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Friday, January 5, 2018

1 सुभाष राय की कविताएँ

1.बच्चे आएंगे 
-------------------------

बच्चों को पढ़ने दो 

मत मारो 
मार नहीं पाओगे सारे बच्चों को


क्या करोगे जब 
तुम्हारी गोलियां 
कम पड़ जाएंगी 
तुम्हारी बंदूकें जवाब 
देने लगेंगी


बच्चे आ रहे होंगे 
और तुम्हारे पास 
गोलियां नहीं होंगी
बारूद नहीं होगी


फिर बच्चे तय करेंगे 
तुम्हारा भविष्य 
वे तय करेंगे कि 
इस दुनिया में 
तुम्हें होना चाहिए या नहीं


बच्चे फिर भी 
तुम्हें मारेंगे नहीं 
तुम्हें मरने देंगे 
खुद-ब-खुद


तुम मिट जाओगे 
क्योंकि बच्चे तुम्हारी तरह 
बंदूकें नहीं उठायेगे 
गोलियां नहीं चलाएंगे 


२. स्पर्श
------------------ 
तुमने जब-जब मुझे छुआ है
मैं धंस गया हूं अपने ही भीतर
तुम्हारी उंगलियों को अपने 
हृदय तक महसूस करते हुए


तुम्हारे पास आते ही मैं 
मुक्त हो जाता हूं नसों में 
दौड़ते हुए सारे विष बवंडर से


तुमने जब-जब 
मेरे  सिर पर हाथ फेरा है  
मेरे रोम-रोम में उग आयी हो
सहस्त्र योनियों की तरह
मुझे हर तरफ से निगलती हुई


तुम्हारे भीतर होकर 
बहुत सुरक्षित महसूस करता हूं में 
अपने होने को तुम्हारे होने में 
विलीन होते देखता हुआ
तुम्हारा स्पर्श तत्क्षण 
बदल कर रख देता है मुझे


स्त्री ही हो जाता हूं 
तुम्हारे पास होकर मैं
बहने लगती हो मेरे भीतर
पिघलने लगता हूं मैं


पुरुष की अपेक्षा से परे 
समूचे जगत को रचती हुई 
अगर योनि हो तो मां हो
योनि हो तो सर्जना हो
योनि हो तो वात्सल्य हो
ब्रह्मांड में बिखरे समस्त 
बीजों की धारयित्री हो


मैं पाना चाहता हूं तुम्हें 
तुम्हारी अनाहत ऊष्मा में डूबकर 
होना चाहता हूं
तुम्हारी हंसी में,
तुम्हारे स्पर्श में
तुममें, हां तुममें   


३ देवदूत
-----------------------


वह मंच पर बैठा था 
दिव्य आलोकपुंज जैसा 
सधी हुई कमलनाल पर 
चमकते हुए हीरे की तरह


और लोग भी थे उसके आजू-बाजू 
धुंधले, अस्पष्ट, लगभग नजर से बाहर
चौंधियाई हुई आँखों में 
समा नहीं रहा था वह


सपनों के अगणित सूर्य समेटे हुए 
अंधेरे, अपमान, भूख और 
नाउम्मीदी के  जंगल में भटकी आत्माओं को 
मुक्ति की आवाज देता हुआ 
धरती पर स्वर्ग उतारने का 
आभास जगाता हुआ


उसके सामने भीड़ थी 
अनागत की उमंग से लहालोट 
तालिया बजा रहे थे लोग 
अवरोध फांद कर आगे आने को आतुर 
झुण्ड गगनभेदी नारे लगा रहा था


कुछ बच्चे बहुत रोमांचित थे 
उन्हें उनके माँ-बाप ने 
सब-कुछ बता दिया था 
वे तेजी से पास खड़े पेड़ों की  
फुनगियों पर सवार हो गए थे


उनका हृदय पसलियों के भीतर 
इतना तेज बज रहा था 
मानो सीने से बाहर निकल 
आना चाहता हो 
नास्त्रेदमस ने कहा था 
हाँ, हाँ नास्त्रेदमस ने कहा था


कि एक दिन 
वह प्रकट होगा और 
चारों ओर फैल जाएगी 
कभी न ख़त्म होने वाली रोशनी 
कि एक दिन वह आएगा 
और सबको मुक्त कर देगा 
कि एक दिन 
वह हवा में हाथ लहराएगा 
और मिट जाएगी गरीबी 
ख़त्म हो जाएगी भूख 
कि एक दिन 
वह अपनी अमृतवाणी से नष्ट कर देगा 
सबकी बीमारियां, बुढ़ापा और मृत्यु 
कि एक दिन 
वह निकलेगा सडकों पर 
और फूट पड़ेंगी नदियां  
सुख, वैभव, ऐश्वर्य की 
डूब जाएंगी झुग्गी-झोपड़ियाँ 
उसकी वेगवती धार में  
खेतों में खूब अनाज होगा 
बागों में खिलेंगे अनदेखे फूल
तितलियाँ बाँटेगीं भरपूर रंग  
पेड़ों से टपकेंगे मीठे फल


बच्चे बहुत उत्साहित थे 
उनके कन्धों पर पंख उग आये थे 
पहली बार वे नास्त्रेदमस पर 
यकीन करना चाह रहे थे


वे यह सोचकर भाव-विह्वल थे 
कि रंक भूला नहीं है अपने दुर्दिन 
अपनी पीड़ा, अपना संघर्ष 
वह सिर्फ कहानी नहीं सुनाएगा 
वह नए संवाद रचेगा, नयी कहानी गढ़ेगा


वह मंच से उतरा और 
भीड़ जुलूस की शक्ल में बदल गयी 
मंच से महामंच तक 
मैदान से अभेद्य किले तक 
सड़क से सरकार तक


उस दिन भी खूब उत्सव मना 
गांव में, कस्बों में, शहरों में 
पटाखे छूटे, नगाड़े बजे
सुरीली शहनाइयो के स्वर गूंजे 
जमीन से आसमान तक 
आशाएं पसरीं जगमग जगमग 


जिसने भी देखा था रोशनी का वह तूफान
अपने पास से गुजरते हुए 
आँखें मल रहा है अब 
चेहरे पर पानी की छींटें मार रहा है 
समझ नहीं पा रहा 
यह नींद थी, सपना था  या केवल भ्रम


ऑंखें बंद करते ही 
दिखने लगता है वह 
वादों को पूरा करने का 
वादा करते हुए 
सपनों को हकीकत में बदलने के 
सपने दिखाता हुआ 
आसमान में उंगली से छेद करने के 
मंसूबे से हाथ लहराता हुआ
बदलाव के लिए बार-बार बदलाव 
की पुकार लगाता हुआ
आँख खुलते ही बिखर जाती  है 
उसकी आवाज, उसका साज 
एक स्वप्न-नाट्य की तरह


