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Sunday, January 13, 2013

1 हृदय -पाँखी

[ चित्र : साभार गूगल ]
हिन्दी में लंबी कविताओं की एक सुदीर्घ परंपरा रही है जिसका अपना अलग ही महत्व है |  मुक्तिबोध की  "'चाँद का मुँह टेढ़ा है', निराला की 'सरोज-स्मृति' या  धूमिल की 'पटकथा' या फिर स्वर्गीय भागवत रावत की 'कहते हैं कि दिल्ली की है कुछ आबोहवा और (नया ज्ञानोदय जुलाई 2007)'  अथवा  अनेक  महान कवियों की कितनी ही लंबी कविताएं आधुनिक साहित्य के धरोहर की तरह हैं, जिनसे गुजरकर न सिर्फ अपना मन अघाता है बल्कि लगने लगता है कि इन लंबी कविताओं में जीवन और समाज का कितना गहरा अर्थ और कितना गूढ सत्य गुप्त है ! सच है कि हर कवि की कोई न कोई कविता सबसे लंबी होती होगी  |मेरी अब तक की सबसे लंबी कविता है - हृदय -पाँखी |


बहुत छोटी सी चीज़ होती है
एक पंख -
इतनी बड़ी इस दुनिया में

बहुत कोमल रोयेंदार और
नाज़ुक भी
पखेरुओं के धड़ से लगा 
इस पंख पर होता है
पक्षियों का संसार
उसका जीवन
उसका विहार

बहुत छोटा होते हुए भी
साधारण नहीं है
एक पंख -
इसमें शक्ति है
पृथ्वी के आकर्षण-बल को
 छोड़ने की

तोड़कर
वायु-वेग के साथ उड़ने की

इसमें अर्थ छिपा है
आज़ादी का
उड़ान का
उछाह और प्रेम का

मेरा भी हृदय-पंछी उड़ना चाहता है
दुनिया की दुविधाओं, शंकाओं और प्रश्नों को छोड़कर
दुखों के गुरुत्व-बल को तोड़कर
स्पष्टता के गगन में..
उड़ना चाहता है
युगों से अनुत्तरित
उस सुख-उछाह-प्रेम के मर्म को पाना चाहता है
जिसकी सदियों से तलाश रही है मुझे 

मैं टोहता रहा हूँ कई-कई कालखंडों में
उस हवा को, उस साधन को
जिस पर चढ़ उड़ सकूँ,
जा सकूँ
दुनिया के सारे क्लेश-दैत्‍य के पार
साल-दर-साल से घूमता रहा हूँ
इसी टोह में दर-बदर
पहाड़ों पर.. घाटियों में 
तराईयों में.. जंगलों में.. यत्र-तत्र
तृषाग्नि की मायावी लपटों में जलता हुआ

पर हर बार लौट आया हूँ
क्लांत-मन, खाली हाथ
अपने अंतस की शांति को खोकर
फटे पैर.. बिवाईयों के घाव और आपा लेकर

इस गहरी थकान भरी यात्रा में
चेहरे पर चिंता की अनगिन 
सघन लकीरें खिंच गयी हैं
हृदय के पात्र में हाँ,.. हर बार
सूनापन ही लेकर लौटता रहा हूँ
बदन पर अपने
उदासी की सघन छाया लपेटे 


और सोचता रहा हूँ सदैव
उस प्रेम-दया-करुणा के बारे में
उस अतिरेक आनंद के बारे में
अपने मन को मथता रहा हूँ
पर हर बार हुआ यही है कि
हृदय की पुकार पर
अपने मन की आवाज़ को ही
भारी पाया है मैंने


देखता हूँ सर्वत्र
प्रकृति में... सृजन में... अपनी आत्मा में भी
चारों ओर...
बंजर-रेत के टीले तो कहीं
बियावान-सा पसरा हुआ सन्नाटा 
सुरम्य संगीत तो नहीं... अधिकतर
गर्जन-तर्जन ही सुने हैं मैंने
खिले हुए उपवन कम ही दीखे
सूखे पत्तों की ढे़र
अंतर्ज्वाला से भस्मीभूत हो रहे
टहनियों और दरख्तों की
चटकती आवाज़ें ही
सुनी हैं जब-तब
तो कहीं दृष्टिगत हुए हैं
भूख से सिकुड़ी अँतडि़याँ 
और अस्थि-पंजर और कहीं-कहीं
जीवाश्मों के ढूहें भी
कहती रही हैं नित्य हैं जो
हाहाकारते लोगों के
चीत्कार की करुण कहानी 

इस यायावरी ज़िदगी में
बड़ा सवाल यह नहीं रहा कि 
अच्छा क्या है, बुरा क्या है?
बल्कि चोटें खा-खाकर
आँखें अपनी नम
और हृदय ज़ख्मी
होते रहे हैं


और हाँ,.. चीज़ों के मूल्य और प्रतिमान भी
बदलते देखे हैं निरंतर...
कि जो कल तक मेरे जिगर का टुकड़ा था
आज वह मेरी छाती पर साँप बन बैठा है
जो कल तक जो सुख था मेरे लिये
अब मेरे हिस्से का दु:ख है

सपनों को टूटते और सच को
सपना होते...हाँ कई बार देखा है मैंने
इस कठिन यात्रा में ।
अब मन में गहरे पैठ गयी है यह बात कि
आज जिससे प्रेम कर रहा हूँ
हो न हो, कल नफ़रत हो उससे..खैर

