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Friday, June 16, 2017

1 आलोचना का संकट और मुक्तिबोध का आत्मपक्ष © सुशील कुमार

【मेरा यह लेख 'लहक' पत्रिका के अप्रैल-मई 2017 अंक में छपी है जो सुधी पाठकों को समर्पित है -सुशील कुमार】
           ●जरूरी नहीं कि हर बड़े कवि में वह साहस, प्रतिभा और विश्वदृष्टि हो कि अपने सृजन से कविता की पहचान का संकट पैदा कर सके। यह कविता के रूपगत और वस्तुगत धारणाओं पर परिवेश के साथ कवि के कठिन आत्मसंघर्ष व तनाव से अर्जित अनुभव और काव्य-कला के अंतर्द्वंद्व से ही संभव होता है, जो बिरला होता है। अपनी इसी अंतर्दृष्टि और साहस की वजह से वह कविता को समय की वर्जनाओं से बाहर निकालकर उसे फिर से परिभाषित (रि-डिफाइन) करने की जोखिम उठाता है। उसकी कृति से उस वक्त की कविता पर गहरा असर पड़ता है। उसके प्रचलित प्रतिमान व शिल्प टूटते और बनते है, नए शिल्प और शैली का ईजाद भी होता है। इस कारण ऐसा कवि घोर आलोचकीय अंतर्विरोधों का सामना करता है। हिन्दी कविता में गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसे ही कवि हैं, जिन्होंने मात्र 47 साल की आयु में न केवल कविता में नए सौन्दर्य लाकर प्रचलित शिल्प और अंतर्वस्तु में एक नया अध्याय जोड़ा, बल्कि एक साथ साहित्य की अन्य कई विधाओं (विशेषत: आलोचना और कहानियाँ) पर भी महत्वपूर्ण काम कर साहित्य-जगत को चकित कर दिया। यह इतने कम जीवन जीने वाले कवि के अंदर उनकी प्रतिभा का विस्फोट ही कहा जाएगा। यह हस्बमामूल है कि इस तरह के कवि को जब किसी विचारधारा के चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है तो उसे परखने में भारी भूल हो जाती है। जब हम विचारधारा पर बात करते हैं तो उससे अर्जित भाषाई संस्कार, पूर्वज्ञान और पूर्वग्रह को लेकर इतने सम्मोहित और आततायी हो उठते हैं कि हम जिस कवि की आलोचना कर रहे होते हैं, उसके आत्मसंघर्ष और मौलिक चिंतन को ताक पर रख देते हैं और हमारी विचारधारा ही केंद्र में आ जाती है। यह उस कवि के साथ अन्याय है। अंततोगत्वा ऐसी समालोचना सवालों के घेरे में चली आती है। इसमें कोई दो मत नहीं कि लब्धप्रतिष्ठ मार्क्सवादी आलोचक डा. रामविलास शर्मा ने अपने युग में प्रतिक्रियावादी लेखन से जो संघर्ष किया, उसे अनदेखी नहीं किया जा सकता। मगर उन्होंने मुक्तिबोध के काव्य में कवि के ‘व्यक्तित्व’ को जिस स्थूल और भौतिकवादी रीति से विश्लेषित किया, उनके ‘व्यक्तित्व’ में रहस्यवाद, अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद के प्रतिलोम विचारों का सामंजस्य स्थापित किया, ‘अस्तित्ववादियों के ‘व्यक्ति’ और मुक्तिबोध जैसे मार्क्सवादियों के ‘व्यक्ति’ में कोई फर्क नहीं देखा और कविता में वैयक्तिकता-मात्र के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा, वह उनकी मुक्तिबोध-संबंधी आलोचना में संघर्ष की सबसे दुखद परिणति है। “हमने पाया है कि डा. शर्मा ने अपने पूर्व निर्धारित निष्कर्षों की स्थापना के लिए इतने बड़े पैमाने पर