अब वह महामंच पर है 
क्षण-क्षण बदलते हुए अपना रूप-रंग 
उसके पास रंग-विरंगी पोशाकें हैं 
अदेखे, अनसुने अनगिनत चेहरे हैं 
रोज नए नाटक, रोज नया रिहर्सल
इसके बावजूद कि कोई अक्षर उभरता नहीं
काले कैनवस पर काली पेन से 
लिख रहा है लगातार 
पूछ रहे हैं लोग 
आखिर कब ख़त्म होगा ये इन्तजार


४ सावधान रहना दोस्त
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सावधान रहना साथी 
मौसम से बहुत सावधान रहना
वह ठीक से अपना पता नहीं देता 
हवाएं कभी कुछ नहीं बताती
तुम देखते हो पेड़ों पर पत्तों को फड़फड़ाते हुए
हिलते हुए और बाहर आ जाते हो सड़क पर
अच्छी लगती है भीगी हवा
दूर कहीं बरसात हो रही होती है
तुम्हारे भीतर उतरती है हवा
दिन भर की थकान और ताप को सोखती हुई
तुम नहीं जानते कि इसी हवा में 
एक तूफान भी होता है छिपा हुआ
जो किसी भी समय तुम्हारे परखचे उड़ा सकता है
पेड़ को जड़ों से उखाड़ कर 
फेंक सकता है तुम्हारे सिर पर 
तुम्हारे घर की छत को चकनाचूर कर सकता है
नरम तने की तरह मोड़ कर 
उछाल सकता है दीवारों में लगे लोहे
नहीं बताती हवा किस क्षण
वह आंधी में बदलेगी और किस क्षण तूफान में


सावधान रहना साथी समुद्र से
वह कभी नहीं बताता उसके हृदय में कितना लावा है
कितने पहाड़ धधक रहे हैं उसके भीतर
उसका सीना चीरकर आसमान की ओर उठने के लिए 
जानता हूं तुम्हें तट पर घूमना बहुत पसंद है
सागर तुम्हारे भीतर बसता है
अपनी लहरों, मूंगों, मछलियों और चट्टानों के साथ
कई बार उसके सीने पर उठती लहरों को छूकर
लहर बन जाता है तुम्हारा मन
नावें लेकर मछलियां पकड़ना चाहते हो तुम
तुम नहीं जानते कब उसकी उद्दाम लहरें 
फूंकार भरती बढ़ेंगी तुम्हारी ओर
और रेत पर पड़े तिनकों की तरह तुम्हें निगल लेंगी
तुम्हारे ऊपर पटक देंगी कोई चट्टान 
एक क्षण में तुम्हें इतिहास के किसी अतल-असित 
गह्वर में दफ्न कर देंगी जीवाश्म की शक्ल में 
नहीं बताता सागर कि वह कितना गहरा है
उसके भीतर कितनी उत्ताल तरंगे हैं
तट के ऊपर धावा बोलने को बेचैन


सावधान रहना साथी 
पहाड़ों की यात्रा करते हुए
माना कि बर्फ से ढंकी चोटियां बरबस खींचती है अपनी ओर
सुबह की धूप में जलते हिमाच्दछादित शिखर 
रोम-रोम में भर देते हैं मोहक शीतल लपट
माना कि पहाड़ों के आंगन में खिले फूल 
सम्मोहित करते हैं अपने रूप गंध से 
पहाड़ों पर बादल भी बतियाते हैं पास आकर 
उड़ने लगता है मन उनके साथ 
सफेदी में घुलकर खो जाते हो तुम 
जब भी होते हो पहाड़ पर 
लेकिन भनक तक नहीं लगती दोस्त
पता नहीं चलता कि किस पल
दरकने वाली है तुम्हारे पांव के नीचे की चट्टान
किस पल खिसकने वाली है आंखों में जमी बर्फ
किस चोटी के पीछे जमा हो रहा है पानी 
पहाड़ छिपाये रखता है अपने भीतर 
चहचहाती घाटियों को  डुबो देने वाली साजिशें 
पहाड़ से सावधान रहना
वह कभी भी रेत, कीचड़ और सैलाब में बदल सकता है


सावधान रहना अपने हाथों से 
तुम्हें अपनी मुट्ठी पर बहुत भरोसा है
जब चाहते हो भिंच जाती है
कभी भी जरूरत पड़ने पर 
ललकार में बदल जाती है 
हवा में तन जाती है 
अनगिनत मुट्ठियों में बदल जाती है
मानो या न मानो पर कभी भी
एक हाथ इनकार कर सकता है
दूसरे हाथ के साथ लहराने से
तनने से, मुट्ठियों में बदलने से


सावधान रहना 
जब कोई भी साथ न हो
जब लालच के बवंडर मंडरा रहे हों
जब पाखंड के चक्रवात घुमड़ रहे हों
चाहे जितने खराब मौसम से सामना हो
सावधान रहना दोस्त
ताकि लड़ते हुए भी  
बने रह सको मनुष्य 
मनुष्य की तरह मरकर भी
झूठ के खिलाफ लड़ते रहोगे
भविष्य के हर युद्ध में खड़े मिलोगे


५ जीवन 
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जैसे पेड़ मर-मर कर जीवित हो उठता है
जमीन पर गिरे हुए अपने बीजों में 
उसी तरह मैं भी बार-बार मरना चाहता हूं
नये सिरे से नयी जमीन में उगने के लिए 
मैं बार-बार मृत्यु से टकराता रहता हूं
मैं जानता हूं कि मृत्यु का सामना करके ही 
मैं जीवित रह सकता हूं हमेशा


६ मेरा होना 
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मैं फूल होना चाहता हूं
गंध बांटने के लिए 
हर पल हमेशा, हर एक को


मैं नदी होना चाहता हूं
निरंतर बहती हुई
कोई भी प्यासा न लौटे मेरे पास से 
सारा जग पीये फिर भी 
लबालब रहूं में पानी से भरी हुई


मैं सूरज होना चाहता हूं
अंधेरों के खिलाफ 
युद्ध का बिगुल फूंकता हुआ
सबको जगाता हुआ
चमकता रहूं सबकी आंखों में 
अपनी-अपनी रौशनी की तरह


मैं पेड़ होना चाहता हूं
सबको छांव दे सकूं
फल बाट सकूं
कभी गिरूं तो जलकर 
आंच दे सकूं भूख को


मैं होना चाहता हूं सबके लिए
दोस्त के लिए, दुश्मन के लिए 
मानुष के लिए, अमानुष के लिए भी 


मैं होना चाहता हूं
सबके होने में या न होने में 
मैं होना चाहता हूं 
इस तरह कि मैं होऊं ही नहीं


७ मैं मुझमें 
---------------------


जो बीत गया 
वह मुझमें ही है
जो बीत रहा है 
वह भी मुझमें ही है
और जो बीतने को तैयार है
वह भी मुझमें ही है
बंद कोंपल की तरह खुलने को आतुर


