Blogger Widgets
नवीनतम पोस्ट -

Thursday, November 3, 2016

3 मनोज कुमार झा की कवितायें : उमाशंकर सिंह परमार

हम पहली बार यहाँ प्रखर युवा आलोचक उमाशंकर सिंह की आलोचकीय टिप्पणी के साथ अपने प्रिय पाठकों को  मनोज कुमार झा की कुछ कविताओं से अपने ब्लॉग पर रु-ब-रु करा रहे हैं हैं -
-----------------------------------------------------------------------
यह दौर भूमंडलीकृत, उदारीकृत, लोकतन्त्र का है जो बहुत हद तक लम्पटीकृत भी हो चुका है। लूट  और शोषण वादाखिलाफी नये राजनीतिक मूल्य बन चुके हैं।  बाजार ऐसी काल-कोठरी है जिसमें न तो दरवाजा है न खिडकियाँ - 'काफ्का '।  चतुर्दिक घुटन, बेचैनी और बेबसी की अराजकता है । ऐसे खतरनाक एवं भीषण गलित रुग्ण समय में कोई संवेदनशील व्यक्ति धीर-शान्त-प्रशान्त कैसे रह सकता है? ये कविताएं व्यवस्था व सरकारी तन्त्र द्वारा  पोषित कुचक्र में पिस रहे आम आदमी की  व्यथा-कथा है, जो हमारे दौर का  मौलिक व अनुभूत शक्तिशाली  प्रतिबिम्ब दिखा रही हैं। व्यवस्था में से वंचित, रोजगार से विस्थापित, अपनी उपस्थिति के लिए संघर्षरत आदमी के लिए सत्ता और पूँजी का अनैतिक गठजोड किस तरह भूमिकाएं बदलता है, भागीदारी के सवालों को देशद्रोह से कैसे  जोड देता है, यह मनोजकुमार झा की इन प्रतिरोधी भंगिमा से लैस जोरदार कविताओं मे म़ुझे देखने को मिला। सत्ता और वैश्विक पूँजी की आन्तरिक एकजुटता व नैतिक मानवीय मूल्यों पर घातक हमलों पर मैने दो साल पहले वरिष्ठ कथाकार राजकुमार का कहानी संग्रह एडवांस स्टडी पढा था । इस कथा-संग्रह में जिस मूल्यहीनता, अराजकता, हिंसा आदि की परिचर्चा है, उसे इन कविताओं में मैने देखा। भाषा भले ही सपाट हो, अनगढ हो, पर आक्रोश की सूक्ष्म बुनावट कविता को सीधे मनुष्य की अस्मिता से जोड़ देती है।  जिस भाषा में अपने समय के अनिवार्य खतरे व्यंजित हो जाएं, उसे मैं समर्थ काव्यभाषा मानता हूँ। आज की पीढ़ी में सबसे बडा रचनात्मक खतरा यही है कि वह काव्यभाषा और समर्थ भाषा में अन्तर नहीं समझ पाता। सच में, चालू मुहावरों की प्रासंगिकता  को यथार्थ के आलोक मे परखे वगैर फार्मुलाबद्ध कविता लिखने का यह दुस्साहसी समय है और यह पृवृत्ति आदत के रूप में विकसित हो रही है। ऐसी काव्यभाषा का वैज्ञानिक तोड़ समर्थ भाषा है जिसे धूमिल "सार्थक वक्तव्य" कहते थे । हम इन कविताओं में  प्रतिरोध के सौन्दर्य को तभी देख पा रहे हैं जब हम सपाटपना और अनगढ़ लहजे में वक्तव्य-सी दिखने वाली कविताओं में एक सार्थक वक्तव्य की खोज कर पा रहे हों । यहाँ कवि की घुटन और बचैनी एक जिद की तरह उपस्थित है। उसकी संवेदना, उसका दृश्य,  हिन्दुस्तान, उसके समय के विरोधाभास और कवि के निजी अन्तर्द्वन्द इन कविताओं मे विवरण की तरह प्रभावित करते हैं । बदलते गाँव गाँवो का समाजशास्त्र अर्थशास्त्र व निजी रिश्तों का ध्वन्सात्मक पहलू भी जो "मेरा गाँव" कविता में उपस्थित है, वह रीतिवादी सौन्दर्य से त्रस्त-विन्यस्त सौन्दर्य का बिल्कुल माकूल जवाब है।  यह  आज का गाँव नही, अभी का गाँव है जिसे लोकधर्मी कलावादियों ने आज तक कविता से विस्थापित कर रखा है ।मनोज कुमार झा मेरे मित्र हैं। इनकी कविताओं को विस्तार से मैने आज पढा है। निश्चित तौर पर वे पुराने कवि नहीं हैं। पर अपनी भाषा और अपने तेवरों में हमारी पीढ़ी के युवा आक्रोशित कवि हैं।
उमाशंकर सिंह परमार
                                                                                             जनपद बांदा, उत्तर प्रदेश 
9838610776 