विकृतिकरण से काम लिया है कि सहसा तो वह अविश्वसनीय है। वे हिंदी के बहुमान्य आलोचक हैं। उनकी गिनती अब हिंदी की जातीय परंपरा के उन्नायकों में होती है। ऐसी स्थिति में आलोचना में इस प्रकार का व्यवहार उनकी आलोचकीय प्रतिष्ठा को क्षतिग्रस्त करता है, बल्कि उनके समग्र आलोचनात्मक कृतित्व की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना देता है। नई पीढ़ी ने उनके द्वारा किए गए मुक्तिबोध के मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन को कभी स्वीकार नहीं किया, तथापि इसकी आवश्यकता बनी हुई है कि विस्तार से उनकी स्थापनाओं पर विचार कर सचाई को सामने लाया जाए। .... क्योंकि मुक्तिबोध-विरोध उनके आरोप भी ‘अक्षम्य’ और निराधार है! यह समझने में विशेष कठिनाई न होनी चाहिए“ (नंदकिशोर नवल /ज्ञान और संवेदना/पृ सं10)। डा. नंदकिशोर नवल जी के इस विचार के परिप्रेक्ष्य में हमें मुक्तिबोध संबंधी डा. रामविलास शर्मा की आलोचना-पद्धति और विचारधारा को जान लेना जरूरी है। आप अगर डा. शर्मा की पुस्तक ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ को देखेंगे तो स्वत: पता चल जाएगा कि उन्होंने मुक्तिबोध की कविताओं का पोस्टमार्टम करने में जिन औजारों से काम लिया, वह है – फ्रायड का मनोविश्लेषणवादी औज़ार। वे काव्य की रचना-प्रक्रिया में ‘अवचेतन की भूमिका’ को एक पूर्वग्रह की तरह अपनाए हुए दिखते हैं। फ्रायड का भूत उनके इतना सिर चढ़कर बोलता है कि कविता ‘अंधेरे में’ का एक ‘प्रेमिका’ शब्द देखकर मुक्तिबोध को काम-वासना पीड़ित घोषित कर देते हैं। उन्हें हर कविता के काव्य-नायक में मुक्तिबोध का ‘मैं’ अर्थात स्वयं कवि ही दिखाई देता है। उन्होंने कभी भी कवि की पक्षधरता को उसके सामाजिक यथार्थ के चिंतन में रखकर नहीं देखा। ‘भूल-गलती’, ‘लकड़ी का बना रावण’, चंबल की घाटी’, ‘अंधेरे में’ - इन बहुचर्चित कविताओं में, अपने युग के सर्वाधिक सुगठित व्यक्तित्व वाले रचनाकार में उनके द्वारा कवि के व्यक्तिगत ‘व्यक्तित्व’ को ही देखा गया, उनके आत्मसंघर्ष को वर्ग-संघर्ष और द्वंद्वात्मकता की मार्क्सवादी समीक्षा पद्धति में नहीं देखा गया । उन्हें फ्रायड के विचारों से सीजोफ़्रेनिया नामक मनोरोगी तक घोषित करने की असफल कुचेष्टा की गई। उनका पूरा ध्यान कवि के कृती-व्यक्तित्व यानि आत्मपक्ष पर न होकर केवल मुक्तिबोध की मनोरचना पर था, लेकिन उस मनोरचना की नींव कहाँ थी, उसके रचनातल का आधार क्या था, इस पर ध्यान नहीं दिया गया । यह डा. शर्मा का भाववादी विश्लेषण है, मार्क्सवादी विश्लेषण नहीं। इस समीक्षा में आलोचना के जिस विचार-दर्शन का प्रक्षेपण हुआ है वह जमीनी नहीं, निहायत वायवीय और कमजोर है। बलजबरी की इस आलोचना की हिन्दी साहित्य में घनघोर निंदा हुई। उनके परवर्ती अंधभक्त आलोचकों-कवियों ने उनके बचाव पक्ष में जो बातें आगे रखीं उनमें मुक्तिबोध को एक साँचे में ढले हुए कवि कहा गया और ‘लोकधर्मिता’ के अनुपयुक्त समझने का प्रयत्न किया गया। उनका मानना है कि फैंटेसी महज एक