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Sunday, March 29, 2009

33 पहाड़ी नदी के बारे में

साभार गूगल


अपनी बाँहों में
कलसियाँ
होठों पर
वीरानियों से सनी
घिर आयी साँझ की
कोई विदागीत
गुनगुनाती पहाड़न
उस बूढ़ी नदी के
सीने पर
छोटी-छोटी
कटोरियाँ
बनाती है
रेत से
रेत को
अलग करके

क्षण में उस वृद्धा के
विलाप से
कटोरियों का तल
पसीज जाता है
और अँजुरी समाने भर
पारभासी नीर
पात्र में
थिराने लगता है

पहाड़न
उलीच-उलीच कर उसे
वियोगिनी नदी माता के
आँचल में
डाल देती है
यज्ञ के अनल-कुंड में
पूजित भाव से प्रक्षेपित
हव्य की तरह

तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है

पहाड़ की मिट्टी से बनी
कलसियों में
पहाड़ का दुःख
नदी का ममत्व भरकर
विरह की कोई पहाड़ी गीत
फिर गुनगुनाती,
अंधेरे होते
अपने गेहों को
लौटती पहाड़न के
पदचाप
और स्वर
तब सिर्फ़
नदी और पहाड़ ही
सुन पाते हैं
उस सुनसान उजाड़ दयार में
*******************
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33 टिप्पणियाँ:

शोभा said...

तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर
वाह !बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई। होने लगता है

दिगम्बर नासवा said...

अंधेरे होते
अपने गेहों को
लौटती पहाड़न के
पदचाप
और स्वर
तब सिर्फ़
नदी और पहाड़ ही
सुन पाते हैं
उस सुनसान उजाड़ दयार में

बहुत सुन्दर.........
गहरा अर्थ लिए हुवे है आपकी कविता, पहाडों का दर्द समेटे

Ashok said...

पहाड़ी नदियों के सूख जाने के बाद वहां पानी की घोर किल्लत हो जाती हैं। बलुयाही नदी में गड्ढ़े करके पानी निकालना पड़ता है। इस मानवीय क्रिया का जीवंत चित्रण हुआ है सुशील जी की इस कविता में। बधाई इस सुन्दर कविता के लिये ।

Dileepraaj Nagpal said...

Kavita Shaandaar Hai Per Mujhe isse Pahle Ki Kavita Bahut Zyada Pasand Aayi. Badhayi

anshu said...

पहाड़ी नदी और उससे जुड़े दर्द का सशक्त चित्रण।

सुशील कुमार said...

धन्यवाद शोभा जी,दिगम्बर नासवा जी और अशोक सिंह जी ।

सुशील कुमार said...

दिलीप राजपाल जी हमारे नये पाठक हैं और इसलिये मेरे मेहमान हैं \मैं आपका खैरमक़दम करता हूं इस साईट पर।

M.A.Sharma "सेहर" said...

शुशील जी

आखिरी कुछ पंक्तियाँ बहुत ही खूबसूरती से लिखी गई हैं
पहाड़ों के तरह स्वच्छ,निर्मल,सादगी लिए हुवे

सादर !!

अविनाश वाचस्पति said...

कविता में आप
अक्षरों से शब्‍द
शब्‍दों से कविता
और कविता से
भावों के पहाड़
हाड़ तोड़ती पहाडि़न
की रेत के साथ
तकधिन धिनतक
करा देते हो गोचर
और उद्वेलित करते
हो विचारों को
मन को, पाते हो
सफलता संप्रेषण में।

सुभाष नीरव said...

गहन अर्थ समेटे आपकी यह कविता अपना प्रभाव छोड़ने में समर्थ है। इस सुन्दर कविता के लिए बधाई !

सुशील कुमार said...

धन्यवाद,आदरणीय सुभाष नीरव जी। आपने मेरे साईट पर आकर मेरा हौसला आफ़जाई किया,इसके लिये आभारी हूँ।

सुशील कुमार said...

आदरणीय अविनाश भाई और एम ए शर्मा “सेहर” जी को भी धन्यवाद। अविनाश बाबू की टिप्पणी काफ़ी उम्दा है।

मोहन वशिष्‍ठ said...

तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है

वाह जी वाह बहुत बेहतरीन कविता लिखी है और ब्‍लाग भी बहुत खूबसूरत बनाया है आपने आज शायद पहली बार आया हूं अब तो आना जाना लगा रहेगा

SWAPN said...

sushil ji aapke aamantran par maine aapki site par aapki kavita padhi , sunder kavita, padhkar achcha laga.
badhai.

mere blog par,www. swapnyogesh.blogspot.com.

par aap amantrit hain.

