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Thursday, September 11, 2014

1 दहकते अंगारों पर इंद्रधनुषों की क्रीड़ा

 
 रामधारी सिंह ’दिनकर
हिन्दी साहित्य में श्री रामधारी सिंह ’दिनकर” का प्रादुर्भाव तब हुआ जब छायावाद ढलान पर था। बीसवीं सदी का दशक, सन 1928-29 का समय। पराधीन देश को जीवन, जागरण, प्रेरणा और अदम्य संघर्ष-शक्ति की जरूरत थी। लिहाजा साहित्य में यह काल सुकोमल, अमूर्त या वायवीय विषय - वस्तुओं पर रचना का नहीं, स्वाधीनता का भाव जगाने वाली, पराधीनता, शोषण-उत्पीड़न और उपनिवेशवाद के विरोध में मुखर होकर अपनी बात कहने वाली रचना का था , पर यह सब इतना आसान नहीं था। वैचारिक सूत्रों को व्यक्त करने वाली भाषा-शैली भी चाहिये थी और दिल में गुलामी से लड़ने की आग, तभी मुक्ति के स्वर का बिगूल फूँकना संभव था। सामने की दुनिया से असंतुष्ट होकर हमारे अधिकांश कवि रोमांसवाद की पलायनवादी प्रेरणाओं से एकात्म हो रहे थे। वे या तो दुर्दिन से दु:खी होकर अंतर्मुखी हो जाना चाहते थे या फिर सृजन-सुख की तलाश में मुर्दा इतिहास में वापस लौट जाना चाहते थे। इस कठिन समय में आधुनिक हिन्दी कविता को एक ऐसे कवि की जरुरत थी जो ओजमयी, ऋजु भाषा-शिल्प में जन-गण के मन को मथकर उनमें स्वतंत्रता का भाव भर सके, दासता की नींद में उंघती लोक-चेतना को जगाकर उसे करने-मरने को उद्वेलित कर सके जिसका श्रेय तत्कालीन साहित्य में मुख्य रूप से कवि दिनकर जी को जाता है, जिनकी सशक्त लेखनी ने अपनी तेजोमय आह्वान-शक्ति से जनता को ललकार कर विद्रोही स्वर में पराधीन भारत के मुक्ति के गीत गाये।

# पर तत्कालीन कई कलावादी कवि-आलोचकों ने उनके कवि-कर्म की यह कहकर निंदा की कि यह एक कवि का काम नहीं हो सकता। कविता से इतर कार्य लेना कविता को अपनी मार्यादा से नीचे गिराना है। पर दिनकर जी का कहना था कि - "मेरी दृढ़ धारणा है कि शुद्ध कविता भी समाज के लिये ही लिखी जाती है।" इस तरह दिनकर सदैव मुक्ति के गायक और राष्ट्रीय चेतना के समर्पित कवि रहे। वैसे लोग जो उनकी निंदा कर रहे थे, धीरे-धीरे स्वयं हाशिये पर चले गये, इतिहास इसका गवाह है।

# दिनकर की कविताओं में कहीं भावनाओं का उदग्र स्वर तो कहीं भावप्रवण, स्निग्ध कोमल-धारा । इसे देखकर कुछ लोगों को यह भ्रम होता है कि वे छायावाद और प्रगतिवाद के बीच की कड़ी थे। परन्तु सच्चाई यह है कि दिनकर साहित्य में किसी वाद-विशेष को लेकर कभी चले नहीं। आजीवन अपनी अनुभूति के प्रबल आवेग को स्वच्छंद अभिव्यक्ति प्रदान करने का प्रयास किया। यही कारण है कि वे तत्कालीन काव्य-प्रभृतियाँ जैसे यथा छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद इत्यादि साहित्य के किसी खाँचे में समा न सके।

