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Saturday, October 6, 2012

15 हम-तुम

(अपने भूले - बिसरे साथियों को याद करते हुए )

हमारी आँखों में तुम थे तुम्हारी आँखों में हम
हमसब की आँखों में ढेर-सारे सपने थे

सपनों के सफेद पंख थे
मन का खुला बितान था
और कुलांचे भर उड़ने की उसमें चुलबुली इच्छाएँ
सोचना सब कुछ इतना आसान था कि
कुछ भी करने को उद्धत हो जाते थे हम एक-दूसरे की खातिर

जेबें खाली थीं अपनी पर हृदय संतोष से भरा था
फटेहाली कम न थी फिर भी मस्तमौला थे बावरे थे
और कई उलझनों के बावजूद लगभग निश्चिंत-से रहते थे

आज न तुम हो मेरे सामने , न हमारे वे सपने
लानतों से भरे सामान हैं, जेबें भरी-पूरी हैं अपनी
पर न रंग है कोई न जज्बा
न वह उमंग न उड़ान

अपने-अपने हिस्से का आकाश ढोते हुए
अपनी-अपनी दुनिया में कैद
एक ही मुहल्ले एक ही गली में
हम एक-दूसरे की पीठ बन गए हैं

सोचता हूँ आदमी बनने के गणित में
अपने जीवन का भूगोल कितना बदल लिया हमने |
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15 टिप्पणियाँ:

वन्दना said...

अपने-अपने हिस्से का आकाश ढोते हुए
अपनी-अपनी दुनिया में कैद
एक ही मुहल्ले एक ही गली में
हम एक-दूसरे की पीठ बन गए हैं

सोचता हूँ आदमी बनने के गणित में
अपने जीवन का भूगोल कितना बदल लिया हमने |

सच कहा

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, आपकी कोई कविता बहुत दिनों बाद मैं पढ़ पाया। यह कविता अपनी सहजता में असाधारण है। बधाई !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर रचना!
ईश्वर इन आँखों को सलामत रखे!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रचना!!

रचना दीक्षित said...

सोचता हूँ आदमी बनने के गणित में
अपने जीवन का भूगोल कितना बदल लिया हमने |

बेहतरीन प्रस्तुति.

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत ही सुंदर रचना |
नई पोस्ट:- वो औरत

रश्मि प्रभा... said...

सपनों के सफेद पंख थे
मन का खुला बितान था
और कुलांचे भर उड़ने की उसमें चुलबुली इच्छाएँ
सोचना सब कुछ इतना आसान था कि
कुछ भी करने को उद्धत हो जाते थे हम एक-दूसरे की खातिर....उन पंखों के साथ मन का खुला बितान आज भी चाह में है

Kishore Kumar Jain said...

एक अहसास जगाने में सक्षम है आपकी कविता। सचमुच में शब्द सक्रिय है जो अम आदमी की जेबें भी देख लेते हैं और सपने भी देख लेते हैं। बधाई। किशोर कुमार जैन गुवाहाटी असम

Reena Maurya said...

बेहतरीन भावाभिव्यक्ति..
:-)

सुशील कुमार said...

धन्यवाद आप सबों का |

रश्मि प्रभा... said...

http://vyakhyaa.blogspot.in/2012/10/blog-post_9.html

सुशील कुमार said...

dhanyavaad rashmi ji

Ila said...

सोचता हूँ आदमी बनने के गणित में
अपने जीवन का भूगोल कितना बदल लिया हमने |
सच कहा |
बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता !
सादर
इला

Yamuna Pathak said...

aadarneeya susheel sir
namaskar
aapkee rachanaaein hamesha padhatee hun.behad sahaj par bahut bhaavpurna hote hain.
shukriya

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