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Sunday, March 22, 2009

32 अधूरी शब्दयात्राएँ

साभार गूगल 

सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे
देखता हूँ रंग-बिरंगे कपडे़ और सज-धज
जमाने के साथ रोज़ करवट लेते फैशन और रिवाजें
पर देख नहीं पाता इनमें छिपी हुई दुष्टताएँ,
प्रेम की वासनाएँ, लालच और रोष...
टुकडे़-टुकड़े में देखता हूँ
जीवन के सच-झूठ, सपने और भविष्य
मगर एकबारगी नहीं देख पाता कभी इन्हें
जिस भी ज़मीन पर खडा़ होता हूँ
नहीं दिखाई देती वहाँ से पूरी की पूरी दुनिया
आंखों में पड़ते छाले भी कभी
ये आँखें खुद नहीं देख पातीं
न मन में चुपके-चुपके जड़ें जमा रहीं
निकम्मे खरूँस देवताओं की काली
करतूतें ही दीखती हैं
जितनी दीखती है, उनमें
नायाब ही रह जाते हैं
अनुभव की अनगिन तारें...
स्पंदन, स्वप्न, सूत्र और आकांक्षाएँ
अधूरे रह जाते हैं...
आँख बनते हुए हाथ
अपनी कुलांचे भरती अनंत इच्छाएँ...
कविताओं में पूरी होती
शब्दयात्राएँ।
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32 टिप्पणियाँ:

"अर्श" said...

badhiya abhibyakti....


arsh

सुशील कुमार छौक्कर said...

सच कविताओं में ही पूरी होती है शब्दय़ात्राएँ।

सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे

बहुत बेहतरीन। काफी दिनों के बाद पढी है आपकी रचना।

PRAN SHARMA said...

SUSHEEL KUMAR KEE LEKHNI SE EK AUR
SASHAKT RACHNA.KITNA SATYA CHHIPAA
HAI IN PANKTIYON MEIN--
AANKHON MEIN PADTE CHHALE BHEE
KABHEE YE AANKHEN KHUD NAHIN
NAHIN DEKH PAATEE.
YAHEE JEEVAN HAI,YAHEE SANSAR
HAI.BAHUT KHOOB.BADHAAEE

सुशील कुमार said...

धन्यवाद प्राण शर्मा जी। आप इतनी गंभीरता से मुझे पढ़ते हैं,इसका गर्व है मुझे।

दिगम्बर नासवा said...

Susheel ji
सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे

बेहतरीन, Ek bahoot hi shandaar rachna, anubhav ke saath saath paki huyee rachna

anshu said...

वाह भाई ,क्या कविता लिखी है। आदमी के भीतर के बुराई को उघाड़ कर रख दिया है आपने। बधाई।

Ashok said...

एक गंभीर रचना। धन्यवाद। दुमका कब आ रहे हैं?

Ashok said...

एक गंभीर रचना। धन्यवाद। दुमका कब आ रहे हैं?

अविनाश वाचस्पति said...

शब्‍द कभी अधूरे नहीं होते
अधूरे रहते हैं अनुभव
न हो ऐसा अनुभव
छिपा जिसमें हो पराभव
ऐसा संभव नहीं है
बिना दुष्‍टता के शिष्‍टता का
और बुराई के अच्‍छाई का
तथा गरीबी के अमीरी का
कोई तत्‍व नहीं है
इसलिए अधूरा कोई शब्‍द नहीं है।

शोभा said...

सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे
देखता हूँ रंग-बिरंगे कपडे़ और सज-धज
जमाने के साथ रोज़ करवट लेते फैशन और रिवाजें
पर देख नहीं पाता इनमें छिपी हुई दुष्टताएँ,
प्रेम की वासनाएँ, लालच और रोष...

waah waah

अरविन्द श्रीवास्तव said...

naye aavaran hetu badhai, kal sbere 4-5 dino k liye patna or bokaro ja raha hoon, fir aa k....

अनुपम अग्रवाल said...

