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Thursday, November 17, 2016

2 सादगी का शिल्प गढ़ती कविताएँ - उमाशंकर सिंह परमार

हम पहली बार यहाँ प्रखर युवा आलोचक उमाशंकर सिंह की आलोचकीय टिप्पणी के साथ अपने प्रिय पाठकों को  सीमा संगकार की कुछ कविताओं से अपने ब्लॉग पर रु-ब-रु करा रहे हैं -
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 सादगी का शिल्प गढ़ती कविताएँ:  
- उमाशंकर सिंह परमार 

सीमा संगसार की कविताएं वगैर भाषाई खिलवाड के सादगीपूर्ण समर्थ शब्दों द्वारा की गयी सपाट अभिव्यक्तियाँ हैं ।भाषा नवीनता से अधिक सार्थकता का बोध दे रही है और कुछ कविताओं में तो वह  अपनी जमीन बेगूसराय के प्रचलित शब्दों को भी बडी कारगरी से गुँथ देती है ।यही कारण है कविता किसी भी विषय पर हो उनकी अपनी जमीन की रंगत बडे गहरे से उभरकर सामने आती है ।यह रंगत मुहावरा नही हैं लोकधर्मी कविता का बेहद जरूरी तकाजा है इसी रंगत में सीमा द्वारा आधी आबादी के लिए उठाए गये सवाल और मानवीय इतिहास और सभ्यता द्वारा तय की गयी वर्गीय संस्कृति के जरूरी प्रसंगों को छेडती हैं । स्त्री विमर्श के चलताऊ मुहावरों को धता बताते हुए वैचारिक रंगत से युक्त संवेदनों के माध्यम से  सामाजिक अन्तर्द्वन्दों द्वारा उत्पन्न स्त्री के मन और विजन को बडे सलीके से व्यक्त करती हैं । यहां कुछ भी 'मिस फिट" नहीं दिखता प्रक्रिया और संवेदनों तक की यात्रा में सबकुछ " फिट" और सुगढ नजर आता है चूँकि    कविता आदमियत की रक्षा करती है इसलिए वह आदमी के चतुर्दिक परिव्याप्त आसन्न संकटों की निर्मम आलोचना करते हुए मनुष्यता के लिए अनिवार्य परिस्थितियों की प्रस्तावना करती है ।आम तौर पर कवि द्वारा अभिकल्पित परिवेश वही होता है जिस क्षण में कविता का जन्म होता है ऐसी कविताओं में कविता का युग तो चिन्हित कर लिया जाता है पर कवि की जमीन में अवगुंठित तमाम सवालात अनछुवे रह जाते हैं ।ऐसी कविताएं तात्कालिक होती हैं । लेकिन जब तात्कालिकता पर विचारधारा और घटनाओं की द्वन्दात्मक प्रक्रिया का सूत्र अन्वेषित किया जाता है तो कविता में केवल आदमियत की अभिरक्षा ही नही होती वह मनुष्य की सांस्कृतिक पहचान की भी रक्षा करने लगती है । सीमा की जंगल और जमीन के हक  को लेकर लिखी गयी कविताओं में सांस्कृतिक विस्थापन , भागीदारी , व पहचान के मुद्दों को बडे उम्दा तरीके से उठाया गया है । लय का भंग होना अखरता है मगर भाषा द्वारा उत्पन्न प्रवाह व सादगी का आग्रह कविता को कविता बना देने मे पूर्ण सक्षम है । कामरेड और चे ग्वेरा कविताएं जहाँ वैचारिक आदर्शों का भावक संवेदन हैं तो क्या फर्क पडता है व्यवस्था व भागीदारी से विस्थापित स्त्री के तिल तिल देह मे तब्दील होने की व्यथा कथा है । इन वैविध्यपूर्ण कविताओं में हर जगह व्यवस्था और मान्यताएं हीं विचारों से मुठभेड करती परिलक्षित हो रही है। 
सीमा संगसार की कविताएँ
 1.कामरेड
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आंखों में सपने लिए
जो कभी मरा नहीं करते
बंद मुट्ठी में बंद होते हैं 

हवा में लहराते हाथ
जब उद्घोष करते हैं 
इंकलाब का

बदलाव लाने को तत्पर
इनकी भुजाएँ फड़कती हैं 
लाल झंडे का दामन थामे
अपनी जिन्दगी होम कर देते हैं 

फटे कपड़ों पर पैबन्द जैसी
इनकी मुस्कान
गंभीर चेहरे की चुगली करते हैं 

अपने उसूलों के लिए
मर मिटने का माद्दा रखने वाले
इनकी झोली में होते हैं 
अनगिनत अन्यायों व अत्याचारों के
कच्चे चिट्ठे

जिन्हें सुलझाना होता है
हर रोज चलते चलते

जिन्हें मौत की परवाह नहीं 
इनकी जिन्दगी युँ ही चलती रहती है
किसी खौफ के साए में

यों ही कोई कामरेड नहीं होता 



 2 . चे ग्वेरा
    ---------
चे
तुमने चार वर्ष की उम्र में 
बाल्देयर,गार्सिया और लोर्का को
पढ़ना शुरू कर दिया था

