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Saturday, December 1, 2012

0 कविता के बारे में -


  • जैसे-जैसे हमारी वय पक रही है, हम महसूस कर रहे हैं कि हमारे जीवन का वसंत कहीं खोता जा रहा है। लगातार किन्हीं अज्ञात-सी चीज़ों से उलझते जा रहे हैं हम, जिससे हमारे हृदय की दुनिया सिकुड़ती जा रही है और स्मृतियों का दायरा फैलता जा रहा है, यानि कि हमारे हाथ से निरंतर वह समय फिसलता जा रहा है, जिसमें कभी आदमीयत की महक़ हुआ करती थी, प्रेम की अजस्त्र धारा प्रवहमान थी और निस्सीम आकाश- सी स्वतन्त्रता से हम कुलांचे भर रहे थे। कहाँ बिला गया हमारा बाल-मन, वह किशोरपन, वह युवा-जोश और अल्हड़पन ? जीवन के किस दुर्गम-अपरिचित खोह में समा गयीं वे अद्भूत, कीमती चीज़ें जिनके होने से हमारा हृदय-कमल हरदम खिला होता था? अगर उसकी ह्त्या कर दी गयी तो फिर हम क्यों और कितना ज़िन्दा हैं...? आदमी बनने की जिम्मेवारियाँ और विकास के चक्करघिन्नी में धूमते हुये कोल्हु के बैल की तरह हमें जीने की आदत पड़ गयी है और हमारे उस बेलौसपन को इतना तोड़ दिया है कि अब वह समय की मुर्दागाड़ी में सजकर जीवनेतिहास की वस्तु मात्र बनकर रह जाने को विडंबित है । ...और गौर करें तो काल के फ्रेम में स्मृतियों के कितने-कितने चित्र जड़ गए हैं जो हमारी आत्मा , हमारे चित्त को नितांत अकेले क्षण में कुरेदते भी हैं  ! उनमें कई रंग धवल-धूसर रंग भी हैं - कुछ रंग तो चित्तप्रिय हैं, पर कुछ काईयाँ हैं। जीवन की अनगिनत मुद्राओं को अर्थ देती हुई, कुछ बेहद उदास तो कुछ तेज और चटख़दार। कई तरह की आवाजे़ भी सुन रहा हूँ - कुछ बेसुरे और डरावने, कुछ मादक और कर्णप्रिय। इनमें जो रंग खुशफ़हम इरादों की जो तस्वीर लेकर हमारे मन में बैठी हैं वह हमारे हृदय को बराबर आवाज़ दे रही हैं कि आओ, फिर से अपना नया रंग चुनो और उस रंग में रंग जाओ, फिर से उसे अपनाओ, अपने जीवन में भर लो।
  • सचमुच हमारी-आपकी, सबकी स्मृतियों में कुछ क्षण अब भी नितांत अकेले और समय के खूँटों से सलीब पर टँगे पड़े हैं, क्या आप देख नहीं पा रहे कि उनमें कहीं हर्ष है, कहीं आतंक और आर्तनाद। पुकार है तो कहीं जिज्ञासा, कहीं सुख की बयार शीतल-सम बह रही है तो कही घनीभूत पीड़ा की लहरें निर्मम हिलोरें ले रही हैं।यह कितनी व्यथा भरी बात है कि आदमी जितना वर्तमान में जीता है, उससे कई गुणा अधिक वह या तो अपने बीते समय में, या फिर अपने सपनों में.. अपने वादों में वास करता है और जीते हुये भी वर्तमान से अनुपस्थित रहता है! इस कारण उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने आसपास के कार्य-कारण, जगत और घटनाओं के प्रति उतनी सजग और सचेत नहीं रह पातीं जितनी कि होनी चाहिये। क्या यह मजाकिया बात है कि उसकी जि़न्दगी का अधिकांश, भूत-भविष्य के एक ऐसे कालखंड के कल्पनालोक में बीत रहा है जहाँ वह जीते जी पहुँच ही नहीं सकता कभी ? मैं तो यही कहूँगा कि यहाँ जीवन रूपी प्रदान की गयी वस्तु का अपव्यय हो रहा है क्योंकि इस तरह वह वर्तमान को ठीक रीति से जी नहीं पाता। क्षण का यदि कोई चिरनवीन तह है तो व्यक्ति जो अब है यानि जो दृश्यमान