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Monday, March 20, 2017

0 हिन्दी साहित्य के ‘आउटसाइडर नीलकांत -निर्भय देवयांश

[ यह समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लहक' (संपादक-निर्भय देवयांश) के अंक दिसंबर- जनवरी , 2017 में प्रकाशित हुई है। यहाँ साभार प्रकाशित ]  
असल में दुनिया को बेहतर बनाने के ठेके ने धरती को नरक में तब्दील कर दिया। यह ठेकेदारी किसी ने दी और तब किसी ने ली की तरह नहीं है। यह किसी के दिलो-दिमाग की निजी उत्पत्ति है जो दूसरे-तीसरे-चौथे के दिमाग में संभव नहीं हो सकी इसलिए लोग पहले का फॉलोअर या कहें कि अबूझ पहेली की सनसनाहट समझ कर पीछे-पीछे हे लिए या फिर पिछलग्गू बन गये। पिछलग्गू बने लोगों का कसूर ढूंढने से बेहतर यह समझना जरूरी है कि पहले के दिलो-दिमाग में जो बेहतर करने की ठेकेदारी पथा उत्पन्न हुई,  यह दूसरे-तीसरे-चौथे के दिलो-दिमाग में क्यों नहीं उत्पन्न हुई? यदि यह इतना आसान हुआ होता तो शायद धरती पर ठेकेदारी पथा की शुरुआत ही नहीं हुई होती। मसलन न कोई भगवान होता, न कोई धर्म, न कोई राजा, न कोई ज्ञानवान। अति और अतिरिक्त होने के चलते ही यह सब हुआ और हो रहा है, क्योंकि मनुष्य के पास सिर्फ और सिर्फ एक ही काम है मनुष्य होने के लिए जद्दोजहद करना और मनुष्य बने रहना। यह न बनने के चलते ही मनुष्य क्या से क्या हो गया और सुअरी संतुष्टि तक पहुंच गया। इसे समझने के लिए कुछ कारणों को अगर हम जुटाएं तो पाएंगे कि पहले के साथ कुछ विशेष होने के चलते माहौल ‘हनी-हनी' हो गया। मतलब किसी के पास बेहतर परिवेश, तो किसी के पास अति बेहतर सुविधा तो किसी के पास अति पूंजी और खानदानी पहचान तो किसी के पास महादुख और उससे उत्पन्न निजी विचार का मायालोक। भक्तिकाल के कवियों में तुलसी, कबीर, सूर, और जो आपको सूझे रख सकते हैं। यूनान के लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व के दार्शनिकों में सुकरात व अरस्तू को भी रख सकते हैं। प्लेटो की स्थिति इनसे अलग थी, यानि कि जन्म के साथ बहुत नहीं तो कुछ अमीरी लेकर पैदा हुए थे। अपने यहां वेदव्यास और वाल्मीकि के भी किस्से हैं। नाम के चक्कर में न फंसें तो आगे बढ़ने में सुविधा होगी इसलिए हम उसका लाभ उठा ही लें। बहुत अमीर घर में लियो टाल्स्टाय और रवीन्द्रनाथ टैगोर पैदा हुए हैं। बुद्ध का तो कहना ही क्या! वैसे अपने देश में राम से  लेकर कृष्ण और महावीर से लेकर बुद्ध सभी राजे-रजवाड़े के घर में जन्म लेकर अपनी लीला दिखायी और चले गये। याद रहे, छोड़ेगा वही, जिसके पास पहले से अतिरिक्त होगा और जिसके पास नहीं होगा, वो जीवन भर ग्रहण करता चला जाएगा। उसके लिए एक जिन्दगी बहुत कम है, दर्जनों जिन्दगी में दमित वासना की पूर्ति नहीं होती है और होगी! इसलिए जो छोड़ पाए हैं उनका नाम इतिहास के पन्नों में अंकित है और ग्रहण करने वाले युगों-युगों से लाखों-करोड़ों लोग आ-जा रहे हैं और खर-पतवार की तरह मर-खप रहे हैं, पर कहीं कोई नाम लेवा नहीं। सोचना जरूरी है कि हम कैसी जिन्दगी जी रहे हैं जिसमें सिर्फ ग्रहणता की भूख है और छोड़ने के नाम पर स्वार्थ आग में ‘घी-घी' हुआ जाता है! 
आप विश्वास नहीं करेंगे पर आपको करना चाहिए कि मैंने दुनिया में किसी विशेष मस्तिष्क निर्मित ज्ञान को न समझने और न जानने की आकांक्षा संजोयी और न कभी इसके लिए बलवती इच्छा पैदा की, (जिस बच्चे को तीन-चार वर्ष की उम्र में पिताश्री तीन खूबसूरत कहावतों की घूंट बात-बात में पिलाए हों, मसलन- अपने भाग्य बसे बनवारी, मिले मार न खोजे मियां ताड़ी और अप्पन खड़री, अप्पन ताल)। और तब यह बालक मां की चुप्पी या बेबसी को समझकर घर से बाहर निकल दौड़े-दौड़े रामपुर बाजार (बिहार के गया जिले के) कुछ दूरी पर स्थित पहाड़ पर पहुँच जाए और चिल्ला-चिल्ला कर आसमान से पूछे कि- ‘इस दुनिया में मेरा कौन है बताओ' और अपनी ही आवाज गूंज करउसके पास आए जिसकी ध्वनि हो  ‘मैं, मैं, मैं', तो उसे समझने में देर न लगी कि उसका जीवन प्रकृति  के साथ ही कटेगा! घंटों पहाड़ पर रहने के बाद भूख लगती और पहाड़ी बेर खाकर कुछ शांति मिलती, झरने में नहाने का सुख और देर रात तक किसी के आने की उम्मीद छोड़ फिर पहाड़ से नीचे उतर कर पुलिस लाइन के क्वार्टरों में यूं अनींद रात गुजरती। हां, तो मैं कुछ कह रहा था (भटक जाने की मेरी बहुत पुरानी आदत है और अब तो कुछ किया नहीं जा सकता, खैर) हाँ, मूर्खता मैंने खूब की है और उसी अज्ञानता में छलांग जरूर लगा ली, क्योंकि अज्ञानता में पता कहां होता है कि ऐसा करने पर हाथ टूटेगा या पैर या कि दिमाग ही चसक जाएगा (अभी दिमाग बेहद परेशान रहता है, बोलने में खूब कष्ट होता है, नतीजा, लगातार मोबाइल बंद रखने की भयंकर रूप से बाध्यता बन गयी है) ऐसा मैंने कहीं पढ़ा है, शायद चीन के हजारों वर्ष पूर्व के दार्शनिक लाओत्से का कहना है कि प्रकृति  देती नहीं लेती है, माया देती है। माया धरती का मैटर है या कहें पूँजी, क्या फर्क पड़ता है (यानि मनुष्य मस्तिष्क निर्मित मुद्रा और उसका चलन), पर चिंता नहीं। प्रकृति  मेरे लिए सबकुछ है इसलिए बेफिक रहता हूं, चाहे जो हो, सो हो। फिर भटक गया (ऐसा लगता है कि जैसे भटक जाने का दौरा पड़ता है, अगर पड़ने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं)। यानि दिमाग दर्द से दरकने लगे और जीवन फटने लगे। लहक मेरी मूर्खता की छलांग है, इसलिए सब कुछ गंवाना मंजूर है और पाना कुछ भी नहीं (कहीं यह भी पढ़ा कि पाने के लिए बहुत पाप करना पड़ता है और मुल्ला नसरूद्दीन कहते हैं कि गधे को भी बाप कहना पड़ता है)। और जीवन की इस भाग-दौड़ में मैं ईश्वर को कभी नहीं लाता हूं। भरोसा या विश्वास का सवाल नहीं बल्कि अपन उनके लायक ही नहीं हूं। एक लैटिन  उक्ति है-‘ईश्वर ही ईश्वर का सामना करने में समर्थ है,' फिर हम जैसे लोगों की औकात क्या? सुनते हैं कि इस देश में औकात वालों को ईश्वर दर्शन देते हैं! यह भी भगवान ही जाने, इस बात में कितनी सच्चाई है। वैसे मैंने कभी यूं ही दो पक्तियां लिखी थीं- ‘मनुष्य, मनुष्य न हो सका, और खुदा की बात करने लगा' और यह भी कि ‘मनुष्य होना क्या कम है, बाकी सब तो खुदाई भ्रम है'। अपने जीवन के साढ़े चार दशकीय उम्र में बस इतना ही जान पाया कि मनुष्य बनने की संभावना बची हुई है और हमें लगातार उसके लिए प्रयास  रत रहना चाहिए। यदि आप विशेष ज्ञान के पीछे नहीं चलेंगे तो संभव है कि बहुत कुछ नहीं पाएंगे। मिलेगा ही नहीं। किन्तु वासनात्मक प्रक्रिया   से उत्पन्न मनुष्य ऐसी संभावना पैदा कर प्रकृति  के सहयोगी होने के पक्ष में नहीं है। उसे वह सबकुछ चाहिए जो उसकी दमित इच्छा कहती है, पल-पल पैदा हो रही वासना हवा भरती है। और हर पल की खुशियां तो आसानी से मिलती नहीं हैं, इसलिए किसी न किसी के पीछे तो चलना ही होगा। बाजार में इसकी भी व्यवस्था है इसलिए चाहतों, पाप्त ज्ञान और बुद्धि की बहुलता के आधार पर खूब सज-संवर, मौज-मस्ती कर सकते हैं। जहां उपलब्धता है वहां लोग जीवन का खूब मजा लूट रहे हैं और जहां नहीं है वहां लोग धू-धू कर जल रहे हैं।  
निश्चित ही इस रास्ते पर चलने में समझौते हैं और बोल देना खतरा है। आउटसाइडर हो जाना है। नीलकांत जी ने आचार्य पवर रामचंद्र शुक्ल पर बोलकर, लिखकर खतरा उठाया और हिन्दी साहित्य के आउटसाइडर हो गये। कुछ बेहतर सोचने के लिए, कुछ बेहतर करने के लिए। ‘रामचंद्र शुक्ल : नई दृष्टि' लिखते वक्त यह उनकी उम्मीद रही होगी कि हिन्दी साहित्य संवाद कर एक कदम आगे बढ़ेगा पर यहां तो पायेदार लोगों ने उन्हें विध्वंसक करार दे दिया। कुछ बेहतर कर सके, कुछ बेहतर सोच सके के लिए इतना ही जानना पर्याप्त है कि अस्सी के आसपास की उम्र में भी खुद हाथ जलाते हैं तो दाना पेट में जाता है। सुविधाओं से बहुत दूर रहने वाले नीलकांत छोटे-बड़े पेड़-पौधों के बीच मनुष्य बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और अंतिम समय तक यही पहचान बनाए रखना चाहते हैं।
नीलकांत दार्शनिक रूसो की तरह यह दावा नहीं करते कि 
   इंसान बनने के लिए 
   मैं खाता हूं फुटपाथ पर
   सोता हूं  
   खुले आकाश के नीचे सतह पर।  
रूसो की तरह यह भी नहीं कहते - ‘मगर मैं क्या करूं, चारों ओर छाया हुआ अन्याय मुझसे सहा नहीं जाता। यह दुनिया राक्षसों से भरी पड़ी है, जो निश्चय ही नरक जाएंगे।'  
और रूसो की तरह यह तो कभी कह ही नहीं सकते- ‘जितना पगाढ़ प्रेम  मैं दे सकता हूं उतनी तीव्रता से प्रेम  करने वाला अभी तक पैदा नहीं हुआ। मुझसे बढ़िया प्रेम  करने वाला दिखाओ, जिसका हृदय मुझसे अधिक कोमल हो, ऐसा बढ़िया आदमी मुझे  दिखाओ।' 
कभी धरती के लोगों को देखकर अमेरिकी कवि वाल्ट व्हिटमैन की तरह नीलकांत जी यह जरूर सोचते होंगे- ‘अब मुझे पता चला, खुली हवा में, गगन तले, धरती पर सोने वाला आदमी, भीतर तक सुंदर क्यों होता है?' दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर के शब्दों में- ‘मनुष्य पृथ्वी पर सही ढंग से सबके साथ रहने की तमीज पैदा करे और फिर विचार या चिंतन के खतरों से टकराए।' 
एक शायर की दो पंक्तियां हैः 
कूदा तिरे घर में कोई यूं धम्म से न होगा,  
वो काम किया हमने कि रूस्तम से न होगा।  
आखिर क्या कारण रहे होंगे कि नीलकांत जी को ‘रामचंद्र शुक्ल नई दृष्टि' किताब लिखने की जरूरत पड़ी होगी। पुस्तक की भूमिका ‘दो शब्द, पृ. सं. 7-8' में कहते हैं- “जलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने प्रेमचंद और कार्ल मार्क्स की जन्मशती और मृत्युशती समारोह के उपरांत आचार्य शुक्ल की जन्मशती मनाने का निर्णय लिया तो इस संबंध में वही हुआ। समारोह का तांता लग गया। कॉलेज, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, सरकारी संस्थान सभी जगहों पर लोग सतर्क हो गये। अध्यापक अपने पुराने नोट्स से रस, छंद, अलंकार, व्याकरण और लोकमंगल जैसे विषयों पर शुक्ल जी के महान योगदान पर लिखा-लिखाया निबंध लेकर दौड़ पड़े। अपने मेज की दराजों और दिमागों में अर्से से जमा रद्दी बेचने का यह अच्छा सुअवसर हाथ लग गया था।'' 
शुक्ल जी की जन्मशती के संदर्भ में एक सौ साल की सृजनशीलता का लेखा-जोखा संभव था, उसके अंतर्संघर्षों का उल्लेख प्रस्तुत  किया जा सकता था और सकारात्मक-नकारात्मक  पक्षों की परख की जा सकती थी। उसके गतिशील पक्षों को प्रगतिशील  संघ के सकारात्मक पक्ष से जोड़कर एक समृद्ध जनवादी विरासत के स्वरूप को प्रस्तुत  करना अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता। किन्तु परिणाम इसके विपरीत निकले। उदारवादी पक्ष के पबल होने के कारण शुक्लशती प्रतिमा पूजन में बदल कर रह गया।  
शुक्ल जी ने सत्ता के सवाल को प्रमुखता दी है और उन्होंने अपने अधिकांश लेखन में दर्शन के क्षेत्र को समाविष्ट किया है। सत्ता के सवाल पर ही किसी विचारक की विश्वदृष्टि का स्वरूप निर्भर करता है। लेकिन साहस जुटाने का अतिरिक्त साहस मुझे विशेषत इसलिए करना पड़ा के निबंध को विभागाध्यक्षों और वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसरों  के सामने पढ़ना था, जो स्वयं तो एक सवाल एक पृष्ठ में पूछते ही हैं, दूसरे उनके लग्गू-भग्गू शोधकामी लोगों की टोली उसी एक सवाल को सौ मर्तबा पूछती है और ताल ठोंक-ठोंक कर उत्तर मांगती है। पुनरावृत्तियों को अनवरत रूप से मुखरित करने में अभ्यस्त इस गुरु-शिष्य परंपरा का सामना अतिरिक्त साहस के बिना कैसे किया जा सकता है। 
सवाल है कि वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसरों , रीडरों आखिर हिन्दी साहित्य की बेहतरी के लिए, बनती-बिगड़ती चीजों को समझने के लिए नीलकांत जी की तरह ही अतिरिक्त साहस  क्यों नहीं जुटा पाते हैं? क्या नौकरी का मोह है, सुविधा छीन जाने का मोह है या फिर कुछ और कारण है जो अभी तक अज्ञात है। क्या इन विधवा प्रश्नों से हिन्दी साहित्य हमेशा जूझता रहेगा? 