 मनोज कुमार झा की कवितायें
1. मेरा गाँव

बरसों बाद जब मैं 
अपने गाँव गया तो
मुझे किसी ने नहीं चीन्हा
गाँव बदल गया था
वहाँ जाने के रास्ते भी 
बदल गए थे
मैं कैसे-कैसे वहाँ पहुँच गया
यह अच्छी तरह मैं भी नहीं जान सका
मैं अपने घर की तलाश करने लगा
मेरा घर कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा था
कहीं-कहीं कोई आदमी दिख रहा था
जानवर ढोर कहीं नहीं दिखे
मैंने जब एक आदमी को अपने बारे में बतलाया
तो उसने मुझे पहचानने की कोशिश की
और कुछ देर में पहचान भी लिया
उसने कहा अब तुम्हारा यहाँ कुछ भी नहीं है
तुम्हारा घर भी अब यहाँ नहीं है
तुम्हें यहाँ आने में काफी देर हो गई
अब तुम्हारा यहाँ कोई नहीं रहता है
तुम यहाँ कैसे आए क्यों आए
अपनी ज़मीन अपना घर बेचने आए
वह सब बिक गया; अब तुम्हारा यहाँ कुछ नहीं
सब दिल्ली चले गए
तुम्हें पता है फिर भी तुम आए हो
आए हो तो आज रुक जाओ
सुबह जाना
तुम भी तो दिल्ली रहते हो
दिल्ली लौट जाओ सभी दिल्ली जाते हैं
और आते हैं तो ज़मीन मकान बेचने
तुम भी इसी फेर में आए लगता है
पर तुम्हारा तो कुछ नहीं रहा
होता तो मैं सौदा करा देता
मैंने कहा लौट जाऊँगा
जरा बेल तर से आता हूँ
उधर से ही निपट कर आता हूँ
आज तो नहीं जा पाऊँगा
मैं अपने बगीचे की तरफ चल पड़ा
सूरज डूब रहा था
दक्खिन की तरफ पहाड़ पहले की
तरह दिखा; मेरा बगीचा नहीं दिखा
वहाँ सूखे खेत थे
मैं अब वापस लौट रहा था
जहाँ मेरा घर था वहाँ अब कचरे का ढेर था
सूअर लोटपोट रहे थे !
यहाँ अँधेरों के घर बने थे

2.  बाज़ार
जब दुनिया ही
एक बाज़ार है
मार्केट
ग्लोबल मार्केट

जब भाषा
बाज़ार के लिए है

विश्व नेता
बाज़ार के लिए
करते हैं कूटनीतिक यात्राएं

जब बाज़ार के लिए
तय होती हैं
युद्ध और शांति की नीतियां

बाज़ार तय कर रहा है
तुम्हारा होना या न होना
जो तुम्हारे बिकाऊपन पर
निर्भर है

बाज़ार क्या पहले नहीं था
कब बना ये बाज़ार
इस बाज़ार में कौन है
ख़रीददार
कौन लगातार बिकता
जा रहा है
कुछ भी पता नहीं

बाज़ार में भिखारी बना ये
कौन घूमता है
कौन है बाज़ार का शहंशाह

कुछ तो बोलो
कहो कुछ
कहां हो तुम
किस बाज़ार में
क्या बिक रहे हो
या बिकने के इंतज़ार में हो
या कोई ख़रीददार नहीं

घर कहां है
और घर में प्रेम
घर बाज़ार में है
या घर में ही घुस गया है बाज़ार
कैसा है ये बाज़ार...