समय के एक छोर से
दूसरे छोर तक हूं मैं
अनादि, अनंत
भीगता हुआ अपनी ही बारिश में
तपता हुआ अपनी ही आग में 
जमता हुआ अपने  ही शीत में


यह जो जंगल है
खुद को ही पार करने में असमर्थ
मुझसे ही रचा गया है
इसके पेड़, फूल, फल, पत्तियों में 
इस पर जीने वाले अजगरों में
चीटियों, घड़ियालों, मगरमच्छों में 
मैं ही दिखता हूं प्रतिपल
खुद को ही निगल जाने को बेचैन


यह जो पर्वत है
उत्तुंग, अनावृत, अछोर
असंख्य उपत्यकाओं पर खड़ा 
पिघल कर झरनों में गिरता हुआ
झीलों को अपनी मजबूत
अंजुरी में थामे 
बादलों से खेलता हुआ
बर्फ से लदा 
सदियां समेटे हुए अपने भीतर
मैं ही खड़ा हूं इसमें, इसके हर रूप में


यह जो नदियां हैं 
पृथ्वी की धमनियों की तरह 
जीवन को जल से सींचती हुईं
यह जो झीलें हैं
असंख्य जीवन को 
अपनी अंकवार में समेटे हुए
यह जो झरने हैं
जीवन का संगीत रचते हुए
यह सब मैं ही हूं


सूरज की तरह चमकता हुआ
चंद्रमा की तरह शीतल करता हुआ
तारों की तरह झिलमिलाता हुआ
स्थिर नीलाकाश का आभास देता हुआ
समूचे ब्रह्मांड में बनता-बिगड़ता हुआ
मैं ही हूं, मैं ही हूूं, केवल मैं हूं, केवल  

८. एक बयान
----------------
मुझे पसंद नहीं है
फूलों का इस तरह खिलना
मनमाने रंगों में 


मैं चाहता हूं कि सारे फूलों में 


एक रंग हो, एक आभा 


एक मूल और एक बीज


पहाड़ को, नदी को


जंगल को, धरती को


कह दिया गया है कि


वे मेरी खुशी का खयाल रखें


मैंने तुम्हारी उम्मीदें जगायी


तुम्हें सपने दिखाये


तुम्हारी उम्र को ललकारा 


तुमसे जिंदगी के 


कठिन सवाल पूछे


तुम्हारी भुजाओं पर  सवार होकर


छू लिया आसमान


तुम्हें मेरे ऊपर हो न हो


मुझे तुम पर भरोसा है


अब सोने दो मुझे


सपनों में खोने दो


जवाब मत मांगो


सवाल मत पूछो


मत कहो कि मैं चुप हूं


मैं चुप रहा ही नहीं कभी  


चुप रह ही नहीं सकता 


बोलना मेरा शगल है, शौक है


आदत है, कमजोरी भी 


मैं बोलता हूं तो बस बोलता हूं


क्या बोलता हूं, पता नहीं


सही या गलत, नामालूम 


मैं चुप रहता तो 


हस्तिनापुर और पाटलिपुत्र 


मेरा मजाक क्यों उड़ाते 


तक्षशिला मुझे मुंह क्यों चिढ़ाती


मैं बोलता हूं


इसीलिए चाहता हूं


आप  बोलें, वे  बोलें, सब के सब बोलें


यह मेरी परम सहिष्णुता है


मेरे समर्थकों को 


सख्त हिदायत दी गयी है 


वे मेरी भाषा पर न जायें


मेरी तकरीर का अनुवाद न करें


मेरा मंतव्य समझें 


मेरी सुने लेकिन मेरी न सुनें


अब सब ठीक-ठाक है


मैं कहता हूं कमल 


वे सुनते हैं कीचड़


मैं कहता हूं सवा सौ करोड़ 


वे सुनते हैं हिंदू


मैं कहता हूं काम-काम


वे सुनते हैं राम-राम


मैं कहता हूं संविधान


वे सुनते हैं गीता गान


आप को लगता है


वे मुझसे सहमत नहीं हैं


मैं आप से सहमत नहीं हूं


आप  मुझसे सहमत नहीं हैं 


इतनी शिकवा-शिकायतें ठीक नहीं


आप  की हर दस्तक सुनी गयी


जरूरी नहीं कि हर बार


दरवाजा खोल ही दिया जाये


आप ने जब मेरे दरवाजे पर


पहली दस्तक दी


मैं प्रार्थना में था


हे, ईश्वर हर हृदय में 


प्रेम भर दे


असहमति, तर्क और


विचार के भ्रम को मिटा दे


जब मैं प्रार्थना में होता हूं


मेरे कान, मेरी आंखें बंद होती हैं


न सुनता हूं, न देखता हूं


आप ने फिर आवाज लगायी


मेरे हाथ में झाड़ू था


मुझे पूरे देश को साफ करना है


मैं सोच रहा था..


