपनी ललचाई लालसा और पुंठित सेक्स कल्पना में रत रहता है कि कोई नयी औरत उसके जीवन के सूखे को दूर कर देगी। ‘आदमी और लड़की' कहानी में पत्नी से अलग रह रहा पति (आदमी) से उसके आधी उम्र की एक लड़की मिलती है और उसके साथ वह सोता है। लड़की को अकेला छोड़कर एक दिन वह अपनी पत्नी के पास चला जाता है। लौटकर आने पर लड़की उससे पूछती है- ‘क्या तुम उसके साथ सोये थे?' आदमी चुप रह जाता है और उसके सिर को अपने सीने से अलग कर लेता है।  
एक रूमानी आउटसाइडर और अस्तित्ववाद के घेरे में कैद निर्मल वर्मा की कहानियों में उपस्थित अनाम ‘मैं' की सबसे बड़ी भूख है- ‘सम्भोग'। ‘लवर्स', ‘पराये शहर में', ‘अन्तर' आदि कहानियों में ‘नैरेटर' सम्भोग के दृश्यों को देखकर स्नायविक उत्तेजना का अनुभव करता है। जलती झाड़ियों के भीतर ‘काम' की ‘ज्वाला' जलती है और उससे सिर्प तीन गज़ दूर बैठा ‘कथा-नायक' उसे मंत्रमुग्ध देखता रहता है। निर्मल वर्मा की एक चर्चित कहानी ‘लन्दन की एक रात' में एक संवाद है- ‘तुम मुझे एक छोटी ह्व्सिकी दे सकते हो?' इस संवाद में स्पष्टत नयी कहानी में भोगवाद की ओछी अभिव्यक्ति है। उनकी एक कहानी ‘पिक्चर पोस्टकार्ड' का कथा-नायक परेश की आकांक्षा में शारीरिक-मिलन का यह उत्तेजक वर्णन देखिए : ‘मैंने कई बार सोचा है कि किसी दिन मैं कालर-बोन के उस गड्ढे को अपनी जुबान की नोक से स्पर्श करूँगा। उस गड्ढे में हल्का पसीना है। मैंने कई बार सोचा है कि किसी दिन मैं उस पसीने को अपने होंठों से चूस लूँगा।' निर्मल वर्मा की कहानियों में ‘सम्भोगवाद' अस्तित्ववादी विचारधारा की सहज निष्पत्ति है। 
निर्मल वर्मा और मोहन राकेश की कई कहानियों में भोगवादी बोहेमियन ज़िन्दगी का अंकन है। घर-परिवार के प्रति निषेध और अस्वीकार का भाव लेकर कहानी लिखना शुरू करने के कारण उनके यहाँ डाक बंगलों, रेस्त्राओं और पबों की पृष्ठभूमि में भोगवादी बोहेमियन ज़िन्दगी का चित्रण हुआ है। पहाड़ी सैरगाहों और रेस्त्राओं के बिना उनकी कोई भी कहानी मुक्कमिल नहीं होती। मोहन राकेश की कहानी ‘...वगैरह' में भोगवाद का यह दृश्यांकन देखिए : ‘बीच-बीच में उसके हाथों से लगा सिगरेट जल उठता है और धुआँ पेंच-दर-पेंच ऊपर उठता हुआ दिखाई देता। फिर धुप्प अंधेरा। ऐसा ही अंधेरा उसके अन्दर है। उसके बगल में नलिनी की उपस्थिति जैसे मौन में कह रही हो- ‘अपने अंधेरे से बाहर आओ' उसके अन्दर साँप की तरह कुछ सरक रहा है।' मोहन राकेश की कहानियों में नारियाँ प्राय अतृप्ति में जी रही हैं और पुरुष भी भोगेच्छा से भरे हैं। 
सेटीपिन' एक प्रतीकात्मक कहानी है, जिसमें कई स्त्रियों से अपनी भोगेच्छा पूर्ण करने वाले पुरुष सेटीपिन की आड़ से बचने का प्रयत्न करते हैं। ‘खंडहर' भगवान के पुजारियों की स्वार्थी तथा वासनाभरी मनोवृत्तियों को उभारने वाली वातावरण प्रधान कहानी है। मंदिर का काम-पुंठित गोस्वामी अपने किशोरवय बटुक चेतू को रात में ‘सिद्धान्त कौमुदी' पढ़ाते हुए ‘नायिका-भेद' बताता है। मन्दिर में आने वाली औरतों की छातियों की तरफ देखा करता है और कापी पर उन स्तनों की तस्वीरें बनाया करता है। ‘मिस पाल' कहानी में मोहन राकेश ने मनोविश्लेषण