Blogger Widgets
नवीनतम पोस्ट -

Sunday, April 5, 2009

37 हृदय भी मेरा हाथ है

साभार : गूगल 
इस पन आकर मुझे
इलहाम हुआ कि
हृदय भी एक हाथ था मेरा
अरसे से मेरी पीठ से बँधा ,
फ़िजूल बंधनों से नधा हुआ।

हृदय हां, अब भी
एक हाथ है मेरा
मुझ आँख के अंधे की
लाठी
इस अंधेर दुनिया के भटकन में ।

और देखो, वह
बुला रहा है मुझे
और तुम्हें भी ।
उसकी आवाज़ गौ़र से सुनो
इस तन-तंबूरे में ।

कह रहा है कोई
सच्ची बात
हित की बात
ओह, सुनी तुमने
पहले कभी
इतनी भली बात !

उसकी टूटन
और नहीं सहूंगा,
अक्षर-अक्षर
हृदय के कहन का
लोक लूंगा !

इस राह चलते हुए
मन की डींगे
खूब सुनता आया हूं,..अब
अपने हृदय को भी
हाँक लूंगा
इस यात्रा में

हां,..हृदय को भी
अपने साथ लूंगा।
*******
Blogger Tricks

37 टिप्पणियाँ:

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

achchhi rachna hai.
- vijay

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

anshu said...

हृदय हां, अब भी
एक हाथ है मेरा
मुझ आँख के अंधे की
लाठी
इस अंधेर दुनिया के भटकन में ।
sach kaha aapane. jitana sundar blog banaya hai,utani hi gambhir kavitaa post ki hai.dhanyavaad.

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण।
बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन भाव-उम्दा रचना.

अविनाश वाचस्पति said...
This comment has been removed by the author.
अविनाश said...

इतनी गहरी सोच

इससे आगे तो

सोच भी हो जाती

है बंद कुंद बूंद।

Nirmla Kapila said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है बधाई

संगीता पुरी said...

सुंदर भाव ... बहुत अच्‍छी रचना।

पुरुषोत्तम कुमार said...

आपकी कविताएं नएपन का अहसास कराती है। सहज और सधे शब्दों के साथ संदेश देती हुई सी। अच्छा लगा पढ़कर।

सुशील कुमार said...

धन्यवाद श्री पुरुषोत्तम कुमार जी। आप कविता के पारखीहैंसुशील कुमार

PRAN SHARMA said...

Bhai Sushil jee,aapkee kavita khoob
hai!Ek-ek pankti man ko bhaa gayee
hai.Kavitayen yun hee aapke hriday
se nikaltee rahen aur yun hee hum
sabke hridayon par anand kaa ras
barsaatee rahen.

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह जी वाह बेहद रचना लिखी है बधाई हो आपको

अनुपम अग्रवाल said...

इस राह चलते हुए
मन की डींगे
खूब सुनता आया हूं,..अब
अपने हृदय को भी
हाँक लूंगा
इस यात्रा में

भावपूर्ण है यह मन की यात्रा.
सुन्दर अभिव्यक्ति

राज भाटिय़ा said...

अति सुंदर भाव लिये है आप की यह कविता. धन्यवाद

श्यामल सुमन said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Anonymous said...

आपकी यह कविता हमेम बताती है कि हमें मनमानी ही नही करनी चाहिये, हृदय की आवाज़ पर भी गौर करनी चाहिये। बहुत अच्छा। लिखते रहें।
--अशोक सिंह ,दुमका।

Dr.Bhawna said...

बहुत खुबसूरत भाव बहुत-बहुत बधाई...

Mumukshh Ki Rachanain said...

हृदय हां, अब भी
एक हाथ है मेरा
मुझ आँख के अंधे की
लाठी
इस अंधेर दुनिया के भटकन में ।

इतनी गहरी सोच,सहज और सधे शब्दों के साथ संदेश देती हुई सी।

अच्छा लगा पढ़कर।

Vidhu said...

sundar,,abhivyakti

सुशील कुमार छौक्कर said...

बेहतरीन रचना।

दिगम्बर नासवा said...

और देखो, वह
बुला रहा है मुझे
और तुम्हें भी ।
उसकी आवाज़ गौ़र से सुनो
इस तन-तंबूरे में

सुन्दर रचना,............बहुत खूब लिखा है

रंजना said...

Waah !! Anootha bimb prayog.....Bahut hi sundar kavita...man mugdh kar gayi...

Badhai..

सुशील कुमार said...

धन्यवाद रंजना जी। आपकी जैसे प्रबुद्ध पाठक प्रतिक्रिया मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती है।

अजित वडनेरकर said...

उत्तम रचना ...

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने .धन्यवाद

महावीर said...

सुशील जी
कविता की हर पंक्ति हृदय को छू गई।

इस राह चलते हुए
मन की डींगे
खूब सुनता आया हूं,..अब
अपने हृदय को भी
हाँक लूंगा
इस यात्रा में

हां,..हृदय को भी
अपने साथ लूंगा।

बहुत सुंदर पंक्तियां है।

सुशील कुमार said...

आदरणीय श्री महावीर शर्मा जी,आपका मेरे साईट पर आना मुझे बहुत अच्छा लगा।-

Dr.Bhawna said...
This comment has been removed by the author.
Dr.Bhawna said...

एकदम सटीक रचना बहुत-बहुत बधाई...

neera said...

yah haath un dono haathon se kitnaa behtar Hai!

APURVYA said...

Aapki rachnayan hirdya ko sparsh karti hai. Meri anant shubhkamnayan swikar karan. Dhanyabad.
Dr. U.S.Anand, Dumka.

sandhyagupta said...

Bahut gehri baat kahi aapne is kavita ke dwara.Sanvedna aur karm ka samanvit darshan.Badhai.

Harkirat Haqeer said...

इस पन आकर मुझे
इल्हाम हुआ कि
ह्रदय भी इक हाथ था मेरा
अरसे से मेरी पीठ में बंधा
फिजूल बन्धनों से नधा हुआ

सुशिल जी बहुत सुन्दर कल्पना ...!1

बेहतरीन भाव...बधाई...!!

SUNIL KUMAR SONU said...

न राग मुझमे है न उमंग मुझमे है .
बस कुछ मीठी यादें की तरंग मुझमे है.
तनहा हूँ ये कैसे स्वीकार कर लूँ
ज़िन्दगी की हजारों जंग मुझमे है

नहीं मालूम किस तरह आपकी शुक्रिया अदा करू.
आप हमेशा खुश रहो ये सदा मै दुआ करूँ

Babli said...

आप का ब्लोग मुझे बहुत अच्छा लगा और आपने बहुत ही सुन्दर लिखा है !

T-POINT (टर्निंग पाईंट) said...

अच्छा काम हुआ है ! आप और आप के सभी सहयोगियों को बधाई !

टिप्पणी-प्रकोष्ठ में आपका स्वागत है! रचनाओं पर आपकी गंभीर और समालोचनात्मक टिप्पणियाँ मुझे बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देती हैं। अत: कृप्या बेबाक़ी से अपनी राय रखें...

हाल की रचनाओं के लिंक -

हिन्दयुग्म - वार्षिकोत्सव- 2010 >>

- हिन्द युग्म के सौजन्य से राजेन्द्र भवन सभागार, नई दिल्ली-01 में सुशील कुमार के काव्य-संग्रह "तुम्हारे शब्दों से अलग" का विमोचन दि. 05 मार्च, 2011 को हुआ ।