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Sunday, May 31, 2009

15 ठूँठ होते पहाड़

साभार : गूगल 
जनतंत्र नहीं,... भीड़तंत्र के
सुबह की काली किरणें
समाज की मुख्य धारा से विच्छिन्न
अंतिम आदमी को
जोड़ने के बहाने अब
पहाड़ की आदिमजात बस्तियों में उतरती है
जहाँ पवित्र आत्माओं की खाल से
अपने चेहरे ढँककर
अपने सड़े कंधों पर गरजमंद
स्वयंसेवी संगठनों को ढोते हुए
विकास के गांधीवादी संस्करणों में
अपने को बदलने का नाटक करते
पहाड़ की भाषा में बोलते
पहाड़ियों के ढंग को ढोंग-से सहते हुए
भेड़िये -
अपने नुकीले पंजों से
पहाड़ की देह नोंचते हैं
और जंगल के हरे सैलाब
पंजीकृत मुहरों तले
उन दहानों तक ठेलते हैं
जिसे लपकने वहाँ
विकासदूतों की लंबी कतार
इंतजार में खड़ी रहती है।

पहाड़ की छाती पर
दर्जनों योजनाओं की कीलें ठोंकते
बजट और फाइलों के काले अक्षरों में
विकास का परचम लहराते
मुखौटे को भी
सुनसान माँझीथान* में पहाड़ अगोरते
वनदेवता चुपचाप सहते रहते हैं।

ठूँठ होते पहाड़ की
विरासत में अब बचा ही क्या है!
थिगड़ों में लिपटे
जंगल में मौत के ’आईस-पाईस’ का
खेल खेलते
पहाड़ियों का ठिंगना जीवन,
सूदखोर महाजनों के बिस्तरों पर
सपनों के पत्थर तोड़ती
उनसे अपने पेट साजतीं
पहाड़नों की करूण गाथाएँ,

अंधेरे गेहों में
बीमार, लाचार वृद्धाओं की दंतकथाओं मे
सपने बुनते नंगे पहाड़ी बच्चे,
उबासी में रंभाते माल-मवेशियों के अस्थि-पंजर
और पहाड़ की पतझड़-सी काया पर
घूमते रेतीले वबंडरों के छजनी
(इसके अलावे यहाँ बचा ही क्या है अब!)

मैं ठिठकता हूँ
पहाड़ के पक्ष में बने
कानून की धाराओं से
और, पूछता हूँ स्वयं से -
कि वन संरक्षण अधिनियमों के
दलदल में हाँफते पहाड़ के
सुख, स्वप्न और भविष्य क्या हैं ?

दिन-दिन लुप्तप्राय हो रही इन
जनजातियों के सच में
कोयला होते आँकड़ों का अभिप्राय क्या है ?
या समय की मुर्दागाड़ी में
लदकर संग्रहालयों में
सज जाने का कोई
चिर-प्रतीक्षित सपना है,

या, दुःखों के अंतहीन जंगल हैं
पहाडियाँ की आँखों में ?
क्या है ठूंठ होते पहाड़
के वंश-बीज में ?

मांझीथान* - पहाड़ियों के देवस्थल।
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15 टिप्पणियाँ:

neeshoo said...

bahut hi sundar rachna lagi aapki . such se ru-b-ru krvaya aapne .

Nirmla Kapila said...

aaj ke vikaas ke sach kaa sajeev chitran hai bahut bahut badhaai

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही जीवित.........यथार्थ कविता है सुशील जी..............पहाडों की वेदना को बाखूबी उतारा है आपने

दिलीप कवठेकर said...

आप के शब्दों में वेदना एक स्थाई भाव लिये हुए है, जो जीवन और यथार्थ के करीब है.

PRAN SHARMA said...

SUSHEEL KUMAR JEE,
AAPKEE LEKHNEE SE EK
AUR SASHAKT KAVITA.MEREE BADHAAEE
SWEEKAR KIJIYE.

अविनाश वाचस्पति said...

आंकड़ों की रोकड़
से लगती
पहाड़ को ठोकर
उस ठोकर को
ठोक दिया है
सुशील भाई ने
सच्‍चाईयों के पैने
तीखे नेजों से
बच्‍चों की आईस
पाईस से ठंडा
करते हुए बाखूबी।

रंजना said...

Bahut bahut bahut hi sundar likhte hain aap....

Prakriti aapke shabdon me sajeev hokar jaise apne dard bayan karne lagti hai....

Is sundar marmsparshi lekhan hetu sadhuwaad aapka.

Jayant Chaudhary said...

Sundar hai bahut sundar hai.

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व सामयिक रचना है।बधाई।

श्याम कोरी 'उदय' said...

... बेहद खूबसूरत रचना ... बहुत ही प्रभावशाली अभिव्यक्ति ... बधाईयाँ !!!!

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है! बहुत बढ़िया लगा!

sandhyagupta said...

Bhole-bhale pahadiya janjatiyon ko vikas ki daud me shamil karne ke bahane pahadon par pravesh karte ghuspaithiyon, unhe apne soshan tantra ke shikanjon me kaste dhongiyon ki pol kholti sushil kumar ki yah kavita bhi antar man ko gahraiyon se mathti hai.

सुशील कुमार said...

धन्यवाद, संध्या गुप्ता जी आपको इस सुन्दर टिप्पणी के लिये।--
सुशील कुमार

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी कविता है सुशील भाई
बधाई।

renu ahuja said...

ootma rachana
bdhaayee

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