और स्थितियों के घात-प्रतिघात से सेक्स की सम्भावना और सेक्स-यंत्रणा को चित्रित किया है। कहानी को पढ़ते हुए पाठक मिस पाल और रणजीत के बीच सम्भावित सेक्स के घटित होने के लिए प्रतीक्षित रहता है। रणजीत कमरे में न सोकर बरामदे में सो जाता है। कमरे में अकेले सोने का असफल प्रयास करती मिस पाल रातभर करवट बदलती रहती है और ‘काम-पीड़ा' में उससे बातें करती रहती है- ‘सरदी तो नहीं लग रही', ‘प्यास तो नहीं लगी' और बार-बार ‘अच्छा सो जाओ' कहती रहती है।  
कमलेश्वर खुद को ‘कस्बे का कथाकार' कहलाना पसन्द करते थे। लेकिन उनकी अधिकांश कहानियों में महानगरीय जीवन-बोध और आधुनिकता-बोध मिलता है। उनकी चर्चित कहानी ‘राजा निरबंसिया' में नर-नारी के काम-सम्बन्धों या प्रेम-सम्बन्धों पर आर्थिक स्थिति के दबाव को मनोवैज्ञानिक-सामाजिक ढंग से उकेरा गया है। राजा और जगपति दोनों निरबंसिया हैं और शायद नपुंसक भी। बाद में दोनों की पत्नियाँ दूसरे व्यक्तियों से गर्भवती होती हैं। जगपति जानता है कि जिस बच्चों को उसकी पत्नी (चंदा) ने जन्म दिया है वह उसका नहीं है। वह खुद को दिलासा देता हुआ सोचता है : ‘औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है...नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा।' (दस प्रतिनिधि कहानियाँ, पृष्ठ 37, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 2010) ‘मांस का दरिया' एक बाज़ारू औरत की कहानी है। इसमें एक बदनाम गली और कोठे का वातावरण खींचा गया है और उस बाज़ारू औरत के साथ अलग-अलग लोगों द्वारा सम्भोग के दृश्यों का खुलकर चित्रण किया गया है। उस औरत की शारीरिक-मानसिक तकल़ीफों का चित्रण करने के बहाने कमलेश्वर ने सम्भोग के नग्न चित्र प्रस्तुत किये हैं। ‘खोई हुई दिशाएँ' कहानी में महानगरीय जीवन में स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों में भी अजनबियत और बेगानेपन को अभिव्यक्त किया गया है। प्रेमिका और पत्नी की सहज उपलब्धता के बावजूद चन्दर ठंडापन का अनुभव करता है। इस कहानी में सम्भोग-स्थिति के बीच मौजूद ठंडापन को उकेरने के लिए शारीरिक-मिलन का उत्तेजक वर्णन इस तरह किया गया है: ‘वह उसकी मांसल बाँहों को महसूस करता है और गोल-गुदारे कंधों पर हाथ से थपथपाता रहता है, निर्मला के शरीर का अंग-अंग अनूठे अनुराग से खिंचता-सा आता है। उसका रोम-रोम उसे पहचान रहा था, जोड़-जोड़ कसाव से पूरित था, तन के भीतर गरम रक्त के ज्वार उठ रहे थे और हर साँस पास खिंचती जा रही थी।... वह दोनों बाहों में उसे भर लेता है। ज्वार और उठता है। तन की गरमाहट और बढ़ती है और रंध्र-रंध्र में एकता का सागर लहराने लगता है।' (वही, पृष्ठ 63) 