मैं जानती हूँ कि
अभी भी तुम 
मार्क्स , एंगेल्स और लेनिन को
सोच रहे हो
लेकिन मैं तो बस
"तुम्हें" पढ़ रही हूँ ---

चे ग्वेरा
मैं चाहती हूँ कि
मेरे बच्चे
तुम्हारी अंगुलियों को पकड़ कर
चलना सीखे
उसे इतनी फुर्सत नहीं है कि
वह घंटों पुस्तकालय में
अपना सिर खपाए

बस तुम उसे थाम लो
फिर उसे कुछ पढ़ने की जरूरत नहीं है

मेरे बच्चे
तुम्हारे होंठों की हंसी को अपनाएंगे
जो आजकल
विलुप्त हो गई है उनके चेहरे से
जब तुम अपने गले में कैमरा लटकाकर
किसी तितली के पीछे भागोगे
मेरे बच्चे खिलखिलाएंगे-

उसे अपने पास बैठाकर
शतरंज की चाल समझाओगे
कि दुनिया कैसे चलती है आड़ी तिरछी
उसकी बुद्धी तीक्ष्ण होती जाएगी तुम्हारी तरह

मेरे बच्चों ने आजकल खेलना छोड़ दिया है
उनके लिए यह वह अजूबा है
जो सिर्फ रियो ओलंपिक में या टी0 वी0 पर ही
खेला जाता है
तुम उनके साथ 
फुटबॉल , गोल्फ या रग्बी खेलोगे
और / उन्हें घोड़े पर बस बिठाकर
सिखाओगे घुड़सवारी के हुनर

और अंत में
मेरे बच्चों के साथ निकल पड़ोगे
एक दिन
अंतहीन दुनिया की यात्रा पर
जहाँ जाने से डरते हैं लोग

मेरे बच्चे तुम्हारी राह देख रहे हैं 
तुम उनके भविष्य का आईना हो

चे ग्वेरा
मुझे आज भी तुम्हारा इंतजार है 
 3. क्या फर्क पड़ता है?
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सज /संवर के बैठी
वो औरतें 
अपनी देहरी पर
करती इंतजार 
अपने पति
या/ ग्राहक का
क्या फर्क पड़ता है??

देह तो एक खिलौना है
जो बिकता है
सब्जियों से भी सस्ता
सरे आम
मंडी में 
या/ बंद कुंडी में
क्या फर्क पड़ता है ----

सारे निशान दर्द व जख्म 
उनके अपने हैं 
जिसे बिना श्रृंगार के
वे लगती अधूरी हैं 

चंद पैसों के लिए
हर रोज दफन होती हैं 
उनकी ख्वाहिशें
पर कभी खरीद नहीं पाती
वे अपने सारे सपने
फिर भी जीती हैं 

वे अपने बच्चों की खातिर
करती हैं कामना
पति के दीर्घायु की
रख कर करवाचौथ
ताकि हर रोज
वे करती रहें
सोलह श्रृंगार
और नुचवाती रहें
अपनी देह

वे हर हाल में 
खरीदी या बेची ही जाती हैं 
वह कोई दलाल हो
या फिर पति या पिता
क्या फर्क पड़ता है ???


4. हरसिंगार
   ------------
जब धरती के सारे फूल
मुरझ जाएंगे
हरसिंगार का फूल
हर रात जन्मता रहेगा 
रोज सुबह झड़ जाने के लिए

पारिजात का यह श्वेत पटल
चंपई रंग के सम्मिश्रण के बाद भी
अछूता है, धवल है
जरा सा मसल कर देखो तो
रंग लेता है अपने ही रंगों में

प्रेम की खुशबू से भरे खत को
मानो हरसिंगार ने
टांक दिया हो अपनी कोमल टहनियों पर
जिसे जरा सा झुलाओ तो
शब्द बनकर बिखरने लगते हैं 
सफेद मोतीयों की तरह
धरती में सने प्रेम पत्रों पर

उफ्फ कितना मोहक है
प्रेम में हरसिंगार होना 

5. सिन्धु नदी की विरासत हैं स्त्रियाँ 
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मोहनजोदड़ो की
कभी न पढ़ सकने वाली लिपि 
होती हैं स्त्रियाँ 
जिनके मन की तह को
खोलने के लिए
पाना होता है एक दिव्य दृष्टि 

साधारण चक्षु से
हम देख पाते हैं 
बस ऊपरी आवरण को
जिसे मापा जा सके
गणितीय इकाइयों में

जैसे सागर के तरंगों की 
कोई माप नहीं होती
स्त्रियों को भी 
नहीं मापा जा सकता है
उसकी लंबाई चौड़ाई व गोलाई में

तरल द्रव्य सी स्त्रियाँ 
बहती हैं अपनी ही धारा में
जिसमें कोई भी रंग मिला दो
सहज घुल जाती हैं 
उसी रंग में

स्त्रियाँ समझती हैं 
बस प्रेम की भाषा
जर उसे दे सको
थोड़ा सा भी प्रेम 

पढ़ लोगे फिर आसानी से उनकी भाषा 
स्त्रियाँ जितनी अबूझ होती हैं 
उतनी ही सरल है
कच्ची माटी की तरह
जिसे चाक पर घूमा कर
मनचाहा पा सको

सिन्धु नदी की विरासत हैं स्त्रियाँ 
जिसकी जितनी खुदाई करो
उतनी ही दुर्लभ 
प्रस्तर मूर्तियाँ निकलेंगी
प्राचीन धरोहर की तरह 




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2 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार said...