कहां, किसे, कैसे


पहले साफ करना है


आप ने सांकल दरवाजे पर दे मारी


नारे लगाये, कविताओं के गोले फेंके


जलते हुए पोस्टरों से वार किया


पर कैसे सुन पाता मैं


योग कर रहा था


भागवत-पाठ और 


बिहार के पुनर्पाठ को छोड़ दें तो


अभी अच्छा चल रहा है मेरा योग


सुबह, दोपहर, शाम


अनुलोम-विलोम, भस्रिका प्राणायाम  


ओम् हुम् सीते राधे राम


९. शिनाख्त
------------
काले कपड़ों से ढंके


तुम्हारे काले दिमाग


पढ़ लिये गये हैं


डिकोड कर ली गयी है


झूठे जिहाद की


नृशंस कूटलिपि


तुम्हें पहचान लिया गया है


तुम्हारी कटी हुई ऊंगलियों से


तुम्हारे जहरीले रक्त से


तुम्हारी विदीर्ण आंतों से


तुम्हारे चीथड़े हो गये दिमागों से


तुम जिंदा भी  


पकड़े गये हो कई बार


कभी  मुंबई, कभी  न्यूयार्क


और कभी पेरिस में


कभी  एलओसी पर लगी


कंटीली बाड़ फांदते हुए


तुम्हारे बयानों में दर्ज हैं


तुम्हारे सारे पते


सारा बारूद, सारी गोलियां


टैंक, मशीनगनें और तोपें


तोरा-बोरा से एबटाबाद तक


रक्का से मक्का तक 


तुम्हारी मांदें


चाहे जितनी गहरी हों


बहुत देर तक तुम्हें 


छिपाकर नहीं रख सकतीं


तुमने सुने नहीं


फतवे, फरमान


तुमने गुने नहीं


अपीलें, अरमान


बामियान के बुद्ध पर


जब तुमने गोले बरसाये


उसकी धूल दुनिया भर के


आसमान में छा गयी


पेशावर की क्रूर-कथा


अब भी  घर-घर में 


सुनाती है खौफजदा हवा


शब्द की ताकत


शांति, तर्क और खोज की आस्था


इतिहास के सबक


और समय के  सीने पर टंगी


मानवता की विरासत को 


पिंजरे  में बंद कर 


भून  देने  का तुम्हारा मंसूबा


कामयाब नहीं होगा


हमने बहुत कोशिश की


मनुष्यता के  अनगिनत शब्द


फेंके तुम्हारी ओर


लेकिन विनम्र होने की जगह 


तुमने उन पर दागी मिसाइलें


तुम्हें नहीं मालूम


शब्द  जितनी बार घायल हुए 


जितने छले गये 


उतने ही मजबूत होते चले गये


१०. नाटक
--------------
माना कि मिट्टी में प्राण है


सूरज रोज धूप


उलीच जाता है खेत में


हवा इतनी है कि अंकुर


फूट सकते हैं


माना कि


मिट्टी, धूप और हवा


तना, पत्ती और फूल में


तबदील हो सकते हैं


माना कि मौसम


अचानक खराब न हो तो


फसलों में दाने


आ सकते हैं


एक दाना हजार


दाने में बदल सकता है


माना कि


कुछ भी हो सकता है


अगर मिट्टी में डाला गया


बीज ठीक-ठाक हो


लेकिन अक्सर


ऐसा क्यों नहीं होता


जब फसलें खड़ी होती हैं


हम खुश होते हैं


कटती हैं तो


हम निराश हो जाते हैं


आदमी की भूख


बढ़ जाती है


हर फसल के बाद


हम कभी मौसम को दोषी


ठहराकर चुप हो जाते हैं


कभी खेत बांट लेते हैं


यही नाटक हर बार होता है


आदमी केवल दर्शक है, श्रोता है


११. मैं नदी हूँ 


  -----------


नदी के पास


होता हूँ जब कभी


बहने लगता हूँ


तरल होकर


नदी को उतर जाने


देता हूँ अपने भीतर


समूची शक्ति के साथ


उसके साथ बहती


रेत, मिट्टी, जलकुंभी


किसी को भी


रोकता नहीं कभी


तट में हो


बिल्कुल शांत, नीरव


या तट से बाहर


गरजती, हहराती


मुझे बहा नहीं पाती


तोड़ नहीं पाती


डुबा नहीं पाती


मैं पानी ही हो जाता हूँ


कभी उसकी सतह पर


कभी उसकी तलेटी में


कभी उसके नर्तन में


कभी उसके तांडव में


फैल जाता हूँ


पूरी नदी में


एक बूंद मैं


महासागर तक


रोम-रोम भीगता


लरजता, बरसता


नदी के आगे


नदी के पीछे


नदी के ऊपर


नदी के नीचे


कैसे देख पाती


वह अपने भीतर


पहचानती कैसे मुझे


खुद से अलग


जब होता ही नहीं


मैं उसके बाहर


जब कभी सूख


जाती है वह


निचुड़ जाती है


धरती के गर्भ में


तब भी मैं होता हूँ


माँ के भीतर सोई नदी में


निस्पंद, निर्बीज, निर्विकार


१२.  मिटकर आओ 
     ----------------
नहीं तुम प्रवेश नहीं


कर सकते यहाँ


दरवाजे बंद हैं तुम्हारे लिए


यह खाला का घर नहीं


कि जब चाहा चले आए


पहले साबित करो खुद को


जाओ चढ़ जाओ


सामने खड़ी छोटी पर


कहीं रुकना नहीं


किसी से रास्ता मत पूछना


पानी पीने के लिए


जलाशय पर ठहरना नहीं


सावधान रहना


आगे बढ़ते हुए


फलों से लदे पेड़ देख


चखने की आतुरता में


उलझना नहीं


भूख से आकुल न हो जाना


जब शिखर बिल्कुल पास हो


तब भी फिसल सकते हो


पाँव जमाकर रखना


चोटी पर पहुँच जाओ तो


नीचे हजार फुट गहरी


खाई में छलाँग लगा देना


और आ जाना


दरवाजा खुला मिलेगा


या फिर अपनी आँखें


चढ़ा दो मेरे चरणों में


तुम्हारे अंतरचक्षु


खोल दूँगा मैं


अपनी जिह्वा कतर दो


अजस्र स्वाद के


स्रोत से जोड़ दूँगा तुझे


कर्णद्वय अलग कर दो


अपने शरीर से


तुम्हारे भीतर बाँसुरी


बज उठेगी तत्क्षण


खींच लो अपनी खाल


भर दूंगा तुम्हें


आनंद के स्पंदनस्पर्श से


परंतु अंदर नहीं


आ सकोगे इतने भर से


जाओ, वेदी पर रखी


तलवार उठा लो


अपना सर काटकर


ले आओ अपनी हथेली


पर सम्हाले


दरवाजा खुला मिलेगा


यह प्रेम का घर है


यहाँ शीश उतारे बिना


कोई नहीं पाता प्रवेश


यहाँ इतनी जगह नहीं


कि दो समा जाएँ


आना ही है तो मिटकर आओ


दरवाजा खुला मिलेगा


-- डा. सुभाष राय
मो. 09455081894
विनीत प्लाजा, फ्लैट नं 1
विनीत खंड-6, गोमतीनगर, लखनऊ


Sunday, July 23, 2017

1 कुलीन लोक से मुठभेड़ करती कविताएँ - उमाशंकर सिंह परमार

युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार की नई आलोचना-पुस्तक है - 'पाठक का रोजनामचा' जो डायरी विधा में लिखी गई है । उन्हीं के किताब से उसका अध्याय सप्तम है जो सुशील कुमार की कविताई पर केन्द्रित है । यह जितनी समीक्षा है उतनी ही आलोचना। जितनी आलोचना है उतनी ही डायरी , यानि इन विधाओं के अपूर्व संयोजन से इस किताब के सभी पाठ बनते हैं ... तो प्रस्तुत है सप्तम अध्याय  - 

Monday, July 17, 2017

2 आत्मसंघर्ष के महत्वपूर्ण कवि : तेजिंदर

[यह समालोचना कवि-कथाकार तेजिन्दर जी केंद्रित अंक पत्रिका *छत्तीसगढ़-मित्र* अप्रैल 2017 में छपी है। ] - सुशील कुमार
"यह कविता नहीं
एक बयान है कि
अब चिड़िया को कविता में
आने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

चिड़ियां, पेड़, बच्चा और मां
- इनमें से कोई भी नहीं आएगा
कविता में
यहां तक कि कविता भी नहीं ।

