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Saturday, March 12, 2011

16 प्रथम नागरिक हैं पेड़ पृथ्वी पर

साभार गूगल 

ज्यों- ज्यों
ठंढी होती गयी पृथ्वी
त्यों-त्यों
पेड़ बसते गये वहाँ

पूरी धरती को पेड़ों ने
धीरे-धीरे
अपने अंक में भर लिया

उसने
धरती-यौवना -
पर्वत-उरोजों को चूमा
नदियों-घाटियों को
जी भर के प्यार किया

जब रजस्वला हो गयी पृथ्वी
और जलने लगी कामातुर हो तृषाग्नि में
तो वृक्षों ने उसकी कोख़ में
सब जगह
प्रेम के उपहार -
अपने वंश-बीज
गिरा दिये चुपके-से

इस तरह धरती से
अटूट संबंध बन गया पेड़ का
और धरती सौभाग्यवती हो गयी !

धरती ने अपने अंचल में फिर
असंख्य नवजात पौधों को जन्म दिया
जिन्हें पितृ-पेड़ों का आशीर्वाद मिला
और सारी धरती हरी-भरी...
जंगल-जंगल हो चली !

हमें विश्वास नहीं होता सहसा,
पेड़ के इतिहास से कि
समस्त प्राणियों का भार
वहन करने वाली धरती
टूट रही है धीरे-धीरे

इस भीषण दु:ख से कि
अपने अंचल में बसे
जिस प्रथम नागरिक--
"पेड़" का वरण किया उसने
उन अनगिन पेड़ों की
नित्य हत्याएँ होने लगी हैं
सृष्टि की सबसे सभ्य प्रजाति -
मनुष्य के द्वारा

और जंगल दिन-दिन
बिलाने लगे हैं
हरीतिमा मिटने लगी है
धीरे-धीरे

धरती स्वयं भी अपने को विधवा
महसूस करने लगी है शायद ।
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16 टिप्पणियाँ:

Sunil Kumar said...

इस तरह धरती से
अटूट संबंध बन गया पेड़ का
और धरती सौभाग्यवती हो गयी !
सुशील कुमार जी, अपने जो बृक्ष का धरती से सम्बन्ध व्यक्त किया है वास्तव में वह अदभुत है ऐसा तो सोचा ना था , बधाई

Babli said...

बहुत खूबसूरती से आपने बृक्ष का धरती से सम्बन्ध को प्रस्तुत किया है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

रश्मि प्रभा... said...

sunami kee tabahi ka zimmedaar manushya ki atript ikshayen hi to hain

रश्मि प्रभा... said...

yah kavita vatvriksh ke liye bhejen

Amarnath Prasad said...

kavita achchi hai...

मनोज कुमार said...

आपकी प्रकृति के प्रति चिंता मुखर होकर अपने पूरे आवेग के साथ कविता में व्यक्त हुई है।

रंजना said...

धरित्री की पीड़ा को अति सार्थक अभिव्यक्ति दी है आपने...
साधुवाद आपका....

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, बहुत ही सशक्त कविता… ऐसी कविता के लिए आपको सलाम ! धरती और पेड़ों के माध्यम से आपने जो दृश्य बांधा है, वह इतना सजीव है कि आपकी कलम को चूमने को मन करता है।
पुनश्च :
'अपने अंक में भर लिये' पंक्ति में 'लिये' के स्थान पर 'लिया' कर लें,'लिये' खल रहा है।

tarun said...

Hamari dharti swarg hai
par hum jaha rahte hai
banana chahte use nark hai
akhir kab tak chusoge
apne hi maa ka lahu
ab to aa jao hosh me
hame milta sub yahi hai.....
Tarun Sinha.(bahut achhi kavita hai apki)

रचना दीक्षित said...

और जंगल दिन-दिन
बिलाने लगे हैं
हरीतिमा मिटने लगी है
धीरे-धीरे

धरती स्वयं भी अपने को विधवा
महसूस करने लगी है शायद ।

प्रकृति संरक्षण आजकी जरूरत है. वर्ना विनाश की जो लीला देखने को मिलेगी वह अकल्पनीय होगी.

सुशील कुमार said...

आदरणीय सुभाष नीरव जी,
आपके सुझाव के अनुसार मैंने "लिये" को "लिया" के रूप में संशोधित कर लिया है।

गरिमा said...

अति सुन्दर, सजीव वर्णन

भाव इतने गहरे उतर गये कि और कुछ कहने के लिये शब्द नही मिल रहे हैं।

सदा said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम ...।

सुरेश यादव said...

प्रिय भाई सुशील कुमार जी ,आप निश्चित रूप से सशक्त रचनाकार हैं और इस कविता में भी रचना कौशल दिखाई दे रहा है .आप के भीतर की आग मुझे निरंतर प्रभावित करती रही है .इस कविता में पेड़ों से धरती का यह सम्बन्ध मुझे हज़म नहीं हो रहा है ,आखिर धरती तो पेड़ों की भी माँ होती हैं .पेड़ों को भी धरती ने पाला है .

सुशील कुमार said...

भावनाएँ हैं बस, कहने का अर्थ और ढंग ही तो कविताई है!भाई सुरेश यादव जी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!
--
होली में चेहरा हुआ, नीला, पीला-लाल।
श्यामल-गोरे गाल भी, हो गये लालम-लाल।१।

महके-चहके अंग हैं, उलझे-उलझे बाल।
होली के त्यौहार पर, बहकी-बहकी चाल।२।

हुलियारे करतें फिरें, चारों ओर धमाल।
होली के इस दिवस पर, हो न कोई बबाल।३।

कीचड़-कालिख छोड़कर, खेलो रंग-गुलाल।
टेसू से महका हुआ, रंग बसन्ती डाल।४।

--

रंगों के पर्व होली की सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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