स्पंदन, स्वप्न, सूत्र और आकांक्षाएँ
अधूरे रह जाते हैं...
आँख बनते हुए हाथ
अपनी कुलांचे भरती अनंत इच्छाएँ...
कविताओं में पूरी होती
शब्दयात्राएँ।
और पूरी होती अभिलाषायेँ
जब कवितायेँ खुद बन
जाती हैँ मात्रायेँ ...

Harkirat Haqeer said...

सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे....

bhot gahri rachna ytharth ko chuti hui...!!

vijay gaur/विजय गौड़ said...

सुंदर कविता है भाई। आपके ब्लाग पर पहले भी आता रहा हूं।

Anonymous said...

Rekha Maitra rekha.maitra@gmail.com Sun, Mar 22, 2009 at 7:56 PM
To: hindi-readers+owner@googlegroups.com

apkee chand kavitayen pareen. yoon to sabhee kavitayen hridaysparshee hein ,par mahuye walee kavita or pahar par ugee bhor marmsparshee hai. Badhaee!!!!!

अखिलेश्‍वर पांडेय said...

अति सुंदर,
आपकी कविता प्रभावित करती है। शुभकामना।

श्यामल सुमन said...

बहुत खूब। कहते हैं कि-

मन दर्पण को जब जब देखा उलझ गईं खुद की तस्वीरें।
चेहरे पे चेहरे का अन्तर याद दिलाती ये तस्वीरें।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Harshad Jangla said...

Susheelbhai
Very nice poem.
Can u tell me the meaning of 'Kulanche" plz?
Thanx.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

सुशील कुमार said...

हर्शद भाई,नमस्कार।
“कुलांचे” का अर्थ होता है- चौकड़ी, छ्लांग या उछाल।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सच्ची बात कही आपने ..अच्छी लगी आपकी कविता
कविताओं में पूरी होती
शब्दयात्राएँ।

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर रचना ... हमेशा की तरह ही सुंदर अभिव्‍यक्ति।

Anonymous said...

Alvis alvis@bigpond.net.au hide details 2:55 pm (2.5 hours ago)
to ????? ????? sk.dumka@gmail.com
date Mar 23, 2009 2:55 PM
Dear Suhshil Ji ,

Thanks for forwarding yr poetry.

It was nice to read.

Pls keep in touch.

Thanks & Regards,

Abbas Raza Alvi

रंजना said...

पीडा को अत्यंत सुन्दर और प्रभावी ढंग से आपने शब्द दिया है....
रचना बहुत ही सुन्दर बन पड़ी है...ऐसे ही लिखते रहें,शुभकामनाये....

Dr.Bhawna said...

सैकड़ों चहरे देखता हूँ भीड़ में
सड़कों पर आते-जाते
पर देख नहीं पाता कभी
चेहरों के पीछे लगे चेहरे

बहुत सुंदर भाव ...दिल को छू देने वाली अभिव्यक्ति...

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर, आप ने पीडा को एक रुप दे दिया.... एक सचाई ...लिख दी आप ने इस इंसानो के जंगल की.
धन्यवाद

Mumukshh Ki Rachanain said...

बहुत सच्ची बात कही आपने ..अच्छी लगी आपकी कविता
ऐसे ही लिखते रहें,शुभकामनाये....

Bhor ka Tara said...
This comment has been removed by the author.
sandhyagupta said...

Kavitaon me hi puri hoti hain shabdyatrayen.vastvik jeevan me iska tartamya tutta hi ja raha hai.Ek aur sargarvit rachna ke liye badhai swikaren.

Anonymous said...

Rekha Maitra rekha.maitra@gmail.com to hindi-readers+.
Mar 30, 2009 4:27 AM
adhooree shabd yatrayen ek sundar kavita ban paree hei.

Shaifaly)Naayika) said...

Chahe ham kuchh bhi likh le lekin Kavitao ka jadu kuchh alag hi hota hai!! Sundar Abhivyakti

Shaifaly

Babli said...

बहुत बढिया!! इसी तरह से लिखते रहिए !

Suman said...

nice

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