क्या यह जानना पाठकों के लिए जरूरी नहीं है कि ‘मृत सौंदर्य का मसीहा' इतना विध्वंसक लेख है, जिसे पढ़ने से मंच ही उड़ जाएगा, तो फिर हिन्दी साहित्य को दो-चार नीलकांत चाहिए, भला एक से कैसे काम चलेगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि शुक्ल जी के समर्थक ही बहुत कमजोर हैं जिन्हें कमजोर मंच के सहारे वैतरणी पार करनी है? 
अच्छा छोड़िए, नीलकांत जी को कुछ पल के लिए। मशहूर  दलित लेखक स्वर्गीय ओमपकाश वाल्मीकि अपनी पुस्तक ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' (पृ. सं. 95) में खुलेआम कहते हैं- ‘हिन्दी साहित्य सवर्ण साहित्य है, इसे सिद्ध करने के लिए बहुत ज्यादा शोध की जरूरत नहीं है। रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास ही काफी है। प्रसाद, पंत, महादेवी, निराला, नागार्जुन  भी इसी परिधि में आते हैं। उनकी रचनाओं के जीवन-मूल्य क्या हैं? इनका विश्लेषण और मूल्यांकन होना आवश्यक है। ‘राम की शक्तिपूजा'  किसी प्रगतिशील , मार्क्सवादी, जनवादी विचार को स्थापित करती है? निराला इस रचना में किसी सर्वहारा की चिंता कर रहे हैं या एक कर्मकांडी सामंत की! ‘राम की शक्तिपूजा' की भाषा और शिल्प के मुख्य सरोकार क्या हैं?' 
फिर नीलकांत जी के पास चलें और उनकी दर्जनों आपत्तियों में एक-दो को देखें (वही, पृ.सं. 22) - “इसके विपरीत दिशा में आचार्य शुक्ल का पक्ष अपने समकालीन यथार्थ को भिन्न दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। अतीत और परंपरागत मानदंडों के प्रति उनमें अतिरिक्त भक्ति दिखाई देती है। विकासमान नई सामाजिक वास्तविकताओं के समकालीन रूपों और निष्पाण अवधारणाओं का अंतर्विरोध, उनकी आलोचना दृष्टि को पंगु और निष्किय बनाता जाता है।'' सामंजस्यवाद के नाम पर, शोषक वर्गों और उसके परजीवी निकाय की वकालत करते हुए, आचार्य शुक्ल लगभग नई मनुस्मृति ही लिख डालते हैः 
“ लोक व्यवस्था के भीतर, कुछ विशेष वर्ग के लोग, जैसे शिष्ट विद्वान, धर्मचिंतक, शासन कार्य नियुक्त अधिकारी, देश रक्षा में पाण देने के लिए तैयार वीर इत्यादि औरों से अधिक सम्मान के पात्र होते हैं। इनके प्रति उचित सम्मान न प्रदर्शित करना अपराध है। '' (चिं.म.भा. 1, पृ.78 )।  
नीलकांत जी तो शुक्ल जी की पुस्तक चिंतामणि पर सवाल उठा रहे हैं। मेरे जैसे पाठक के मन में भी यह सवाल उठेगा कि शुक्ल जी का मानस ब्राह्मण जाति में जन्म लेने के आधार पर बनता है या पढ़ने-लिखने से पाप्त बुद्धि की प्रगतिशीलता के आधार पर? मनुस्मृति की सोच को ही अंतिम मानेंगे तो फिर हजारों वर्ष की मानसिक विकास यात्रा की समझ यह कि मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं होना चाहिए। स्वामी करपात्री जी अपनी पुस्तक ‘मार्क्सवाद और रामराज्य' में संकेत देते हैं कि जाति-पांति में भेद, ऊंच-नीच में भेद मिट जाना ही रामराज्य है, मार्क्सवाद है। तो क्या शुक्ल जी समाज की असमानता को बनाए रखना चाहते हैं? किन्तु ऐसा क्यों? वर्गच्युत होने में खतरा है, तो फिर  विज्ञान के अति विस्फोटक समय में अपने प्यारे देश भारत का क्या होगा? बुद्ध ने जब ईश्वर की सत्ता को इनकार किया था तो उनके मन में बड़ा प्रश्न यही था कि मनुष्य और मनुष्य में फर्क क्यों? यदि यह है, तो समझने में कठिनाई नहीं है कि ईश्वर नहीं है। बुद्ध ने तो यहां तक कह दिया कोई आत्मा नहीं है। आदि शंकराचार्य ‘ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या' कहते हैं तो महावीर सिर्फ और सिर्फ निजी आत्मा की बात करते हैं। महावीर के पास भी परमात्मा नाम की कोई चीज नहीं है। जहां बात इतनी दूर तक पहुंच गयी है, फिर हम कहां अटके हुए हैं! शुक्ल जी जीवन और हिन्दी साहित्य को कहां अटकाए रखना चाहते हैं?  
क्या इस सच को स्व. शिवकुमार मिश्र या चंद्रबली सिंह भी नहीं समझ पाए कि उन्होंने भी नीलकांत जी के ‘मृत सौंदर्य का मसीहा' लेख पर गहरी नाराजगी जाहिर की। तो फिर शुक्लजी किस लोकमंगल का सपना देख रहे हैं? क्या लोक का मंगल राजा की पूजा-अर्चना करने से या फिर वैज्ञानिकता के सहारे आगे बढ़ने से होगा? आदरणीय विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना' (पृ.सं. 52) में लिखते हैं- “विश्व प्रपंच की भूमिका पढ़ने पर इस बात का पता चलता है कि उन्होंने भौतिक विज्ञान, दर्शन, तथा मनोविज्ञान का गहरा अध्ययन किया था। उन्होंने लार्ड केलविन, डार्विन, हक्सले, शेफर, जेम्स हरबर्ट, स्पेन्सर, वाटसन, स्पिनोजा, डेकार्ट, कांट, बर्पले, शेलिंग, हीगेल, शॉपेनहावर, ड्यूरिंग, रीड, स्टिवर्ट, हेमिल्टन, सर आलिवर लाज, ह्मूम, प्लांक तथा अन्य वैज्ञानिकों तथा दार्शनिकों के सिद्धांतों तथा विचारों का तालमेल बिठाने के लिए गीता, वैशेषिकों, नैयायिकों, उपनिषदों, पतंजलि, चरक, सांख्य, वेदान्त, चार्वाक आदि के विचारों को उद्धृत करके उनकी विवेचना की है।  
पसीना छूटने जैसा अध्ययन, पर दिन भर चले ढाई कोस।  
अपने स्वदेशी मिजाज वाले आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी से पूछने का मन करता है कि इतना कुछ शुक्ल जी पढ़ गये पर उन्होंने क्या मार्क्स के विचारों का अध्ययन नहीं किया? तो सुनिए रामस्वरूप चतुर्वेदी अपनी पुस्तक ‘हिंदी गद्य विन्यास और विकास' के पृ.सं. 193 में क्या कहते हैं- “रामचंद्र शुक्ल का समकालीन राजनीति के प्रति रवैया इस बात से भी प्रकट होता है कि अपने लेखन में वे मार्क्स का उल्लेख नहीं करते हैं। वे मार्क्स को अपनी विचार परिधि में स्वीकार नहीं करते हैं।''   
शुक्ल जी चिंतामणि में कहते हैं- “कुशल यही है कि जिनका दिल सही सलामत है, जिनका हृदय मारा नहीं गया है, उनकी दृष्टि अतीत की ओर जाती है। क्यों जाती है, क्या करने जाती है, यह बताते नहीं बनता।'' (चि.म. भाग 1, पृ.171) 
यहीं पर नहीं रुकते हैं शुक्ल जी, आगे कहते हैं- “वर्तमान हमें अन्धा बनाए रहता है, अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है। मैं तो समझता हूं कि जीवन का नित्य स्वरूप दिखाने वाला दर्पण मनुष्य के पीछे रहता है।'' (वही पृ. 178) 
... तो देश अतीत में जाएगा तो फिर भारत गुलाम हो जाएगा, दलितों के साथ अन्याय होगा। फिर तो यह समझने में दुविधा नहीं है कि शुक्ल जी का तार कहां जुड़ा हुआ है। यह तार है तुलसीदास जी की ये दो पंक्तियां -‘पूजिए विप सकल गुणहीना, यद्यपि न शुद्र परम प्रवीणा।' तो कौटिल्य (अर्थशास्त्र के लेखक) से लेकर बाबा तुलसीदास और आचार्य प्रवर शुक्ल जी तक, जन्म को ही जीवन का आधार मानते हैं। मतलब ब्राह्मण में जन्म लिए हैं तो सब सुख-ऐश्वर्य उन्हीं का! यह काम तो बिना पढ़े-लिखे भी किया जा सकता है। तो सिर्फ धरती पर मनुष्य, मनुष्य नहीं बन सकेगा और यह उपद्रव जारी रहेगा। तब तो रामराज्य आने से रहा!  
प्राच्यवाद के अग्रदूत एडवर्ड सईद बुद्धिधर्मियों से पूछते हैं-“ ‘द गाड दैट फेल्ड' के प्रमाण  को पढ़ना मुझ जैसे लोगों के लिए हतोत्साहित करने वाला है। मैं पूछना चाहता हूं कि बुद्धिधर्मी के रूप में आपने किसी ईश्वर में विश्वास ही क्यों किया? और इसके अतिरिक्त किसने आपको यह कल्पना करने का अधिकार दिया था कि आपका पूर्व का विश्वास और बाद का मोहभंग इतने महत्वपूर्ण थे? मेरे लिए स्वयं में धार्मिक आस्था अवबोध्य है और यह गहरे रूप में व्यक्तिगत होती है-ऐसा तब तक होता है जब किसी नितांत जड़ व्यवस्था में एक पक्ष को मासूम और भला मान लिया जाता है और दूसरे को आत्यंतिक रूप में बुरा, और ऐसी स्थिति में एक प्रक्रिया   जगह लेती है जिसमें राजनीति धार्मिक उत्साह बन जाती है... परिणामस्वरूप नस्ली संहार, सामूहिक संहार और अंतहीन संघर्ष होते हैं, जिनके बारे में सोचना भी भयावह है।'' (साखी, जुलाई-दिसम्बर अंक 2006, एडवर्ड सईद पर केन्द्रित) 
देखिए कितनी पवित्र ईमानदारी है अज्ञेय जी की। वे कहते हैं -“अनेक इतर प्रभावों के रहते भी एक प्रकार  का हिन्दू हूं, तबियत रईसी है लेकिन इस रईसी के पीछे जो संस्कार हैं वह ब्राह्मण के हैं।'' अपने संस्मरणों में अज्ञेय अपने परिवार का जिक करते हुए ब्राह्मणत्व के गौरव भाव का उल्लेख बार-बार करते हैं। तो यह समझने में किसको दिक्कत होगी कि ‘कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' का एंजेडा ही था-धार्मिक आस्था को बनाए रखो और पूंजीवादी व्यवस्था की रक्षा करो। मुद्राराक्षस कहते हैं- “इसी जातिवाद दर्प के चलते रचना को अज्ञेय विशेषाधिकार बनाना चाहते थे और कुछ चुने हुए लोगों की संपदा। अज्ञेय कहते हैं-कुछ अधिक संस्कृत हैं और कुछ कम। संस्कार ब्राह्मण कर्मकांड में एक प्रक्रिया   विशेष है। इसी संस्कार के कारण कुछ लोगों को समाज में  विशेषाधिकार मिलते हैं-‘संस्कारात् द्विज उच्यते'। इसका मतलब यह तो नहीं कि अज्ञेय फांसीसी चिंतक मांटेस्क्यू से बहुत प्रभावित  थे? मांटेस्क्यू ने ऐय्याशी के सिद्धांत पर खूब विचार किया था। उसकी स्थापना थी कि ऐय्याश समृद्ध लोगों के होने से एक लाभ होता है। ऐय्याश समृद्ध अनुपयोगी उत्पादनों के बाजार होते हैं। ऐसे उत्पादन जिनका मानव जीवन को बनाए रखने में कोई इस्तेमाल नहीं होता, ऐय्याश समृद्ध लोगों में खपता है। हम सब इस बात को ऐसे समझ सकते हैं कि कुछ लोग हीरे खरीदते हैं। हीरे न खाए जा सकते हैं न ओढ़े-बिछाए जा सकते हैं। फिर उनका एक बाजार होता है और उनके खरीदार होते हैं। अक्सर रचना को भी कुछ लोग ऐसा ही उत्पादन बनाने की कोशिश करते हैं। तभी तो लेखक गालब्रेथ ने कहा है-“समृद्धि का एक रूप यह सामने आया कि समृद्ध व्यक्ति कला पर बड़ी रकम खर्च करता है। इंजीनियरी और विज्ञान सामाजिक जरूरत हैं, कला ऐय्याशी होती है।'' 
तो लीजिए और देखिए कि शुक्ल जी जरूरत के समय कैसे मैदान छोड़कर भाग खड़े होते हैं। पुरुषोत्तम दास मोदी की पुस्तक ‘अंतरंग संस्मरणों में जयशंकर प्रसाद' में आचार्य पं. सीताराम चतुर्वेदी अपने संस्मरण श्री जयशंकर प्रसाद, पृ. सं. 91' में लिखते हैं- ‘इसी प्रसंग   में एक बार सेंट्रल हिन्दू स्कूल के हिन्दी के पसिद्ध अध्यापक श्रीसांवल जी नागर भी आ पहुंचे। वे पक्के महल में रहते थे। बातचीत के प्रसंग  में उन्होंने कहा कि साहित्य में आजकल बड़ी अराजकता है। उसके सुधार का कोई उपाय निकाल लेना चाहिए और यह काम आप लोग ही कर सकते हैं। जयशंकर प्रसाद  जी ने कहा-“जो बोले सो घी को जाय। आप कोई योजना बना लाइए''। लगभग एक सप्ताह पश्चात प्रेमचंद जी के आवास  पर काशी के साहित्य-महारथियों की बैठक हुई। कुल मिलाकर आठ या दस होंगे। पं. रामचंद्र शुक्ल जी भी निमंत्रित कर लिये गये थे। जब योजना प्रस्तुत  की गई तब आचार्य शुक्ल जी ने अपनी गज्झिन आधी मूंछों के नीचे अपनी स्वाभाविक हल्की मुस्कान फैलाते हुए कहा-“आप लोग लाख योजना बनाइए, पर आपकी मानेगा कौन?'' बस इसी पर सारी योजना ठप हो गई। प्रसाद  जी ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा- “लीजिए, अच्छा हुआ। सिर मुड़ाते ही ओले पड़े। शुक्लजी ने ठीक ही कहा है। हम कौन होते हैं, किसी पर दबाव बनाने वाले।'' और वह सभा जो उखड़ी तो फिर कभी नहीं बैठी। 
तो क्या वृहत्तर वेतनमान पाने वाले प्रोफेसर शुक्ल जी की तरह ही संवाद और सभा उखाड़ने वाले साबित हो रहे हैं? तब तो किसी न किसी को नीलकांत तो बनना ही पड़ेगा। और न बनिएगा तो काम कैसे चलेगा? 
