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Thursday, January 8, 2009

4 जड़ें


बढ़ती ही जाती हैं
अंधेरे में
अतल गहराईयों में
अपने आस-पास सदैव
मिट्टी को थामे हुए।


जड़ें
बेख़बर हैं
बसंत से पतझड़ तक
पृथ्वी की उपरी सतह के हर मौसम से।


जड़ें तो
तल्लीन होकर
सोखती रही हैं
धरती का सत्वजल
और फैलाती रही हैं
निरंतर उसे
शाखाओं-प्रशाखाओं से,
लताओं-गुल्मों-फुनगियों-कल्लों तक।


जड़ें
टकरा रही हैं
पृथ्वी के गर्भ में
चट्टानों से
गर्म तैलीय लावा से
उफनते धुँओं से भी
आघात से जिसके नित
टूटते-फूटते रहे हैं
जड़ों के असंख्य रोएँदार कोमल रोम।

जड़ें चाहे जितनी बेचैन रही हों
दुख:कातर और निस्सहाय भी,
पर भेदती रही हैं दिन-रात
धरती का सीना,
सहती रही हैं
धरती की सीलन-तपिश,
फिर भी विकल हैं
हरदम
भीतर ही भीतर धँसने को।


पेड़ों को क्या मालूम कि
इस कठिन यात्रा में
जड़ें
मर रही हैं,
सड़ रही हैं
फ़िर भी
हर क्षण लड़ रही हैं
हर विघ्न-रोड़ों से
पेड़ों के जीवन के वास्ते।


जड़ों की चिंता
वाज़िब है, उस पर
गर्व होता होगा पेड़ों को !
हॉलाकि पता है सबको कि
जंगल बचे हैं जड़ों से ही
पूरी दुनिया में।


सच है कि जड़ों ने
वन्य-संसार में
श्रम की संस्कृति रच रखी है
और खड़े किये हैं
अपने कंधों पर
जंगलों का गौरवमय इतिहास,
फिर भी मजलूम है
हमारे समाज में
जड़ें
जैसे दुनियाभर के इतिहास में
मेहनतकश घट्ठाये हमारे हाथ
मजलूम हैं
जिसने सिरजा है बड़े जतन से
विश्व में पूरी मानवता।


यह भी सोचना कितना
हैरत-अंगेज है कि
तख़त-ए-ताऊसों से इमारतों तक
जड़ों के कहीं नाम नहीं!

जहाँ भी जड़ें साबूत बची हैं
(ठूँठ बादिय़ों में भी,)
जीवन के फ़िर से
लौट आने की
वहाँ संभावना अभी अशेष है
किंतु जड़ों के नसीब में
बदा है सिर्फ़
रात की
सियाही हर क्षण
नहीं प्रकाश का एक कण।


पेड़ों को देखकर लगता है कि
जब हम भी
अपनी जड़ों से
कटने लगते हैं,
पेड़ों की तरह ही
सूखने लगते हैं
तड़पने लगते हैं,
जिजीविषा बेचैन हो उठती हैं
हममें भी ।


जड़ें मरकर भी
हमारी मिट्टी को पकड़े रहती हैं
और हमारी नीवों को
स्खलन से बचाती हैं,
हमारे पुरखों के किये-धरे की तरह।
किसको पता नहीं कि
जिसकी जड़ में
रोगाणु लग जाते हैं
उनके साबूत बचने के आसार
कम ही रहते,
उन वृक्षों को भी घुन लग जाते है।
Photobucket
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4 टिप्पणियाँ:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जड के बिम्ब का चेतन प्रयोग।
इस जनतन्त्र की जडे खोखली हो रही है और पेड को कोई फ़िक्र नही।
फलों के मोह मे बस इतराये जा रहा है…कॉन रोक सकता है उसके विनाश को? शायद कवि…

राजीव रंजन प्रसाद said...

बेहतरीन रचना। आपको पढना एक अनुभव है।

sandhyagupta said...

Aaj hamari sanskriti,hamara paryavaran,hamare samajik mulya pradushan ke anek thapede jhel rahe hain.Bahari chamak damak me bithari skhalan hame lagatar kokhala , kamjor aur jarjar kar raha hai.Kavi-alochak Sushil Kumar ki yah kavita is pradushit samay par gehrai se vichar karti hai.

Bahadur Patel said...

बढ़ती ही जाती हैं
अंधेरे में
अतल गहराईयों में
अपने आस-पास सदैव
मिट्टियों को थामे हुए।

bahut achchhi evm lambi kavita padhakar achchha laga.
jad ko prateek ke roop me istemal karake is bahane se aapane jeevan me upekshit karmath logon ki baat bahut khubi ke sath kahi. badhai.

ek gutakhi hai mittiyon ko shayad mitti karane se achchha lagega.
dhanywaad.

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