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Saturday, May 21, 2011

11 पहाड़िया

गूगल: साभार 
( साहेबगंज-पाकुड़ की पहाड़ी जिन्दगी से रु-ब-रु होकर )

दिन समेटकर उतरता है थका-माँदा बूढ़ा सूरज
पहाड़ के पीछे
अपने साथ वन-प्रांतरों की निःशेष होती गाथाएँ लिये
तमतमायी उसकी आँखों की ललाई पसर आती है
जंगलों से गुम हो रही हरियाली तक
दम तोड़ रही नदियों में फैल रहे रेतीले दयार तक
विलुप्त हो रहे पंछियों के नीड़ों तक

उँची-नीची पगडंडियों पर कुलेलती
लौटती है घर पहाड़न
टोकरी-भर महुआ
दिन की थकान
होठों पर वीरानियों से सनी कोई विदागीत लिये

उबड़-खाबड़ जंगल-झाड़ के रस्ते लौट आते हैं
बैल-बकरी, सुअर, कुत्ते, गायें भी दालान में
साँझ की उबासी लिये
साथ लौटता है पहाड़िया बगाल
निठल्ला अपने सिर पर ढेर-सा आसमान
और झोलीभर सपने लिये

-2-
घिर जाती है साँझ और गहरी
अंधरे के दस्तक के साथ ही
घर-ओसारे में उतर आते हैं महाजन
खटिया पर बैठ देर तक
गोल-गोल बतियाते हैं पहाड़िया से
हँसी-ठिठोली करते घूरते हैं पहाड़न को
फिर खोलते हैं भूतैल खाते-बहियाँ अपनी
और भुखमरी भरे जेठ में लिये गये उधार पर
बेतहाशा बढ़ रहे सूद का हिसाब पढ़ते हैं
दूध, महुआ, धान, बरबट्टी और बूटियों के दाम से
लेकर पिछली जंगल-कटनी तक की मजूरी घटाकर भी
कई माल-मवेशी बेच-बीकन कर भी
जब उरिन नहीं हो पाता पहाड़िया तो
गिरवी रख लते हैं महाजन
पहाड़न के चांदी के जेवर, हंसुली, कर्णफूल, बाले वगैरह..
तेज उसाँसें भरता अपने कलेजे में पहाड़िया
टिका देता है अपना माथा महाजन के पैर पर
तब महाजन देते हैं भरोसा
कोसते हैं निर्मोही समय को
वनदेवता से करते हैं कोप बरजने की दिखावटी प्रार्थनाएँ
अपनेपन का कराते हैं बोध पहाड़िया को
गलबहियाँ डाल महाजन साथ मिलकर दुःख बांटने का
और संग-संग पीते हैं 'हंडिया-दारू' भी
भात के हंडियों में सीझने तक,

फिर देते हैं, एक जरूरी सुझाव जल्दी उरिन होने का,
जंगल कटाई का -
फफक-फफककर असहमति में सिर हिलाता रो पड़ता है पहाड़िया
पहाड़न गुस्से से लाल हो बिफरती है
गरियाती है निगोड़े महाजन को
करमजले अपने मरद को भी
पर बेबस पहाड़िया
निकल पड़ता है माँझी-थान में खायी कसमें तोड़
हाथ में टांगी, आरा लिये निविड़ रात्रि में
भोजन-भात कर, गिदरा-गिदरी को सोता छोड़
पहाड़न से झगड़ कर
महाजन के साथ बीहड़ जंगल

-3-
रातभर दुःख में कसमसाती
अपने भीतर सपने टूटते देखती है पहाड़न
रात गिनती
मन की परत-परत गाँठें खोल पढती है पहाड़न
नशे में धुत्त पहाड़िया रातभर
पेड़ों के सीने पर चलाता है आरा, टांगी
और काटता रहता है अपने दुःखों के जंगल
बनमुरगे की कुट्टियाँ नोंचते
रहरह कर दारू, बीड़ी पीते
जगे रहते हैं संग-संग धींगड़े महाजन भी रातभर