समय के ऐसे दौर में
जब बादशाह खाता है रेवड़ियाँ
और बाँटता है टट्टी,
मैं हैरान हूं कि
तुम्हें पेड़ और बच्चे याद आ रहे हैं।" (कविता 'बयान' का अंश/ तेजिंदर)
श्री तेजिंदर को आप उपन्यासकार-कहानीकार के रूप में तो जानते होंगे पर शायद कवि के रूप में नहीं। अगर जानते भी हों तो उनकी कविताएँ संभवत: नहीं पढ़ी होंगी। (क्योंकि सोशल मीडिया या ब्लॉग पर उनकी कविताएँ उपलब्ध नहीं,  न 'कविताकोश' जैसे किसी वेबसाईट पर ही लगाई गयी है , और पुस्तक भी फिलहाल उपलब्ध नहीं।) यह हिन्दी साहित्य की विडम्बना कही जाएगी। इस वरिष्ठ साहित्यकार का नाम है – श्री तेजिंदर (गगन)। पैंसठ वर्षीय तेजिंदर गगन के अब तक चार उपन्यास, दो कहानी संग्रह, एक डायरी, एक जीवनी और एक कविता संग्रह "बच्चे अलाव ताप रहे हैं' (1997) आ चुके हैं। कहना चाहूँगा कि मुक्तिबोध, धूमिल और कुमार विकल की काव्य-परंपरा के अत्यंत दृष्टि-सम्पन्न कवि श्री तेजिंदर पिछले तीस वर्षों से ऊपर लेखन-कार्य में रत हैं।
अक्सर यह देखा जाता है कि स्पष्ट पक्षधरता और विचारधारा के बावजूद खराब कविताएँ प्रभूत मात्रा में लिखी जाती हैं, गोया कि परिदृश्य में विचारधारा मात्र के प्रबल पूर्वाग्रह से युत खराब कविताओं की भरमार है। इस स्थिति में तेजिंदर की कविताएँ प्रतिबद्ध विचारधारा के साथ सर्जनात्मक प्रतिभा और काव्यात्मक सार्थकता का बखूबी भान कराती है - वस्तु और रूप दोनों स्तरों पर- और अपना प्रतिमान भी खुद बनाती हैं। ऐसी कविताओं को आलोचकों के प्रतिमानों की जरूरत न हुई , न कभी होगी। कवि की पक्षधरता से आप उनकी कविता के प्रतिमान को स्वयं भलीभाँति समझ सकते हैं। मेरी दृष्टि में इनकी कविताएं संघर्ष और विद्रोह की अनुपम कविताएँ हैं - संघर्षरत, युद्धरत, बेचैन मनुष्य की खालिस कविताएँ। तेजिंदर जी के यहाँ यह संघर्ष जीवन और कविता दोनों स्तरों पर मौजूद है। यहाँ कवि केदारनाथ सिंह या उदय प्रकाश की कविताओं की तरह कोई 'ड्रामेबाजी' या 'फैंटेसी' का स्वप्नलोक नहीं, बल्कि सीधी-सपाट शैली में बिंबों के नायाब प्रयोग से कविताएँ बनावट और बुनावट में समाज के आंतरिक यथार्थ को खोलती हुई इतनी सघन अर्थ-स्फीतियाँ रचती हैं कि पाठक कवि की 'कहन के जादू' से स्वयं सम्मोहित हो जाता है - 'घास खाकर बिच्छू उगलना', 'पेड़ और माँ की वर्दी में सामंती क्रूर चेहरों का रूप बदलना' और 'गिद्ध पर कविता लिखने की कवि की जरूरत का महसूस होना', आदि कुछ ऐसे ही अद्भुत बिम्ब आप उनकी 'बयान' कविता में आगे देखेंगे –
"तुम लिखो यह बयान कि
इस शहर में अब सिर्फ
उन्हीं बच्चों को पैदा होने की छूट दी जाएगी
जो हाथों में तीर कमान लिए पैदा होंगे ।

हम युद्ध के मैदान में है इन दिनों।
यह समय मां और चिड़िया को याद करने का नहीं
घास खा कर
बिच्छू उगलने का है।

वे वर्दियों में है तरह-तरह की
मैं स्पष्ट कर दूं कि
वह पेड़ और माँ की
वर्दी में भी हो सकते हैं
उन्हें पहचानने के लिए
जरूरी है कि
तुम गिद्ध पर कुछ लिखो इन दिनों।"
कहना न होगा कि तेजिंदर जी की कविताएँ देर तक स्मृति में इसलिए भी टिकती है कि अपने संघर्ष या जद्दोजहद में वे बड़बोलेपन का रास्ता अख़्तियार नहीं करते, जो तुरत-फुरत क्रांति चाहने वाले विद्रोही कवियों की प्रदर्शनप्रियता का हिस्सा हो, बल्कि मानव मन को आलोड़ित कर उसकी संवेदना के भीतर भावोद्वेलन पैदा करती हैं। कवि का यह आत्मसंघर्ष घर, परिवार, गाँव, शहर, सड़क, खेत आदि आदमी की रोज़मर्रा की जरूरतों की किल्लत से गुजरता हुआ एक व्यापक जन-विद्रोह का आकार लेता है; जो जाहिर है, ममत्व और प्रेम की कोख से ही पैदा होता है –
"इन शब्दों के अर्थ में
हमारी समूची दुनिया है
और वे उन्हें हमसे छीन ले जाना चाहते हैं।

ये तमाम शब्द हमें संभाल कर रखते हैं
लड़ाई जीत जाने के बाद
प्यार करने के लिए लिए ,
इसलिए कविता में इनका इस्तेमाल
फिलहाल, वर्जित घोषित किया जाता है।"´( 'बयान' कविता का अंतिम अंश )
कवि कुमार विकल की तरह तेजिंदर मानवीय संघर्ष की कठिन प्रक्रिया से पूरी तरह भिज्ञ हैं, इस प्रक्रिया में वे मूल मानवीय रागात्मकताओं और सहज जीवनासक्ति को नहीं भूलते, बल्कि उसका हिस्सा बनकर संघर्ष में शामिल होते हैं। यही आधुनिक कविता के लिए बड़ी बात है जो उसे जीवंत बनाती है। 'नई कविता' के साठ के दशक के अस्तित्ववादी कवियों की तरह तेजिंदर गगन अनास्था, कुंठा, संत्रास, अजनबीपन, परायेपन और मानवीय रिश्तों के भग्नावशेष पर निस्सहाय होकर अपना काव्य-मुहावरा नहीं बनाते हैं, बल्कि ज़िंदगी की टूटन और तकलीफ़ों से लड़ने के लिए अपनी मुहावरा को ताकत देते नजर आते हैं। इस कारण उनकी कविताओं का आवेग हमेशा एक जीवित समाज को लक्ष्य करता है –
"तुम्हारी यह गर्वीली हंसी मुझे बहुत प्यारी लगती है
सोजेलिन खाखा