 3. खबर नहीं

आपके सामने
जो ख़बर है
दरअसल ख़बर वो नहीं है

ख़बर छुपा ली गई है
बड़ी सफ़ाई से

आपको चंद हवाले
दे दिए गए
आप आंकड़ों में
उलझ गए

वो ख़बर
छप नहीं सकती
वो दुर्घटना में मौत
हत्या
बलात्कार और दंगे की
ख़बर नहीं

वो मंगल पर यान पहुंचने की
प्रधानमंत्री का दसलखिया सूट
करोड़ों में नीलाम होने की
ख़बर नहीं है
वो ख़बर किसी को
फांसी पर लटकाने की भी
नहीं है

वो तो बड़ी संगीन
ख़बर है
इतनी कि किसी अख़बार में
छप नहीं सकती

वो हमारे या आपके
होने या न होने से
शायद ताल्लुक रखती है।

4. आज़ादी की राह है पुरख़तर

जब भूख से ही
जद्दोजहद में
बीत गए
हज़ारों-हज़ार साल

और भूख अभी भी
दावानल की तरह
तुम्हारे अस्तित्व को मिटाने
पर है आमादा

पेट का ओखल भर लेना ही है
सबसे बड़ा संघर्ष
मृत्यु तक
बस यही सिर्फ़
और फ़िर भी
लाज बचती नहीं...
कर्ज़ लेकर भी
जान बचती नहीं...
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
बस भूख से ही हुआ सामना

क्या करोगे
जब लूट हो संविधानसम्मत
क़ानून हो लुटेरों का पहरेदार

जब तुम्हारी ज़मीनें छीनने वाले
एंटीलिया जैसी इमारतें खड़ी कर रहे
तो वो सवाल खड़ा कर रहे
तुम्हारे आदमी होने पर ही...

हंसता है उनका चौकीदार
देश का भाग्यविधाता बना
हंसता है
तुम्हारे भूखे होने की विवशता पर...

संविधान के पन्नों पर
लूट को वैधानिक दर्जा दिया गया
ये समझ पाना भी
है नहीं आसान...

रोज़-रोज बाज़ार में खड़े होकर
ख़ुद को बेचना
और आवारा पशुओं की तरह
कचरा चबा
ज़िंदा रहने का जतन करना...

पशु और मनुष्य का भेद मिटा डाला है
इस सभ्यता ने...
तो भूख से लड़ना
अब अकेले नहीं...
आज़ादी के लिए लड़ना
सवाल है
किसके साथ...
पुरख़तर है राह।
.
5. इतिहास लिखा जाना बाकी था 

यह एक भयानक समय था
इसका इतिहास लिखा जाना बाक़ी था
सदानीरा नदियों वाले इस देश में
पानी बोतलों में बेचा जा रहा था
दुनिया की बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने
यहाँ के पानी पर कब्ज़ा कर लिया था
देश के शासकों की आँखों का पानी
बहुत पहले ही मर चुका था
देश के बड़े सेठ विदेशी कम्पनियों के
दलाल और कमीशनखोर थे
और शासक उनकी दलाली करते थे
ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटेन की महारानी के
शासन के बाद देशी लुटेरे सत्ता में आ गए थे
मुल्क़ को बाँट कर
अभी वे और बाँट-बाँट कर
जनता को और देश को
लूटने में लगे थे
ज़मीन पानी औरतों की अस्मत
रोज़ लूटी जाती थी
माँ गंगा के नाम पर 
विदेशी लुटेरों के साथ
महाआरती कर 
देश का बनिया बक्काल शासक
उनका दाहिना हाथ बन गया था
मांस खाना धर्म-विरुद्ध बताया जा रहा था
शराब पर पाबन्दी लगाई जा रही थी
और गो-मांस का निर्यात बढ़ता जा रहा था
गो-मांस रखने के शक में
कुछ लोगों को दिन-दहाड़े
मारा भी जा रहा था
पंचतारा होटलों में जैसा कि कुछ लोगों का
कहना था
आदमी का मांस परोसा जा रहा था
नरभक्षियों का स्वागत गाजे-बाजे के साथ
होता था
यह एक भयानक समय था
इसका इतिहास लिखा जाना बाक़ी था
ख़ून बह रहा था
पानी के लिए हाहाकार मचा था।

