
मेरी बारी में
महुआ का यह पेड़
दिन-दिन सूखता जा रहा है
अब फल नहीं आते उस तरह
न ही गमक उसकी
फैल पाती
भीतर वाले घर - ओसारे तक
कंक-सा होता जा रहा है यह पेड़
तुम्हारे जाने के बाद
कहती है माँ
जब से सोनचिरैया
लापता हुई इस पेड़ से
यहां पहाड़ के
भूतों ने डेरा डाल दिया है
कौन देस चली गई
कि लौटने का नाम नहीं लेती ?



शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ |एक बहुत सुंदर सारगर्भित रचना पढ़ने को मिली आभार .......
bahut sundar rachana
विछोह का दुःख झेलना आसान नहीं. सुंदर प्रस्तुति.
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति....
सदर...
SUNDAR ! ATI SUNDAR !!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!!
एक प्रभावकारी और मन को छूने वाली कविता लगी आपकी…बधाई !
सुभाष नीरव