शिल्पगत प्रयोग है। इसका प्रयोग परवर्ती कवियों ने नहीं किया, न ही इसे कविता में मुक्तिबोध की परंपरा के रूप में स्वीकार ही किया गया। मुक्तिबोध के सुधी पाठक यह महसूस करेंगे कि उनका काव्य-शिल्प जासूसी कथानकों में प्रयुक्त कोई मनोरंजक फैंटेसी नहीं है, बल्कि उसमें समय के कटु और वीभत्स यथार्थ का ताना-बाना मौजूद है, जो उनकी फैंटेसी को सही अर्थ देता है और उसे महान बनाता है। पर, रामविलास शर्मा जी ने मुक्तिबोध को व्याख्यायित करने के लिए जिस साहित्यिक मिथकीकरण का सहारा लिया, उसके पक्षधरों ने यह नहीं बताया कि फैंटेसी लोकधर्मी प्रतिमान के लिए कैसे बाधक है या मुक्तिबोध की फैंटेसी वाली कविताओं की सीमाएं क्या हैं अथवा क्या होनी चाहिए। इस परंपरा के एक वरिष्ठ कवि विजेंद्र ने खुद अपनी कई लंबी कविताओं में छिट-पुट फैंटेसी का प्रयोग किया है। फिर भी इस पर बात करने से उनको गुरेज है। यह डा. रामविलास शर्मा के प्रति उनका गुरुभक्ति-धर्म के निर्वाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं। आप कवि विजेंद्र की लंबी कविता – ‘मैग्मा’ पढ़ें। उसमें यत्र-तत्र फैंटेसी का प्रयोग हुआ है, पर कवि अपनी भाषा की बुनावट और वाचालता में इतना फंसा नजर आता है कि वहाँ हर जगह भटकाव ही दृष्टिगत होता है। वहाँ मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ की तरह न कथन है, न लक्ष्य है, न वह भाषिक बुनावट ही है। केवल एक अर्थहीन खालिस स्वप्न या कल्पना का भास-मात्र है। डा. रामविलास शर्मा की मुक्तिबोध-संबंधी स्थापना के प्रभाव में जो कवि-आलोचक-चिंतक बुरी तरह फंसे रहे, उनका एकालाप है कि मुक्तिबोध कविताओं में केवल फैंटेसी या स्वप्नलोक बुनते हैं, जिस पर अस्तित्ववाद और रहस्यवाद की गहरी छाया मंडराती दिखती है। उनकी स्थापना के समर्थन की वे अपनी कोई वैचारिक जमीन प्रदान नहीं करते, केवल इसके सिवाय कि, रामविलास जी ‘एंटी नामवर’ हैं, इसलिए उनकी स्थापना लोकधर्मिता के अनुरूप है और सही है। प्रसंगवश यहाँ कहना चाहूँगा कि हम चाहे नामवर सिंह की जितनी निंदा कर लें, पर अगर ‘कविता के नए प्रतिमान’ में उन्होंने गजाजन माधव ‘मुक्तिबोध’ की काव्यात्मकता का रहस्य नहीं खोला होता तो मरणोत्तर मुक्तिबोध को जानने में हिन्दी-सेवियों और आलोचकों की भूमिका और तत्परता वह नहीं होती जो आज चहुंदिश दिख रही है। इसका पहला श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने मुक्तिबोध में डा. रामविलास शर्मा के ‘व्यक्तित्व’ की स्थापना को ‘अस्मिता’ या ‘आइडैनटिटी’ से प्रतिस्थापित किया और एक-एक कर डा. शर्मा के सारे तर्कों को काटकर मुक्तिबोध के ‘आत्मसंघर्ष’ की परिणति अंतत: सामाजिक संघर्ष में मानी। उनके सम्पूर्ण साहित्य के कथ्य का बुनियादी ढांचा भी यही बताया। देखने वाली बात यह है कि मुक्तिबोध की जिन लंबी कविताओं को नामवर जी ने सामने रखा और उनके काव्य-मूल्यों को जिस सामाजिक और वस्तुपरक दृष्टि से व्याखायायित किया, उसमें उनका ज़ोर एक ऐसे नाट्य-विन्यास की ओर है जो तथाकथित बिंबवादी