6. इतिहास कौन लिखेगा

इस भयानक समय का इतिहास
कौन लिखेगा
जब आदमी खा रहा है
आदमी का ही मांस
और पशुओं को अत्याचार से
बचाने के लिए
दुनिया की मशहूर मॉडल्स
नंगी हो कर
दुनिया की मशहूर मैगज़ीन्स में
कर रही हैं विज्ञापन
इस विचित्र भयानक समय का
इतिहास कौन लिखेगा
जब सबसे बड़ा दुराचारी
गेरुआ बाना पहन
ब्रह्मचर्य का उपदेश देता है
और बलात्कार में पकड़े जाने पर
सत्ताधारी दल का सबसे बड़ा वकील
उसके लिए कोर्ट में खड़ा होता है
कौन लिखेगा 
इस भयानक समय का इतिहास
जब दुनिया को तीसरे युद्ध में
झोंकने को तत्पर 
पुतिन-ओबामा शान्ति का नोबेल
पाने वालों की कतार में है आगे
इस भयानक समय का इतिहास
कौन लिखेगा
जब लाखों किसान कर रहे हैं आत्महत्या
और मोदी अमिताभ बच्चन को
नाचने के लिए भाड़े पर
बुला रहा है
जनता को 'अच्छे दिनों' का तमाशा
दिखाने के लिए
कौन लिखेगा इतिहास
इतिहास सिर्फ़ घटनाओं को दर्ज़ करना
नहीं होता
जो इतिहास को बदलने के लिए
इतिहास बनाने के लिए होते हैं तैयार
लिखते हैं वही इतिहास
भयानक से भयानक समय का
नया इतिहास!

7.मैं तो एक पुर्जा हूँ
अब मैं अपने चेहरे अपनी आवाज़ से
नहीं पहचाना जाता
मैं तो एक पुर्जा हूँ
बस पुर्जा
ये जो मशीन चल रही है
उसका बहुत ही ज़रूरी हिस्सा हूँ
मेरे बिना नहीं चलेगी यह मशीन
सब ठप हो जाएगा
मैं इस दुनिया का बहुत ही
नायाब पुर्जा हूँ
वो वक़्त जो देखता है मुझे
लगाता है आवाज़
पुकारता है मुझे
अरे ओ पुर्जे, तू तो इस दुनिया को
चला रहा है मशीन में फिट हो कर
पर तू  मशीन नहीं है
है तो इंसान ही
जरा समझ ले
समझ ले अपना होना समझ ले
मैं तुम्हारे साथ बहुत कम हूँ
ये भी समझ ले
और सोच ले कि क्या करना है तुझे
अपनी आवाज़ और अपने चेहरे की 
तलाश कर ले !

परिचय -
मनोज कुमार झा
जन्म : 28 जुलाई 1968
शिक्षा: एम ए इतिहास, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली
रिसर्च एसोसिएट, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् , नयी दिल्ली
1982 से 1985 तक डेहरी ऑन सोन बिहार से वैचारिक कलमकार मासिक का प्रकाशन
विविध पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा, लेख, कविता, व्यंग्य, साक्षात्कार आदि का प्रकाशन
1992 में लाल-नीली लौ कविता संग्रह का प्रकाशन
मगही के कवि मथुरा प्रसाद नवीन के कविता संग्रह राहे राह अन्हरिया कटतौ का प्रकाशन
साहित्यिक सांस्कृतिक संगठनों में छात्र जीवन से सक्रिय
कई अख़बारों में कार्य। फिलहाल, दैनिक भास्कर की हिन्दी वेबसाइट में कार्यरत
भोपाल (म.प्र.) *




Blogger Tricks

3 टिप्पणियाँ:

Sanjay Shandilya said...

पहली और अंतिम कविता बेहद पुर'असर है ।पहली खासकर-गाँव जैसे देखता है बाहर से लौटते लोगों को ।बिना लाग-लपेट के कही गई बात है ।ग्रामीण संवेदना की प्रतिनिधि कविता सी ।अब वहाँ अँधेरों के घर हैं -इस पंक्ति ने पूरी कविता के ऐश्वर्य को कंधे पर उठा लिया है ।

Sanjay Shandilya said...

पहली और अंतिम कविता बेहद पुर'असर है ।पहली खासकर-गाँव जैसे देखता है बाहर से लौटते लोगों को ।बिना लाग-लपेट के कही गई बात है ।ग्रामीण संवेदना की प्रतिनिधि कविता सी ।अब वहाँ अँधेरों के घर हैं -इस पंक्ति ने पूरी कविता के ऐश्वर्य को कंधे पर उठा लिया है ।

Onkar said...

बहुत सुन्दर रचनाएँ

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

हाल की रचनाओं के लिंक -

हिन्दयुग्म - वार्षिकोत्सव- 2010 >>

- हिन्द युग्म के सौजन्य से राजेन्द्र भवन सभागार, नई दिल्ली-01 में सुशील कुमार के काव्य-संग्रह "तुम्हारे शब्दों से अलग" का विमोचन दि. 05 मार्च, 2011 को हुआ ।