राजेन्द्र यादव नगरीय बोध के कहानीकार हैं। उन्होंने शहरी जीवन के मध्यवर्गीय स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों की कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय समाज की तीन मुख्य-प्रवृत्तियों- ‘काम, अहं और हीनता-ग्रंथि' का चित्रण किया गया है। ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है' की पच्चीस वर्षीय लड़की पुँआरी है और अंधविश्वासी पिता द्वारा कैद है। उसके सीने में कई तमन्नाएँ द़फन हैं। उसकी देह को देह की प्यास है। उसकी सेक्स-पुंठा हिस्टीरिया में बदल चुकी है। मिर्गी (हिस्टीरिया) के दौरे पड़ने पर वह अपने कपड़े फाड़ नंगी होकर पिता से कहती है : ‘ले, तूने मुझे अपने लिए रखा है, मुझे खा, मुझे चबा, मुझे भोग...।' महानगरीय जीवन के लम्पट पात्र उनकी कहानियों में हमेशा सहवास की खोज में भटकते हैं। स्त्राr-पुरुष सम्बन्धों की कहानियों में भोग-सम्भोग के ब्यौरे मिलते हैं। ‘मेरा तन मन तुम्हारा है', ‘एक कमजोर लड़की की कहानी', ‘खेल' जैसी कहानियों में सेक्स-चर्चा खूब की गई है। ‘एक खुली हुई साँझ' कहानी में स्त्राr-पुरुष के कसमसाते रिश्ते के बीच ‘सेक्स की सम्भावना जन्य उत्तेजना' की उपस्थिति आद्यन्त बनी रहती है। उनकी कई कहानियों में फस्ट्रेटेड युवा के लिए औरत ‘डस्ट-बिन' की तरह नज़र आती है। प्राय युवा शराब की बोतल की तरह प्रेमिका को भोग कर फेंक देते हैं। उनकी देह-भोगवादी-कहानियों में औरत एक जिन्स की तरह नज़र आती है। ‘छोटे-छोटे ताजमहल' कहानी में शारीरिकता के स्तर पर उतर चुका ‘प्रेमालाप' वस्तुत भोगवाद और सम्भोगवाद का अच्छा उदाहरण है : ‘विजय ने एक बार फिर सशंक निगाहों से इधर-उधर देखा और बढ़कर उसकी दोनों कनपटियों को हथेलियों से दबाकर अपने पास खींच लिया। नहीं, मीरा ने विरोध नहीं किया, मानो वह प्रत्याशा कर रही थी कि यह क्षण आएगा अवश्य।... विजय का मन हुआ, रेगिस्तान में भटकते प्यासे की तरह दोनों हाथों से सुराही को पकड़कर इस मुस्कुराहट की शराब को पागल आवेग में पीता चला जाए-पीता चला जाए...' (प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र यादव, पृष्ठ 134, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, नौवाँ पेपर बैक संस्करण : 2015)। ‘छोटे-छोटे ताजमहल' में नायक को ‘नपुंसकता' की जो बेचैनी है वह ‘हासिल' और ‘चालीस साल बाद' कहानियों में तृप्ति को प्राप्त करती है। 
मार्कंडेय ने नयी कहानी के ग्रामीण पक्ष को सशक्त किया है। उनकी कहानियों में ग्रामीण समाज में आ रहे बदलाव, नयी चेतना, नयी नैतिकता और नये मूल्यों की तरफ स्पष्ट संकेत मिलता है। उन्होंने ग्रामीण जीवन के प्रति रागात्मकता की अभिव्यक्ति के साथ-साथ उस ग्रामीण समाज की विसंगतियों और विडम्बनाओं को भी उजागर किया है। ‘पान फूल', ‘उत्तराधिकारी', ‘गुलरा के बाबा' जैसी कहानियों में गाँव-समाज के प्रति उनका रागात्मक, आदर्शवादी और भावुकतापूर्ण दृष्टिकोण मिलता है। उनकी ‘सूर्या' कहानी के ब्यौरों में खासी अश्लीलता परोसी गई है। यह एक बनावटी और अविश्वसनीय कहानी है। माँ के सामने जवान सूर्या का निर्वसन नहाना, लड़की होकर स्नान घर में कपड़े लेकर न जाना जैसी बातें अविश्वसनीय लगती हैं। सेक्स-फस्ट्रेटिड किस्म की लड़कियों को लेकर लिखी जाने वाली कहानियों पर अपने गुस्से का इजहार करने वाले मार्कंडेय ने ‘माही' संग्रह में खुद ऐसी ही कहानियाँ संकलित की। देखा जाय तो नई कहानी आंदोलन के दौर में जिस प्रकार आरम्भिक शहरी कहानियाँ आगे चलकर बाजारू फ़रमाइश का शिकार हुईं, कुछ वैसी ही स्थिति इस दौर के ग्राम कथा की भी हुई। गाँव की