-4-
शीशम, सागवान, साल की सिल्लियाँ लादे
जंगल से तराई की ओर बैलगाड़ियाँ पार कराते महाजन,
बिन दातुन-पानी किये, बासी भात और अपनी गिदरे
पीठ पर गठियाये महुआ बीनने पहाड़न,
मवेशियों को हाँक लगाता बगाल पहाड़िया
कब के उतर चुके होते हैं पहाड़ी ढलान !
बहुत सुबह, सूरज के उठान के काफी पेश्तर ही !!

खाली रहती है बहुधा पहाड़ी बस्तियाँ दिनभर
बचे रहते हैं पहाड़ पर सिर्फ़
सुनसान माँझी-थान में पहाड़ अगोरते वनदेवता
उधर पूरब में जलता-भुनता सूरज
और गेहों में लाचार कई वृद्ध-वृद्धाएँ ।
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11 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्तियाँ हैं!
--
चित्रगीत लिखने में आपका जवाब नहीं!

मनोज कुमार said...

अद्भुत!
सुंदर बिम्ब!
बहुत अच्छी रचना।

pran sharma said...

Aapkee kavitaayen padhnaa hameshaa hee sukhdaaee
rahaa hai . Aap prakriti ke anokhe chitaira hain .
Pahaadee jeewan par aapse badh kar kaun likh saktaa
hai ? Sabhee kavitaayen naye andaaz mein hain aur
man ko bharpoor chhootee hain .

सुभाष नीरव said...

पहाड़ी ज़िन्दगी से जुड़ी गहरी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति हुई है आपकी इस कविता में… एक चित्र सा भी खिंचता चला जाता है आंखों के आगे कविता को पढ़ते समय… यह विज्युलिटि रचनाओं में खास तौर पर कविताओं में हो तो वह और अधिक प्रभावकारी और सम्प्रेषणीय हो जाती है…

सुशील कुमार said...

धन्यवाद बड़े भाई प्राण शर्मा जी और सुभाष नीरव जी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
पढ़कर मन आनन्दित हो गया!

Babli said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है आपने! प्रशंग्सनीय प्रस्तुती!

Anonymous said...

ਸਖ਼ਤ ਮਿਹਨਤ ਨਾਲ ਟੁੱਟੀ ਤੇ ਹੰਭੀ ਪੇਂਡੂ ਪਹਾੜੀ ਜਿੰਦਗੀ ਦਾ ਮਾਰਮਿਕ ਚਿੱਤਰ ਪੇਸ਼ ਕਰਦੀ ਇਹ ਕਵਿਤਾ ਡੂੰਘੀ ਸੰਵੇਦਨਾ ਨਾਲ ਭਰੀ ਹੋਈ ਹੈ. ਇਹ ਵਿਡੰਬਨਾ ਹੈ ਕੀ ਇਹ ਲੋਕ ਸਦੀਆਂ ਤੋਂ ਇਸੇ ਤਰਾਂ ਜੀਵਨ ਨਿਰਬਾਹ ਕਦੇ ਆ ਰਹੇ ਹਨ. ਸੁਸ਼ੀਲ ਜੀ ਨੂੰ ਏਨੀ ਵਧੀਆ ਨਜ਼ਮ ਲਿਖਣ ਲਈ ਮੁਬਾਰਕ.
ਤਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ

रंजना said...

एकदम सटीक चित्र खींचा आपने....

बहती आँखों को रोकना मुश्किल हो रहा है अभी...

धनतंत्र की गुलामी में पहाड़ और पहाड़िया पुश्तों पुष्ट लगे रहेंगे...इनकी मुक्ति कभी संभव नहीं... चाहे कितने भी उलगुलान हो जाएँ...

Richa P Madhwani said...

http://shayaridays.blogspot.com

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

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