अब देखिए डॉ. रामविलास शर्मा ने शुक्ल जी द्वारा निरुपित  लोकधर्म के संदर्भ में रूसी व्यवस्था के प्रति व्यक्त आक्रोश पर अपनी वैचारिक प्रतिकिया देते हुए लिखा है-“रूसी क्रान्ति  के बारे में साम्राज्यवादियों ने धुंआधार प्रचार  किया था, उसी को दोहराते हुए लिख डाला है शुक्ल जी ने यह सब। ...शुक्ल जी के विवेचन का यह सबसे कमजोर पहलू है। उन्होंने शुरुआत की थी कबीर आदि का लोकविरोधी रूप दिखाने से, पहुंच गये रूसी क्रान्ति और लेनिन तक और अंत में जनता को ही मूर्ख और जड़ कहने लगे। शुक्ल जी ने शब्द आवेश में लिखे हैं-उनकी मूल विचारधारा से इसका मेल नहीं बैठता। इस आवेश का कारण तुलसी के महत्व का गलत प्रतिपादन करने के जोश में वह अनेक असंगतियों में फंस गये।''  
आश्चर्य है कि डॉ. शर्मा की शुक्ल जी को लेकर कही गयी बातों पर कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘एक पहाड़' रामचंद्र शुक्ल जी तो ‘दूसरे पहाड़' शर्मा जी को समझ कर तथाकथित हस्तक्षेपी लोग चुप्पी ताने हुए हैं! 
डॉ. शर्मा जहां शुक्ल जी की समझ का रहस्यमयी उद्घाटन करते हैं तो मुद्राराक्षस अपनी पुस्तक ‘आलोचना और रचना की उलझनें' के ‘सवर्ण साहित्य और दलित प्रश्न' अध्याय, पृ.सं. 148 में डॉ.  शर्मा की समझ को कठघरे में खड़ा करते हैः- “डॉ. रामविलास शर्मा विख्यात तुलसी भक्त हैं पर जब कुछ लोगों ने उनसे तुलसीदास के घोर दलित विरोधी लेखन पर सवाल किए तो उन्होंने आश्चर्यजनक उत्तर दिएः “काव्य का ढांचा कैसा है, कविता का स्तर कैसा है, उसके गुण-दोष का विवेचन वो नहीं करते।'' यह लगभग वैसा बयान है जैसे कोई यह कहे कि समूचे शहर को जलाने के वक्त नीरो जो बांसुरी बजा रहा था उसकी संगीत मधुरता की पशंसा करनी चाहिए न कि जलने वालों की चीख पुकार की चिंता? 
शुक्ल जी के भतीजे चंद्रशेखर शुक्ल चाचा पर लिखी अपनी पुस्तक में कहते हैं-“अंग्रेजी साहित्य में जो काम  डॉ. जानसन ने वर्ड्सवर्थ को प्रोत्साहित करके किया, वही  काम हिन्दी के लिए चौधरी बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेम घन' ने शुक्ल जी को प्रोत्साहित करके किया।'' 
शुक्ल जी तो हिन्दी के उपन्यासकार और नाटककार बनना चाहते थे फिर यह हिन्दी आलोचना का इतिहास क्यों लिखने लगे? भतीजा चन्द्रशेखर शुक्ल कहते हैं-“शुक्ल जी फरमायशी कार्य करने के विरुद्ध थे। उन्हें सुरुचि के विरुद्ध खटना पड़ता था। नतीजा निकला सन् 1908 से 1928 तक लगभग 22 वर्ष वे नागरी प्रचार णी सभा में शब्द सागर का कार्य करते रहे। सन् 1929 में काशी में हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन के लिए गए  और अंत समय तक वहीं रहे। 
तो क्या हिन्दी साहित्य का इतिहास शुक्ल जी द्वारा अरुचि से  किया गया काम है? पिता चन्द्रवली शुक्ल अपने पुत्र से कहते थे कि हिन्दी पढ़ने से उन्नति नहीं हो सकती इसलिए तुम्हें अंग्रेजी पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पिता के इतना कहने पर पुत्र शुक्ल भी कहां रुकने वाले थे। महज सोलह वर्ष की उम्र में एडिशन के ‘एसे ऑन इमैजिनेशन' का हिन्दी अनुवाद। कुछ और वर्षों में एडविन आरनाल्ड के पसिद्ध ग्रंथ ‘लाइट ऑफ एशिया', हैकल की पुस्तक ‘रिडल ऑफ द यूनिवर्स' के अनुवाद कर डाले। अंग्रेजी में रचा-बसा मन के विकास का पस्फुटन चिंतामणि में महसूस किया जा सकता है! नीलकांत जी ने जो कुछ लिखा, सुरुचि से लिखा। कोई उनसे फरमायशी लिखा नहीं सकता, क्योंकि उन्होंने नामवर सिंह की तरह ‘कविता के नए प्रतिमान' लिखकर साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने की इच्छा तो स्वप्न में नहीं पाली होगी। 
शुक्ल जी का परिवार बहुत बड़ा था। नौकरी का ही सहारा थी। पिताजी दूसरी शादी के बाद अपने द्वितीयक परिवार में उलझे थे। सो, वहां से सहायता मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। ऊपर से कुछ वर्षों में छह संतानें- केशवचंद्र शुक्ल, दुर्गावती, गोकुलचंद्र, विद्यावती, लीलावती उर्प लल्ला और कलावती। पत्नी सावित्री देवी भी जैसे-तैसे घर चलातीं।  
यह सवाल बाहरी लोगों को सालता रहेगा के हिन्दी साहित्य क्या शिक्षण कैंपस का अड्डा भर है। ठीक ही है, बाहरी लोगों को भला हिन्दी साहित्य की चिंता क्यों होने लगी? कौन महत्व देगा आपको, ज्यादा इधर-उधर करेंगे तो नीलकांत की तरह आउटसाइडर बना दिये जाएंगे।  क्या संभव है कि ‘रामचंद्र शुक्ल नई दृष्टि' पुस्तक कभी विश्वविद्यालय के पाठ्यकम में लग सकती है? कहीं हम दिन में अंधियारी सपना तो नहीं देख रहे हैं?  
किन्तु क्या भूलने की जरूरत है कि हिन्दी के भविष्यगामी छात्रों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखते हुए (छात्रोपयोगी) शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने में किन-किन पुस्तकों की मदद ली थी। कुछ नाम इस प्रकार  हैं- मिश्र बन्धु विनोद का हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. किशोरी लाल गुप्त की सरोज सर्वेक्षण विशाल ग्रंथ, बाबू श्यामसुंदर दास की ‘साहित्यालोचन', ‘रूपक रहस्य' और ‘हिन्दी भाषा और साहित्य' (बाबू श्यामसुंदर दास पर शुक्ल जी ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास' में टिप्पणी करते हैं-शिक्षापयोगी तीन पुस्तकें-भाषाविज्ञान, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा साहित्यालोचन-भी आपने लिखीं या संकलित की हैं ), पं. रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, वियोगी हरि जी की ब्रज माधुरी सार, फिर फांसीसी लेखक गार्सा दउ तासी की हिन्दुई और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास दो भागों में, शिव सिंह सेंगर का हिन्दी साहित्य का इतिहास, 1878 में इसी को आधार बनाकर सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने हिन्दी साहित्य का पथम इतिहास द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर नाम से अंग्रेजी में लिखा जिसे 1888 में प्रस्तुत  किया गया था। और कितनों की भागीदारी होगी, अब क्या-क्या कहा जाए। 
खुद शुक्ल जी स्वीकार करते हैं-“आई.ए.रिचर्ड्स ने यूरोपीय साहित्य में समीक्षा के नाम पर फैलाये हुए बहुत से अर्थशून्य वाग्जाल को हटाकर शुद्ध विवेचनात्मक समीक्षा का रास्ता निकाला है। हिन्दी साहित्य में भी जो वाग्जाल फैला हुआ है, उसे दूर करना है।'' क्या ऐसे ही मौके पर एक प्रश्न शुक्ल जी से नहीं बनता है-तो फिर प्रेमचंद के घर पर जो बैठक हुई थी उससे आप भाग खड़े क्यों हुए थे?  
क्या नीलकांत जी यही काम शुक्ल जी के वाग्जालों को हटाकर हिन्दी साहित्य को जिंदा बनाने के लिए नहीं करना चाहते हैं?  
तभी तो अतिरिक्त साहस और अतिरिक्त अध्ययन का सहारा लेना पड़ा।   
यदि ऐसी बात नहीं होती तो क्यों डॉ. नामवर सिंह यह लिखने को बाध्य होते- “आचार्य शुक्ल की विश्व दृष्टि कितनी  प्रासंगिक? शीर्षक लेख मिला, आज ही। एक सांस में पढ़ गया। दृष्टि निर्मम, भाषा तल्ख, निर्णय सख्त, फिर भी संपूर्ण निबंध तर्कसंगत और प्रमाण  पुष्ट। बहुत दिनों के बाद ऐसा प्रौढ़ निबंध पढ़ने को मिला। इस निबंध के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा ऋणी हूं। बधाई स्वीकार करो। अनुरोध यही है कि अब इसे कहीं  अन्यत्र पकाशन के लिए न भेजना। इस पर मेरा ही हक है।'' 
अगर नीलकांत जी का लेख इतना असर कर गया कि दिल्ली से लेकर इलाहाबाद और पटना तक हिलने लगा, तो फिर मुक्तिबोध की सलाह पर ही क्यों नहीं विचार संभव हो पा रहा है? 
मुक्तिबोध अपनी पुस्तक ‘समीक्षा की समस्याएं' में लिखते हैं- “डॉ. रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, पकाशचंद्र गुप्त और अमृत राय, डॉ. नामवर सिंह तथा इनके अतिरिक्त यशपाल और नागार्जुन जैसे लेखक, कलाकार क्या कभी इकट्ठा होकर सम्मिलित रूप से काम नहीं कर सकते थे? ... और अगर ये सम्मिलित रूप से, संगठित रूप से काम नहीं कर सकते तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि अन्य बाधाओं के अतिरिक्त एक बाधा यह भी है कि ये सब मध्यमवर्गीय व्यक्तिवादी हैं जिन्हें अपनी व्यक्ति सत्ता अन्य बातों से अधिक प्रिय है?'' 
माओत्से तुंग ने यह कहकर क्या भूल कर दी-“हजारों फूलों को खिलने दो, हजारों विचारों को टकराने दो।'' 
आखिर क्या कारण रहा होगा के डॉ. नामवर सिंह ने नीलकांत के लेख की तारीफ की। दिल्ली के कई आचार्य प्रवरों का मानना है कि ऐसा कर नामवर सिंह अपने गुरु हजारीप्रसाद  द्विवेदी को मजबूत दिखाने के लिए एकसाथ रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा को काउंटर कर रहे थे। यानि कि ‘नीलकांत टूल्स' काउंटर के लिए कारगर हथियार बन गया नामवर सिंह के लिए।  
नंदकिशोर आचार्य भी नामवर सिंह की समझ-नासमझ को पकड़ लेते हैं और अपनी पुस्तक ‘साहित्य का स्वभाव' के ‘अपने ही घर में बेघर की आलोचना' अध्याय में कहते हैं-“ऐसा कभी नहीं होता कि हमने स्वयं साहित्य और उसकी प्रक्रिया   को एक संवेदनात्मक प्रमाण  सामग्री की तरह लेते हुए उसके माध्यम से मानवीय नियति को, समय और समाज को मनुष्य की आशा-आकांक्षाओं तथा निराशाओं और पुंठाओं को समझने का प्रयास   किया हो। यदि ऐसा होता तो कोई कारण नहीं था कि आचार्य शुक्ल छायावाद को स्वीकार नहीं कर पाते और छायावाद के आलोचक नयी कविता को, और तब न डॉ. नामवर सिंह जैसे आलोचक को उसी लिरिक की वापसी का आग्रह करना पड़ता जिसकी अप्रासंगिकता की घोषणा कविता के नये प्रतिमान तलाशते हुए वह कर चुके थे।'' 
देखिए, रविभूषण जी भी ‘साम्य' पत्रिका के रामविलास शर्मा एकाग्र अंक में अपने लेख ‘रामविलास शर्मा और इतिहास की शव-साधना' की अंतिम पंक्तियों में नामवर सिंह के बारे में कुछ कह रहे हैं-“रामविलास जी जिन तथ्यों-साक्ष्यों की बिना पर अपनी स्थापनाएं प्रस्तुत  करते हैं, उन्हें चुटकी बजाकर समाप्त नहीं किया जा सकता। नामवर अब स्वयं दूसरे ही दिन अपनी बातों को झुठलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। हिन्दी में बहस का अभाव है। हिन्दी लेखकों-आलोचकों में फिसलन-विचलन भी है। रामविलास शर्मा में ये सब नहीं था। वे सुविधावादी, संबंधवादी और अवसरवादी नहीं थे।'' 
तो क्या यह समझा जाय कि नामवर सिंह के पास शुक्ल की विश्वदृष्टि और इतिहासदृष्टि पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई थी।  
आदरणीय मैनेजर पांडेय ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘साहित्य और इतिहास दृष्टि' में नामवर सिंह पर अलग से कोई अध्याय नहीं लिखा है। टुकड़ों-टुकड़ों में बस याद भर कर लेते हैं। यह एक गंभीर सवाल पर जिस पर विचार करना तो बनता है। लेकिन मैनेजर पांडेय के कालक्रम का ज्ञान भी आश्चर्य से भरा अजूबा पैदा करता है। इसी पुस्तक में लिखते हैं-“1967 ईं के सामाजिक- राजनीतिक वातावरण से प्रभावित  रचनाकारों की एक नई पीढ़ी अखिल भारतीय स्तर पर उभर कर सामने आई। हिन्दी में आलोक धन्वा, कुमार विमल, पंकज सिंह, विष्णुचंद्र शर्मा, विजेन्द्र, वेणु गोपाल, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, ज्ञानेन्द्रप्रति, अरुण कमल, ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह, रमेश उपाध्याय, स्वयं पकाश, जगदीशचंद्र, जगदंबा प्रसाद  दीक्षित आदि की नई पीढ़ी जनवादी रचनाशीलता के नए उत्थान को समृद्ध करने लगी।'' 
आलोक धन्वा इस सूची में पहले कैसे आ गये? क्या विष्णुचंद्र शर्मा और विजेन्द्र से वरिष्ठ कवि हैं आलोक धन्वा? मैंने सच की जानकारी के लिए विष्णुचंद्र शर्मा जी को फोन किया- उन्होंने कहा, क्या बोल रहे हो, आलोक धन्वा मुझसे बहुत जूनियर हैं। अब इन अध्यापकों की आलोचना दृष्टि और सूची पर भला हम और तुम क्या करेंगे? जिन्हें चाहेंगे उठाएंगे और जिन्हें चाहेंगे गिरा देंगे। यही सब हिन्दी साहित्य में दशकों से चल रहा है। आलोक धन्वा भी बातचीत में कहते हैं कि पांडेय जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। इससे तो मेरा ही अपमान हुआ। विष्णुचंद्र शर्मा और विजेन्द्र मुझसे बहुत वरिष्ठ कवि हैं।  
एक सवाल, क्या ये आलोक धन्वा के प्रति मैनेजर पांडेय का मोह है? उसी तरह से शुक्ल जी का भी पंत जी को लेकर बहुत मोह है! यदि नहीं, तो हिन्दी साहित्य का इतिहास में भक्तिकाल   के महत्वपूर्ण कवि तुलसीदास पर 11-12 पेज और छायावाद के कवि पंत जी पर भी 11-12 पेज। निराला पर महज दो-तीन पेज,  आखिर क्यों? गौरतलब है कि मुक्तिबोध भी अपनी आलोचना में निराला का एक-दो बार नाम भर लिए हैं? पर क्यों? ‘कहीं पे निगाहें-कहीं पे निशाना'। अजी, ये पाठक हैं-सब जानते हैं!   