कहानियों में भी पाठकों के मन को पसन्द आने वाली कामोत्तेजक स्थितियाँ और लम्पट पात्र रचे गये। उन्हें झटका देने के लिए नग्न सेक्स के वर्णन उपस्थित किये गये। ‘दोपहर का भोजन', ‘डिप्टी कलक्टरी', ‘जिन्दगी और जोंक' जैसी अविस्मरणीय कहानियाँ लिखने वाले अमरकान्त शहरी मध्यवर्ग के कहानीकार हैं। अमरकान्त की कहानी ‘हत्यारे' में सत्ता की कूरता और आतंक की भयकारी उपस्थिति है। इस कहानी में, आजन्म ब्रह्मचारी रहने की घोषणा के बावजूद युवकों के मन में छिपी वासना जब-तब झाँकती है। वे सब एक गरीब औरत को धोखा देकर अपनी देह की भूख मिटाते हैं। उसे पैसा न देना पड़े इसलिए हाथों में जूते उठाकर भाग खड़े होते हैं।  
फणीश्वरनाथ रेणु गाँव की संस्कृति के प्रति रोमानी भावबोध के कहानीकार हैं। ‘तीसरी कसम उर्प मारे गए गुलफाम' में रेणु का रोमानी भाव-बोध मुखर हुआ है। हीराबाई के रूप-रस और गंध के मनमोहक बिम्बों से कहानी भरी हुई है। सेक्स की अभिव्यक्ति यहाँ रोमानी ढंग से हुई है। एक आदिम रात्रि की महक' कहानी में सरसतिया के बे-नहाये शरीर की गंध में करमा पूरी तरह डूब जाता है। सरसतिया और करमा की दैहिक-निकटता का रस-गंध कहानी में रोमानी ढंग से चित्रित हुआ है। शिवप्रसाद सिंह ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं और अपनी कहानियों में गाँव के वातावरण का रंगीन तथा रोमांटिक चित्र उपस्थित करते हैं। लेकिन इनके यहाँ ग्रामीण जीवन के अन्तर्विरोधों और विकृतियों का यथार्थ भी मौजूद है। स्त्राr का शोषण-व्यभिचार करने को उद्यत सामाजिक संरचना का विश्लेषण उनकी कहानियों की खासियत है। ‘केवड़े का फूल', ‘कर्मनाशा की हार', ‘अरूंधती', ‘नन्हों' जैसी कहानियाँ पुरुषवादी, सामंती समाज में भोग्या बनी स्त्राr के शोषण की पड़ताल करती कहानियाँ हैं। 
मन्नू भंडारी ने नारी-मन के अन्तर्द्वन्द्वों और इच्छाओं को बारीकी तथा बेबाकी से उभारा है। ‘यही सच है' उनकी एक विवादस्पद कहानी है। इस कहानी की नायिका (‘मैं') संजय और निशीथ के प्यार और आकर्षण के बीच डाँवाडोल है। संकोची निशीथ के साथ घूमते हुए उसे संजय की याद आती हैः ‘इस समय वह यहाँ होता तो उसका हाथ मेरी कमर में लिपटा होता। यों सड़क पर ऐसी हरकतें मुझे स्वयं पसन्द नहीं, पर आज, जाने क्यों, किसी की बाहों की लपेट के लिए मेरा मन ललक उठता है।' इस कहानी में वर्तमान को पकड़ और भोग लेने का भोगवादी-क्षणवादी दर्शन की अभिव्यक्ति मिलती है। ‘ऊँचाई' कहानी में विवाह-पूर्व सेक्स-क्रिया घटित होती है और दूसरे व्यक्ति से विवाह के पश्चात् भी स्त्राr को कोई पुंठा नहीं है। ‘तीन निगाहों की एक निगाह' तथा ‘कील और कसक' कहानियों की नायिकाएँ सेक्स में अतृप्ति का अनुभव करती हैं और अतृप्त यौन-आकांक्षाओं के कारण पड़ोसियों की ओर आकृष्ट होती हैं। मन्नू भंडारी की कई कहानियों की नायिकाओं की ज़िन्दगी में दो-दो पुरुषों की उपस्थिति से ऐसा लगता है कि वे नारी पात्र प्रेम और सेक्स की तृप्ति के लिए एकाधिक पुरुषों के संसर्ग का औचित्य सिद्ध करना चाहती हैं। ‘ऊँचाई' कहानी की नायिका शिवानी निर्भीक ढंग से अपने पति से कहती है: ‘किसी के कितनी ही निकट चली जाऊँ, चाहे शारीरिक सम्बन्ध भी स्थापित कर लूँ, पर मन की जिस ऊँचाई पर तुम्हें बैठा रखा है, वहाँ कोई नहीं आ सकता।' कृष्णा सोबती की तीन विवादास्पद कहानियों- ‘मित्रों मरजानी', ‘यारों का यार', ‘तिन पहाड़' की स्त्राr पात्र सेक्स में अतृप्त दिखती हैं और बार-बार प्रबल सेक्स आवेग का इजहार करती हैं। 
