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Wednesday, September 3, 2014

1 बिचौलिया - तंत्र

 photo signature_zps7906ce45.pngजन का यह कैसा तंत्र है कि
उसके और तंत्र के मध्य लोगों की जो जमात है
वह जन और तंत्र दोनों का विध्वंसक है
फिर भी जनता उसे माला पहनाती है
उसकी जय-जयकार करती है

नहीं यह जनतंत्र नहीं,
बिचौलिया - तंत्र है |






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1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

तन्त्र में जन की भूमिका नगण्य हो गयी है।

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