कुछ इसी तरह के कारण रहे होंगे कि नीलकांत जी बार-बार अध्यापकीय आलोचकों द्वारा अस्वीकार किये जाते रहे।  अध्यापकों के पास व्यापक आडम्बर होता है। शिष्यों की मंडली होती है। शिष्यों का कब्जा महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में होता है। वाहवाही-पशंसा का खुला बाजार चलता है। और इस तरह से हिन्दी साहित्य अपना तथाकथित संसार बढ़ाता चलता है। यदि नीलकांत जी के पास भी एक शिष्य मंडली होती तो क्या उनकी स्थिति वैसी ही होती जैसी आज है। पूरी तरह से आउटसाइडर  ‘किन्तु, यही बाहरवाली जान मारे ली'! विष्णुचंद्र शर्मा ने कहा-‘नीलकांत की हिन्दी साहित्य में बहुत उपेक्षा हुई है।' 
विष्णुचंद्र शर्मा की इस बात का अंदाजा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि किसी हिन्दी के लेखक की पुस्तक में नीलकांत जी का नाम ढूंढते रह जाएंगे! और आपको देखने को नहीं मिलेगा। इसलिए जब आदरणीय काशीनाथ सिंह की संस्मराणात्मक पुस्तक ‘याद हो कि न याद हो' में नीलकांत जी का नाम दिखा तो मैं आश्चर्य में पड़ गया। यहां नीलकांत नाम कहीं भूल से तो नहीं आ टपका या इसके पीछे तर्क भी है। 
काशीनाथ जी इस पुस्तक के ‘गरबीली गरीबी वह' नामक अध्याय में लिखते हैं- (यह लगभग 1963 की बात है)। 3 मार्च को इलाहाबाद से मार्कण्डेय आए। तब तक नीलकांत की कुछ कहानियाँ छप चुकी थीं और लोगों का ध्यान भी आकृष्ट कर चुकी थीं। सो, एक तो मार्कण्डेय स्वयं चर्चित कहानीकार, दूसरे नए-नए लिखने वाले दो युवा कहानीकारों के भाइयों ने 60 के बाद की कहानियों पर खूब बातें कीं-एक दिन, दो दिन, तीन दिन। भैया (नामवर सिंह) ने बातें शुरू कीं हम दोनों की कहानियों के संदर्भ में और ये बातें इतनी गंभीर थीं कि मैं चकित। 
शुरू किया था भैया ने हेमिग्ंवे की कहानियों से। उनकी यही खासियत थी। साहित्य या राजनीति की एक अदना से अदना नामालूम-सी चीज या समस्या को उठाकर विश्व-साहित्य या विश्व-राजनीति के मानचित्र पर रख देते थे और तब उसका जायजा लेते थे। संभव है कि वह मानचित्र हमेशा प्रत्यक्ष न दिखाई पड़े, लेकिन वह उनके दिमाग के एक हिस्से की दीवार पर स्थायी रूप से टंगा रहता था। 
नीलकांत जी कोई एक बात या घटना लेते हैं और पीछा करते  हुए उसके अंदर भीतर तक चले जाते हैं। इसके उलटा काशीनाथ जी करते हैं। बाहरी दृश्यों का चित्रण। कांसिस्टेंट चिंतन इनके बस की बात नहीं है। मुझे चिंतन और बोरियत वाली कहानियाँ पसंद नहीं हैं। 
एक भैया के चलते आज काशीनाथ सिंह कहां हैं और एक भैया के चलते नीलकांत जी कहां हैं? यह तो शायद ही किसी को बताने की जरूरत है। बकौल दिनकर-‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास'। मैं अपने पिछले संपादकीय में लिख चुका हूं कि उपेन्द्रनाथ अश्क ने कभी अपने में एक इंटरव्यू में कहा था कि नामवर सिंह को अपने भाई काशीनाथ सिंह को छोड़कर दूसरा कोई कहानीकार नहीं दिखता है। खैर। 
काशीनाथ की पशंसा नामवर सिंह के मुख से मैं भी साथ में शराब पीते हुए सुन चुका हूं।  
मुझे याद आ रहा है लगभग (13-14) वर्ष पहले 2002-2003 में, उस समय मैं कोलकाता के पभात खबर में उपसंपादक था और अगले वर्ष 2004 में इसी शहर में दैनिक जागरण में आ गया था, जहां 2011 के अगस्त तक रहा। 2003 के पुस्तक मेले में नामवर जी ने मेरी पहली कविता पुस्तक ‘संगीन के साये में लोकतंत्र' और अब तक की वही आखिरी भी है, का विमोचन किया था। निश्चित ही उन्होंने कुछ कहा होगा, उस पर फिर कभी। उस वर्ष काशीनाथ जी भी आए थे। जो फोटो हमारे पास है उसमें वह मौजूद हैं। हाँ, तो कह रहा था कि शराब पीने के दौरान (पत्रकार-लेखक कृपाशंकर चौबे की मौजूदगी में) नामवर जी कह रहे थे-“रचनाकार बहुत दिनों तक याद किया जाता है और आलोचक बहुत जल्द भूला दिया जाता है। काशी युगों तक याद किया जाएगा और मैं दशकों तक। तब तक मैं दो-तीन पेग ले चुका था, सो नामवर जी की हर बात पर लोट-पोट हो रहा था। (उस समय तक शराब के बारे में बहुत नहीं जानता था, आज भी बहुत नहीं जानता हूं)। नामवर जी की बात से असहमति जताते हुए कृपा जी कह रहे थे-“सर, आप हिन्दी साहित्य में हैं और रहेंगे।'' 
दूसरा प्रसंग  भी कोलकाता का ही है। मैं दैनिक जागरण में आया ही था और उसी समय रवीन्द्र कालिया वागर्थ के संपादक और ममता कालिया भारतीय भाषा परिषद की निदेशक बनकर आयी थीं। काशीनाथ सिंह परिषद के गेस्टहाउस में ठहरे थे। कृपा जी ने मुझे भी बुलाया। मैंने पूछा कि और कौन रहेंगे। उन्होंने कहा-बस तीन-चार लोग। मैं गया तो वाकई तीन से ज्यादा नहीं थे-काशीनाथ जी, कृपा जी और विनोद शर्मा (व्यंग्यकार), चौथा मैं। पीने-खाने का दौर शुरू हुआ। उसी दौरान मैं काशीनाथ की प्रतिनिधि कहानियां पढ़ रहा था, और ‘कविता की नई तारीख' कहानी उस पुस्तक में मुझे बहुत अच्छी लगी थी। मैं सोचा इसी कहानी के साथ दो-तीन घंटे गुजार देना बहुत मुश्किल नहीं होगा। और हुआ भी वही। काशीनाथ जी के साथ कविता की नई तारीख पर ठहाका लगाता रहा। अंतिम पेग ले रहा था तभी रवीन्द्र कालिया आ गये। मुझे काशी जी के साथ शराब पीते देख कालिया जी ने चुटकी ली-काशी, तुम्हारी फॉलोइंग अच्छी है। काशी जी ने कालिया जी से भी कहा, तुम भी लो। उनका जवाब था-अब कहां लेता हूं, तुम तो जानते ही हो, अब देरी ना करो-ममता खाने पर इंतजार कर रही है। इतना सुनते ही मैं बचा-खुचा गटक गया और कुछ समय बाद वहां से निकल गया। संभव है कि मैं इन प्रसंगों को यहां नहीं दे सकता था पर यह इसलिए जरूरी हो गया कि मैं यह समझना चाहता हूं कि क्या ‘शराब की सहृदयता' और ‘साहित्य की सहृदयता' दोनों अलग-अलग चीजें हैं। ऐसी बात नहीं होती तो मेरे बार-बार के अनुरोध के बाद भी क्या नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी, ज्ञानरंजन और न जाने कितनों से मैंने कहा कि छोटी ही टिप्पणी आप नीलकांत जी पर दें, पर कहीं  से इनकार तो कहीं से आश्वासन ही मिलता रह गया! ...  तो मालूम पड़ा कि ‘शराब की सहृदयता' कुछ पल के लिए है और ‘साहित्य की सहृदयता' असली जंग और तंज है, अरे, छोड़ो भी यार! हिन्दी में कहां तुम सहृदयता लेकर आ टपके और वो भी नीलकांत जी के लिए।  
नीलकांत जी अचानक आउटसाइडर हो गये या परिस्थितियों ने उन्हें ऐसा बनाया, इस पर विचार जरूरी है। प्रश्न उठता है कि कोई आउटसाइडर बनता ही क्यों है? जवाब होगा-परंपरा से चली आ रही सोच का वह पोषक नहीं होगा। समाज में व्यापक पैमाने पर फैली अराजकता के बारे में बोलने में वह संकोच नहीं करेगा। अगर गुरु-शिष्य परंपरा, महिमामंडन के चलते सच बोलना छोड़ दिया जाए, तब तो ग़ड़बड़ी के ठीक होने की उम्मीद बिल्कुल ही नहीं रहेगी। कोई बात नहीं है। नीलकांत जी कभी इनसाइडर हो ही नहीं सकते हैं, इसलिए उन्होंने आउटसाइडर होना स्वीकार किया। उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता, और पड़ता तो पड़ ही गया होता, नहीं पड़ा तो आज भी उसी अंदाजे बयां में जी रहे हैं- “जो घर पूंके आपना-चले हमारे साथ।'' 
चलते-चलाते आदरणीय रमेशचंद्र शाह जी के बहाने रामचंद्र शुक्ल को एक बार फिर से याद कर लिया जाए। शाह जी अपनी पुस्तक ‘आलोचना का पक्ष' के आशुतोष तुम अवढरदानी अध्याय  की शुरुआत करते हैं-(जानसन नहीं रहे। उनका समकक्षी कोई नहीं, चलो बॉजवेल, इस शून्य को भरने के लिए किसी एक ऐसे व्यक्ति के पास जो कहीं से भी उस आदमी का स्मरण हमें दिलाए। क्या तुम्हें दिखाई पड़ता है कहीं ऐसा व्यक्ति? मुझे तो दिखाई नहीं पड़ता। ) एडमंड बर्प (बॉजवेल की पुस्तक ‘द लाइफ ऑफ सेम्युअल जानसन' का उपसंहार) 
“ऑगुस्टस के राज की तारीफ करते हुए इतिहासकार गिब्बन ने कहीं लिखा है कि ‘उसे जो रोम मिला था वह ईंटों से बना रोम था और उसने जो अपने उत्तराधिकारियों को सौंपा, वह संगमरमर का रोम था।' पंडित रामचंद्र शुक्ल के किए-धरे की तारीफ करनी हो तो यह रूपक भी छोटा पड़ेगा क्योंकि उन्हें जिस रोम से साबका पड़ा था, उसकी ईंटें भी उन्हें खुद ही जुटानी पड़ी थीं। ऐसी स्थिति में जब तक कोई साहित्य का बख्तियार खिलजी ही आ के हिन्दी की ईंट से ईंट नहीं बजा देता, तब तक शुक्ल जी के फिर अवतरित होने की गुंजाइश तो नहीं दिखती।'' 
नीलकांत जी आप क्या कहते हैं? 