और मैं तुम्हारे हाथ थामना चाहता हूं
तुम्हारा माथा चूमना चाहता हूं
इसलिए नहीं कि तुम्हें मेरी जरूरत है
और मैं तुम पर कृपा करने आया हूँ
बल्कि इसलिए कि
तुम भूख के घराने का सबसे सुंदर राग हो

तुम्हारी हथेलियों से मुझे डर भी लगता है
क्योंकि मेरे भीतर अपराध-बोध का
एक शहरी कैक्टस है
और मैं अपना चेहरा छिपा लेता हूं बार-बार
तुम्हारी देह, तुम्हारी आवाज, तुम्हारा मौन, तुम्हारे हाथ -
मुझे अच्छे लगते हैं
क्योंकि ये सब
भूख के विरुद्ध तुम्हारी लड़ाई के अलग-अलग हथियार है। “
- कवितांश "समझदार होती आदिवासी युवती के लिए" / तेजिंदर
सच में मुझे तेजिंदर की कविताएं पढ़ते हुए बार-बार कुमार विकल की याद आती है - 'जनता एक बहुमुखी तेज हथियार है /जो अकेली लड़ाइयों को आपस में जोड़ता है (कविता 'मिथक' / कुमार विकल)
जीवन की छोटी-छोटी बातों पर कविता लिखना आसान काम नहीं। कविता बड़बोलेपन , भद्राचरण और आभिजात्य संस्कारों से टूटती है। वह अपनी असली ताकत, अर्थ और क्षमता को खोती है, जबकि वह अपनी अनगढ़ता और श्रमशील लोकजीवन में नई ऊर्जा और ताकत पाती है। बक़ौल मुक्तिबोध, “यह सही है कि जीवन के छिटपुट चित्रों में भी भाव-गंभीरता है तथा सच्चाई होती है (नहीं भी होती है)। फिर भी उससे संतोष नहीं हो पाता। कुछ और चाहिए, और, और, ! – वह चाहिए जो जीवन को उसकी समग्रता में, उसकी सारी विशेषताओं सहित, प्रकट करे। केवल छिटपुट प्रयत्नों में (और उसकी वाहवाही) अब मजा नहीं आता। इसलिए कुछ लोग खोज पर विश्वास करते हैं। सतत अन्वेषण, सतत अनुसंधान के पथ का नाम लेनेवाले लोग कम नहीं। किन्तु अनुसंधान और अन्वेषण का थियोंराइजेशन (theorization, केवल विचारणा, केवल सिद्धान्त-स्थापना) ही किया जाता है। अधिक से अधिक, वह आत्मान्वेषण और आत्मानुसंधान बनकर रह जाता है, जिसके आवेग में दो-चार, पाँच-दस, दस-बीस कविताएँ बनाकर मामला ठप्प हो जाता है। और ऐसी कविताओं में आवृति, पुनरावृति, आवृति-पुनरावृति। फिर वही दुष्चक्र चालू। संक्षेप में, एक घेरा बन गया है, उसमें से निकलना मुश्किल है। (नई कविता: निस्सहाय नकारात्मकता/ ‘डबरे पर सूरज का बिम्ब /पृ सं -69)।“  यह बात कुमार विकल और तेजिंदर की कविताओं पर समान रूप से लागू होता है। दोनों कवि अपने जीवन के अनुभवों का कच्चा माल कविता में पूंजी की तरह ‘इन्वेस्ट’ करते हैं। जीवन के यथार्थ-चित्रों को कविता में बिलकुल अनौपचारिक-स्वाभाविक  तरीके से रखना और और उसे मूर्त कर जीवन के अंतर्द्वंदों, अंतर्विरोधों और बाह्यांतर दबावों के बीच से निकालकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना और नेपथ्य से यानि बहुत पीछे रहकर अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करना इनकी कविताओं का खास मकसद होता है। संदर्भवश पहले यहाँ कुमार विकल की एक कविता ‘खिड़कियाँ’ देखिए –
“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
उनमें रहने वाले बच्चों का
सूरज के साथ किस तरह का रिश्ता होता है?

सूरज उन्हें उस अमीर मेहमान—सा लगता है
जो किसी सुदूर शहर से
कभी—कभार आता है
एकाध दिन के लिए घर में रुकता है
सारा वक्त माँ से हँस—हँस के बतियाता है
और जाते समय
उन सबकी मुठ्ठियों में
कुछ रुपये ठूँस जाता है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
वहाँ से धूप बाहर की दीवार से लौट जाती है
जैसे किसी बच्चे के बीमार पड़ने पर
माँ की कोई सहेली मिजाजपुर्सी के लिए तो आती है
किंतु घर की दहलीज़ से ही
हाल पूछ पर चली जाती है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/
वहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा—/
कुछ इस तरह से होती है/
जिस तरह राखी के कुछ दिनों बाद/
घर के सामने से/
पोस्टमैन के गुज़र जाने के बाद/
पहले पोस्टमैन को कोसती है/
बाद में रसोई में जाकर/
अपने भाई की मजबूरी समझ कर/
बहुत रोती है।“

“जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/
उनमें रहने वाले बच्चों का /
चाँद के साथ रिश्ता किस तरह का होता है
/वह उन्हें अद्भुत चोर – सा लगता है/
जो हर रात किसी गुप्त दरवाजे से आता है /
उनके हिस्से की रोटियाँ चुराके ले जाता है।“
यथार्थ और जीवन-संघर्ष की इन्हीं कौतुक-वृतियों में पगी तेजिंदर की कविता – ‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ को देखिए –
“बच्चे अलाव ताप रहे हैं
भरी ठंड में

बच्चे आग से नहीं डरते
आग की तपिश है
उनके चेहरों पर 

आग का रंग क्या होता है
उनसे पूछता हूं
भरी ठंड में ताप उनके चेहरों पर है
और वे जवाब देते हैं
आग का रंग ताप होता है

बच्चों को ताप से डर नहीं लगता
वे कहते हैं -  आग से हमारी दोस्ती है
जो ताप बन कर
हमारे भीतर उतरती है
और फिर अलग-अलग आकृतियों में
बाहर निकलती है
कभी गिल्ली-डंडा बनकर 
और कभी टप्पे खाती गेंद की तरह

बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और उनके चेहरों पर ताप है
टप्पे खाता हुआ

मैं हैरान हूं कि हूं कि
वे ताप से से खेलते हैं
जिसे छूते ही
मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं

मैं वापिस बच्चा बनना चाहता हूं
और सड़क किनारे
बच्चों के साथ बैठ
अलाव तापना चाहता हूं
वही सड़क के उस मोड़ पर
जहां बच्चे भी ठंड में
अलाव ताप रहे हैं

