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Friday, February 27, 2009

4 पहाड़ पर भोर

साभार - गूगल 

सुबह घर से निकला तो
गुलाब के रंगों पर चटक देखी
और ओस की नन्हीं मोतियों पर आब,
उस पर फिर टघरते
सुबह को अपनी आँखें मलते और
दिन को धीरे-धीरे उठते देखा।

आदिवासी कलूटों के झोपडि़यों से
कोई अपना बस्ता बगोचे
पाँच मील पर स्कूल की पहली घंटी
पकड़ने भागते तो कोई
अपनी गैया-बकरियाँ हँकाते।

छोरों के चेहरों पर
तंग होती मुस्कुराहटों के बीच
कपूर की तरह उड़ते उसके रंग,
उसकी मंद पड़ती चहक देखी।

सड़क पर हल्की धूप में गरमाते
सुकोमल बदनों पर
समय की उघरती खराँचे भी देखी।

फिर पहाड़ी औरतों के सिर पर
दतुवन-घास का बोझा...
उसके हिलते माथ और सुर्ख होंठों की
कँपकपाहटों को..
उसके ढ़लते यौवन में गुम होते श्रृंगार और
सिसकारियों की भाषा में पढ़ी
और तब आँखें अपनी भी
कुछ सोचकर नम हो गयीं!

कोसों साइकिलों के आगे -पीछे
लकड़ियों के मन-मन भारी गठ्ठर बाँधे
हाँफते-धकेलते पैदल चल रहे पहड़ियों
के फटे बिवाईयों के घाव
से बह्ता मवाद देखा तो
कलेजा मुँह को आ गया और फिर
गुस्सा भी कि ...
पूरे पहाड़ को जब धीरे-धीरे बिला ही
जाना है तो गुलाब की चटक
और फूलते महुआ की खुमारी
का मतलब क्या है यहाँ ? फिर भी..


आँखों में लहराते उमंगों की मोतियों के बीच
उन चेहरों पर अनगिन नम झुर्रियों में
घर-संसार-पेट की फँसी चिंतायें
खुली आँखों से पढ़ता रहा
और अपनी ऊब और तमक़ से
अपने हाथ सिर्फ़ मलता रहा।

फिर...पहाड़ पर लड़ते साँढ़ों को देखकर
आँखों में काँटे सी चुभन होने लगी
अधखिले चेहरों पर छाँह की काली होती चतें
और होंठों पर पड़ती पपड़ियों ने
मेरे सपने के रंग सब बदरंग कर दिये।

आप मानें या न मानें,
इतनी गरमी पड़ रही है
इस भोरउवा पहर में भी
मेरे अंदर
और इस पहाड़ पर भी कि
कि ओस जमती ही नहीं कहीं अब -
न फूल पर न पत्थर पर न जंगल में

हृदय में बजता है सिर्फ़ रेगिस्तान का सुनापन
जो टूटता है लौह-पत्थरों से भरी
मालगाड़ियों के घर्घराहटों से जब -तब।

बाहर की उदासी मन को
चीरती हुई धँसी जाती है भीतर के खोह में और
पूरा पहाड़ इस भोर में
दु:ख का पठार सा नज़र आता है।

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4 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर लगी आपकी यह रचना ...

sandhyagupta said...

Ek sundar bhor.. aasha aur umangon ki kirne kulanche bharti.. antata yatharth ke pathar se takrakar chur-chur hoti..

Jeevan ki vidrup sachchaiyon ko abhivyakt karti is kavita ke liye badhai.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

क्या दृश्य खीन्चा है
भई वाह

Bahadur Patel said...

आपको और आपके परिवार को होली मुबारक

bahut achchhi kavita hai.

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