और साकार होकर चल रहा है वहाँ नहीं है | वह शरीर और मन दोनों से भूत और भविष्य तो सदैव हमें अपने विचारों के अमूर्तन-अँधेरे में ही धकेला  जा रहा है क्योंकि स्मृति के टिके हुये क्षणों में इतनी शक्ति होती है कि जब भी आदमी रिक्त बैठा होता तो उसका अवचेतन मन सक्रिय हो उठता है और झट उसे भूत-भविष्य के किसी-न-किसी विचार-क्रम से जोड़ देता है। इस तरह स्मृति के वे क्षण सजीव होकर वर्तमान के विरुद्ध उसके इर्द-गिर्द एक मायावी संसार की सृष्टि कर देते हैं।
  •  यह अनुभव करने का विषय है कि जिस व्यक्ति के अंतर्मन में दु:ख और अवसाद की जितनी गहरी छाया दबी हुई होगी, मौक़ा पाकर उसका ज्वार उस व्यक्ति में उतना ही उफान से प्रकट होगा। स्मृति में धँसे ऐसे क्षण जीवनघाती होते हैं और हममें उन विचार-भावों को भरते हैं जिसकी परिणति विषाद और असफलता ही होती है।ये क्षण सृजन के लिये भी उतने ही घातक हैं। कवि-लेखक-कलाकार के लिये उसका धरोहर उसका वर्तमान है क्योंकि यही वह समय है जहाँ वह अपने आस-पास की प्रकृति और जगत का सूक्ष्म निरीक्षण करता है। गौरतलब है कि भूत भी कभी वर्तमान ही होता है और यदि वह अपने समय में जीवित रहा तो भविष्य़ भी एक न एक दिन उसका वर्तमान ही बनेगा। पर जब वह निरंतर अपने वर्तमान के प्रति अन्यमनस्क-असावधान रहता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह अपने उन अनुभवों के उन बहुमूल्य क्षणों को खोता चला जा रहा है जिसके उपयोग की संभावना  उसकी अपनी रचना में कर पाने की शेष थी। फलस्वरूप उसका इन्द्रियबोध उतना प्रखर और वेगवान नहीं रह पाता और उसकी काव्य-सम्प्रेषणीयता भी प्रभावित होती है। सृजन में भावों की जगह विचारों का प्राबल्य हो जाता है क्योंकि अनुभव की कमी उसे मात्र अपने अर्जित किताबी ज्ञान की ओर उन्मुख करता है और इसके लिये उसे अपने पेशानी पर बल डालना पड़ता है। पर सिर्फ़ शब्दों की जादूगिरी सृजन को बोझिल बना डालती है।
  • हमारी यादों की दुनिया कभी सम और स्थिर नहीं होती। वह समय और परिवेश से अपना सत्व ग्रहण करती है और बदलती रहती है। उसमें सुनहरे पलों की आहटें कम, हादसों का दौर अधिक होता है जो उसकी चेतना के नसपुटों को जाग्रत करता रहता है | यही उसकी प्रकृति बन जाती  है जबकि  एक साहित्यकार को हमेशा प्रकृति और परिवेश के अंतर्द्वद्व और संघर्ष से अपने वर्तमान को नवीकृत करने को सचेष्ट भी रखना चाहिए । इसलिये उसकी स्मृति में टिके हुये क्षण उसके वर्तमान के साथ एकलय और एकरस नहीं रह पाते  और  उसे अपनी रचना में जीवन और जन के अंतर्द्वंद्व और संघर्ष को रेखांकित करने में कठिनाईयाँ उत्पन्न करती हैं जिससे उसकी रचना समकाल के संवेग और ध्वनि को मुश्किल से ही पकड़ पाती हैं , बल्कि यूँ कहें कि उसके कुछ तार उसकी पहुँच से बाहर रह जाते हैं । अत: इन बीते क्षणों को अपने सृजन का अभिष्ट बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि हम अपने बुरे और दु:ख के पलों को याद करने के बजाय उसकी प्रकृति-सत्ता पर अपना ध्यान केन्द्रित करें और उसकी अभिलक्षणा का मनोविश्लेषण कर उससे उपजे सकारात्मक सोच को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें।तभी एक कवि-लेखक के लिये स्मृति में टिके हुये क्षण की सार्थकता सिद्ध होगी। इसे मै यहाँ एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ। एक विद्यार्थी है जो मेधावी है पर उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इस कारण परीक्षा में उसके अंक वह नहीं आ पाते है जैसा उसने सोचा था क्योंकि परीक्षा की अवधि में ही वह बीमार पड़ गया और उसके कई पेपर खराब हो गये। यह अवसाद हो सकता है उसकी स्मृति में कई सालों तक टिकी रह जाये जो उसके भविष्य़ का शुभ-संकेत नहीं है। अगर अब वह अपने संस्मरण या अपनी कविता में सिर्फ़ अपनी असफलता का वर्णन ही करे और उसकी प्रकृति-सत्ता से आमुख होकर उसकी विवेचना न करे तो वह अपने दु:ख से उबर नहीं पायेगा जब तक कि काल के मरहम उसके घाव नहीं भर देते। इसलिये स्मृत-क्षणों के कार्य-कारण जगत की समुचित व्याख्या बेहद जरूरी है। यहाँ जीवनानुभव के खनिज दबे होते हैं जिन्हें  उत्खनित कर उसको अपने सृजन का हिस्सा बनाना एक रचनाकार की रचाधर्मिता का अभिप्राय है और चुनौती भी।
  • कुंठा और संत्रास से रची कविताओं में यह पक्ष अत्यंत दूर्बल होता है| वहाँ कवि अपनी व्यथा से उबर नहीं पाता जो अंतत: उसे उस घेरे के अंदर ले आती है जहाँ विडंबना और तनाव-संत्रास को ही वह सृजन का अभिप्रेत समझने लगता है, जिसकी प्रतिच्छाया में सृजन का नुकसान होता है, उसके रूपाकार प्रभावित होते हैं,रचना की प्रभावन्विति कमज़ोर होती है और कभी-कभी कवि अपने मूल लक्ष्य से भटक भी जाता है |
  • कविता को लेकर मैं किसी मुगालते में नहीं रहता, न ही हिन्दी के किसी काव्य-वाद या धारा से अपना वास्ता है। मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि वे सब मुझे प्रिय हैं जिसने अपनी रचनाओं में दुनियाभर में मेहनतकश लोगों की मदद और सराहना की है। बाकी... काव्य-सौंदर्य के सब तत्व तो कविता में खुद ही समाहित हो जाते हैं, (उसे अलग से बताने की यहाँ जरुरत नहीं)।हाँ, यह बात दीगर है कि आज हिन्दी कविता में एक साथ एक ही समय में कई भाव-धाराएँ प्रवहमान हैं जो इस भाषा-साहित्य को व्यापक पाट और भूमि प्रदान कर रहे हैं और यह इसके उज्ज्वल भविष्य का प्रमाण देता है, यह मेरा निजी और कहूँ तो सुखद अनुभव है। आज हिन्दी कविताएँ जिस दौर से गुजर रही है उसकी चर्चा के केंद्र में वाद की जगह विवाद और सहमति की जगह बहस अधिक छिड गये हैं | अहम सवाल यह है कि जनवादी लेखक आचरण और स्वभाव से कितने जनवादी हैं|  दूसरा महत्वपूर्ण सवाल पाश्चात्य नव्य काव्य प्रतिमानों के पक्षधर कवि-लेखकों को लेकर है जो हमारी जातीय साहित्य-संस्कृति की दहलीज लांघकर पश्चिम से विचार और व्यवहार, विकास-गतिशीलता और उदारीकरण के मुखौटे ओढ़ अपनी रचनाओं के माध्यम से हममें समाते जा रहे हैं, उनमें नव-उपनिवेशवाद की ‘बू’ है जो हमारी देशज और प्राकृतिक विरासत को नष्ट कर देने पर तुला है, ( इन नष्टप्राय होती चीजों में अपनी माटी से उपजने वाली खरी कविता भी शामिल है| ) और एक गुलामी से निकलकर दूसरे गुलामी की ओर हमारे गमन का मार्ग खोल रहा है क्योंकि वह आदमी के काव्यात्मक तरीके से