नयी कहानी के दौर में कमोबेश सभी कहानीकारों ने इस बात को शिद्दत से महसूस किया कि पाठक और सम्पादक को वही कहानी पसन्द आयेगी जिसमें ‘सेक्स की छौंक' मौजूद हो। श्रीकान्त वर्मा ने तो साफ-साफ कहा कि, ‘कहानी की बुनावट में सेक्स की उपस्थिति से एक उष्णता आ जाती है' (नई कहानी : दशा-दिशा-सम्भावना, वही, पृष्ठ 238)। अकहानी आन्दोलन के चार यारों (ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, काशीनाथ सिंह) ने भी स्त्राr-पुरुष के असहज रिश्तों, प्रेमी-प्रेमिका के बोल्ड सम्बन्धों के चित्रण में सेक्स की चासनी का खुलकर इस्तेमाल किया। आठवें दशक के कहानीकारों ने भी उनकी राह पकड़ ली। आठवें दशक में लिखना शुरू करने वाले उदय प्रकाश और अखिलेश जैसे कहानीकारों ने शुरू में ही अपनी कहानियों में सेक्स को चटख़ारेदार ढंग से परोसना शुरू कर दिया था। भारत यायावर ने साफ कहा है कि ‘अखिलेश तो सेक्स में तलकर ही अपनी कहानियाँ तैयार करते हैं' (लहक, अक्टूबर-नवम्बर 2016, पृष्ठ 7)। 
आदमी नहीं टूटता' अखिलेश की आरम्भिक कहानियों का संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में कस्बाई जीवन की सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक ताने-बाने में हो रहे बदलावों की हलचल और उसमें व्याप्त अन्तर्विरोधों को साफ देखा-सुना जा सकता है। उनकी कुछ कहानियों में सेक्स पुंठा में छटपटाते पात्रों का चित्रण किया गया है। ‘कुचक्र' कहानी में ‘गे-रिलेशन' का उल्लेख यों मिलता है : ‘एक दिन हड़ताली लड़के बगल वाली बैरक में बन्द कर दिये गए। रात को बड़ा शोर उभरा। कोई लड़का बड़ी तेजी से चीखा। थोड़ी देर में जेल वाले लोग आ गए। पता चला कि कुछ लड़के एक कम उम्र के लड़के की पैंट उतरवा कर उसके साथ...' (आदमी नहीं टूटता, पृष्ठ 44, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, संस्करण : 2014)। इस कहानी में भैंस चराने वाला एक पात्र चन्दर सेक्स-उत्तेजना से भरकर ‘हस्तमैथुन' करता है : ‘चन्दर केवल एक अंडरवियर पहने था। ...चन्दर चौकन्ना होकर चारों तरफ देखा। फिर किसी को न देखकर झट से अपना हाथ अंडरवियर के अन्दर डाल दिया ... उस क्षण होंठ इस तरह हिलने लगे जैसे वह बुदबुदा रहा हो। एक मिनट में उसकी आँखें मूँद गयीं और दिमाग क्षणभर के लिए गिनगिना उठा' (वही, पृष्ठ 46)। इस कहानी में रतन सिंह और चरना खटिक जैसे नई उम्र के कई लड़के हस्तमैथुन का मजा लेते मिलते हैं। कई ‘लड़की लड़के पटाने' की कला में पारंगत दिखाई देते हैं। ऐश-आराम में पली-बढ़ी ‘सुधा' शऱीफ पर मर मिटी और शऱीफ उस पर मर मिटा। दोनों की कामोत्तेजना और सम्भोग-सुख का चटखारेदार वर्णन कथाकार ने इस तरह उपस्थित किया है : ‘घूमते-घूमते वे फुहारे के नज़दीक पहुँचे। वहाँ चूड़ियों की टूटन थीं, बुझे हुए सिगरेट के टुकड़े और किताब के पन्ने फड़फड़ा रहे थे। सुधा ने पैर से किताब दाबकर कवर देखा-एक पुरुष एक स्त्राr नंगे लिपटे हुए, दोनों के पैर सटे हुए थे ... शऱीफ ने महसूस किया कि सुधा का बदन सरसरा रहा है। उसके भी अन्दर मीठा अहसास हो रहा था... दोनों ही अद्भुत तृप्ति को भोग रहे थे... सारा शरीर महँगे ऐश्वर्य में तैरने लगा था। थोड़ी देर बाद शरीर ढीला हो गया... उन्हें लगा कि वे दोनों ही सुखी हैं लेकिन गिर कर।' 
