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Saturday, July 28, 2012

6 हृदय भी मेरा हाथ है




इस पन आकर मुझे
इलहाम हुआ कि
हृदय भी एक हाथ था मेरा
अरसे से मेरी पीठ से बँधा
फ़िजूल बंधनों से नधा
हृदय हां, अब भी
एक हाथ है मेरा
मुझ आँख के अंधे की
      लाठी
इस अंधेर दुनिया के भटकन में
और देखो, वह
बुला रहा है मुझे
और तुम्हें भी
उसकी आवाज़ गौ़र से सुनो
इस तन-तंबूरे में

कह रहा है कोई
सच्ची बात
हित की बात
ओह, सुनी तुमने
पहले कभी
इतनी भली बात !
उसकी टूटन
और नहीं सहूंगा
अक्षर-अक्षर
हृदय के कहन का
लोक लूंगा !
इस राह चलते
मन की डींगे
खूब सुनता आया हूं, अब
अपने हृदय को भी
हाँक लूंगा
इस यात्रा में
हां,..हृदय को भी
अपने साथ लूंगा।
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6 टिप्पणियाँ:

Satish Chandra Satyarthi said...

बहुत सुन्दर कविता...

Dr. Sudha Om Dhingra said...

सुन्दर कविता...

Suman said...

nice

Anonymous said...

स्वागत है |

PRAN SHARMA said...

ACHCHHEE KAVITA KE LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA . MERA EK
SHER SUNIYE -

SABKEE BAATEN SUNNE WAALE
APNE DIL KEE BAAT KABHEE SUN
TEREE KHAIR MNAANE WAALAA
TERA APNA HAI DIL PYAARE

सुशील कुमार said...

धन्यवाद आदरणीय प्राण साहब |

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

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