। । । कल सुनना मुझे । । ।

c

Pages

19.4.09

मैं पहाड़ की बेटी

झरना ..ऽ..ऽ..
ओ झर... ना !
कल-कल तेरे जल में .
खूब नहाऊँगी

नदी माँ ....ऽ...ऽ... तू
रेत के घूँघट में
मुँह ढाँप मत रोना
तेरी भी बेटी हूँ
तू बह माँ !
तू बह ना !!...

जल से तेरे
आचमन करूँगी ।
लाल, पीले, बैगनी
अपनी आँचल में फूल
खिला माँ !
खिला ना ..ऽ..ऽ..

खोपा में खोसूँगी,
करधनी बनाऊँगी,
माँग सजाऊँगी,
ओ पतझड़ के
निदर्य बयार ....!
वन-उपवन के पत्ते
सब मत गिरा,
हरित-वर्ण से
घर-ओसारे में
भित्ति-चित्र बनाऊँगी।
ओ बसंत, लौट आ..ऽ..ऽ..
लौट आ ना...!

माँदल की थाप पर
पहाड़नों के दल बना
खूब नाचूँगी, ठुमकूँगी,
परब मनाऊँगी।


वनवासी ...
ओ वनवासी ...
बेल, बूटे
शीशम, महुआ
केंदु-पत्ते
बुरी नजर से बचा..ऽ..ऽ..,
वही अपनी थाती है !


हे पहाड़ जोगते वनदेवता !
बापू की तरह
बूढ़ा पहाड़
बहुत बीमार है
बड़े-बड़े घाव हैं,
बड़े-बड़े खोह हैं,
उसकी देह में।
उसे ढाढ़स देना,
मेघ देना, पानी देना,
खेत में अन्न उगाना,
जंगल बचाना
वनदेवता जंगल बचाना
दिक्कुओं के पाप
मत सहना

हे वनदेवी
पुकार मेरी सुनना!
महाजन से मेरी
देह बचाना
नदी-माँ की लाज बचाना !
पहाड़ की बेटी हूँ,
मेरी आर्त्त-विनती
सुन माँ !
ओ ... सुन ना..ऽ..ऽ..

टिप्पणियाँ :

37 टिप्पणियाँ to “मैं पहाड़ की बेटी”

आप पहाड़ी जन - जीवन का चित्रण करने में माहिर हैं सुशील भाई,गजब का लिखा है ! एक टोकरी बधाई देता हूँ।

Ashok said...
on 

nadee -pahaaD aur prakRuti ki khoobsoorat jhaanki hai

anshu said...
on 

प्रकृति और जीवन के सामंजस्य का उम्दा चित्रण...
शुभकामनायें.

Bhuwan said...
on 

पहाडी जन जीवन का प्रकृति के साथ तालमेल का अति सुदर चित्रण किया करते हैं आप... बहुत बढिया लिखा है ... बधाई।

संगीता पुरी said...
on 

बहुत,बहुत सुन्दर!

Dr. Amar Jyoti said...
on 

जल की कमी होती जा रही है.
जिसने प्रकृति के साथ कुछ समय बिताया हो उसे इस प्रकृति के अद्भुत रूप को अनुभव करने के बाद यह कविता और सुन्दर लगेगी .

सजीव चित्रण के लिये बधाई

अनुपम अग्रवाल said...
on 

सघन संवेदना समन्वित कविता। भाषा आपकी अपनी है।
* महेंद्रभटनागर

Dr. Mahendra Bhatnagar said...
on 

रचना मात्र नहीं, माटी की
गंध है यां....जो बची रही
तो सब कुछ बच सकता है.
=====================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Dr. Chandra Kumar Jain said...
on 

मैं वयोवृद्ध कवि महेन्द्र भटनागर जी का आभारी हूँ कि उन्होंने यहाँ भ्रमणकर मेरी कविता पढ़ी।- सुशील कुमार।

सुशील कुमार said...
on 

यह पूरे पहाड़ की व्यथा और दर्द समेटे पंक्तियाँ मात्र कविता नहीं-अनेको उन आंदोलनों की तरह एक संपूर्ण आंओलन है जो टिहरी में बहुगुणा जी आदि चला रहे हैं और हर पहाड़ प्रेमी एवं वासी की कराह सुनाई दे रही है.

अद्भुत अभिव्यक्ति!! बहुत बधाई. ऐसी रचना बिना अहसासे नहीं लिखी जा सकती.