                  मीर फरमाते हैं- 
                किस किस अदा से रेख्ते मैंने कहे वले, 
                समझा न कोई मेरी जबां इस दयार में।  - निर्भय देवयांश ( - अंक फरवरी-मार्च , 2017  से साभार )

Saturday, February 11, 2017

0 नव स्त्रीवाद – जमीन से पृथक अंतर्विरोध : उमाशंकर सिंह परमार

[ यह बहुचिंतित समालोचना कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका 'लमही ' (संपादक-विजय राय ) के हालिया अंक  जनवरी -मार्च , 2017 में प्रकाशित हुई है, जिसे साभार यहाँ छापी जा रही है। । ] - 
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Sunday, January 22, 2017

1 छायावादी प्रेत की भटकती आत्माएं: उमाशंकर सिंह परमार

छायावादी प्रेत की भटकती आत्माएं- उमाशंकर सिंह परमार
(नरेश सक्सेना, ज्ञानेन्द्रपति, श्री प्रकाश शुक्ला की काव्यात्मकता पर)

भाषा व्यक्ति के परिवेश से जन्म लेती है। व्यक्ति जिस यथार्थ को जी रहा होता है, जिस यथार्थ से उसके संवेग और चिन्तन विनिर्मित होते हैं, वही यथार्थ उसको भाषा प्रदत्त करता है। इस तरह से भाषा रचना में कवि का अन्तर्ग्रथित व्यक्तित्व है। कवि की संवेदना कितनी वास्तविक है, कितनी आभासी है और कितनी नकली है, भाषा ही बता सकती है। यदि कवि ने बगैर पीड़ाबोध संवेदना के कविता लिखी है तो निश्चित है उसकी भाषा कलात्मक अभिरुचि चमत्कार को अधिक तरजीह देगी। वास्तविक संवेदनाएं कला की बजाय अभिव्यक्ति की गहनता पर बल देती हैं। 
कलाएं तभी सक्रिय होती हैं जब संवेदनाएं संवेदना होकर महज मानसिक चिन्तन के स्वरूप में, अवचेतन में विद्यमान रहती हैं। छायावाद आभासी यथार्थ का बड़ा युग माना जाता है। इसके अधिकांश कवि कलावादी थे। मगर जैसे ही आलोचना ने अपने औजारों की बुनियादी अवधारणाओं में तब्दीली की वैसे ही छायवाद के बड़े-बड़े दुर्ग ढहते चले गये और निराला एक बड़े कवि के रूप में स्थापित हो गये। निराला छायावाद की हर एक विशिष्टता से पृथक थे। वह कलात्मक आबद्धता को अस्वीकार करते थे, संवेदनाओं को आभासी रखने के समर्थक नहीं थे, वह कविता का  जन्म ही यथार्थ संवेदन से मानते थे- “ देखा एक दुखी निज भाई / दुःख की छाया पड़ी हृदय में / झट उमड़ वेदना आई'' संवेदनाओं का नकलीपन निराला में नहीं था। बाकी समस्त कवियों में संवेदन आभासी काल्पनिक रहा, शायद यही कारण है वो अतिकल्पना, अतिभावुकता, कलात्मक चमत्कार में उलझकर रह गये। आज का युग उत्तर आधुनिकता का युग है। वैश्विक पूँजीवाद आवारा पूँजी के व्यापक हस्तक्षेप का युग है। जन-जीवन की शैली सामाजिक संरचनाओं का पारम्परिक ढाँचा बदल चुका है। जिस लोकतत्र को हमारे विचारकों और आम जनता ने बड़े भावुक अन्दाज में ग्रहणकर मानवीय विमुक्ति का आगाज़ समझा था, आज उसका स्वरूप भी तब्दील होकर जन-विरोधी हो चुका है। सत्ता और पूँजी की अति निकटता ने मूल्यों में जोरदार हस्तक्षेप किया है। इस हस्तक्षेप से एक तरफ तो आम जनता में इस लोकतत्र के प्रति गहरी अनास्था उत्पन्न हुई है तो दूसरी तरफ कविता ने प्रतिक्रियावादी मान्यताओं से मुठभेड़ करने के लिए नये तरीके शिल्प का आविष्कार कर लिया है। यही कारण है आज कलात्मक उक्ति वैचित्र्य की जगह सपाट कथनों को तरजीह दी जा रही है। आभाषी यथार्थ की बजाय वास्तविक यथार्थ के बिम्ब अधिक परिलक्षित हो रहे हैं। सामाजिक संरचनाओं के आधार पर नयी विकृतियों जातिगत वर्गगत संवेदनाओं और अनुभूतियों को तरजीह दी जा रही है। यह युग का तकाजा है आज थोथी भावुकता, आसमानी कल्पना, भाषा का चमत्कार, बलात् लयबद्धता और भारी-भरकम उपमाओं का जमाना नहीं है। वास्तविक यथार्थ को वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ सीधे कहने की परम्परा है। लेकिन कवि भी मनुष्य है, उसकी अपनी सामाजिक और जातीय स्थिति होती है, उसकी अपनी वर्गीय समझ भी होती है। 
उच्च-मध्यम वर्गीय बुर्जुवा परिवेश और परिवार में पले-बढ़े व्यक्ति की भाषा और संवेदना कैसे वास्तविक यथार्थ को तरजीह देगी? एक दलित लेखक की भाषा और संवेदना कैसे सामन्ती सवर्णों की भाषा से मेल खाएगी? स्त्राr की जमीनी अनुभूतियाँ और पुरुष वर्चस्ववादी दृष्टि की मुखालफत कैसे पुरुषवादी नजरिए से मेल खाएगा? यह सवाल महज नजरिए का नहीं है, कविता की भाषा का सवाल है। जातीय और वर्गीय संरचनाएं व्यक्ति की भाषा सुनिश्चित करती हैं और भाषा कवि की संवेदना और यथार्थ का निरूपण करती है। कवि की वैचारिक समझ यदि यथार्थ की संरचनाओं के अनुरूप, सवालों के अनुरूप, नये उभारों और हाशिए की अस्मिताओं के अनुरूप नहीं है तो कविता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज हिन्दी कविता में शौकिया और पेशेवर कवियों का बड़ा समूह है  जिन्होंने संवेदना और यथार्थ को उपेक्षित किया है। उनके लिए कविता सरोकारों के लिए नहीं पुरस्कारों के लिखी जाती है। कविता का सम्बन्ध समाज की वास्तविक संरचनाओं से नहीं चमत्कार से होता है। कविता की शक्ति अनास्था प्रतिरोध और वर्ग-चेतना का निरूपण नहीं मनोरंजन और चर्चा है। इन शौकिया कवियों ने केवल चर्चा और पुरस्कार के लिए लिखा है। विचारधारा और सरोकार के सहारे आज की सामाजिक अवस्थितियों, अस्मिताओं और अन्तर्विरोधों का विश्लेषण बिल्कुल नदारद है। यदि है भी तो बुर्जुवा छायावादी काव्य-फार्मूलों का इतना अधिक प्रभाव है कि यथार्थ विकृत और आभासी बनकर निष्प्रभावी हो जाता है। समकालीन हिंदी कविता में छायावादी फार्मूलों के आधार पर चमत्कार को नमस्कार करने वाले तीन कवि बड़े चर्चित हैं। 
नरेश सक्सेना लखनऊ के हैं, बुजुर्ग हैं, इनके दो कविता संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं-पहला कविता संग्रह-समुद्र में हो रही बारिस और दूसरा कविता संग्रह है-सुनो चारूशीला। दोनों कविता संग्रह काफी समय अन्तराल के बाद प्रकाशित हुए हैं। मगर भाषागत चमत्कार ने मम्मट परिभाषितकाव्य रसिकों' को बहुत आकर्षित किया जिससे चर्चा में बने रहे, पुरस्कृत भी हुए। 
दूसरे कवि हैं ज्ञानेन्द्रपति, जो साहित्य अकादेमी पा चुके हैं, बड़े कवि हैं, इनकी खूबी है कि लोकधर्मी और मीडियाकर दोनें तरह के आलोचक इन्हें पंसद करते हैं। अहा ग्राम्य जीवन वाले  लोकधर्मी आलोचक इन्हें लोकधर्मी कवि कहते हैं, भले ही इनकी कविता में लोक नामक किसी भी तत्व का सिरे से अभाव हो। संशयात्मा पर साहित्य अकादेमी पाकर ज्ञानेन्द्रपति जी बड़े कवि के रूप मे स्थापित हैं। 
तीसरे, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर होने के कारण अपने शिष्यों और विश्वविद्यालयी राजनैतिक चौखटों में जकड़े आलोचकों और पुरस्कारों के बीच लोकप्रिय कवि श्री प्रकाश शुक्ला। इनके कई कविता संग्रह चुके हैं अभी भी निरन्तर लिख रहे हैं। इनकी खाशियत है कि हिंदी के तमाम बड़े प्रकाशकों और मठों और राजनीतिज्ञों के बीच इनका महत्व है और कविता कमजोर और भावुक विलाप होने के बावजूद भी अपनी पहचान और साख के बूते पाठकों को सुनाने में सफल हो जाते हैं। व्यक्ति का पद और पहचान कैसे व्यक्ति की रचनात्मकता बन जाती है, यह देखना है तो अशोक बाजपेयी, केदारनाथ सिंह और श्री प्रकाश शुक्ला से बेहतर कोई उदाहरण नहीं है। बहुत से कमजोर कवि जैसे अशोक कुमार पांडेय, जीतेन्द्र श्रीवास्तव आदि अपने लेखन और कवि कर्म के कारण पहचान नहीं बना सके, बल्कि कविता की राजनीति और अपने सम्बन्धों के कारण पुरस्कृत और कुचर्चित हुए। मगर कविता के क्षेत्र में कोई भी गम्भीर समझदार आलोचक इनका नाम नहीं लेता है। श्री प्रकाश शुक्ला भी ऐसे कवि हैं। इन तीनों कवियों को यदि गहराई से पढ़ा जाय, इनकी कविताओं का आज की सामाजिक जातीय संरचना के आधार पर मूल्यांकन किया जाए तो ये बुरी तरह से असफल कवि हैं। चमत्कार तीनों को प्रिय है या यह भी कह सकते हैं कि तीनों चमत्कारवादी कवि हैं। तीनों में बलात् चमत्कार पैदा करने की ऐसी लालसा दिखाई देती है कि ये यथार्थ को विकृत कर उसका भी सत्यानाश कर देते हैं। संवेदनाओं का नकलीपन तो इनकी अपनी वर्गीय अवस्थिति का तकाजा है। जब इन्हें वास्तविक यथार्थ को अस्वीकार करना ही है तो संवेदनाएं कैसे वास्तविक होंगी? इनका काव्य छायावादी, अतिभावुकता, अतिकाल्पनिकता, चमत्कार, युग विरोध एवं भाषाई क्रीड़ा को तरजीह देता है। कल्पनाजन्य ऊँची उड़ानें इनकी कविता का कच्चा माल है। छायावाद का प्रभाव इनकी कविता में इस कदर है कि छायावादी युगीन सामन्ती समाजों के मूल्य भी इनकी कविता में उतर आए हैं। परन्तु इनके आलोचक इन्हें श्रेष्ठ कवि कहते हैं। आलोचकों ने इनकी ओढ़ी हुई विचारधारा को ही वास्तविक विचारधारा मान लिया है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। कविता का विश्लेषण कवि की विचारधारा तय करता है। जब कविता के रचनात्मक मूल्य छायावादी और भाषा चमत्कारपूर्ण है तो कवि कैसे वैचारिक रूप से आधुनिक हो सकता है? ऐसा कोई उदाहरण किसी भाषा के किसी कवि में नहीं है जो परम्परागत मूल्यों के आधार पर आधुनिकता का विश्लेषण कर सके, हिंदी में तो बिल्कुल नहीं है। कला और विचारधारा को लेकर हिंदी में हमेशा विवाद रहा है। इन तीनों कवियों ने खेल यह किया है कि इनकी आत्मा तो कलावादी रही मगर मुद्दे आधुनिक ग्रहण किए। हर युग की अपनी समर्थ भाषा होती है जो युग के सवालों से मुठभेड़ करती है। यदि भाषा का रंग-ढंग छायावादी है तो कवि के मुद्दे कितने ही आधुनिक हों उसका रहस्य पकड़ में जाता है। यही इन तीनों के साथ है। प्रगतिशीलता और कलावाद दोनों पृथक अवधारणाएं हैं, जब हम खुद को प्रगतिशील कहते हैं तो भाषा चमत्कार द्वारा यथार्थ को सूक्ष्म करते हुए विलोपित कर देना उचित नहीं है। हमारा ध्येय यथार्थ है, वही यथार्थ जिसे हम अनुभव करते हैं और अपनी वैचारिकता के खाँचे से उसे परिपक्व कर उसमें अन्तर्निहित प्रतिक्रियावादी तत्वों सम्भावनाओं से विरत होकर प्रस्तुतीकरण करते हैं। तब वह प्रभावोत्पादक मन्तव्यपूर्ण होता है। अनुभव के बाद हमें विचार की आवश्कता होती है कि चमत्कार की। चमत्कार क्षणिक मनोरंजन दे सकता है लेकिन किसी वृहद सरोकार की प्रतिपुष्टि नहीं कर सकता है। नरेश सक्सेना, ज्ञानेन्द्रपति, श्री प्रकाश शुक्ला की कविताओं में सबसे बड़ी कमी इसी रचना प्रक्रिया की है। विचारधारा की बजाय भाषिक रंग-रोगन चमत्कार के प्रति अदम्य लालसा ने कविता को मात्र क्षणिक उबाल बना दिया है। मन में क्षण भर के लिए आनन्द की अवायवीय प्रस्तावना तो कर सकती है मगर स्थाई प्रभाव छोड़ने में बुरी तरह असफल हो जाती है। यहां तक कि चमत्कार का सम्मोहन इतना प्रभावी है कि कविता छायावादी अतिभावुकता की आधुनिक प्रतिकृति सी लगने लगती है। भावुकता, उपमानों का बाहुल्य, कलात्मक असंगतियाँ, भाषा की गैर-जरूरी तोड़-फोड़ कविता को इहलोक से परे आलौकिक अनुभूतियों की आत्मनिष्ठता से युक्त कर देती है। ऐसा लगने लगता है कवि इस लोक और समाज का प्राणी नहीं है, वह संवेदनों के महासागर में नहाया हुआ कल्पनाजीवी देवता है जो लौकिक रीति जन से अपरिचित और अनभिज्ञ है। उसका बोध यथार्थ से अधिक कल्पना में रमता है, वह कल्पना से जीवनी शक्ति उपार्जित करता है और कल्पना में ही जीवन देखता है। नरेश सक्सेना के दोनों कविता संग्रहों में मुझे एक भी कविता ऐसी नहीं मिली जिसमें वो इस लोक की जमीन में खड़े होकर इस लोक को देख रहे हों। वो दिव्यलोक से ही इस लोक का अवलोकन करते हैं। इस बुरी आदत के कारण उनकी कविता वैचारिकता का घोर तिरस्कार करने लगती है और संवेदना बोध को भी फर्जी प्रतीत होने लगता है। उदाहरण के रूप में मैं उनकी कवितापीछे छूटी हुई चीजें' का एक अंश दूंगा, इस अंश में देखिए भोथरी और हवाई कल्पना के कारण कवि का अनुभव झूठा और वैचारिकता प्रतिक्रियावादी हो गया है- “कभी-कभी रातों के सन्नाटे में / चौंक कर उठ जाता हूँ / सोचता हुआ / कि कहीं यह सन्नाटा किसी ऐसी चीज के / टूटने का तो नहीं / जिसे हम हड़बड़ी में बहुत पीछे छोड़ आए हों।'' सन्नाटा ध्वनि हीनता है मगर कवि की सहृदयता देखिए, वह इसमें भी टूटने की ध्वनि सुन रहा है। और ऐसी टूटन का आभास कर रहा है जो कहीं पीछे छोड़ आया है। सन्नाटे में टूटन की आवाज विलक्षण कल्पना है, लोग-बाग वाहवाही कर सकते हैं मगर पीछे छूटने वाली चीजों के प्रति कवि का सम्मोहन समझ में नहीं रहा है। आखिरकार कवि को अपने अतीत से इतना मोह क्यों हैं? जो टूट रहा है वह नया बना भी रहा है। कवि अपने सामन्ती गौरव और श्रेय-प्रेय की टूटन से विचलित है। वह नहीं चाहता कि नयी अस्मिताएं अपने हक और वजूद की प्राप्ति करे, इसलिए वो अपने वजूद और गौरव को रातों की नींद के बीच में भी स्मरण करने लगता है। ऐसा अतीतवाद और अतीत को बचाने की लालसा हमें छायावादी कवि प्रसाद में ही दिखती है। यदि कवि भाषा के चमत्कार और सन्नाटे की चमत्कारिक परिकल्पना में रमता तो शायद अतीतवाद सीधे तौर पर कविता में आता। स्वाभाविक है जब पूँजीवाद अपने झूठे गौरव की टूटन देखता है तो वह मानसिक रूप से अपने अतीत की ओर दौड़ता है वहीं विश्राम पाता है। यदि वह अतीत की भी दौड़े तो उड़नछू कल्पनाओं और उपमाओं में सौन्दर्यबोध करने लगता है, यह दिव्यबोध कविता की रचनात्मकता बन जाता है, ऐसा बोध ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं में भरा-पूरा है। जैसा मैंने बताया कि चमत्कार कविता में दो अपरूपों में आता है, पहले अपरूप का उदाहरण है-नरेश सक्सेना जिनकी कविताएं अतीत के प्रति आग्रही हो जाती हैं तो दूसरा रूप है ज्ञानेन्द्रति और श्रीप्रकाश शुक्ला। इनका चमत्कार कल्पनाजन्य उपमानों में दम तोड़ देता है। अमूमन हर कवि उपमानों का प्रयोग करता है मगर उसका एक वैचारिक आधार होना चाहिए निरा कल्पना नहीं थोपनी चाहिए। यदि केवल कल्पना आधारित चमत्कार सिरजना है तो आप उपमानों के प्रयोग से बचिए, इससे केवल चमत्कारी भर रह जाएंगे। मगर अप्रस्तुत विधानों पर भी कल्पना थोपकर आप कविता को निरा मजाक बनाकर छोड़ देते हैं। मैं ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता का उदाहरण दूँगा, जिसका शीर्षक है-‘मकर-संक्रान्ति के दिवस का शीर्षक। इस कविता का आरम्भ ही अयथार्थ से कोसों दूर है मगर सबसे आकर्षक खंड वह है जहाँ पर वह अतिकल्पना के शिकार हो जाते हैं, देखिएवह एक पतंग है / बिजली के तार पर अटकी हुई एक पतंग / रह-रह हिलाती अपना चंचल माथ / नभ को ललकती / एक वही तो है इस पृथ्वी पर / पार्थिवता की सबसे पतली पर्त / जो अपने जिस्म से / आकाश का गुरुत्वाकर्षण महसूस करती है '' यह पंतग का सौन्दर्यबोध है जिसे कवि मकर संक्रान्ति को देख रहा है और कल्पना की हवाई यात्रा देखिए कि पंतग इस धरती का अनुभव करने लगती है और गुरुत्वाकर्षण बल को भी प्रकट करने लगती है। पंतग का ऐसा उच्चाशयी बिम्ब मात्र छायावादी कवियों के यहाँ प्राप्त होता है। आधुनिक कविता में विशेषकर जब वैश्विक पूँजीवाद फासीवाद का पोषक बनकर जन-मन-गण को तहस-नहस कर रहा हो, हत्या राजनीति बन गयी हो, मकर संक्रान्ति के समय लहलहाते फूलते खेत अकाल और सूखे की मार झेल रहे हों। किसान आत्महत्या कर रहे हों तब मकर संक्रान्ति का यह बिम्ब बहुत मजा देता है। मगर आज के प्रतिरोधी से हम ऐसी आशा नहीं कर सकते हैं। ऐसे बिम्ब वही कवि दे सकता है जिसे दीन दुनिया से मतलब हो, जो यथार्थ से घबराकर कल्पना लोक में विचरण कर रहा हो, उसकी कविता आम जन पाठकों के लिए हो ऐसी कविताएँ, देवपुरुषों के मनोरंजन हेतु होती हैं। ज्ञानेद्रपति से भी आगे बढ़कर श्री प्रकाश शुक्ला की कविता है वो कल्पना और चमत्कार के चक्कर में विशुद्ध छायावादी प्रलाप लिखने लगते हैं। उन्होंने एक कविता लिखी है- ‘ अषाढ़ के बादल' बादल जैसे विषय पर बहुत से कवियों ने कविता लिखी है, केदारनाथ अग्रवाल तो बादल द्वारा क्रान्ति और परिवर्तन का आवाहन करते हैं। कालिदास जैसा सामन्तयुगीन कवि मेघदूतम में बादल द्वारा कृषक ललनाओं का भी हित कराता है। हरिऔंध ने पवन दूतिका में हवा द्वारा जनकल्याण गाँधीवादी सिद्धांतों की विवेचना कराई है। मगर श्री प्रकाश शुक्ला इन सबसे आगे हैं। वो बादल पर लिखने के पूर्व कम से कम निराला का बादल राग पढ़ लेते तो अच्छा रहता, कम-से-कम बादल की अर्थवत्ता का विस्तार कर लेते पर वह ऐसा क्यों करें? उन्हें अर्थ की जरूरत नहीं है, उनकी कविता तो महज मनोरंजन और ऐन्द्रिक सुखबोध की माँग करती है, वही उनके काव्य सरोकारों में भी संस्कार की तरह जड़ हो गया है। निराला आदि कवि अपने युग से टकरा रहे थे-श्री प्रकाश शुक्ला को युग से टकराने की जरूरत नहीं है, देखिए उनकी कविता बादल और कवि बादल के सामने क्या माँग रखता है-“हवाओं में सुगंध बिखेरो/ पत्तों को हरियाली दो / धरती को भारीपन / कविता को गीत दो। '' कोई कह सकता है कि यह आज का कवि है? सुगन्ध, हरियाली, गीत आदि तो नवाबी ठाठ के साधन हैं। आम आदमी को रोटी की जरूरत होती है, उसे सुगन्ध से क्या मतलब? हरियाली केवल पत्तों के लिए माँग रहे हैं, खेतों के लिए माँगने से कवि का कवित्व खतरे में जाता। और जनवादी होने का खतरा पैदा हो जाएगा। आज का युगबोध कविता में भूल से भी आना उन्हें पुरस्कारों और सत्ता पोषित कॉरपोरेट प्रकाशनों की लिस्ट से वंचित कर सकता है इसलिए वह हवा हवाई मदभरी माँगों की लिस्ट बादल को थमा देते हैं। इन तीनों कवियों ने चमत्कार की लालसा में वैयक्तिक सुखबोध वैयक्तिक सौन्दर्य दर्शन का वायवीय काल्पनिक प्रत्याहार किया है। यह छायावादी कवि का मौलिक गुण था जो एन्द्रिक संवेदनों में ही आनन्द की अनुभूति चाहता था वही ये तीनों कर रहे हैं। मुझे अजीब लगता है कि आलोचकों और शिष्यों की अन्धी परम्परा बगैर कवि को सम्पूर्णता से जाने-बूझे कैसे प्रगतिशील कवि होने का तमगा प्रदत्त कर देती है। कम-से-कम कवि की कविताओं को उनके युगबोध से जोड़कर देख लेते, इससे आलोचक महोदयों को चारण बन जाने का खतरा तो होता। 
कवि की सामाजिक और आर्थिक स्थिति उसकी रचना-प्रक्रिया का निर्धारण करती है। तीनों कवि पुरस्कृत हैं। घर भी धन-धान्य से पूर्ण हैं, जीवन कष्टों में रहा नहीं। कविता उनके लिए सरोकार नहीं है, शौक है। इसलिए इन तीनों की मानसिक भाषिक बनावट छायावादी भूत से उबर नहीं सकी है। वैयक्तिकता और अपनी वर्गीय जातीय धार्मिक स्थिति इतना अधिक प्रभावी है कि तीनों सामाजिक यथार्थ अस्मिताओं की सत्ता को अस्वीकार करने लगते हैं। भाषा और चमत्कार भी वैयक्तिकता की देन है। वैयक्तिकता जब सन्तुलित आकृति में उभरती है तो कविता होने की शर्तें सामाजिक समझ बरकरार रहती है। जब वैयक्तिकता खतरनाक हो जाती है तो कवि इतिहास और मुल्क की संस्कृति को भी नकारने लगता है वह प्रतिक्रियावादी हो जाता है। ऐसा प्रतिक्रियावाद नरेश सक्सेना में बड़ा भयावह रूप धारण कर लेता है। वो इतिहास बोध का गलत प्रमाणन करने लगते हैं। उनकी कविता छह दिसम्बर बहुत चर्चित कविता है, कवि की मंशा कुछ और कहने की है मगर आत्मग्रस्त वैयक्तिकता के खतरनाक आग्रह कुछ और कहला देते हैं। देखिए कविता-“ इतिहास के बहुत से भ्रमों में से / एक यह भी है / कि महमूद ग़ज़नवी लौट गया था / लौटा नहीं था वह / यहीं था / सैंकड़ों बरस बाद अचानक / वह प्रकट हुआ अयोध्या में / सोमनाथ में उसने किया था / अल्लाह का काम तमाम / इस बार उसका नारा था / जय श्रीराम।''  महमूद गज़नवी आक्रमणकारी था। उसने धर्म का प्रचार करने के लक्ष्य से सोमनाथ मन्दिर को नहीं तोड़ा था बल्कि मन्दिर की अकूत धन सम्पत्ति लूटने के लिए मन्दिर तोड़ा था। यह बात इतिहास सिद्ध है। मगर कवि चमत्कार की लालसा और अपने अवचेतन में विद्यमान प्रतिक्रियावादी आग्रहों के समक्ष नतमस्तक है। वह बाबरी मस्जिद ध्वन्स करके देश में दंगा कराने वाली साम्प्रदायिक ताकतों की तुलना महमूद गजनवी जैसे डकैतों से कर देता है। डकैत एक आदमी का नुकसान करते हैं जबकि साम्प्रदायिकता समूचे मुल्क की सुख-शान्ति भाईचारा को नष्ट कर देती है। यह कविता बाबरी मस्जिद ध्वन्स की लूट से तुलना करके साम्प्रदायिकता जैसे भीषण अपराध को कमतर करके आँक रही है। यह तो वैसा ही तर्प है जैसा भाजपा देती है। भाजपा गजनवी और गोरी का उदाहरण देकर अपने हिन्दुत्व को प्रतिक्रिया ठहरा देती है। इसमें भी कवि ने बाबरी मस्जिद टूटने को गजनवी की प्रतिक्रिया ठहराने की कोशिश की है। दूसरी कमी है, यह तर्प भी असंगत है क्योंकि डकैती और दंगों में अन्तर होता है। दोनों की तुलना नहीं की जा सकती है। यदि दोनों की तुलना की जाती है जैसा कवि ने किया है तो इतिहास का इससे भीषण कुपाठ नहीं हो सकता है। कवि को इतिहास के निकषों का तार्किक बोध तो होना ही चाहिए मगर नरेश सक्सेना को इतिहासबोध जैसी वैचारिक अवधारणाओं से दूर-दूर तक का नाता नहीं है। उनका नाता केवल चमत्कार से है, विचार से नहीं है। चमत्कार का प्रभाव इतना व्यापक है कि नरेश सक्सेना अपने अहंमूलक छद्म को भी उघाड़कर रख देते हैं। सामाजिक-राजनैतिक सरोकारों जरूरतों का ख्याल रखे बगैर वह अपनी सामन्ती और शासक वर्गीय अवधाराणाएं और सोच थोपने लगते हैं। साम्प्रदायिकता एक जरूरी विषय है, हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए मगर इसका आशय यह नहीं है कि हम इसमें कल्पना का आरोपण कर इसका सौन्दर्य रस आस्वादित करें। बहुत से कवियों ने इस विषय पर कविताएं लिखी हैं, मगर इस विषय पर सौन्दर्य की सृष्टि करना जताता है कि कवि इस मुद्दे पर गम्भीर नहीं है। वह केवल इसे फूहड़ मज़ाक समझता है। यह बात आखिरकार पीड़ितों के पक्ष में नहीं जाती बल्कि इस तरह के मजाक से प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ ही मजबूत होती हैं। ऐसे अगम्भीर और भद्दे मजाकों के लिए नरेश सक्सेना की कविताएं कुख्यात हैं। 
देखिए एक कविता जो सुनो चारूशीला कविता संग्रह में है। इसका शीर्षक है रंग- “ सुबह उठ कर देखा तो आकाश / लाल , पीले, सिंदूरी और गेरू, रंगों से रंग गया था / मजा गया, आकाश हिंदू हो गया है/ पड़ोसी ने चिल्लाकर कहा / अभी तो और मजा आएगा / मैंने कहा / बारिश आने दीजिए / सारी धरती मुसलमान हो जाएगी।'' आकाश की छटा देखकर कवि को हिन्दू और बरसात की हरियाली देखकर मुसलमान याद आने लगे। कवि को इस पर मजा भी रहा है। साम्प्रदायिकता जातीयता का ऐसा चमत्कारिक सौन्दर्य आस्वादन किसी कवि ने आज तक किया होगा। हिन्दुस्तान का वैचारिक तबका मनुष्यता की हत्यारी इस फासीवादी वृत्ति से आक्रान्त रहा है मगर नरेश सक्सेना की कविता से प्रतीत हो रहा है कि वो जरा भी गम्भीर नहीं हैं। यदि आप साम्प्रदायिकता के खिलाफ कुछ कह नहीं सकते तो कम-से-कम अपनी वैयक्तिक बहुसंख्यक वृत्ति को छिपा तो सकते हैं मगर ऐसा नहीं हो सकता है। इसके लिए इतिहासबोध और देश की वस्तुस्थिति की जानकारी जरूरी है। वैचारिकता जरूरी है जो उनके पास नहीं है। ऐसी बकवास विचारहीन-संवेदनहीन कविताओं का नरेश सक्सेना में अम्बार लगा है। नरेश सक्सेना की भाषाई कबड्डी चमत्कार इतिहासबोध और गम्भीर मुद्दों को पलीता लगाकर उड़ा देती है और प्रतिक्रियावाद का पक्षपोषण करने लगता है तो ज्ञानेन्द्रपति और श्री प्रकाश शुक्ला की भाषाई कबड्डी सामाजिक अस्मिताओं का मज़ाक बना देती है। ज्ञानेन्द्रपति में चमत्कार की लत इतनी खतरनाक है कि यह केवल छायावादी अति-काल्पनिकता नकली भावुकता का बिम्ब ही नहीं रचती बल्कि स्त्राr विरोधी मर्दवादी रवैये का पक्षपोषण करने लगती है। हम सब नारीवाद पर लम्बे भाषण देते हैं मगर मन में छिपे पित्रसत्तावादी मर्द से कभी विमुक्त नहीं हो पाते हैं। यदि पुरुष समुदाय स्त्राr की जैविक सामाजिक कठिनाईयों के प्रति संवेदनशील होता तो स्त्राr के मातृत्व पर कभी