अलाव तापते बच्चों की आंखों में
शेर की आंखें हैं
सुंदर और आदिम
आने वाली दुनिया
इन्हीं आंखो पर टिकी है
टेलीविजन के पर्दे पर
या चिड़ियाघरों में कैद शेर देखने वाले बच्चे
जल्दी अंधे हो जाएंगे
बच्चे अगर बचेंगे तो वही
जो शहरी किनारे, गांव की चौखट पर
भरी ठंड में
अलाव ताप रहे होंगे

खत्म हो जाएंगे
बंधुआ और छद्म शेर बच्चे
खत्म हो जाएंगे वे भी
जो खुरदुरे नहीं हैं
पिघल जाएंगे उनके चेहरे जल्द
जिन्हें अलाव तापने की आदत नहीं

बचेंगे केवल वे ही
जो लाल हैं
आग और ईंट की तरह

गाँव की चौखट पर
बच्चे अलाव ताप रहे हैं
और मैं आश्वस्त हूँ कि
इतनी जल्दी खत्म नहीं होंगी
यह दुनिया।“
दोनों कविताओं में बच्चे उपस्थित हैं। कुमार विकल जिस तह सूरज-चाँद, खिड़की, रोशनी, राखी, चिट्ठी, आदि लोकजीवन के मर्मस्पर्शी संदर्भों से जुड़कर मनुष्य की आर्थिक तंगी और विपन्नता का गहन बोध कराते हैं, आभिजात्य सौंदर्य से अलग लोकचेतना की वर्गीय अभिव्यक्ति को उभार और नई दृष्टि प्रदान करते हैं, उसी प्रकार तेजिंदर भी भरी ठंड में बच्चों के अलाव तापने की बात कर हमारी संवेदना को बहुविध रीति से उद्वेलित करते हैं। सृजन की अंतर्वस्तु और उसके आत्मसंघर्ष में यहाँ अंतर होते हुए भी दोनों में प्रकट वर्गीय वैशिष्ट्य देखने के लायक है। तेजिंदर की कविता में दार्शनिक उठान अधिक है और कुमार विकल में काव्यानुभव और सौंदर्य अधिक। तेजिंदर कहते हैं कि ‘मैं हैरान हूं कि हूं/ कि वे (बच्चे) ताप से खेलते हैं / जिसे छूते ही / मेरी उंगलियां झुलस जाती हैं’। यह ताप तेजिंदर के बच्चों में भीतर से उठता हुआ अगल-अलग आकृतियों में बाहर आता है, मसलन गिल्ली-डंडे या टप्पे खाते गेंद की तरह। यह कवि के विनोदप्रियता का हिस्सा मात्र नहीं है, बल्कि उस ताप को पाने के लिए तेजिंदर का कवि फिर बचपन में लौटना चाहता है। यहाँ अलाव का ताप जीवन को बचाने का ताप है – ‘बच्चे अगर बचेंगे तो वही/जो शहरी किनारे, गांव की चौखट पर / भरी ठंड में / अलाव ताप रहे होंगे’- इसका द्वन्द्वात्मक संघर्ष उन बच्चों के ताप से है जो अभिजात वर्ग से आते हैं, जो कि समाज का लघु-वर्ग है, सुविधा-सम्पन्न वर्ग। पर जो बच्चे शहर किनारे और गाँव की चौखटों पर कड़ी ठंड मे अलाव ताप रहे  उनके ही चेहरे के ताप, आँखों की लाल चमक और उनके खुरदुरे चेहरे में दुनिया बचाने की कवि की उम्मीद कायम है। दोनों कविताएं अपनी-अपनी तरह से समाज की वर्गीय ढांचों को के अतर्विरोध को पूरी  काव्यात्मक सार्थकता के साथ व्यक्त करती हैं । यही तेजिंदर की कविता की सार्थकता और विशेषता है।
कहना न होगा कि दोनों कवियों ने मिलता-जुलता गहन लोक-चेतस काव्यविवेक का इस्तेमाल किया है जो भिज्ञ यथार्थ को काव्यात्मक बनाने का सायास प्रयत्न करता नहीं दिखता, न कविता को तराशता या परिष्कृत करता है, बल्कि अपनी अनगढ़ शिल्प के साथ पाठकों की चेतना में धँसने का उपक्रम करता है और इस क्रिया-व्यापार मे सफल भी होता है।
आमजन की बेबसी, लाचारी के बीच उसकी ईमानदारी और मानवीय लगाव का बना रहना, जनता के सुख-दुख के अटूट हिस्सेदारी, साहस, सहृदयता, जनप्लावित करुणा आदि ऐसे काव्येतर मूल्य हैं जो कविता में आकार लेकर लोकचेतना को अर्थवत्ता और प्रखरता देते हैं । इनके वगैर कोई साधारण जीवन की अच्छी कविताएँ लिख ही नहीं सकता। यह तेजिंदर के कवि का आत्मसंघर्ष है जो उनकी कविताओं को पठनीय और जनोपयोगी बनाता है। कविता के सुनिश्चित प्रतिमानों में ढली खास शैली और काट की कविताओं में इस तरह का आकर्षण नहीं होता। इसलिए आज ऐसी ही कविताओं की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है जिनमें काव्यात्मक मूल्यों से अधिक मानवीय मूल्य हों और जो पाठको को उसकी संवेदना से नैतिकता से, गहराई से, असल में जोड़े और उसे भीतर तक आलोड़ित भी करे।
तेजिंदर मूलत: उपन्यासकार और कहानीकार हैं, इसलिए इनके कथात्मक शैली-शिल्प का गहरा प्रभाव इनकी काव्यात्मकता पर पड़ा है। कविताओं में कहीं-कहीं फैंटेसी या स्वप्न-लोक का भी आभास होता है पर यह फैंटेसी उदय प्रकाश की कविताओं की तरह दुर्बोधता का वरण नहीं करती। अभिव्यक्ति हमेशा सहज बनी रहती है। न ही किसी वाद का कोई विचार-अभिकथन ही सामने से पाठकों में सायास उत्प्रेरणा को भरने का कार्य करता है। श्रमशील जनता के प्रति उनका आगाध प्रेम है। ‘डर’ कविता में वे उसे काला राजकुमार कहते हैं –
“खुद से पूछता हूँ/
मैं क्यों डरता हूँ, उस काले राजकुमार से /
जिसकी आँखों में /
अभी भी, एक आदिम प्यार है/
मेरे लिए।“  गोया कि, तेजिंदर के कवि को आदिम सौन्दर्य से बहुत लगाव है। उन्हें अलाव तापते बच्चों और श्रमिक, दोनों की आँखों में आदिम प्यार नजर आता है। ‘डर’ कविता में कवि को ऐसा लगता है कि मजदूर वर्ग के ही कपड़े, घर, जमीन , तंख्वाह आदि पर संभ्रांत लोगों ने दखल कर रखा है। दुनिया के बनने में वे शहर और जंगल के बराबर हिस्सेदारी की तरफदारी करते हैं और “जब नगर में होता है / तो अक्सर ही उन्हें / उसके भीतर छिपे जंगल की जरूरत होती है।“ समतामूलक समाज के पैरोकारी में कविता कहीं-कहीं सपाट भी हुई है, पर अपनी अर्थवत्ता को कभी धूमिल और इकहरी नहीं होने देती। यह इनकी सपाट कविताओं की खास विशेषता है। जिन कवियों ने कविता की सपाटबयानी शैली का केवल नकल किया है और विदेशी ढंग को बिना भारतीय परिवेश में ढाले अपनाया है, उनकी कविताएं बोझिल और उबाऊ हो गयी है । आप विष्णु खरे और पवन करण की सपाटबयानी कविताओं में अन्तर्लय और प्रगीतात्मकता का अभाव पाएंगे जो कंटेंट में मजबूत रहने के बावजूद कवितात्मकता में कमजोर मालूम होती है और पाठकों मे अरुचि पैदा करती है।  
आगे आप देखेंगे कि दुनिया को बदलने का स्वप्न तेजिंदर के कवि में इतनी हिलोरें मारता है कि वह घोषणा करना चाहता है कि
“जो कोयला जलने पर लाल नहीं होता,/
उस पर हाँडी चढ़ाना अपराध है। ... /
फिर भी गर्म सलाखों को नहीं छुएंगे /
और दावा करेंगे कि /
ठंडे हाथों से ही बदला जा सकता है।/
यह पूरा परिदृश्य।“
कवि को सदैव उस जंगल की तलाश है जो खो चुका है। वह अपनी आदिम सभ्यता को फिर से पाना चाहता है,  उसी में उसे आदमीयत की महक मिलती है। आधुनिकता की होड़ में हम उसे गंवा चुके हैं। -
“तुम्हारे पाँव जहां थे /
वहाँ कभी जंगल हुआ करता था/
आज कोलतार की सड़क है/
और जंगल तुम खो चुके हो। “
- यह कितना त्रासद समय है कि जंगल की तलाश में तेजिंदर का कवि बार-बार खारिज होता जाता है-
“तुम जहाँ जाते हो/
अपने भीतर एक जंगल समेट लेने की/
असफल कोशिश में/
खारिज हो जाते हो/
और फिर कोलतार से समझौता करने की/
गलती कर लेते हो।“ (कविता – बाजार से लौटते हुए ) ।
तेजिंदर जी की काव्य-भाषा देखकर हम कभी-कभी हैरान होते हैं कि कवि ने कविता की यह “धूमिल” भाषा कितनी काव्य-हठ और श्रम से अर्जित की होगी ! अधिक से अधिक क्रूर होती व्यवस्था के विरुद्ध कविता को एक प्रकार के नैतिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाते हुए तेजिंदर ने क्रुद्ध कवि धूमिल के करीब अपना एक खास मुहावरा विकसित किया है जिसका बड़ा काव्यात्मक महत्व है जो धूमिल से अलग और अधिक संवेदनात्म्क है। इससे उनकी वक्तव्य-शैली की कहन धारदार बन पाई है। यह उनके नैतिक साहस का प्रतीक है जिसमें नया काव्य-विवेक भी उतना ही अपेक्षित होता है, जितनी कविता कि अंतर्वस्तु। वे कविता के वर्जित क्षेत्रों में  बार-बार प्रवेश करने की हठ करते हैं और उनमें अधिकतर सफल भी होते हैं। लेकिन यह भाषा धूमिल की तरह असंयत, अमार्यादित, तीक्ष्ण और बेधक नहीं हैं। यह बुझी हुई राख़ के भीतर सुलगती अंगीठी जैसी है – देखिए कविता “बूढ़ा” -
“जंगल के पेड़ों पर
बार-बार चढ़ता है, एक बूढ़ा
और देखता है
लगातार कागज होता जंगल
बंजर होती जमीन।