# इनकी कविताओं में एक ओर प्रेमजनित भावपूर्ण अनुभूतियों का गहरा वेग है तो दूसरी ओर दासता से मुक्ति का विद्रोही स्वर, और सामाजिक कुरीतियों-विषमताओं के विरोध का कड़ा तेवर भी। दोनों ही दिनकर के काव्य की उपलब्धियाँ मानी गयी हैं क्योंकि एक ओर जहाँ राष्ट्रीय-सामाजिक धारा ने उन्हें राष्ट्रकवि का दर्जा दिलाया तो वहीं दूसरी ओर सौम्य-गंभीर चिंतन, भावात्मक प्रकृति और गीतात्मक भाषा-शिल्प से नि:सृत वैयैक्तिक भावधारा ने ज्ञानपीठ जैसे उत्कृष्ट सम्मान से नवाजा। देखने वाली बात यह है कि उनके काव्य में उपर्युक्त दोनों विपरीत ध्रूवों की प्रवृतियाँ बारम्बार दृष्टिगोचर हुई हैं जिस कारण उनका काव्य-जीवन आदि से अंत तक द्वंद्वों से जूझते रहने की मनोहारी कथा ही कही जायेगी। इस सहज किन्तु दूर्लभ प्रकृति के कारण ही उनके काव्य को "दहकते अंगारों पर इन्द्रधनुष की क्रीड़ा" कहा गया। यह अंतर्द्वंद्व जितना उनके आभ्यांतर में लक्ष्य किया गया उतना ही उनके सृजन में भी। इस अंतर्द्वंद्व पर ज्ञानपीठ समारोह में भाषण देते हुए स्वयं दिनकर जी ने कहा, - "मैं रन्दा लेकर काठ को चिकनाने नहीं आया था। मेरे हाथ में तो कुल्हाड़ी थी। मैं जड़ता की लकड़ियों को फाड़ रहा था। लेकिन मुझे राष्ट्रीयता, क्रांति और गर्जन-तर्जन की कविताएँ लिखते देख मेरे भीतर बैठे हुए रवीन्द्रनाथ दु:खी होते थे और संकेतों में कहते थे,- "तू जिस भूमि पर काम कर रहा है, वह काव्य के असली स्रोतों के ठीक समीप नहीं है।" तब मैं "असमय आह्वान" में, "हाहाकार" में, कई अन्य कविताओं में अपनी किस्मत पर रोता था कि हाय, काल ने इतना कसकर मुझे ही क्यों पकड़ लिया? मेरे भीतर जो कोमल स्वप्न हैं, वे क्या मुरझाकर मर जायेंगे? उन्हें क्या शब्द बिल्कुल नहीं मिलेंगे?"

# उनके आभ्यांतर में इस द्वंद्व का करण था उनके भीतर दो महाकवियों का एक साथ पैठा होना। उनमें एक थे सर मोहम्मद इकबाल जिनकी कवितायें पाठकों के मन में तुफान पैदा करती थीं और चिंतन के नये द्वार खोलती थीं। दूसरे थे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जिनकी कवितायें प्रेम-करुणा-सिक्त थीं और भावनाओं की शीतल लहरें जगाती थीं। पहले को युगीन त्रासदी के कारण दिनकर ने अपनाया तो दूसरे को अपने हृदय की पुकार के कारण। अंतर्द्वंद्व नि:संदेह स्वाभाविक था और यह अंतर्द्वंद्व ही उनकी कविता का प्राण था।

# यदि काव्य की समकालीनता की दृष्टि से देखें तो कविता आज भले ही छंद से मुक्त हो गयी हो पर द्वंद्व पहले से भी अधिक परिमाण में मौजूद है जो कविता के भीतर तनाव और घिराव का वातावरण सिरजता है। मुक्तिबोध ने भी " नई कविता के आत्मसंघर्ष" में उल्लेख किया है कि आवश्यकता इस बात की है कि हम इस द्वंद्व को समझें और तदनुसार अनुभव-समृद्धि बढ़ाएँ। "

# द्वंद्व दिनकर के काव्य-जीवन के पग-पग में घटित है। या कहें कि उनकी भावना और चिंतन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। यह द्वंद्व उनकी रचना में भावों का गुंफन पैदा करता है, विषय-वस्तु के प्रत्येक क्षेत्र में भरमाता है और बेचैन करता है। दिनकर का कवि इस गंभीर संकट से जूझता है, उबरता है जिसमें उनकी काव्य-साधना उसकी चुनौतियों को स्वीकार करती है और फिर उसका समाधान भी प्रस्तुत करती है।

# उनका "कुरुक्षेत्र" द्वंद्व की (1946) एक सर्वाधिक समर्थ अभिव्यक्ति है जो युद्ध और शांति, हिंसा और अहिंसा, प्रवृति और निवृति की जीवन-शैली तथा विज्ञान और आत्मज्ञान की परिणति में निहित है। उसके पूर्व "द्वंद्व-गीत" (1940) नाम से ही स्पष्ट है। "उर्वशी" (1961) तो अप्सरा और लक्ष्मी, संशययुक्त मानव और संशयरहित देवता एवं काम और अध्यात्म के द्वंद्वों की अप्रतिम गाथा है।

# जहाँ तक शिल्प और छंद का प्रश्न है, अपनी आंतरिक प्रकृति के अनुकूल शिल्प के परम्परागत बंधन को वे स्वीकार नहीं करते। सायास छंद-योजना की अपेक्षा भावानुकूल छंद-योजना दिनकर को प्रिय है। इसी कारण परम्परा-प्राप्त छंदों के स्थान पर नये छंदों के निमार्ण की आवश्यकता पर बल देते हुए वे लिखते हैं कि- “अब वे ही छंद कवियों के भीतर से नवीन अनुभूतियों को बाहर निकाल सकेंगे जिसमें संगीत कम, सुस्थिरता अधिक होगी,जो उड़ान की अपेक्षा चिन्तन के उपयुक्त होंगे।क्योंकि हमारी मनोदशाएँ परिवर्तित हो रही हैं और इन मनोदशाओं की अभिव्यक्ति वे छंद नहीं कर सकेंगे जो पहले से चले आ रहे हैं।”