अब तो, अपने हृदय को पूरा करना है मुझे
केवल उसी की पुकार सुननी है 
चाहे मैं पर्वत-पर्वत जाऊँ
चाहे नदी-नदी
गहरे से गहरे समुद्र में छ्लांग लगाऊँ
या फिर शिखरों पर चढ़ विजय-पताका
अपने जीत की फहराऊँ
पर बज रहा है जो स्वतंत्रता का गान मेरे भीतर
उसके लय और ताल पर ही
इस दुर्गम यात्रा की डगर
अब तय करनी है मुझे,
अब तक के जो ख़याल थे मेरे भीतर
जो निर्णय लिया था मैंने
अपनी जिंदगी में
इस दुनिया में
अपने सृजन में

वह सब बाहर की आवाज़ थी
विभ्रम का रचा संसार था
धोखे थे, छलावे थे
सपने थे ,खुशफ़हम इरादे थे
अब जान गया हूँ मैं कि
जो मेरे हृदय की आवाज़ है
वह दुनिया की सब आवाज़ों से जुदा है
निराली है

अगर सुन न पाया उसकी धुन 
समझ न सका अगर उस लिपिहीन भाषा के अर्थ,
उसके सौंदर्य को यदि निरख न पाया
तो मेरा आना इस उपग्रह पर
व्यर्थ ही होगा

अपनी पिपासा को मिटाने के लिये
क्या-क्या नहीं किया मैंने !
रंग-बिरंगे चोले पहने
मणि-कांचन गहने
रुप-रस-गंध के सारे
सामान से अपने घर भी भर दिये
पर हृदय का अवसाद न मिटा

सिर्फ़ सूनापन ही बजता रहा वहाँ ।

हाँ..फिर,विकल हो जब भी
अपने हृदय के पंख खोले हैं मैंने
अपने को उस शांति-निकेतन में पाया है
और पहले से ज्यादा सुंदर भी दिखा हूँ
युगों से छ्टपटाती मेरी आत्मा वहाँ जब-तब
स्नेह-वर्षा से भीगने लगी है

पर हाय, यह कैसे हो गया कि
मैंने स्वयं ही बिसार दिया अपने संग को!
अपने हृदय-कमल को!!
अपने ही अंग को !!!


चाहे मैं धरती की अतल गहराईयों में धसूँ
या अनंत आकाश में उड़ूँ
या फिर कोई भी उपाय करूँ
पर निरुपाय ही रहूँगा हर बार
अधूरा ही रहूँगा आजीवन
अगर अपने भीतर पुकारते
उस नीरव शब्द में अपने को ढाल न पाया

जिस रोशनी की मुझे तलाश है
जिस ताल-तलैया का पानी पीकर
मैं अपनी प्यास बुझाना चाहता हूँ
उसके रास्ते मात्र हृदय की गहरी गलियों से
होकर जाते हैं
पर उसके लिए मुझे 
जग के घने तमस में
भटकने की जरुरत नहीं
,खड्ड-खोहों में लड़खड़ाकर गिरने की जरुरत नहीं
बल्कि धीरज और आशा के सबक सीखने हैं
प्रतीक्षा करनी है मुझे
पौध बनने की आस में 
रेगिस्तान में दबे उस बीज सा,
जिसे पानी चाहिए,ऋतु चाहिए
समय का मलाल नहीं जिसे 
चाहे कितनी ही घड़ियाँ बीत जायें
प्रतीक्षा में ठहरे हुए,
पर जो तैयार है हर क्षण
ऋतु की आहट पाने को 
निज जीवन में उसके अभिनंदन को

उस बीज की तरह ही
मेरे अंतर्तम में एक शक्ति गुप्त हो गयी है
जो मेरे हृदय-पंख को उड़ा सकेगी
भव्य शांति के अजस्त्र, खुले आकाश में
बस मुझे इंतज़ार करना है उस मौसम का

अब तक अनागत उस हवा का,
आगमन पर जिसके मैं
अत्यंत हर्षित हो
अपने पंख में भर
आनंद-गगन में विहार करूँगा

दुनिया तो बनती रहेगी
बिगड़ती रहेगी, घड़ी की सुईयाँ भी
यूँ ही रोज़ चलती रहेंगी
और हर दिन मैं बिलाता रहूँगा
अमावस के चाँद की तरह
पर एक छोटा-सा यह पंख हृदय का -
एक चीज़ कर सकता है,
यह उड़ सकता है

स्वच्छंदता, प्रेम, विहार उसके वश में है
उसका पर खोलकर उड़ना
बहुत अच्छा लगता है मुझे !
घड़ी की सुईयाँ तो 
बार-बार अपने को दुहरायेंगी 
मगर मैं लौटकर दुबारा नहीं आ पाऊँगा
वह दिन मेरे लिये लौटकर दुबारा
नहीं आयेगा, इसलिये
खोलने दो मुझे अपनी खिड़कियाँ, दरवाजे सब 
जो न जाने कब से बंद पड़े हैं -

आने दो उस हवा को
जिस पर बैठ कर यह मेरा
हृदय-पाँखी
आनंदलोक की सैर करेगा

तब जाकर मैं जीवनोत्सव का
रस ले पाऊँगा, वरना
यहाँ सब ओर
मृगमरीचिका के साये पड़े हैं |


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1 टिप्पणियाँ:

रचना दीक्षित said...

बहुत सुंदर कविता एक गंभीर सोच को समेटे हुए.

बहुत बधाई.

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

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