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Thursday, January 1, 2009

9 जनतंत्र एक डैश है


सफ़हे पे दर्ज

दो ईस्वीसनों के बीच छोटी लकीर की तरह

पर आँख से एकदम ओझल

यह जनतंत्र

जन और तंत्र के बीच का

सिर्फ़ एक डैश ( - ) है

(जो समझो उसके पहिये की कील है)

जिसे जनगण ने उस आदमीनुमा जंतु के हवाले कर दिया है

जो सियार और सांप की हाईब्रीड से

इंसानी मादा की कोख का इस्तेमाल कर पैदा हुआ है

और घूमा रहा है जनतंत्र का पहिया

लगातार उल्टा-पुल्टा, आगे के बजाय पीछे

पर भूख की जगह भाषा पर छिड़ी बहस में जुटे लोग

डैने ताने अपने को फुलाये बैठे हैं कि

उनका लोकतंत्र सरपट दौड़ रहा है

गंतव्य की ओर।


- 2 -
डैश पर टांगें फैलाये बैठा

पूरे तंत्र का तमाशागर यह जंतु

जनता की बोटियों के खुराक़ पर

ज़िन्दा रहता है

लूटता है उनके वोटों को

घुस आता है सरकार की धमनियों में

वायरस बनकर और

डैश को लंबा करने की

हर मिनट

बहत्तर शातिर चालें चलता है ।


- 3 -
जज़्ब हो जाना चाहता है

जनता के वीर्य में, कोख़ में ;

अपने जैसे संततियों की

पंक्तियाँ खड़ी करना चाहता है

जनतंत्र के पथ पर

और बचाये रखना चाहता है हर हाल में

डैश का बजूद ।


- 4 -
जनता की नींद में

वर्दियों के घेरे में

तमंचों के साये में

कानून की आड़ में

अब पूरे सूरक्षित हो गया है वह ।


- 5 -
जनता तो

मालगोदामों में एक पर एक लदी

चुप्पियों से भरी बोरियों का

जैसे छतें छूती असंख्य ढ़ेर हैं

जिस पर तंत्र का कड़ा पहरा है

और हिलना - डुलना मना है ।


- 6 -
सरकार से बंधी उसकी आशाएं

सड़कों पर धूल चाट रही हैं

अपनी ही भीड़ के रेल-पेल में

मंचासीन दुभाषिये आदमीनुमा जंतु के

कनफोड़ भाषणों की गहमागहमी के बीच ।


- 7-
बदलाव की उम्मीद में

जनता बेसब्री से

उलटती है सुबह के अखबार

पर हिंस्त्र जानवरों के बढ़ रहे नाख़ून

की खबरें अहसास दिलाती है उसे

जन और तंत्र के मध्य हर दिन

(लंबे) खींच रहे डैश का ।
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9 टिप्पणियाँ:

जितेन्द्र कुमार said...

सबसे पहले तो मैं नव वर्ष की बधाई के साथ-साथ इतनी खुबसुरत वेबसाईट के लिये आपको धन्यवाद कहना चाहता हूँ... निश्चित तौर पर यह हिन्दी की सबसे बेहतरीन साईट में से एक है। बहुत-बहुत बधाई। हम हिन्दी प्रेमियों को आपने शानदार उपहार दिया।

"जनतन्त्र एक डैश है" आपकी यह कविता आज की जनतान्त्रिक व्यवस्था की सही तस्वीर प्रस्तुत करती है। आज हिन्दुस्तान में ’जनतन्त्र’ बेचारी सी हो गयी है। आपने विल्कुल ठीक लिखा है-

"....जो सियार और सांप की हाईब्रीड से

इंसानी मादा की कोख का इस्तेमाल कर पैदा हुआ है

और घूमा रहा है जनतंत्र का पहिया

लगातार उल्टा-पुल्टा, आगे के बजाय पीछे

पर भूख की जगह भाषा पर छिड़ी बहस में जुटे लोग

डैने ताने अपने को फुलाये बैठे हैं कि

उनका लोकतंत्र सरपट दौड़ रहा है

गंतव्य की ओर। "
.....आज के माहौल में नव वर्ष पर यह कविता सटीक बैठती है। सच-मुच "डैश" के सिवा बचा क्या है?
सुन्दर शिल्प और विचारशील रचना के लिये पुनः धन्यवाद। - जितेन्द्र कुमार.

अविनाश वाचस्पति said...

1. गंतव्‍य है नोट बटोरना

जिसमें नेता बुरी तरह कामयाब हैं।

अविनाश वाचस्पति said...

लूटता वोटों को नहीं

मुगालता हुआ है

सिर्फ लूट रहा है

नोटों को।

Bahadur Patel said...

badhiya kavita hai.

यह जनतंत्र

जन और तंत्र के बीच का

सिर्फ़ एक डैश ( - ) है

(जो समझो उसके पहिये की कील है)

जिसे जनगण ने उस आदमीनुमा जंतु के हवाले कर दिया है
poori kavita hi behatarin hai.

PRAN SHARMA said...

JANTANTRA KEE SACHCHEE TASVEER HAI.

sandhyagupta said...

Aapne Bhartiya jantantra ko rekhankit karne ka achcha prayas kiya hai.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह - उनके लिये खज़ाने की कुन्जी है हमारे लिये गले पर रखा ख़न्जर!!!!!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

उलटती है सुबह की अखबारें

यह तो व्याकरण की अशुद्धि है भाई

उलटती है सुबह के अख़बार

सुशील कुमार said...

व्याकरणिक अशुद्धियों की ओर ध्यान दिलाने के लिये श्री अशोक कुमार पाण्डेय जी का आभारी हूँ।

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