सौन्दर्यबोध का आसमानी रंग चढ़ाता ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता है- “एक गर्भवती औरत के प्रति'' इस कविता को कवि महाशय घनघोर उपमानों और अभिधानों से थोपकर उसके निजी दुख, वेदना ममत्व अनिवार्यता का मजाक बना देते हैं। ऐसा मजाक उस पीड़ा की अनदेखी है जिस पीड़ा को प्रसव के वक्त गर्भवती अवस्था मे एक स्त्राr भोगती है। स्त्राr की देह सदैव से सामन्तवादी  पुरुषों  के लिए सौन्दर्य का स्रोत रही है। वह कष्ट में रही है तब भी सामाजिक बाध्यताएं उसके विरोध चीख को नैतिक मूल्यों द्वारा दबा देती रही हैं। यही कारण है आज स्त्रियों को अपना पक्ष खुद लेकर रचनात्मक आन्दोलन करना पड़ा है मगर ज्ञानेन्द्रपति जैसे चमत्कारवादी कवि आज भी स्त्राr की अस्मिता और उसके सवालों से मुठभेड़ करने में कतराते हैं। देखिए इस कविता में एक मर्द की समूची वर्चस्ववादी कुंठा उबाल पर है- “ कितनी फैलती जा रही है परिधि तुम्हारे उदर की / तुम क्या जानो / कि अंतरिक्ष तक चली गयी है यह विरूप गोलाई और ये पेड़-पौधे मकान, सड़कें, / यह पोल वह कुत्ता / उछलता वह मेढक / रँभाती गाय बाड़ कतरता माली क्षितिज पर का सूरज / सब उसके अंदर चले गये हैं और तुम भी। '' उप् इतनी संवेदनहीनता स्त्राr के मातृत्व का इतना घोर अपमान? और यह एक संवेदनशील और पुरस्कृत कवि कर रहा है। यदि स्त्राr का पेट बढ़ गया है तो आप भी समझ रहे हैं और स्त्राr भी समझ रही है कि पेट क्यों बढ़ा है। यह भी पुरुष की देन है लेकिन स्त्राr यदि सच को कह भी रही है तो कवि बड़ी बेदर्दी से खंडन करते हुए कह रहा हैतुम क्या जानो' अर्थात स्त्राr अपनी पीड़ा नहीं समझती केवल मर्द समझता है। यह सोच वही है जिसे मनुस्मृति में प्रमाणित किया गया है, जो कवि के मनोजगत में घर करके बैठ गयी है अर्थात स्त्राr जन्मणा मूर्ख होती है। नहीं तो कवि कोतुम क्या जानो' कहने की क्या जरूरत थी। अब कवि की समझदारी भी देखिए कि वह पेड़-पौधे मकान पोल खम्भे गाय बाड़ा यहाँ तक कि मेढक भी उसके पेट में घुसेड़ देता है। हद हो गयी फूहड़ और मर्दवादी पुंठा की। और देखिए, आखिरी पंक्ति में वह स्त्राr को भी उसके गर्भाशय में डाल देता है। मगर अपने आपको बचा लेता है क्योंकि अपने आपको बचाने से मर्दवाद का सामन्ती अहसास बचा रहता है। यह तो स्त्राr के प्रति बेहद संकुचित और वर्चस्वादी मर्द का बयान है। जब कलात्मक और फर्जी कल्पनाओं की पूँछ पर लटक कर कविता लिखना है तो जाहिर है कहीं कहीं आप सामाजिक संरचनाओं और दबी- कुचली अस्मिताओं का विरोध करेगें। ऐसा विरोध छायावाद में भी नहीं दिखता है। छायावादी कविता में देह है मगर अपनी गरिमा के साथ उपस्थित है। यहाँ तो कवि इस गरिमा को भी तार-तार कर रहा है। इसी तरह उनकी दूसरी चर्चित कविता  इंतजार है। इस कविता मे वेश्यावृत्ति पर कवि ने एक स्त्राr को शिकारी तक कह दिया है। भाषागत खिलवाड़ और संवेदनहीनता के कारण उसे भयानक भूत और प्रेतों-सा चित्रित किया है। देखिए कविता-“ जाएगी उनमें वह चमक जो केवल / बुरी स्त्रियों की आँखों में होती है / लालसा और घृणा से भर देने वाली चमक / आहिस्ता चलती हुई / अपने शिकार की तलाश में निकलेगी इस मैदान में।'' वेश्याएं समाज का ऐसा तबका है जो मर्दवादी समाज की देन हैं। गरीब मजलूम औरतें-मर्दों के हाथ का खेला बनकर इस गन्दगी में उतरती हैं। यह गन्दगी किसी समुदाय की नहीं है, मर्द प्रजाति की है। औरत-मर्द के बगैर कैसे वेश्या बनेगी? मर्द ही उसे वेश्या बनाते हैं और मर्द ही शुचितावाद की दुहाई देते हुए उसके इस मजबूर पेशे पर तंज कसते हैं। यहां तक कि उसे भूत प्रेत और शिकारी तक कहने में नहीं चूकते हैं। कवि ने इस कविता में अपने भीतर स्थित शुचितावादी मर्द का सामन्ती चेहरा उजागर कर दिया है। इस कविता के अन्त में कवि कहता है - वह शिकार के लिए पूरी तैयारी के साथ निकलती है मगर खुद शिकार हो जाती है, यह अंश मर्दवादी सत्ता की जीत को प्रकट करता है। मतलब स्त्राr कितना भी वेश बदल ले वह मर्द का ही शिकार होगी। इस कविता में कवि स्त्राr के प्रति कोई संवेदना नहीं रखना चाहता, वह केवल मर्द को विजित दिखाना चाहता है, नहीं तो उसका ध्यान उस पहलू पर अवश्य जाता जिस कारण वह इस पेशे में उतरी है, कि उसके रूप और लालसा चमक का विधान करता। स्त्राr विरोध का यही अंधा भटकाव श्री प्रकाश शुक्ला में भी मिलता है। चमत्कार और कलाकारी ने इन कवियों के चिन्तन को लील लिया है, ये क्या लिख रहे हैं, इन्हें खुद नहीं पता चल रहा कविता किस बुनियाद में खड़ी की जा रही है यह भी इनको नहीं पता। बस कविता लिख रहे हैं, चमत्कार पैदा कर रहे हैं। कवि ने कहा कि श्रृंखला छापी जा रही है। पुरस्कार झटक रहे हैं। शिष्यों से फेसबुक में कविता लगवा रहे हैं। लाइक पा रहे हैं। आत्ममुग्धता का भीषण राग गा रहे हैं और आलोचक इनके पालतू आलोचक भी इन्हें समझाने की कोशिश नहीं करते कि हे गुरूदेव, हे कविवर, आज की स्थिति क्या है और आप कहाँ भटक रहे हैं, उन्हें बताना चाहिए कि यह दौर जनवादी कविता का है और आप छायावादी भूत की आत्मा बने हुए हैं। इनकी एक कविता है - “एक स्त्राr घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती है'' आम तौर पर मर्दवादी समाज स्त्राr के शोषण के दो तरीके अपनाता है- एक तो वह उसको भयभीत करता है या फिर उसका महिमामंडन करता है। स्त्राr का घर से निकलना मर्द की हार है, यह सामन्ती सामाजों की समझ होती है इसलिए वो उसे घर की देवी आदि कहकर उसे उस व्यवस्था से बाँधे रखता है। उसके इस बन्धन का महिमामंडन और मजाक भी करता रहता है। मगर स्त्राr घर से बँधी क्यों इस बात पर चतुर मर्द चुप्पी मार लेता है। श्रीप्रकाश शुक्ला ऐसे ही चतुर खिलाड़ी हैं। उनकी कविता देखिएएक स्त्राr घर से निकलते हुए भी नहीं निकलती / वह जब भी घर से निकलती है / अपने साथ घर की पूरी खतौनी लेकर निकलती है / अचानक उसे याद आता है / गैस का जलना / दरवाज़े का खुला रहना / नल का टपकना और दूध का दहकना।'' औरत की इस विशिष्टता का रेखांकन करने के पूर्व उनको सोचना चाहिए कि रेखांकन की यही महिमामंडन प्रवृत्ति स्त्राr को घर से नहीं निकलने देती है, वह अपने बन्धनों में जकड़ी हुई परिवार की सीमाओं में कैद रहती है और कवि द्वारा प्रयुक्तखतौनी' शब्द तो और भी अधिक घातक है। इस शब्द की व्यंजकता स्त्राr की इस गुलामी का मजाक उड़ा रही है। शुक्ल जी को बताना चाहिए कि स्त्राr जब घर से बाहर जाती है खतौनी कैसे ले जाती है। खतौनी तो दस्तावेज़ होता है क्या वह घर से बाहर जाते समय रजिस्ट्री, खतौनी, खसरा, नक्सा सब लेकर निकलती है? भाषागत चमत्कार के सम्मोहन में कवि स्त्राr की इस विसंगति विडम्बना को मजाक बना देता है। जबकि यह विसंगति मर्दवादी समाज की ही देन है। शुक्ल जी में स्त्राr केवल मजाक के ही रूप में नहीं है वह पुरुष की मर्दवादी अभिव्यक्ति के रूप में भी उपस्थित होती है। स्त्राr विरोध इतनी गहराई से धँसा है कि वह इन्हें माँस के लोथड़े से ज्यादा कुछ नहीं है। इनकी कविता है दुपट्टा। इस कविता में कवि एक स्त्राr के मुख से दैहिकता का ऊल-जुलूल वक्तव्य दिला रहा है। कविता में उपस्थित स्त्राr और कोई नहीं है। यह स्त्राr शुक्ल जी हैं, वह स्त्राr शुक्ल के मनोवेगों आर्थात सामन्तवादी पुरुष के मनोवेगों का प्रतिनिधित्व कर रही है। देखिए कविता-“ दुपट्टा लहरा रहा है शानदार / हवा चल रही है तेज़ / बादल बरसने को हैं / मौसम रहा है लगातार बदल / तय करना कठिन है / दुपट्टा क्यों लहरा रहा है / अंग क्यों भीगे है / उभार क्यों नही है / रंग क्यों गायब है / सवाल करती है युवती / क्यों नहीं किसी को याद आते / कालिदास / या फिर उनकी शपुंतला।'' इस कविता में कवि यह कह रहा है कि बरसात हो हवा चले और स्त्राr के उभरे अंग हों तो अन्य सारे भाव समाप्त हो जाते हैं। तो यथार्थ दिखता है सामाजिक विभेद दिखते हैं, केवल अंगों का उभार दिखाई देता है।  यदि स्त्राr का दुपट्टा लहरा रहा है तो स्त्राr की देह-पुरुष के लिए खुला आमत्रण है। और स्त्राr भी यही चाहती है। यह मानसिकता मनोरोग है और भीषण अपराधों का कारण है। कम-से-कम आधुनिक कवि से ऐसी घटिया और बेहूदी कविता की आशा नही की जा सकती है। यह कविता पढ़कर मुझे तरस आता है उन पुरस्कार दाताओं पर जो तमाम राजनीतियों के आधार पर समाज विरोधी रचनाओं को पुरस्कृत करके अस्मिताओं के खिलाफ घोर अपराध कर रहे हैं। बात यदि स्त्राr तक सीमित होती तो कोई बात नहीं थी। इन कवियों की दो तिहाई कविताएं यथार्थ दलित शोषित मजलूम तबकों का भी विरोध करती हैं। तीनों कवियों के किसी भी संग्रह में नजरिया स़ाफ नहीं है। कवि अपने आपको कहीं भी संवेगात्मक रूप में उपस्थित नहीं करता है, वह यथार्थ के करीब तो आता है मगर दर्शक की तरह भोक्ता की तरह नहीं आता है। यह भी एक किसिम का अभिजात्यवाद है। सच्चा कवि जिस घटना का बिम्ब देता है तो वह घटित होने वाले हर पल की संवेद अनुभूति करता है, वह महसूस करता है, व्यथित होता है, जब वह दर्शक के रूप में आता है तो तो संवेदना रह जाती है आत्मीयता रह जाती है। वह उपदेशक बनकर पाठक को आशाराम बापू की तरह उपदेश देने लगता है। कलावादी कौतुक प्रेमी कविताओं में आत्मीयता का क्षरण अक्सर देखा जाता है। देखिए नरेश सक्सेना की एक कविता डूबना। इस कविता में कुछ सैलानी सूर्य को डूबते हुए देख रहे हैं, वहीं पास में एक बच्चा नदी में डूब रहा है। अब आप तय करिए कि कवि डूबने वाले के प्रति कितना संवेदनशील है-“ खेलता हुआ बच्चा / जाने कब गिरा छटपटाया और डूब गया / देखते रहे सब /पर्वत के पीछे धीरे-धीरे डूबता हुआ सूरज / पानी में सदियों से डूबी चट्टान। '' मुझे प्रतीत हो रहा है यहां कवि भी सैलानियों की भीड़ में है, वह भी सूरज देखने आया है। बच्चे का डूबना वह देख रहा है एक दर्शक की तरह। यदि कवि दर्शक होता तो सहानुभूति और आत्मीयता भी दिखती कि बाकी सैलानियों को कोसता और उपदेशात्मक भंगिमा अख्तियार करता। यहां आत्मीयता का अभाव इसी से प्रकट होता है कि कवि महज एक पंक्ति में डूबने का जिक्र करके खतम कर देता है क्योंकि उसकी ललक तो शाम की ललझौंही अभिराम दृश्य लगी हुई है। डूबने को महज सांकेतित कर देना और उसके साथ तुरन्त डूबते सूर्य का जिक्र सिद्ध कर देता है कि कवि ने किसी ऐसे दृश्य को नहीं देखा, यह फेक दृश्य है, कल्पित है। कवि महज उपदेश का नैतिकतापूर्ण छौंका लगा रहा है। आत्मीयता का अभाव संवेदना की फर्जी संकल्पनाएं मात्र नरेश सक्सेना में ही नहीं बल्कि तीनों कवियों में है। तीनों को फर्जी बिम्ब गढ़ने की आदत है। देखिए ज्ञानेद्रपति की कविता बीज। इस बीज कविता में कवि का लगाव किसानों की वस्तुस्थिति के प्रति नहीं है बल्कि बीज के आदिम महिमामंडन के प्रति है। जैसा कि मैंने पहले बताया है कि कौतुक प्रिय कवि या तो अतीतवादी हो जाता है या यथार्थ विरोधी विज्ञान विरोधी हो जाता है। छायावादी कवियों में या फिर इन तीनों कवियों मे देखा जा सकता है-बीजव्यथा कविता आप देखिएभारतभूमि के अन्नमय कोश के मधुमय प्राण / तितलियों की तरह ही मार दिये गये / मरी पूरबी तितलियों की तरह ही / नायाब नमूनों की तरह जतन से सँजो रखे गये हैं वे / वहाँ सुदूर पच्छिम के जीन-बैंक में / बीज-संग्रहालय में / सुदूर पच्छिम जो उतना दूर भी नहीं है / बस उतना ही जितना निवाले से मुँह / सुदूर पच्छिम जो पुरातन मायावी स्वर्ग का है अधुनातन प्रतिरूप / नन्दनवन अनिन्दय / जहाँ से निकलकर / आते हैं वे पुष्ट दुष्ट संकर बीज। '' इस कविता में कवि फर्जी ज्ञान बघार रहा है। सभी जानते हैं कि किसानों की दुरव्यवस्था का सबसे बड़ा कारण परम्परागत खेती है। अब कवि को परम्परागत बीज और ढंग इतना सुहा रहा है कि वह खाद, मशीन आदि का विरोध कर बैठता है। यदि कवि ने कभी किसानों