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Sunday, August 23, 2009

8 यहाँ कभी बसंत नहीं आता

साभार : गूगल 
घर से बाज़ार तक बेतरतीब बिछे

सुन्दर, कागज के ये

रंग-बिरंगे फूलों के गुलदस्ते

और पॉलीथीन के गमले

बताते हैं कि भागमभाग इस दुनिया में

मन के किसी कोने,

सौंदर्य-प्रेम की अनुभूति

बची है अब भी जिसे

यादकर हम सिहरना चाहते हैं।


दौनी-निकौनी, खर-पतवार का झंझट नहीं,

न खाद, बीज और पानी ही डालना पड़ता है

धूप,हवा की भी ज़रुरत नहीं इन फूल-पत्तों को

और शयन-कक्षों से लेकर दुकानों तक को

सजाते हैं सगर्व हम इनके बगीचों से।


अच्छा तो लगता है यह सब पर

मन हरा-भरा आजकल नहीं रहता

न मन खिलता है न फूल

सुवास नहीं बिखरता अब

अंतस के आंगन में

बसंत कभी आता नहीं

मधुमक्खियाँ फूलों पर मँडराती नहीं

पंछी यहाँ आकर गाते नहीं

न बया अपने नीड़ बनाते

न हवाओं में डालियाँ ही झूलती हैं।

यंत्रवत् खड़े ये बगीचे

मन की बेकली नहीं हर पाते

न देख इन्हें हृदय ही हुलसता है कभी।
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8 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा और गहन अभिव्यक्ति!!

श्यामल सुमन said...

सचमुच अब हर जगह वसंत नहीं आता। कहीं कहीं इसे लाया जाता है।

आये ऋतुराज कैसे इजाजत बिना
राज दरबार पतझड़ का सजने लगा

अच्छी रचना जो सोचने को मजबूर करती है।

RAJNISH PARIHAR said...

सच में आजकल वसंत आता ही कहाँ है?....

संगीता पुरी said...

जहां चारो ओर कृत्रिमता हो .. वहां वसंत कैसे आ सकता है !!

अविनाश वाचस्पति said...

हमारे यहां चिडि़यां (गौरेया)
पहले आती थीं
अब आकर चहचहाती भी नहीं।

कृत्रिमता का चढ़ा आवरण है
मनमैटा हुआ सब पर्यावरण है

sandhyagupta said...
This comment has been removed by the author.
sandhyagupta said...

Sari hi chijen kritrim ho gayin hain,vastuen bhi aur sanvednayen bhi.

varsha said...

ek bachpan me kavita padhi thi-khoonti par tanga basant-plastic ke phoolon ka-uski yaad dila di.-Bhaut khoob!

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