Udan Tashtari said...
on 

मैं श्री समीर लाल ‘समीर’ (उड़नतश्तरी ब्लॉग के स्वामी) की टिप्पणी से अत्यंत प्रभावित हुआ। मैं उन जैसे गंभीर पाठकों का आभारी हूँ।

सुशील कुमार said...
on 

सुन्दर सी पहाडों जैसी भोली कविता
लिख डाली आपने मन मोहक कविता
बहूत खूब ........

दिगम्बर नासवा said...
on 

खूबसूरत…
बने रहें। शुभकामनाओं सहित

योगेंद्र कृष्णा Yogendra Krishna said...
on 

PRAKRITI PAR EK AUR SASHAKT KAVITA.
BADHAAEE HO SUSHIL JEE.

PRAN SHARMA said...
on 

This comment has been removed by the author.

सुशील कुमार said...
on 

श्री योगेन्द्र कृष्णा जी का पहली बार हमारे साईट पर पदार्पण हुआ है। मैं इनका गर्मजोशी से “अक्षर जब शब्द बनते हैं” की ओर से स्वागत करता हूँ।- सुशील कुमार।

सुशील कुमार said...
on 

pahadon ka hone ke karan bata sakta hoon ki apne kavita ke madhyam se sajeev chitran kiya hai...

...badhai !!

दर्पण साह "दर्शन" said...
on 

bahut hi behtreen likha hai ....bahut bahut badhhayi

अनिल कान्त : said...
on 

जीव को सजीव करती
ग्राम्‍य जीवन में रंग भरती
कविता अहसासों की है
भरती की नहीं
सुशील की कोई कविता ऐसी नहीं
जिसमें धरती और सुगंध बसती नहीं

अविनाश वाचस्पति said...
on 

श्री अनिल कांत जी का पहली बार हमारे साईट पर आगमन हुआ है। मैं इनका गर्मजोशी से “अक्षर जब शब्द बनते हैं” की ओर से स्वागत करता हूँ।- सुशील कुमार।

सुशील कुमार said...
on 

टिप्‍पणी मेरी न भाई हो भाई को
तो ठंडजोशी से ही कर लो स्‍वागत
वैसे भी यहां गर्मी बहुत है
पर कर तो लो
यह मत कहना कि
आप तो आते आते रहते हैं

अविनाश वाचस्पति said...
on 

आप मेरे ब्लाग-गुरु हैं अविनाश भाई । आप को भला कैसे नकार सकता हूं|

सुशील कुमार said...
on 

nice poem bhaiya.
Rishi

Anonymous said...
on 

पहाड़ी जन - जीवन का सुन्दर चित्रण

प्रदीप कांत said...
on 

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना!
आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...
on 

एक टीस को अनुभव किया आपकी इस रचना में एक बेचैनी सी का अहसास हुआ, बहुत पसंद आई आपकी रचना बहुत-बहुत बधाई...

Dr.Bhawna said...
on 
This comment has been removed by the author.
परमजीत बाली said...
on 

बढिया शब्द चित्रण किया है। बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

परमजीत बाली said...
on 

प्रकृति का अद्भुत वर्णन, साथ ही अनेकानेक सन्देश समेटे आपकी अद्भुत रचना का मैं तहे दिल से स्वागत करता है.

यह एक प्रकार का कवियों का प्रकृति संरक्षण हेतु आन्दोलन अर्थ मदांध लोगों के विरुद्ध है.

इस तरह के काव्यमय आन्दोलनों का पुरजोर समर्थन होना ही चाहिए.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

Mumukshh Ki Rachanain said...
on 

wah sushil bhai badhiya kavita hai.

Bahadur Patel said...
on 

वाह वाह क्या बात है! बहुत ही उन्दा लिखा है आपने !

Babli said...
on 

shabd nahi hain.... kafi sunder beb banaya hai aapne...bahut-bahut badhayi..

aapki kavitaaon ka kya kahna? jo bhi kaha jay taarif me vo kam hai..

जितेन्द्र कुमार said...
on 

गज़ब.

अब पृश्ठभूमी में कोई पहाडी राग में गाना हो जाये तो मज़ा आ जाय.

दिलीप कवठेकर said...
on 
This comment has been removed by the author.
sandhyagupta said...
on 

Bilkul taaza hawa ke jhonke si lagi aapki yah rachna.Mantramugdh sa kar diya.

sandhyagupta said...
on 

क्या इस चिन्ता का संचार कविता के बाहर कहीं नज़र आता है? उन अंधे-बहरे अपराधियों को कोई चिन्ता नहीं व्यापती जो प्रकृति को विकृत कर रहे हैं....

सुंदर रचना, व्याकुल अभिव्यक्ति...

अजित वडनेरकर said...
on 

kitna bada likhta hai be..........

Anonymous said...
on 

Post a Comment

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! कविताओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...