युवा मन को अपनी कहानियों में खोलने वाले अखिलेश के लिए वर्जित कुछ भी नहीं था। उनकी शुरुआती कहानी ‘खोया हुआ पुल' में षोडषी प्रतिमा लुका-छिपी किसी लड़के से करती तो लव-लेटर किसी को देती। आँख किसी को मारती, तो चुम्बन का आदान-प्रदान करने के लिए कोई और होता। उसी प्रतिमा के घुटनों के नीचे पुंसी हो गई। बड़ा दर्द। उसने नयी उम्र के नौकर उमर को आवाज दिया और सलवार घुटनों तक खिसका कर कहा : ‘इसके किनारे-किनारे गुदगुदी लगाओ।'... ‘उमर की दुनिया में सनसनी फैल गई। गोरी टाँग को देख छू कर उसे अजीब-अजीब सा लगता। उसके दाँत मिच से गए थे। उँगलियाँ काँप जातीं (वही, पृष्ट 41)।' ऐसे सरस कामोद्दीपक वर्णन पाठक के अन्दर सनसनी पैदा करने के लिए ही प्रस्तुत किये जाते हैं। ‘अभिमन्यु की हत्या' कहानी में गाँव के कुचक्रों और सर्वत्र फैले व्यभिचार की कहानी खूब रस लेकर कही गई है। यहाँ पिता-पुत्र एक ही लड़की को भोगते दिखाई देते हैं। जगेसरी को ‘चंद्रबली का साथ उसके अन्दर तक पैठ कर गया'। सम्भोग सुख लूटने के बाद वह उसे ‘बाडी टाइप चीज' भेंट करता है। बाद में चन्द्रबली की दिलचस्पी जगेसरी की बजाय गेंदा खटकिन में हो गई। इण्टर में पढ़ने वाली कुमकुम को मिसिर टोला का सिरपत साइकिल के डंडे पर बैठा कर घूमाता है ‘और कुमकुमिया खिलिर-खिलिर पतुरिया जइसन हँसती है...'। कुमकुम के पिता गोकली बाबू ‘एक बार इस लड़की का गर्भ भी गिरवा चुके थे। गर्भ गिराने के बाद इसके पैरों पर गिर फूट-फूट कर रोये थे।... लेकिन मानी नहीं। फिर गर्भ आ गया' (वही, पृष्ठ 56)। इस कहानी में अखिलेश गाँव में सर्वत्र फैले व्यभिचार और ‘छिनरपन' की कहानी को खूब तानते दिखाई देते हैं और इसमें दलित-शोषण का फार्मूला फिट कर देते हैं। कुछ दलित भी पंडितों के व्यभिचार में स्वार्थवश और मजबूरीवश सहायक दिखाई देते हैं : ‘मालिक को महीन माल जिआदा पसन्द है का... खि... खि... खि... खि...'। दलित औरतें भी व्यभिचार का विरोध करती दिखाई नहीं देतीं। जगेसरी और रज्जन के बीच सम्भोग का यह कामोद्दीपक वर्णन देखिए : ‘जगेसरी भगउवा बाबा के मन्दिर के सामने रुक कर आस-पास का जायजा लेती रही, फिर दरवाज़ा बन्द करके किल्ली खिसका दी उसने। रज्जन वहाँ पहले से ही मौजूद था। उसने कोठरी में जलती मोमबत्ती पूँक मारकर बुझा दी और गिरा दिया के अन्दाज़ में जगेसरी को लिटा दिया। वह पंचम सिंह की लड़की से मिले जगेसरी के फटे-पुराने ब्लाउज़ को खोलने लगा। लेकिन दिक्कत महसूस हो रही थी। सो जल्दबाजी में उसने कर्र... ।़... ।़... से ब्लाउज़ फाड़ डाला (वही, पृष्ठ 60)।' चरन और कैलाशी एक दूसरे से प्रेम करते हैं और उसी भगउवा बाबा के मन्दिर वाली कोठरी में सम्भोग-सुख लूटते हैं। यह कहानी सेक्स और छिनरपन की चासनी से पूरी तरह तली हुई है।  
