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Saturday, June 4, 2011

8 कविता और बाज़ार


बाज़ार आदमी की
रोजमर्रा की जरूरतों से पैदा हुआ
और कविता मन के
एकांत में उठती
लहरों की उथल-पुथल से

फिर दोनो में जंग छिड़ गई

कविता की जगह खारिज करता हुआ
बाज़ार नित्य घुसता रहा
आदमी की चेतना में हौले-हौले
संचार के नूतन
तरीकों-तकनीकों को अपनाकर
भाषा की नई ताबिश में

ज्यादातर चुप रहकर
वह
ऐसी लिपि... ऐसी भाषा
के इज़ाद के जुटान में रहा
जो आदमी को फाँसकर उसे
केवल
एक ग्राहक-आदमी बना दे, तभी तो

उसके चौबारों घरों...
यहाँ तक कि बिस्तरों पर भी
टी. वी. स्क्रीनों के मार्फ़त
विज्ञापन की नई-नई चुहुलबाजियों के जरिये
रोज़ काबिज हो रहा

बहुत चालाकी से उसने
कविता के लिये
कवि-भेसधारी हिजड़ों की
फ़ौजें भी तैयार कर ली
जो बाज़ार की बोली बोल रहीं
विज्ञापन के रोज़ नये छंद रच रहीं
मंचों पर गोष्ठियों में
अपनी वाहवाही लूट रहीं और लोगों की
तालियाँ बटोर रहीं

पर बाज़ार को क्या मालूम कि
कविता अनगिनत उन
आदिमजातों की नसों में
लहु बन कर
दौड़ रही हैं
जो बाज़ार के खौफ़नाक़ इरादों से सावधान होकर
अधजले शब्दों की ढेर से
अनाहत शब्द चुन रहे हैं
और भाषा की रात के खिलाफ़
हृदय के पन्नों पर
नई कवितायें बुन रहे हैं


बस, पौ फटने की देर है
कि आदमी बाज़ार की साजिशों के विरुद्ध
कबीर की तरह लकुटी लिये जगह-जगह
इसी बाज़ार में खड़े मिलेंगे आपको
जिनके पीछे कवियों का कारवाँ होगा ।
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8 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार said...

• अनेक कवि विश्व बाज़ार से आक्रांत हैं और महानगरीय विद्रूपताओं वाली कैविताओं की भरमार है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

वाणी गीत said...

लाजवाब !

रचना दीक्षित said...

बाज़ार आदमी की
रोजमर्रा की जरूरतों से पैदा हुआ
और कविता मन के
एकांत में उठती
लहरों की उथल-पुथल से

बाज़ार का कविता के साथ तुलनात्मक अध्यन. अच्छा विषय लिया. धन्यबाद.

Babli said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब कविता!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जो बाज़ार के खौफ़नाक़ इरादों से सावधान होकर
अधजले शब्दों की ढेर से
अनाहत शब्द चुन रहे हैं
और भाषा की रात के खिलाफ़
हृदय के पन्नों पर
नई कवितायें बुन रहे हैं

कविता को नया आयाम देती सशक्त रचना

सुभाष नीरव said...

बाज़ार किस तरह आदमी के जीवन के हर कोने में सेंध लगा रहा है, यह हम अब समझने लगे हैं। उसने साहित्य और भाषा को भी नहीं बख्शा है। आपकी कविता में इसी चिंता की सटीक तर्जुबानी हुई है और एक कवि मन की ओर से इस बाज़ार को चेतावनी भी !

Anonymous said...

आज बाजारवाद सर्वत्र है. इसकी गिरफ्त में हर शय है ,कविता भी .
आपकी कविता में बाज़ारवाद के विरोध में विद्रोह का स्वर खूब उभरा है.
--- प्राण शर्मा

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