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Thursday, January 1, 2009

2 तंत्र में सेंध लगाते कायरों के विरुद्ध एक रिपोर्ट


वे सहमत नहीं हैं

कि हथियार कायरों की भाषा है

जो विचार की जगह

लोगों में डर उपजाते हैं

क्योंकि इस पर धार

उन बहुभाषियों के शब्दों की धार है

जिनके हौसले पर खौफ़नाक इरादों का

पानी चढ़ा है

सत्ता का सुख जिनके सपनों से हमेशा

बंधा है

जो हत्यारों के पेट में घुसकर

उसकी बुद्धि और भाषा खाते हैं

और अपने नापाक़ मंसूबों की

अधूरी जबान से बोलते हैं ।


हथियार का

अपना कोई वजूद नहीं होता

वह रूपहीन, रंगहीन, गंधहीन है

उसका सारा कच्चा माल

दैनिक उपयोग की क्रीड़ा-सामग्री भर है

और हत्यारे तो

इस संसार के निरीहतम जीव हैं

जैसे सफेद पांडा या डॉल्फिन, लेकिन


पर हथियार और हत्यारे के बीच

खड़ा है

वही अदद आदमी

जो दोनों को तोड़ता है

टूटने के अंतिम क्रम तक -

अंतिम क्षण तक -

फिर जोड़ता है उसे

अपने मगज़ की प्रयोगशाला में।


दोनों मटियामेट होकर

अपने रूप और अस्तित्व खोकर

आतंक के दमकते गोले से

उर्जावान होते हैं और

तब सिर्फ़, उसके फ़रमानों के

गुलाम होते हैं।


कितनी विडंबना है कि

(जन) तंत्र के सभी कमज़ोर

बुर्ज़ों और इलाकों में

हत्यारे रोज़ गुप्त रहते हैं पर

अपनी आँखों में काली पट्टियाँ बांध

अरसे से खड़ी वह माता

तराजू ढोती

उसके पैरों के निशान

ढूंढती है चप्पे-चप्पे !

मगर हलफ़नामे और सबूत

डर के साये में

शिनाख्त नहीं हो पाते

कानून के दायरों से

छुटता हुआ आतंकी

शहर में फिर उधम मचाता है

और हलकान जनता की

पलकें झपकते ही

उसकी नींद को

गुनाहों की काली रात में बदल देता है ।


भागमभाग-सा पूरा शहर तब

सन्नाटे के जंगल में डूब जाता है

और तंत्र के त्रिकोण पर बैठा

हत्यारों का सौदागर

ठहाका मारकर

शहर के बीचों बीच हंसता है

और विजयी मुद्रा में

जनता का वोट बन जाता है


इसलिए जनता के डर

के विरूद्ध ठोस कार्रवाई जरूरी है

क्योंकि अपराध के चोर-गलियारों से

तंत्र में घुसपैठ करते

कायरों के खिलाफ

सिर्फ़ जनता ही

सही और सख्त हथियार

हो सकती है

इस हत्यारी आबहवा में।
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2 टिप्पणियाँ:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सुशील भाई,
इस कविता मे जन के प्रति जिस तरह का विश्वास आपने प्रदर्शित किया है वह ही एकमात्र प्राणतत्व है जो कवि को कुन्ठित होने से बचाता है।
कवि शब्द को हथियारों के बरक्स विकल्प की तलाश मे खडा कर देता है और इस दुनिया मे एक बेहतर कल की उम्मीद को बचाये रखता है।
यह कविता उसी यथार्थवादी आशावाद की कविता है ।
बधाई।

sandhyagupta said...

Satta ke galiyare me punji, apradh-apradhi puri tarah se paavn pasar chuke hain. Vidambana hi hai ki loktantra me bhi ye apni karamat dikhane se baaj nahin aate.Sab kuch jhelti hai janta bechari.Kavi ki aankh aar-par dekhti hai aur nirantar yathasthiti ke khilaph aawaj buland karti hi.

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