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Sunday, August 9, 2009

4 मन-पाँखी

साभार : गूगल 
सोचता हूं कई दिनों से
तन)पिंजड़ में कैद इस पंछी
को मुक्त कर दूं...

उड़े यह स्वच्छंद आकाश...
पर पंख खोल उड़ना
इसने तो सीखा ही नहीं
फडा़फडा़ तो सकता है यह
पर उड़ नहीं सकता
पेड़ पर बैठ
दाना चुग नहीं सकता

इसकी बांहों में पंख नहीं उगे थे
जब इसे पेड़ के कोटर से
उतारा गया था।
मुझे संशय है
और दु:ख भी
कि अब यह पंछी ही न रहा
पंख इसकी बांहों में
एक निर्रथ सी चीज़ बन गयी है।

खुला आकाश,
चुमती हुई पहाड़ों की मेखलाएं
और घुमती हुई मेघमालाएं
जंगल के लहराते हरे सैलाब
क्षितिज तक कलकल दौड़ती नदियां
वृंदों में चहकना,
अनंत उछाह और आजा़दी
प्रेम- प्रसंग करना....
इनका इसे अनुभव नहीं।

इस अनुभवहीन पंछी का मैं
क्या करूं ? यह पिंजडा़
इसका घर है
और संसार भी।
* * * * *
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4 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा भाव!!

काश!! मुक्त करना हमारे बस में होता... तो!!!!

अविनाश वाचस्पति said...

मुझे तो ऐसा लगता है
मुक्ति यह मुक्ति नहीं
छुटकारा है
ऐसा छुटकारा
कहलाता है खुदकुशी
यानी आत्‍महत्‍या
पर आत्‍मा की हत्‍या
कर सका है कौन ?

तन की हत्‍या कर लो
मन की हत्‍या कर लो
पर आत्‍मा की हत्‍या
खुदखुशी से भी
बिसरा दो
पॉसीबल नॉट।

संगीता पुरी said...

गंभीर दर्शन से युक्‍त रचना .. निरीह पक्षी से भी अधिक अज्ञानी हैं हम .. यह हम समझ भी तो नहीं पाते कि हम पिंजडें में कैद हैं .. झूठ को सच समझकर जीए जा रहे हैं .. असली सुख से वंचित .. बहुत सुंदर लिखा है !!

sandhyagupta said...

Is kavita ko padh bahut pahle padha ek upanyas "Middlemarch"(George Eliot) yaad aa gaya.Karna to bahut kuch chahte hain par samaj dwara ek paridhi me bandh diye jate hain.Phir sara jeevan ek samjhauta matr hota hai.

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