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Monday, August 1, 2011

11 सुनना केवल तुम


गूगल : साभार 

सुनना केवल तुम
वह आवाज़
जो बज रही है
इस तन-तंबूरे में
स्वाँस के नगाड़े पर
प्रतिपल दिनरात
वहाँ लय भी है,
और ताल भी,..तो
जरुर वहाँ नृत्य भी
होगा और दृश्य भी ।

ओह, कितना शोर है
सबओर,
कितने कनफोड़ स्वर हैं
आवाज़ की इस दुनिया में
और कितनी बेआवाज़
हो रही है यहाँ मेरी
अपनी ही आवाज़ !

कहीं चीखें सुन रहा हूँ,
कहीं क्रंदन।
मशीनों के बीच घुमता हुआ
खुद एक मशीन हो गया हूँ
भीड़ का तमाशाई बन रहा हूँ कहीं
तो कभी तमाशबीन हो गया हूँ !

कम करो कोई बाहर की
इन कर्कश-बेसूरी आवाज़ों को...
अपने घर लौटने दो मुझे
सुनने दो आज
वह अनहद नाद
जन्म से ही मेरे भीतर
जो बज रहा है
मेरे सुने जाने की प्रतीक्षा में।

उसकी लय और ताल पर
मुझे झूमने दो
मुझे थोड़ी देर यूँ ही
स्वाँस-हिंडोला में
झूलने दो।
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11 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... said...

कम करो कोई बाहर की
इन कर्कश-बेसूरी आवाज़ों को...
अपने घर लौटने दो मुझे
सुनने दो आज
वह अनहद नाद
जन्म से ही मेरे भीतर
जो बज रहा है
मेरे सुने जाने की प्रतीक्षा में।
......अद्वितीय भाव ....

मीत said...

behad sunder likhi hai yeh rachna...
bhav itne sunder ban pade hain ki shabd nhi hai iski prshansa ke liye...
bahut khub sushil bhai..

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छे लगी यह कविता।

pran sharma said...

AAPKEE KAVITA MAN KO BHAA GAYEE HAI .

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, एक और आपकी उत्तम कविता… कहां सुन पाते हैं अपने भीतर की आवाज़… और यदि सुनना भी चाहें तो सुनने नहीं दी जाती… वह भीतर की हमारी आवाज़ हर पल, हर क्षण हमारे द्वारा सुने जाने की प्रतीक्षा में रहती है…

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

रचना दीक्षित said...

कहीं चीखें सुन रहा हूँ,
कहीं क्रंदन।
मशीनों के बीच घुमता हुआ
खुद एक मशीन हो गया हूँ
भीड़ का तमाशाई बन रहा हूँ कहीं
तो कभी तमाशबीन हो गया हूँ !

बहुत उत्कृष्ट कविता, अभिनन्दन.

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन रचना....

सागर said...

sunder rachna...

vidhya said...

बहुत अच्छे लगी यह कविता।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुनने दो आज
वह अनहद नाद
जन्म से ही मेरे भीतर
जो बज रहा है
मेरे सुने जाने की प्रतीक्षा में।

Bemisal Panktiyan...Bahut Sunder

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