सहज साहित्य said...

इस कविता में बिम्ब का सौन्दर्य अत्यन्त सहज एवं प्रभावी है ।

संगीता पुरी said...

badhiya bhav ke sath hi sath sunder prastutikaran bhi hai ... bahut achchha laga.

PRAN SHARMA said...

"PAHAADEE NADEE KE BARE MEIN" KAVITA PADHKAR BAHUT ACHCHHA
LAGAA HAI.AAP PRAKRITI KE
SAATH-SAATH MANVIY SUKH-DUKH
KAA SAJEEV CHITRAN KARNE MEIN
DAKSH HAIN.

neera said...

ati sunder !

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ख़ूब!

Manoshi said...

वाह!

Vijay Kumar Sappatti said...

susheel ji,

maaf kare, kaam ki adhiktha ki vajah se aapke site par aa nahi saka ..

ye nazm padhkar main bahut der tak shaant baitha hoon ..

kya kahun .. koi shabd nahi hai .. in fact aapne itni sashakt kavita likhi hai ki ..i am just speechless..

well. aap guru ho , mera salaam hai aapki lekhni ko ..

mujhe intjaar rahenga .aapki kavitao ka ..
aapka
vijay

प्रदीप कांत said...

तब स्नेहिल
वात्सल्य का
स्वच्छ
पारदर्शी
प्रशांत जल
पात्र में
ठहरने लगता है और
पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है

!!!!!!!!!

Sundar chitran

Nirmla Kapila said...

pahadi nadi ke dard ki sahaj aur satya abhivyakti ka sunder chitaran kya hai badhai

Dr.Bhawna said...

bahut sundar rachna...bahut2 badhai...

दिव्यांशु शर्मा said...

बहुत उम्दा शुशील भाई ...
"पहाड़न का रूप,
नदी का अर्थ उसमें
गोचर होने लगता है "....
बहुत सशक्त पंक्तियाँ हैं | चित्र बहुत सुन्दर बन पड़ा है .... पाठक, कविता पढने के काफी देर बाद तक पहाड़न को जाते हुए दूर तक देखता है और उस की अवचेतना में अंजुलियों से पानी में हुआ शब्द गूंजता रहता है ...
पता नहीं क्यूँ पर मुझे अन्दर कहीं कुछ याद दिला गयी ये कविता .. क्या? मैं अब तक सोच रहा हूँ ... :-)

सुशील कुमार said...

Partap Sehgal partapsehgal@gmail.com 12:54 pm to sk.dumka@gmail.com
date Mar 30, 2009 12:54 PM
subject Re: [नई पोस्ट देंखे-लिंक नीचे] नई पोस्ट - पहाड़ी नदी के बारे में
mailed-by gmail.com

Priye Sushil ji,

Aapki site par jakar appke baare mein janane ka ek awasar mila. kuchh
padha kuchh aur padhunga. tab vistaar se kuchh likhunga.

PARTAP SEHGAL

kiran rajpurohit nitila said...

Shushil sa
chanchalta ki kalkal me paharan ka roop ukerti kavita ne Shivani ki kathaon ki yaad dila di.

Kiran Rajpurohit Nitila

sandhyagupta said...

Sanvedansheel yuva kavi Sushil Kumar ne pahadi jan jeevan ko atyant karib se dekha aur mahsoos kiya hai.Pahadi jeevan ki ek-ek bhav bhangima unke shabd chitron me jeevant hui hai.Yah kavita bhi iski misal hai.

सुशील कुमार said...

आदरणीय संध्या गुप्ता जी।
आपकी टिप्पणी मुझे बहुत इसलिये भायी क्योंकि आप भी संताल परगना के पहाड़ी क्षेत्र के जनजीवन और आबहबा से उतनी ही वाकिफ़ हैं। धन्यवाद आपको महत्वपूर्ण टिप्प्णी के लिये।

सुशील कुमार said...

आदरणीय प्राण शर्मा जी को भी धन्यवाद।

mohit sharma said...

man ki atisundar aur nirbaadh abhiwaykti hai ye kawita, meri taraf se bahut bahut badhayi.

mohit sharma said...

Man ki sundar aur nirbaadh abhiwyakti hai ye kawita, meri taraf se badhayi.

Arshad Khan said...

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