काव्य-भाषा के दायरे को तोड़कर सपाटबयानी आदि अन्य क्षेत्रों में कदम रखने की ओर साहस का संकेत करते नजर आते हैं। इस तरह उनकी स्थापना से मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष से उत्पन्न भाषागत क्रीड़ाभाव, लीलाभाव, तनाव, जटिलता, विसंगति, विडम्बना आदि काव्य-मूल्यों की स्वीकृति उनके काव्य-सिद्धान्त के अंतर्गत स्वत: स्थान पा जाते हैं। डा. नामवर सिंह स्वयं कहते हैं – ‘इस काव्य-सिद्धान्त का ढाँचा खड़ा करते समय निश्चय ही मेरे सामने प्रधानत: मुक्तिबोध की वे ही कविताएँ रही हैं, जिनके बारे में कवि ने कुछ खीजते-से स्वर में एक जगह कहा है कि : मेरी ये कविताएँ / भयानक हिडिंबा हैं / वास्तव की विस्फारित प्रतिमाएँ / विकृताकृति–बिम्बा हैं (कविता के नए प्रतिमान / पृ सं -250-251)। अतएव नामवर जी के इस व्याख्या का मूल उद्देश्य मुक्तिबोध के पुनर्मूल्यांकन के बहाने एक ओर डा. रामविलास शर्मा की स्थापना का विरोध करना है तो दूसरी ओर अपनी आलोचना-पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ में विहित विचार जैसे; काव्य-भाषा, विसंगति, विडम्बना, नाटकीयता, अनूभूति की जटिलता और तनाव, ईमानदारी आदि को मुक्तिबोध की कविताओं में लक्षित कर अपनी स्थापना की जमीन को मजबूती प्रदान करना है। अगर सही में नामवर सिंह मुक्तिबोध की कविताओं को लेकर इतने सहृदय, निष्पक्ष और चौकन्ने होते तो इस किताब के मुख्य अध्याय में ही इन पाठों को जगह मिल गई होती। बाद में जब ‘कविता के नए प्रतिमान’ का द्वितीय संस्करण आने को हुआ तो उसके परिशिष्ट के अंतर्गत ‘अंधेरे में: पुनश्च’ शीर्षक से नए निबंध को जोड़कर नामवर जी ने इस कवि के प्रति अपने नैतिक दायित्व से मुक्त होने की चेष्टा की... खैर। इस प्रकार हिन्दी के दोनों मूर्धन्य प्रगतिशील आलोचकों ने जाने-अनजाने मुक्तिबोध-काव्य की अधूरी और पक्षपाती व्याख्या की। प्राध्यापक और आलोचक डा. चंचल चौहान का मानना है कि ‘हिन्दी की प्रगतिशील जनवादी समीक्षा की ये दो अतिवादी भटकाव हैं। इन भटकावों के सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं।‘ डा. शर्मा स्थूल समाजशास्त्रीय और भौतिकवादी रीति से मुक्तिबोध को एंटी-मार्क्सवादी साबित करने पर तुले हैं तो डा. नामवर सिंह ने मूल्यांकन में जिन औजारों को सहारा लिया है उससे कविता में भाववादी-रूपवादी झुकाव को प्रश्रय मिलता है। कहना न होगा कि मुक्तिबोध की कविताएँ उत्तर-आधुनिकता के इस सर्वग्रासी समय के मुकम्मल बयान हैं। वे पाठकों को उनके बहुस्तरीय आंतरिक यथार्थ से रु-ब-रु कराती है और उनके अंतर्तम को आलोड़ती भी हैं। वे आजादी के दो दशक के भीतर की रचनाएँ होते हुए भी उसके अगले पचास सालों के अनंतर आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं । कवि ने उन कविताओं में परिवेश के जिस तनाव को महसूस किया है वह कमोवेश दृश्य में अब भी उसी त्तीव्रता से मौजूद है। वास्तव में, इस अप्रतिम काव्य-व्यक्तित्व की प्रखरता ने कविता को एक नया संदर्भ दे दिया है। हिंदी