सोचने की सम्पूर्ण प्रक्रिया को ही उजाड़ देना चाहता है|अस्तु , जन–चेतना से प्रसूत कविताएँ हमेशा इस संवेदनहीनता के विरोध में खडी़ रहेगी। वे इस जीवन के समानांतर एक अलग, विलक्षण और सुंदर संसार रचती हैं जिसमें सुविचारों को बचाने की, जीवन की अच्छाईयों को अक्षुण्ण रखने की ताक़त है जो उन शब्दों से ग्रहण करती है जो समाज के श्रमशील पवित्र श्वांस से निस्सरित होता है, सक्रिय होकर सच्चाई को प्रतिष्ठित करता है और मनुष्यता की संस्कृति रचता है। झूठ को जीवन से विलगाता है एवं अन्याय, शोषण और उत्पीड़न से प्रतिवाद करता है। इसलिये अत्यंत दुरुह और जटिल होते इस समय में कवि-कर्म त्याग, आत्म-संघर्ष और जोखिम से ज्यादा भरा दीखता है जहाँ नए किस्म की चुनौतियाँ उठ खड़ी हुई हैं| इसकी फलश्रुति यह रही कि रूपवाद और लोकधर्मिता दृश्य में अब आमने-सामने और पहले से अधिक मुखर हो गये हैं| इसमें आयातित कलावाद का खतरा और भी आसन्न है (जिसका प्रभाव आज के कई युवा कवियों के सृजन में स्पष्ट रूप से गोचर हो रहा है)| पर इन दो विपरीत काव्य-धाराओं की प्रतिस्पर्धा में सीधे-सादे कवि के लिए शब्द-कर्म का कोई अभिप्रेत निकाल पाना कठिन हो जाता है जिसके प्रभाव में सृजन का नुकसान होता है, उसके रूपाकार प्रभावित होते हैं, रचना की प्रभावन्विति कमज़ोर होती है और कभी –कभी कवि अपने मूल लक्ष्य से भटक भी जाता है। पर इतना तो तय है कि बिना अपनी धरती, अपनी जनता, प्रकृति और अपनी जातीय काव्य-परंपरा को जाने-गुने कोई उधार की सोच से बड़ा विजन, बड़ा संकल्प नहीँ बना सकता| शायद इसके अनेक कारणों में से एक कारण है हमारे चित्त की शून्यता जो पैदा होती है अपने इतिहास, अपनी परंपरा और अपनी जनता से बहुत दूर चले जाने से| बिना इस काव्य-विवेक, देशज प्रकृति और लोकधर्मी दृष्टि के कोई कवि सर्वसाधारण का कवि नहीं बन सकता | इसके लिए कवि को जनपद की पाठशाला तक की दूरी तय करनी होगी| वस्तुत: इसी सर्वहारा सोच से प्रस्तुत वेबपत्रिका की सभी कविताएँ उद्भूत हुई हैं जिसके केंद्र में वह लोक-हृदय है जो सृजन के लिए सदैव मुझे उद्वेलित करता रहा है , बाकी सोच-विचार सुधी पाठकों पर छोड़ता हूँ |
  •  हिन्दी की बहुत सारी प्रिंट पत्रिकाओं की तरह स्तरीय बेब-पत्रिकाएँ अंतर्जाल पर हिन्दी साहित्य को वैश्विक फलक और नया आयाम दे रही हैं और संभ्रांत-जन को इससे जोड़ रही है जहाँ से कविता के नये कल्ले के प्रस्फुटित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिये वेब-पत्रिकाओं के प्रति भी मेरा अंतर्मन से लगाव रहा है। इच्छा यही है कि मेरे अंदर सदैव वह लौ बची रहे जिसकी आँच में तपकर मैंने (शब्द सक्रिय हैं - ई पत्रिका की ) कविताएँ रची है, ताकि इस धरती पर अपने होने के अस्तित्व को महसूस कर सकूँ और अपने हृदय के एक कोने में दुनिया की उन शातिर प्रभृतियों से लड़ने का माद्दा बचाकर रख सकूँ जो दुनिया को आज नरक से भी बदतर बना देने पर आमादा हैं । अगर इन कविताओं की थोड़ी सी भी गरमी आप तक पहुँच सकी तो अपना श्रम सार्थक समझूँगा ।- सुशील कुमार , sk.dumka@gmail.com

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