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Sunday, January 18, 2009

7 कोसी- शोक में डूबी एक नदी का नाम है।


कोसी मंद पड़ रही।

लौट रहे लोग
सब कुछ हारकर वापस
अपने घर मकान खेत-खलिहान।
सबकी आँखें ढूँढ़ रही अपने-अपनों को।

लोगों की बाढ़ अब उमर रही
दियारा में गाँव में शिविरों में

सिर पर मोटरी उनके
गोद में, कंधे पर बाल-गोपाल
चेहरे पर गहरी चिंता लिये
मन-मन भर भारी पैर से
चलते हैं धीरे-धीरे
नई मिट्टी और रेत पटे रस्ते पर
पगडंडियों पर

दूर बहुत दूर तलक पसरे
मृणमय श्मशानी चुप्पियों
और मातम के बीच।

विलाप और थकान सर्वत्र
महामारी और सड़ा पानी सर्वत्र।

हर आँख में लहराता
आँसूओं का पारावार।

धराशायी झोंपड़ी और मकान
गिरे हुए पेड़
पानी में तैरती लाशें

उन पर चीलों-कौवों छीना-झपटी
से जब-तब टूटता हुआ सन्नाटा
मरे जानवरों से उठती दुर्गंध

राहत-शिविरों में अन्न की
उम्मीद में घंटों खड़े लोग

ध्वस्त मकानों की ओट में
प्रसव-पीड़ा से कराहती औरतें
बरबादी के खौफ़नाक़ मंजर,
और और!

पानी घट रहा
कि पानी बढ़ रहा!

कोसी मंद पड़ रही
कि कोसी समा रही!

जन-जन की आँख में
नीर बनकर,
हृदय में लोगों के
दुस्सह पीड़ बनकर!!
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7 टिप्पणियाँ:

अनिल कान्त : said...

जिस तरह से कोसी नदी से तबाह हुए लोग ...आज जीवन बसर करने की सोच रहे हैं ...उस पर कल टी.वी. पर देखा ....बहुत बेबस और लाचार दिख रहे थे सभी ....पता नही पूरा भारत और सरकार ...जितना ध्यान मुंबई के किस्से पर दे रही है उतना कोसी से प्रभावित जनता पर क्यों नही

अशोक कुमार पाण्डेय said...

कोसी की दुर्दशा केवल कोशी की नही…विकास का यह माडल पूरे देश को तबाह कर रहा है।
इस विकास मे आम आदमी और गरीब कहीं नहीं ।

राजीव रंजन प्रसाद said...

कोसी से हुए विनाश के दर्द को समेटे यह कविता गंभीर है, पाठक के हृदय में उतरते ही एक कोसी हो जाती है।

संगीता पुरी said...

कोसी से तबाह हुए लोगों और क्षेत्रों की दुर्दशा के बारे में सही चित्रण है इस कविता में.....बेबसी और लाचारी है इसमें।

sandhyagupta said...
This comment has been removed by the author.
sandhyagupta said...

Ek aur vikas ka dambh bharti maanav jati, uski bhautik uplabdhiyan aur dusri aur unhe munh chidati badh, bhukamp,mahamari jaisi vibhishikayen !

Ye kaisi pragati hai? Kaisa vikas hai?

Kitne asahay aur bechargi se bhare hain in vibhishikaon ko jhalne wale log iska bada hi marmik aur lomharshak chitran kiya hai samkalin yuva kavi Sushil Kumar ji ne.

Bahadur Patel said...

जन-जन की आँख में
नीर बनकर,
हृदय में लोगों के
दुस्सह पीड़ बनकर!!

bahut achchhi kavita hai.
aapako bahut-bahut badhai.

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