अखिलेश की तीन लम्बी कहानियों- ‘यक्षगान', ‘अंधेरा' और ‘श्रृंखला' का सृजन धरातल एक ही है-‘राजनीति'। इन तीनों कहानियों में सत्ता और राजनीति के कूर पंजों तथा दाँव-पेचों की प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई है। अखिलेश की कहानियों में किस्सागोई और वृत्तात्मकता का खास असर दिखाई देता है। लेकिन संवेदनशील प्रसंगों में भी ‘अति नाटकीयता' और ‘कॉमिक हल्कापन' उनकी सीमा बनकर खड़ी हो जाती हैं। ‘अंधेरा' कहानी का कथ्य और साँचा घिसा-पिटा है। कहानी में हिन्दू नायक और मुस्लिम प्रेमिका को हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगा में बचते-छिपते दिखाया गया है। कहानी का यह एक ‘पुराना नुस्खा' है और इस पुराने नुस्खे पर निर्मित या बने-बनाये साँचे में ढली हुई है यह कहानी। कहानी का कथ्य ‘एजेंडाबद्ध' लगता है। इस कहानी में एक तरह का फार्मूलापन है और वह फार्मूला है- साम्प्रदायिक दंगा, रेप, मुस्लम लड़की-हिन्दू लड़के का प्रेम। ‘यक्षगान' कहानी में अखिलेश ने सरोज नाम की अल्पवयस्क लड़की से हुए बलात्कार की घटना के माध्यम से राजनीति सत्ता (सत्ता और विपक्ष), धर्म (मठाधीश), व्यापारी, अधिकारी और अपराधी तत्त्वों के साँठ-गाँठ वाले अमानवीय तथा कूर तंत्र का आख्यान रचा है। इस कहानी में बलात्कार के वृहद् ब्यौरों में सेक्स-चर्चा और गालियों की भरमार है। 
अखिलेश अपनी कहानियों में पाठकों की दिलचस्पी जगाने के लिए और उन्हें ‘झटका' देने के लिए सेक्स-सनसनी का चटखारेदार वर्णन करते हैं। उनकी लम्बी कहानी ‘श्रृंखला' का नायक (रतन कुमार) सुनिधि के बेडरूम में है और आगे का ‘आँखों देखा हाल' खुद कथाकार की ज़बानी : ‘उन सात दीयों की रोशनी में सुनिधि के वक्ष भी जल रहे थे। सुनिधि की नग्न लम्बी पीठ पर उसने धीमे से दायीं हथेली रखी,... ‘पीठ भी जल रही है'.. ‘और जैसे आतिशबाजी हो रही हो।' उसने कहा था और सुनिधि के दोनों वक्षों के मध्य चूमा था, ‘यहाँ तिल है तुम्हारे।' उसने तिल देखा था, सुनिधि की गर्दन के बायीं तरफ भी, जहाँ केशों का इलाका खत्म होता था। उसने तिल देखा था नितम्ब पर और स्कन्ध पर और नाभि के थोड़ा ऊपर।' (प्रतिनिधि कहानियाँ : अखिलेश, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 17-18, पेपर बैक संस्करण 2013); ‘वजूद' कहानी में भी कथाकार ने सम्भोग का रस लेकर चित्रण किया है: ‘जान जब कोठरी में घुसी तो उसके बाह सूखे थे और बँधे थे जबकि स्तन अधखुले थे। इसी समय जयप्रकाश के मन में बवंडर आया था जिसकी चपेट में फँसकर जान खटिया पर गिर पड़ी। थोड़ी देर बार जब बवंडर का हमला थमा तो जान को लगा, उसका नहाना-धोना सब ख़राब हो गया' (वही, पृष्ठ 74)। 
