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Monday, September 16, 2013

10 घर से चिट्ठियाँ नहीं आतीं

साभार : गूगल 
घर से चिट्ठियाँ नहीं आतीं
जब – तब एस. एम. एस. आते हैं
जो कंपनी के अनचाहे एस.एम.एसों. में खो जाते हैं
और कुछ दिनों में गायब हो जाते हैं

नहीं बचा पाया ज्यादा दिन उन एस. एम. एसों. को भी
जिनमें पत्नी ने प्यार लिखा था
जिनमें बच्चों की जिद और बोली के अक्स छुपे थे
इष्ट-मित्रों के जन्म-दिन बधाई - संदेश भी बिला गए

गाहे-बगाहे माँ – पिता फोन करते हैं
और शिकायत की मुद्रा में हाल - समाचार पूछते हैं
उन्हें दु;ख है कि
अब कम आता हूँ गाँव
न कभी चिट्ठी – पत्री लिखता हूँ
मोबाईल की आवाज़ उन्हें ठीक से सुनाई नहीं देती
और कान दर्द करने लगते हैं

बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहा हूँ इन दिनों –
बच्चे फोन पर अपने शिष्टाचार भूलते जा रहे  
पत्नी बिना हाल-समाचार पूछे ही शुरू हो जाती है

फिर खोलता हूँ घर की चिठ्ठियों के पुलिंदे
बरसों पहले जिन्हें सम्हाल कर रख दिया था दराज में
उन पर पड़ी धूल की मोटी परत झाड़ता हूँ
और सोचता हूँ - 

घर के प्यार और संस्कार कब तक बचा पाऊँगा भला 
दिन – दिन तार – तार हो रहीं चिट्ठी – पत्री की इन लिखावटों में ?
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10 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

समझौता तो करना होगा इस नये जमाने की नई परिपाटी से...विचारणीय!!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-09-2013) गुज़ारिश प्रथम पुरूष की :चर्चामंच 1370 में "मयंक का कोना" पर भी है!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार said...

ईमेल पर प्राप्त टिप्पणी -
मन की गहराइयों में जा कर सुषुप्त भावों को झकझोरने वाली रचना के लिये साधुवाद !!
शकुन्तला बहादुर
Sent from my iPad

दिगम्बर नासवा said...

बीते दिनों के संवेदनाएं ... चिट्ठियों का प्यार अब कहां .... कुछ नया ढूंढना होगा ...

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, आज का कितना बड़ा सच आपने कविता के माध्यम से कह दिया है। वह पोस्टकार्डों, वह अंतर्देशीय पत्रों और लिफ़ाफ़ों की खुशबू और उन्हें सहेज सहेज कर रखने का मोह… अब तो इस नई तकनीक में बिल्कुल बिला गए… एक सुन्दर कविता के लिए बधाई आपको !

रश्मि प्रभा... said...

जीवन की गहराई भागदौड़ में लुप्त हो गई है - जितनी सुविधा,उतना ही अजनबीपन सा

chandan kumar said...

nice sir

Kavita Rawat said...

चिट्ठी पत्री यादों के भंवर उलझ कर रह गयी हैं ...

jafar said...

बीते दिनों की याद दिला दी,…
शानदार

Pratibha Verma said...

well said!!!

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