Blogger Widgets
नवीनतम पोस्ट -

Sunday, February 17, 2013

4 शब्द जब



1 -
शब्द जब
घिसने लगते हैं
दिनचर्या के भागमभाग में
भाव तब
कतराने लगते हैं
कविता में उसे आकार देने से   

2 –
कवि फिर तराशता है उसे  
अनुभव की खराद पर
उसमें नई चमक पैदा करता है
तब सृजन जन का कंठहार बन जाता है  

3 –
पर लोक लेते हैं मतलब के अ-कवि जन उसे 
और पोस्टर - विज्ञापन - बैनर - झंडे  बनाकर 
कथित जनमंचों के खंभों से टांग देते हैं
जहाँ गहरी अनुभूतियों में पगी संज्ञाएँ  
रूढ होने लगती हैं
विशेषण पुराने पड़ने लगते हैं
क्रियाएँ मरने लगती हैं 
मुहावरे अपने अर्थ खोने  लगते हैं  

4 –
शब्द पनपता है बेतरतीव
जनपद में, लोकवाणी में
सबसे ज्यादा सुरक्षित रहता है
सड़क के लोगों में
लेकिन  सबसे अधिक पिटता दिखता है
संसद और ऊँची सभाओं में

5-
इस दुनिया में कोई शब्द बेचता है,
कोई शब्द बुहारता है
तो कोई शब्द से खेलता है
अकेला कवि ही होगा शायद 
जो शब्द को जीता है !


Photobucket
Blogger Tricks

4 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... said...

शब्द तो रुई के फाहों से उड़ते हैं हवाओं में
मन के आँगन में
मस्तिष्क की संकरी गलियों में
जहाँ रुका पथिक
शब्द प्यास बुझाने लगते हैं

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, शब्द को लेकर बहुत सन्दर कविता पंक्तियां हैं। बधाई। परन्तु अन्तिम पंक्तियां धूमिल की उन कविता पंक्तियों की याद दिलाती हैं जिनमें वह यूं लिखते हैं - एक आदमी रोटी बेलता है/ दूसरा आदमी/रोटी खाता है/ एक तीसरा आदमी है/ जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है/ बल्कि रोटी से खेलता है…' खैर, आपकी पंक्तियां अपनी जगह हैं।

PRAN SHARMA said...

EK SE BADH KAR EK KAVITA HAI . BADHAAEE .

शालिनी कौशिक said...

इस दुनिया में कोई शब्द बेचता है,
कोई शब्द बुहारता है
तो कोई शब्द से खेलता है
अकेला कवि ही होगा शायद
जो शब्द को जीता है !
बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति .एक एक बात सही कही है आपने कैग [विनोद राय ] व् मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन ]की समझ व् संवैधानिक स्थिति का कोई मुकाबला नहीं .

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

हाल की रचनाओं के लिंक -

हिन्दयुग्म - वार्षिकोत्सव- 2010 >>

- हिन्द युग्म के सौजन्य से राजेन्द्र भवन सभागार, नई दिल्ली-01 में सुशील कुमार के काव्य-संग्रह "तुम्हारे शब्दों से अलग" का विमोचन दि. 05 मार्च, 2011 को हुआ ।