। । । कल सुनना मुझे । । ।

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15.10.11

महुआ





मेरी बारी में
महुआ का यह पेड़
दिन-दिन सूखता जा रहा है
अब फल नहीं आते उस तरह
न ही गमक उसकी
फैल पाती
भीतर वाले घर - ओसारे तक

कंक-सा होता जा रहा है यह पेड़
तुम्हारे जाने के बाद 

कहती है माँ
जब से सोनचिरैया 
लापता हुई इस पेड़ से
यहां पहाड़ के
भूतों ने डेरा डाल दिया है 

कौन देस चली गई 
सोनचिरैया संग तुम
कि लौटने का नाम नहीं लेती ?



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टिप्पणियाँ :

7 टिप्पणियाँ to “महुआ”

शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ |एक बहुत सुंदर सारगर्भित रचना पढ़ने को मिली आभार .......

Sunil Kumar said...
on 

bahut sundar rachana

वन्दना said...
on 

विछोह का दुःख झेलना आसान नहीं. सुंदर प्रस्तुति.

रचना दीक्षित said...
on 

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति....
सदर...

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...
on 

SUNDAR ! ATI SUNDAR !!

PRAN SHARMA said...
on 

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!!

Udan Tashtari said...
on 

एक प्रभावकारी और मन को छूने वाली कविता लगी आपकी…बधाई !
सुभाष नीरव

सुभाष नीरव said...
on 

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