बुड्ढा देखता है
एक ठूंठ
अपने भीतर धंसता हुआ।

बंजर होती जमीन
मापने वाला बूढ़ा
मृत्यु से पहले
अंतिम छोर तक की जमीन
माप लेना चाहता है
एक पेड़ की
सूखी टहनियों पर चढ़कर।

अपने भीतर लगातार धँस रहे
ठूंठ से
उसे कोई भय नहीं है।

एक पहाड़ है- अदृश्य
बुड्ढे की पीठ पर

जिसे बहुत ऊंचाई से
जंगल में धकेल देना चाहता है बूढ़ा
ताकि पेड़ हरे हो और हरे और हरे
और इस तरह पूरी पृथ्वी हरी-भरी हो जाए

इंतजार करता है, बुड्ढा
पृथ्वी करवट बदलेगी एक दिन
इन दिनों अपने साथ किए जा रहे
सुलूक के खिलाफ
और उस दिन वह सिर्फ एक बूढ़ा नहीं रहेगा
फैल जाएगा
बंद होती पृथ्वी पर
अपनी पकी हुई देह के साथ
और यह पृथ्वी
उसकी पकी उम्र की फसल के
लहलहाते दानों से
ढक जाएगी अपने हरेपन में ।
हमें लगता है कि तेजिंदर की कवि-क्षमता, काव्य-विधान, कलात्मक संगठन और मानवीय रागात्मकताओं के साथ अंतर्बिद्ध गहरे राजनीतिक आशय वाली कविताओं पर हमारे सुधी आलोचकों का ध्यान अब तक नहीं गया है, उनकी कहीं गंभीरता से चर्चा नहीं की गई है, जिस कारण तेजिंदर ने साहित्य की गद्य विधाओं पर ही अपना ध्यान केन्द्रित किया है। काव्य-संग्रह ‘बच्चे अलाव ताप रहे हैं’ (1997) के बीस वर्षों के अनंतर इनका कोई दूसरा काव्य-संग्रह दृष्टिगत नहीं होना इसका पुष्ट प्रमाण है। यही हिन्दी कविता का वास्तविक परिदृश्य है जो खेदजनक है। पर तेजिंदर अपने समकालीनों में एक अलग तरह के महत्वपूर्ण और बेबाक कवि हैं। एक सोये हुए कवि-मन को फिर से जगाने के लिए इन कविताओं पर गंभीर चर्चा और बहस की शिद्दत से आवश्यकता महसूस की जा रही है।  
@ सुशील कुमार
सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय,
स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग,
एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004
ईमेल–sk.dumka@gmail.com
मोबाईल न. –09431310216 / 09006740311

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- हिन्द युग्म के सौजन्य से राजेन्द्र भवन सभागार, नई दिल्ली-01 में सुशील कुमार के काव्य-संग्रह "तुम्हारे शब्दों से अलग" का विमोचन दि. 05 मार्च, 2011 को हुआ ।

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