से मुलाकात की होती या किसानों की वस्तुस्थिति देखी होती तो इतने भावुक ढंग से पुराने बीज का महिमामडंन करता, और यदि किसानों से मिला भी है तो इस कदर आधुनिक संसाधनों का विरोध देखकर प्रतीत होता है कि वह किसानों को मानसून और साहूकारों का गुलाम ही देखना चाहता है। वह किसानों के विकास से विक्षुब्ध है। यहां भी आत्मीयता की बजाय भारत के सबसे गरीब तबके किसानों के प्रति नफरत की भावना का अवगुठंन है। नहीं तो बीज के माध्यम से अतीतवादी संस्कृति और व्यवस्था की चाहत कवि में होती। दरअसल बुर्जुवा वर्ग हमेशा अपने विचारों के माध्यम से हाशिए की अस्मिताओं के पक्ष में हुए परिवर्तनों का विरोध करता है, वह ऐसी स्थिति में अतीत का तर्प लेता है। यह प्रतिक्रियावादी आदत है जैसे संघ और पौराणिक पांखडों के पोषक समूह इतिहास और विज्ञान को झूठा बताते हुए प्राचीन काल के विज्ञान को आज के विज्ञान से श्रेष्ठ बता देते हैं। ऐसे कुतर्प का मतलब बस एक ही होता है येन केन प्रकारेण अपनी पुरातन सामन्ती व्यवस्था को जायज ठहराना और तमाम जातियों और अस्मिताओं को दबाकर रखना। इन तीन कवियों में यथार्थ के प्रति अधिक लापरवाह और जुमले गढ़ने में माहिर कवि हैं श्री प्रकाश शुक्ला जी। पता नहीं किसानों की दुरव्यवस्था और भागीदारी से वंचित करते इतिहास का उन्होंने कभी अध्ययन किया है कि नहीं, मैं नहीं जानता पर उनकी कविताएं किसी सर्वसमावेशी उपदेशक पुरोहित की तरह आदर्शवाद बघारती दिखाई देती हैं। उनका आदर्शवाद बनावट और बुनावट में विशुद्ध अभिजात्य और छायावादी है। जैसे छायावाद मेंहे ग्राम देवता नमस्कार' के गीत गाए जाते थे वही गीत, वही आदर्शवाद शुक्ला में भी है। उनकी कविता देखिएकिसान'  इस कविता में पौराणिक ब्राह्मणवादी जुमलों का नाटकीय प्रयोग करते दिख जाते हैं। पौराणिक ब्रह्म का स्वरूप इन्हें इतना भाता है, मैं सोच नहीं सकता था। बाबा सूरदास के शब्द उधार लेते हुए ये भी लिख रहे हैं- “रूप रेख गुन जाति जुगति बिनु निरालम्ब कित धावै'' वैसे शुक्ला जी अपनी उच्च अभिजात्य पौराणिक ब्राह्मणवादी जुमलों से किसान को भी ब्रह्म की तरह अदृश्य करने की पूरी कोशिश करते हैं- “ उसका कोई रूप है / उसकी कोई जाति / उसका कोई घर है / उसकी कोई पाति / आकाश उसकी छत है / मौसम उसका आभूषण / जिसे आप बुढ़ापा कहते हैं / वह है उसकी आज़ादी / जिसे ढहने के पहले / उसने सुरक्षित कर लिया है / धरती के नीचे / अपने रकबे में '' पता नहीं शुक्ला जी किस युग में जी रहे हैं। समाचार पत्रों में इन्हें किसानों की आत्महत्या की हुई लाश नहीं दिखाई देती है, इन्हें किसान की वर्गीय अवस्थिति दिखाई देती है, इन्हें किसान का कर्ज दिखाई देता है, उसकी जातिगत शोषण परिधि दिखाई दे रही है। मतलब किसान की कोई पहचान ही नहीं है। एक तो मीडिया ने किसान को उपेक्षित किया, दूसरे इस भूमंडलीकरण और राजनैतिक भागीदारी से विस्थापन ने उसको मरणासन्न किया। किसी भी जनसंचार माध्यम ने उसकी वास्तविक स्थिति पर कोई सकारात्मक बयान नहीं दिया और जब कविता की बात आती है तो शुक्ला जी और केदारनाथ सिंह जैसी छायावादी भूत की आत्माएं उनकी पहचान ही गुम कर देते हैं। और घर-बार भी छीन लेते हैं और तिस पर मजाक भी उड़ा रहे हैं कि बुढ़ापा उसकी आजादी है। अरे, बुढ़ापा उसके ऊपर संकटों का पहाड़ है, जब वह अपने श्रम से विरत होकर केवल मौत का इंतजार करता है। उसके पास किसी विश्वविद्यालय की मोटी पेंशन तो होती नहीं कि वह आराम से बैठकर खाएगा, वह जीवन भर अपना खून पिलाकर पेट भरता है और बुढ़ापे में अपने अस्तित्व के लिए हड्डियाँ गलाकर पिलाता है। वह खेत में बुढ़ापे को गाड़कर नहीं रखता है। हद है संवेदनहीनता और बेरूखीपन कि श्रम और शोषित तबके का ऐसा आपमान वह भी पौराणिक जुमलों के बूते शुक्ला जैसे जनविरोधी शौकिया कवि ही कर सकते हैं। ऐसे कवियों को कवि कहने में भी कोफ्त होती है। भाववादी, अतीतवादी कल्पनावादी कलाधिराज समाज की वास्तविक पड़ताल नहीं कर सकते हैं। उनकी कविता में उपस्थित किसान, मजदूर और भूख क्रान्ति इत्यादि देखकर कभी मत सोचिए कि यह प्रगतिशील भी होगा। प्रगतिशीलता, यथार्थवादी अवधारणा है, वह एक विचार है जबकि कल्पनावादी होना यथार्थ का निषेध है। यदि यहां पर यथार्थ उपस्थित होता भी है वह कल्पना और अतिभाववाद से इतना विकृत हो जाता है कि उसकी वास्तविकता के निष्कर्ष शोषित समुदाय के वास्तविक यथार्थ का प्रतिबिम्बन करने की बजाय शोषक समुदाय की अभिजन सौन्दर्य दृष्टि का पोषण करने लगते हैं। यही कारण है जब ज्वलन्त यथार्थ की बात आती है तो  छायावादी प्रेत के शिकार कवि काल्पनिक वृत्ति के सहारे तमाम किस्म की भूमिका बाँधते हुए अन्त में विकृत पूँजीवादी मानसिकता के परम्परागत भय का रहस्य खोलने लगते हैं। देखिए वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना की कविता, यह कविता अंश उनकी भूख कविता से लिया गया है। भूख इंसान की जरूरत, यह क्रान्ति का आगाज करती है, आक्रोश की जननी होती है मगर कविराज इसे हत्यारी और अमानवीय बता रहे हैं। दरअसल शासकवर्ग आम शोषित जनता गरीब जनता से भयभीत रहता है। निश्चित है वह भूख से भी भयभीत होगा उसे परिवर्तन और क्रान्ति से भी भय होता है अस्तु, नरेश सक्सेना यदि भूख को हत्यारी सिद्ध कर रहे हैं तो यह उनकी अपनी निजी वर्गीय और जातीय सोच है। कविता देखिए-  “भूख सबसे पहले दिमाग़ खाती है / उसके बाद आँखें / फिर जिस्म में ब़ाकी बची चीज़ों को / छोड़ती कुछ भी नहीं है भूख / वह रिश्तों को खाती है / माँ का हो बहन या बच्चों का / बच्चे तो उसे बेहद पसन्द हैं / जिन्हें वह सबसे पहले / और बड़ी तेज़ी से खाती है।'' कवि भूख के बाद उत्पन्न आक्रोश से इतना भयभीत है कि वह परिवर्तनकारी सत्ता भूमिका को अस्वीकार कर उसे अपराधी बना देन में तुल गया है। कविता में भी कहीं भी व्यवस्था का सवाल नहीं उठाया गया जबकि भूख व्यवस्था की देन है। कवि को भूख को गाली देने में अधिक अभिरुचि है, कि भूख को जन्म देने वाली सामाजिक शोषक शक्तियों का उद्घाटन करने में रुचि है। यह दृष्टि का सवाल है कला का या फर्जी मनगढ़ंत उपमानों और रूपकों का सवाल नहीं है। इस कविता में कवि की पूरी आस्था अभिजात्य उच्चवर्ग के साथ है। वह क्रान्ति को नकार कर व्यवस्था को बचाए रखने का हिमायती बन गया है। इन तीनों कवियों की अभिजात्य वर्गीय अवस्थिति स्पष्ट है। यदि हम कला और भाषा कौतुक की काई हटाकर देखें तो कविता में सामन्तवादी मनोवृत्ति की वैष्णवी छाया का निर्मल जल प्राप्त हो जाता है। देखिए ज्ञानेन्द्रपति की कविता, इस कविता में श्रम का कलात्मक महिमामंडन किया गया है। मतलब इनमें कला का सम्मोहन इस हद तक है कि श्रम जैसे संवेदनशील विषय से भी सौन्दर्य आस्वादन करने में चूक नहीं करते हैं। निराला जी ने जब देखा कि एक औरत पत्थर तोड़ रही है तो उनकी दृष्टि उसके पसीने, उसके बच्चे और उसकी जीवटता की ओर जाती है। वो कराह उठते हैं, इससे झलकता है कि कवि देखी जाती विसंगति के प्रति कितना आत्मीय और सहृदय है, जबकि ज्ञानेन्द्रपति अपनी कविताकर्म संगीत' में लगभग वैसे ही बिम्ब को आस्वाद मूलक बना देते हैं। आप देख सकते हैं-“कपड़े पछींटता हुआ आदमी / अपने अनजाने संगीतकार बन जाता है / संगीत में मस्त हो जाता है / कर्म का संगीत धीरे-धीरे बन जाता है संगीत का क्रम '' निराला के यहां स्त्राr पत्थर तोड़ रही थी, यहाँ धोबी कपड़े धो रहा है। निराला ने पूँजीवादी व्यवस्था की विसंगति कुकर्मों पर प्रहार किया था और यहां कवि कपड़े फींचने में संगीत की मधुरिम ध्वनि आरोह अवरोह सुन रहा है। हद है संवेदनहीता और विचार विहीनता की, मुझे बड़ा अज़ीब लग रहा है कि इतनी प्रतिक्रियावादी श्रम विरोधी बुर्जुवा कविता कैसे लिख लेते हैं लोग? प्रगतिशील कवि श्रम और श्रमिक समुदायों के प्रति आत्मीयता रखता है तो वह ऐसी स्थितियों को चरित्र के रूप में प्रस्तुत करता है। चरित्र कवि की आत्मीयता की पैदाइश है। नरेश सक्सेना में चरित्र गायब है। अत उनकी चर्चा करना ही बेकार है। ज्ञानेन्द्रपति में चरित्र बहुत खोजने से मिलते हैं मगर कलावादी तिकड़मों से वो चरित्र का पूरा चाल-चरित और चेहरा बदल देते हैं। इसी कविता मे यह शगल देखा जा सकता है। श्री प्रकाश शुक्ला ने चरित्रों गढ़ने की कोशिश की है मगर गढ़ने की कला और सामाजिक समझ होने के कारण वह बुरी तरह असफल हो जाते हैं। उनकी एक कविता है घुर फेंकन लोहार। इस कविता को आप देखिए और बताइए कि श्रम समुदाय के प्रति कवि की आत्मीयता कितनी है और जुमलों के प्रति कवि की आत्मीयता कितनी है- “अपने कंघे पर टँगारी को लादे जाता घुर फेंकन लोहार / हमारे लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण नागरिक है / जब वह चलता है/ हमारे लोकतंत्र का सबसे सजग पात्र चल रहा होता है / जिसकी टाँगों टंगो में अद्भुत लोच है।'' बन्द वातानुकूलित कमरे में बैठ कर काफी और टोस्ट के साथ कविता लिखना अलग बात है और चरित्र का प्रत्यक्ष अवलोकन करते हुए उसकी संवेदनाओं को आत्मसात करना अलग बात है। शुक्ला जी बड़े आदमी हैं जो भी लिख देगें उनके चेले चर्चा कर देंगे, उन्हें किसी भी आत्मीयता और संवेदना की जरूरत नहीं है। बड़ी कठिनाई से वो श्रमजीवी समुदाय का चरित्र लाए हैं पर उनकी वर्गीय और शहरी अभिजात्य वृत्ति इतनी प्रभावी है कि वह लोकतत्र को भी उसके बीच घुसेड़ देते हैं। इससे तो लोकतंत्र पूरा फिट हो पाता है, चरित्र की कोई बखत रह जाती है। पाठक भी नहीं पता कर पाता कि कवि चरित्र गढ़ रहा है कि लोकतत्र के प्रति बयानबाजी कर रहा है। मुझे समझ नहीं आता कि चरित्र की आत्मीयता में लोकतत्र का बिम्ब कैसे? यह जुमलों के प्रति कवि की मुहब्बत का इजहार है उसे तो लोकतत्र के प्रति कोई अनास्था है चरित्र के श्रम पर कोई आस्था है। वह महज भाषा का वितान खड़ा कर रहा है तिस परलोकतत्र का सबसे सजग पात्र' कह रहे हैं। यह घटिया मजाक है। मैं शुक्ल जी से पूछना चाहता हूं कि यदि लोहार, हरिजन, पिछड़े , स्त्राऔर गरीब तबके लोकतत्र के सबसे सजग पात्र होते तो आप जैसे अभिजात्य उच्चवर्गीय सवर्ण क्या ऐसा मज़ाक करते? यह नजरिया गरीबों का उपहास है, कवि की जातीयता का निंदनीय प्रदर्शन है। ऐसी कविताओं को खारिज कर देना चाहिए। शुक्ल जी को यदि जुमलों से सम्मोहन है तो कविता की राजनीति छोड़कर जनता की राजनीति करें। आजकल लोकतत्र ऐसे ही जुमलों पर जिन्दा है। आप जैसे पुरस्कृत कवि होना वहाँ जरूरी है कम-से-कम कविता तो बची रह जाएगी। इन कवियों को समझना चाहिए कि प्रगतिशील कविता भावना रोमांस और अतिकल्पना से नहीं चलती है। इसके लिए वास्तविक सामाजिक यथार्थ का बोध जरूरी है। छायावादी आत्मग्रस्तता, वासना, दृष्टि, कलावाद और भाषाई कबड्डी की आज कोई जरूरत नहीं। आज का युग भूमंडलीकरण का युग है, विचारधारा के संकट का युग है। लोकधर्मिता को भूमंडलीकरण के सांस्कृतिक उत्पाद को उत्तर संरचनावाद से जूझना पड़ रहा है और आम जनता को साम्प्रदायिक फासीवाद से जूझना पड़ रहा है। तमाम अस्मिताएं अपना पक्ष लेकर उभार पर हैं उन तक भी नजर जाना चाहिए। दलित, स्त्राr, अल्पसंख्यक, आदिवासी, किसान, आज स्वयं में नये विमर्श का स्वरूप धारण कर चुके हैं। इन्हें वैचारिक तरीके से मूल्यांकित करने और लोक के औजारों को तैयार करने की जरूरत है। यदि ऐसे भीषण और दुर्दान्त समय में भी आपको भाषाई कलावाद, भावुकता, अतीतपन, बुर्जुवा चिन्तन भा रहा है। आपको जुमलों और अतिकल्पना से सम्मोहन है, तो इस युग के लिए और हिंदी कविता के लिए आप तीनों कवि खतरा हैं। ऐसे में यदि आपको छायावादी प्रेत की भटकती आत्माएं कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।  + उमाशंकर सिंह परमार
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