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Sunday, September 20, 2009

7 बाँसलोय में बहत्तर ऋतु - भाग- २

साभार : गूगल 
[भाग-१ पिछले रविवार को प्रकाशित हुई थी।]

(२) दो-

नदी माँ, तुम्हारी ममता में
बहत्तर ऋतुओं को जिया है मैंने

देखता हूँ, तिल-तिल जलती हो
दिक्कुओं के पाप से तुम
दिन-दिन सूखती हो
क्षण-क्षण कुढ़ती हो निर्मोही महाजनों से
मन ही मन कोसती हो जंगल के सौदागरों को
रेत के घूँघट में मुँह ढाँप
रात-रात भर रोती हो

तुम्हारी जिन्दगी दुःख का पहाड़ है
सचमुच पहाड़ की छंदानुगामिनी हो तुम!
बूढ़े पहाड़ की तरह ही तुम्हें भी
शहर लीलता है हर साल थोड़ा-थोड़ा
इसीलिए इतनी बीहड़, उदास, कृशा हो तुम!

तुम्हारा जन्म
किसी हिमालय की गंगोत्री में नहीं,
पहाड़ी ढलानों में अनचाहे उग आये
बाँस की झुरमुटों से हुआ है
मुझे डर है,
आदिम सभ्यता की आखिरी निशानी
जोग रही हो
पर बचा नहीं पा रही अपनी अस्मिता तुम अब

सारे पत्ते गिराकर जंगल नंगे हो रहे हैं
दम तोड़ रहे हैं
पंछी अपने नीड़ छोड़ रहे हैं
नित तुम्हारा सर्वांग हरण हो रहा है
और मानवीय पशुता के बीच
गहरी उसांसें भरती हुई नित
मैली हो रही हो तुम ।

मुझे दुःख है कि,
अपनी छायाओं में फली-फूली
आदिम सभ्यता के मनोहर चित्र
रेत के वबंडरों से पाटती हुई
लोक-कथाओं में
तुम स्वयं एक दिन
किवदन्ती बनकर दर्ज हो जाओगी।
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7 टिप्पणियाँ:

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कविता.धन्यवाद

yehsilsila said...

दिक्कुओं की सभ्यता पर दम तोड़ती नदियाँ लोक-कथाओं का हिस्सा बनने को विवश हैं...इस मार्मिक कविता के लिये आभार।

सुभाष नीरव said...

भाई सुशील जी, नदियाँ अब नदियाँ कहाँ रही हैं। 'नदी' पढ़ते-सुनते ही जेहन में कलकल करती प्रवहमान जिस नदी का चित्र बनता है, वैसी नदियाँ या तो गन्दे नालों में परिवर्तित हो गई हैं या फिर लुप्तप्राय:। आपकी यह कविता एक संवेदनशील कवि के प्रकृति से प्रेमानुराग को व्यक्त करती है और जिस चिन्ता को रेखांकित करती है, उस पर यदि गंभीरता से न सोचा गया तो प्रकृति प्रदत्त एक एक सम्पदा किवदन्ती ही बनकर रह जाएगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। बहरहाल, एक सुन्दर कविता के लिए बधाई ! हाँ, एक बात और्। कविता के बीच के गैप को भी दिया करें। ये गैप न केवल कविता के अर्थों को बढ़ाते हैं अपितु पाठक को क्षण भर ठहरकर सोचने को भी विवश करते हैं।

सुशील कुमार said...

भाई सुभाष नीरव जी,मैं स्वयं कविता में गैप रखता हूँ।यहां भी रखा था पर पोस्ट होने पर वह गैप मिट गया।जब आपकी टिप्पणी पढ़ी तो उसमें फिर सुधार किया।याद दिलाने के लिये धन्यवाद।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

पहाड़ की छंदानुगामिनी हो तुम!
अभिनव शब्द - प्रयोग , प्रकृति का सामीप्य ,
जोग माया सी नदी के किवदंती बन कर रह जाने की व्यथा
ये सभी द्रष्टव्य बन पड़े हैं
आप की बस्तर व ग्राम्य अंचल से जुडी सभी कवितायेँ ,
बेहद सुन्दर हैं --
इसी तरह लिखते रहे ताकि, हम ,
भारत के असली चेहरे से अवगत हो पायें -
नव रात्र पर - जय माता दी !
- लावण्या

सुभाष नीरव said...

हाँ, अब कविता का रूप निखर आया है। कविता में इस गैप की बहुत अहमियत है।

सुरेश यादव said...

प्रिय सुशील जी,नदी के माद्ध्यम से जन मानस की उस पीडा को आप ने अभिव्यक्ति दी है जो नदी के संघर्ष और उसकी वेदना केसाथ एकाकार होकर निरंतर बह रही है.संवेदनशील कविताके दोनों भागों के लिए आप को बधाई.

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