¶ युवा कवयित्री सीमा संगसार का नाम शायद आपने न सुना हो। पेशे से शिक्षिका हैं। बेगूसराय (बिहार) में रहती हैं।
आगे बात करने से पहले यह कहना चाहूंगा कि पिछले दिनों बिहार की उर्वर माटी के कई वरिष्ठ व युवा लोकधर्मी कवि सर्वश्री शहंशाह आलम, राजकिशोर राजन, योगेंद्र कृष्णा, शम्भु बादल (अब झारखंड) के कृतित्व पर विशदता से मैंने आपका ध्यान आकृष्ट कराया था।
उसी क्रम में आज (बिहार की ) नवोदित कवयित्री सीमा संगसार की कविताओं को लेकर चंद बातें करनी हैं। उनकी कविताओं से युवा आलोचक और कवि-मित्र उमाशंकर सिंह परमार ने परिचय कराया । इससे गुजरना मुझे लोकधर्मी कविता के उस विकासमान पौध से गुजरने जैसा लगा, जिसमें असली लोक की संभावना का वट-वृक्ष छिपा हो । यहाँ संगसार के कवि का लोक उसकी कल्पना का कोई वायवीय लोक नहीं, न शब्द यहाँ जुगत या फैशन ही है। भाषा यहाँ बनावटी या पेशेवर उद्दम नहीं। मुहावरों में चौंकाने वाली कोई फैंटेसी भी नही। यहाँ अभिव्यक्ति सरल और ग्राह्य है, इसलिए उदात्त और गहरी है, स्त्री-विमर्श की कोई सोची हुई राजनीति नहीं, इसलिए काव्य-संवेदना जितनी खरी, करुणाप्लावित और द्रवणशील है, उतनी ही जीवन-तत्वों से बनी इस्पाती और ठोस भी । कहन जितनी कोमल और नई, उतनी ही कबीराना और चैतन्य भी -
“सिन्धु नदी की विरासत हैं स्त्रियाँ
जिसकी जितनी खुदाई करो
उतनी ही दुर्लभ
प्रस्तर मूर्तियाँ निकलेंगी
प्राचीन धरोहर की तरह।“ –

प्रेम भी है यहाँ तो प्रकृति से पूरी तादात्म्य और जीवंत–

“प्रेम की खुशबू से भरे खत को
मानो हरसिंगार ने
टांक दिया हो अपनी कोमल टहनियों पर”
- और स्त्रीपन की शोषण-वृति का आंतरिक प्रतिरोध उतना ही तीक्षण -

“चंद पैसों के लिए
हर रोज दफन होती हैं
उनकी ख्वाहिशें
पर कभी खरीद नहीं पाती
वे अपने सारे सपने ।“
अगर सीमा संगसार ने कविता में अपने को नारीविमर्श की आभिजात्य विमर्शवादी सीमा से इसी तरह आगे भी बचाए रखा और मुक्तमनीषा होकर कविताओं को अपना सही वक्त दिया तो उनका वक्त कविताओं के बरअक्स उनकी गुप्त प्रतिभा को इतना खोल देगा कि कविता के गंभीर पाठक उनको अपने माथे पर रखेंगे, आदर करेंगे । आशा है, सीमा हमारी उम्मीदों पर खड़ी उतरेंगी। आइये इनकी कुछ कविताओं को साथी और युवा आलोचक उमाशंकर सिंह, जिन्होंने इनकी कविताओं से परिचय कराया, की अन्वेषी और गहरी टिप्पणी के साथ अपने ब्लॉग पर रु-ब –रु होते हैं -

Bhaskar Choudhury said...

सिन्धु नदी की विरासत हैं स्त्रियाँ
जिसकी जितनी खुदाई करो
उतनी ही दुर्लभ
प्रस्तर मूर्तियाँ निकलेंगी
प्राचीन धरोहर की तरह... सीमा जी की कविताएँ ताजगी का एहसास कराती है... प्रेम की खुशबू से भरे खत को
मानो हरसिंगार ने
टांक दिया हो अपनी कोमल टहनियों पर
जिसे जरा सा झुलाओ तो
शब्द बनकर बिखरने लगते हैं
सफेद मोतीयों की तरह
धरती में सने प्रेम पत्रों पर... दिल को छू गई ये पंक्तियाँ.. सीमा जी को बधाई... भास्कर चौधुरी

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