# क्योंकि वे मानते हैं कि-“कविता के नये माध्यम यानी नये ढाँचे और नये छंद कविता की नवीनता के प्रमाण होते हैं। उनसे युगमानस की जड़ता टूटती है, उनसे यह आभास मिलता है कि काव्याकाश में नया नक्षत्र उदित हो रहा है। जब कविता पुराने छंदों की भूमि से नये छंदों के भीतर पाँव धरती है, तभी यह अनुभूति जगने लगती है कि कविता वहीं तक सीमित नहीं है जहाँ तक हम उसे समझते आये हैं बल्कि और भी नयी भूमियाँ है जहाँ कवि के चरण पर सकते हैं। नये छंदों से नयी भावदशा पकड़ी जाती है। नये छंदो से नयी आयु प्राप्त होती है।”

# भाषा और शब्द-चयन पर भी उनके यही विचार हैं। उन्होंने अपनी भाषा को समर्थ बनाने के लिये जहां एक ओर तत्सम, तद्भव, देशज और प्रान्तीय शब्दों का भावानुकूल चयन किया वहाँ दूसरी ओर प्रचलित विदेशी शब्दों का प्रयोग भी निर्बाध रूप में किया है। उनकी काव्य-भाषा में शब्द-शक्ति , उक्ति-वैचित्र्य तथा परम्परागत एवं नये मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से वह तीखापन आ गया है जो किसी श्रेष्ठ काव्य-भाषा का गुण हो सकता है

# शिल्प के सबंध में, इस तरह निश्चय ही दिनकर ने पूर्ण स्वच्छन्दता का प्रयोग किया है। बदलते युग-बोध और परिवर्तित काव्य-विषयों की सहज अभिव्यक्ति के लिये उन्होंने नये छंद का निर्माण भी किया जो ‘दिनकर-छंद’ के नाम से सुविख्यात है जैसे कि उनकी कविता ‘कस्मै देवाय’ में। अत: दिनकर को साहित्य के आभिजात्य से मुक्ति की परम्परा की एक प्रमुख कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिये। कहीं परम्परा का तत्व ग्रहण भी किया तो उसे नया बनाकर। छ्न्दों के समान ही उनके काव्य में प्रयुक्त रूप विधाओं के नवीन प्रयोग भी इसी ओर संकेत करते हैं।

# इस प्रकार दिनकर जीवन में ही नहीं, साहित्य में भी स्वतंत्रता के पक्षधर थे। उन्होंने साहित्य के आभिजात्य से मुक्ति के लिये काव्य के साधना-पक्ष अर्थात शिल्प के कठोर नियमों के प्रति विद्रोह किया और सायास छंद-योजना की जगह भावानुकूल छंद की योजना को तरजी़ह दी। उनका विचार था कि नये छंदों से नयी भाव-दशा पकडी़ जाती है जिससे कविता को नयी आयु प्राप्त होती है। हिन्दी साहित्य की इस कलात्मक आजा़दी के संबंध में दिनकर जी कहना है कि 'शुद्ध कलावादियों की भाषा में कहना चाहें तो कह सकते हैं कि रीति काल के बाद की हिन्दी कविता कला की पराजय और जीवन की विजय की कविता थी।'

# अत: इनके काव्य के कलेवर को प्राचीन शास्त्रीय नियमों से आबद्ध नहीं किया जा सकता। उनके काव्य में भाषागत लोच और रुप- योजना इसलिए परंपरा-समर्थित न होकर विषयानुकूल और सहज है। भावानुकूल सहज छंद का एक उदाहरण यहां भी देखें-

कविता सबसे बडा़ तो नहीं
फ़िर भी अच्छा वरदान है।
मगर मालिक की अजब शान है।
जिसे भी यह वरदान मिलता है,
उसे जीवनभर पहाड़ ढोना पड़ता है।
एक नेमत के बदले
अनेक नेमतों से हाथ धोना पड़ता है!

- कविता 'नेमत' से

सरसरी नज़र से देखने पर भी साफ़ है कि दिनकर की काव्यधारा जीवन के द्वंद्व और स्वतंत्रता के लिये जीवन-संघर्ष की काव्यधारा है जो दिनकर के कवि को किसी- भी साहित्यिक वाद-विशेष में उलझाती नहीं, बल्कि साहित्य के क्लासिक बंधनों से उपर उठाकर अपनी अभिव्यक्ति का ऐसा मार्ग चु्नती है जो सरल और बोधगम्य हो। कविता आज छंद से छूटकर अपने लयात्मक गति और द्वंद्व के साथ जिस रुप में समय के सच को अभिव्यक्त कर रही है, उसके आंदोलन में दिनकर जी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। आज की कविता रुढि़ और परंपरा से पूर्णतया मुक्त है। इसमें किसी कवि-विशेष का अवदान नहीं, बल्कि कविता को इस भावभूमि तक लाने का श्रेय अन्य कवियों के साथ ही रामधारी सिंह 'दिनकर' को भी जाता है जिन्होंने एक अर्थ में अपने समय को तो शब्द दिये ही, आने वाले समय की कविता के लिये एक पृष्ठभूमि भी तैयार की।
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