कॉमिक अन्दाज़ और मसखरापन अखिलेश की खास शैली है। लेकिन कई बार वह हास्यापद वर्णन बन जाता है। यथा- ‘यक्षगान' कहानी में यह वर्णन : ‘गाँव में छैल बिहारी के दो ख़ास दोस्त थे, भोला और परमू। तीनों की मित्रता का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि एक समय में तीनों साथ-साथ पेशाब करते थे और अपनी-अपनी पेशाब की धारों को आपस में लड़ाते थे।' वास्तव में अखिलेश के ‘कथा-लंतरानी' में वर्जित कुछ भी नहीं होता। उनकी चर्चित कहानी ‘चिट्ठी' में बेरोजगार युवकों की यौन पुंठाओं और ल़फंगागिरी को महिमामंडित करने का भाव प्रकट होता है। यह कहानी हमें यह बताकर रह जाती है कि बेरोजगार युवा का काम पिता द्वारा भेजे गए पैसे को दारू पीकर उड़ा देना और लड़कियों के पीछे भागना है। कल की परवाह किये बिना ‘वर्तमान को जमकर भोग' लेने का यही भाव ‘शोकगीत' कहानी में भी दिखाई देता है।  
अखिलेश की ‘जलडमरूमध्य' कहानी में बाजारवाद और उपभोक्तावाद के घातक असर की बारीक पड़ताल है। इस कहानी में युवा पति-पत्नी एक दूसरे के चरित्र पर शक करते हैं। चिन्मय का आरोप है कि वह अपने बॉस तथा अन्य कई लोगों के साथ रंगरेलियाँ मनाती है, जबकि मनजीत की शिकायत है कि वह अपने न जाने कितने दोस्तों की बीवियों और बेटियों को बर्बाद कर चुका है। मनजीत के चरित्र पर शक करते हुए चिन्मय उससे पूछता है : ‘तुमने कुर्ते के नीचे ब्रा पहना था। अब कुर्ता उतारा है तो ब्रा ग़ायब है। क्या हो गई तुम्हारी ब्रा?' (वही, पृष्ठ 14); ‘शापग्रस्त' कहानी के नायक प्रमोद वर्मा को सुख-भोग-ऐश्वर्य की ज़िन्दगी में सुख नहीं मिलता। एक बुढ़िया द्वारा ‘क्या कभी तू दुःखी हुआ है?' यह सवाल पूछने पर वह दुःखी होने के लिए छटपटाने लगता है। इस कहानी में लोगों को खुश करने के प्रमोद वर्मा अपने फिश्चुला या भंगदर (गुदा रोग) की आवृत्ति इतनी बार करता है कि ऊब हो जाती है। बारम्बार यह आवृत्ति कहानी को फैलाने की एक युक्ति की तरह इस्तेमाल की गई है। प्रमोद वर्मा पहले हर बात से ‘बेपरवाह पैसे लुटा-लुटाकर गुलछर्रे उड़ा रहा था और बिला नागा प्रतिदिन सरोज वर्मा के साथ सहवास कर रहा था।' (प्रतिनिधि कहानियाँ, वही, पृष्ठ 186); ‘भोग-विलास भी अन्तत ऊब पैदा करता है' इस थीम पर कहानी रची गई है। लेकिन किसी को ‘सुख' से ऐसी ऊब हो जाय कि वह दुखी होना चाहेगा यह बात गले से नीचे नहीं उतरती।  
स्त्राr-पुरुष के बदलते रिश्तों पर ध्यान केन्द्रित करना कहानीकारों का हमेशा ही प्रिय शगल रहा है। लेकिन प्रेम और सेक्स वर्णनों में सच्ची अनुभूति तथा ‘कहानी की माँग' की बजाय पाठकों को ‘झटका' देने और ‘बाजार की माँग' को ध्यान में रखकर कहानियों में सेक्स परोसने को किसी भी तरह ज़ायज नहीं ठहराया जा सकता। ‘नई कहानी' से पहले भी और आज की कहानी में भी ‘काम-प्रसंग' अनुभूति की सच्चाई के कारण उतने अभिव्यक्ति नहीं हुए जितने की बाजार की माँग और कहानी को सनसनीखेज बनाने की ललक से। यह भी सच है कि जीवन के बहुविध यथार्थ और उसके अन्तर्विरोधों से जिस लेखक का गहरा नाता नहीं होगा वह या तो रोमानी या भावुक वर्णन करेगा अथवा कहानी में सेक्स के ब्यौरे परोसेगा। +

 एसोसिएट प्रोफेसर
डी.ए.भी.पी.जी. काॅलेज, लखनऊ
मो.-073766 20633
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1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-01-2017) को "होने लगे बबाल" (चर्चा अंक-2584) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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