आलोचना की गुटबाजियों का यह परिणाम हुआ कि इसने मुक्तिबोध की कविताओं का ‘अंधेरा’ और बढ़ा दिया है। यह सही है कि फैंटेसी अब हिंदी कविता और आलोचना - दोनों के लिए नया शिल्प नहीं रहा । इसे अब तक कविता के सौंदर्यशास्त्र में अभिहित नहीं किया गया है, न ही इस पर गंभीरता से काम ही हुआ है। यह दुखद है कि क्लासिक मार्क्‍सवादी और यथार्थवादी आलोचक डॉ रामविलास शर्मा को मुक्तिबोध में एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सार्त्र के खंडित व्यक्तित्व का अस्तित्ववाद। आधुनिकताबोध और नव्य समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए वहां भाषिक एवं साहित्यवादी ‘अस्मिता की खोज’ दिखती है, वहीं स्थूल मार्क्‍सवादी प्रभाकर माचवे के लिए वह ‘गुएरनिका इन वर्स’ हो गई है। शमशेर के लिए मुक्तिबोध देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रता-पूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है तो कलावादी अशोक वाजपेयी के लिए ‘खंडित रामायण’। किसी को इसमें भाषा की रात नजर आती है तो किसी को शब्दों का जंगल। किसी को बीसवीं सदी का सबसे दुरूह और जटिल कविताएँ लगती हैं। इन आलोचकीय अंतर्विरोधों के बीच अधिक गंभीर काम डा.. नंदकिशोर नवल जी का ही लगता है। उनकी आलोचना पुस्तक ‘मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना’ में कोई दुराग्रह नहीं है। उसमें मुक्तिबोध के मुख्य काव्य-आधार ज्ञान और संवेदना की पूरी गहराई से पड़ताल की गई है और उनकी विश्वदृष्टि, सौंदर्यशास्त्र, पॉलिटिक्स, अस्तित्ववाद, रहस्यवाद आदि की सुचिन्तित व्याख्या कर उन्हें आज का एक महत्वपूर्ण और जरूरी कवि माना गया है, जो बहुविध पठनीय है। यह अनुभवनीय है कि मुक्तिबोध के सृजन के संबंध में आलोचकीय अंतर्विरोधों का सही-सही पता पाना एक दुष्कर कार्य है, क्योंकि उनकी कविताएं जितनी बहुस्तरीय हैं, उतनी ही अर्थगर्भी। यथार्थ से सन्निबद्ध कवि का स्वप्न-लोक जब फैंटेसी के रूप में सामने आता है तो हर पाठक अपनी समझ और हर आलोचक अपने प्रतिमानों से उसे पकड़ने की कोशिश करता है, किन्तु दूसरों के प्रतिमान और समझ से मुक्तिबोध के कुछ सूत्र छूट जाते हैं। यही अनसुलझे कथ्य और वस्तु की स्वव्याख्या विवाद को जन्म देती है। सही में निष्पक्ष होकर बिना किसी मान्यता के मुक्तिबोध को पढ़ना पाठक के मन में अंतर्द्वंद्व और वैचारिक विकलता को जन्म देना है, जिसका हल भी पाठक अपने दृष्टिकोण में ही पाता है। यह एक विचार-दृष्टि को पाठक के अंदर साकार करता है जो उसकी अपनी निज समझ की निष्पत्ति होती है। मुक्तिबोध की मतभिन्नता तो अज्ञेय जी से भी थी। उनसे उनकी पटती नहीं थी। तारसप्तक के प्रभावी लेखक और सम्पादक होने के कारण अज्ञेय ने मुक्तिबोध की न केवल उपेक्षा की, बल्कि पूरी शक्ति से यत्नपूर्वक उनकी लेखनी की बाढ़ दबाने की कोशिश भी की। लेकिन ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’ और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ पुस्तकें उनको अज्ञेय से आगे लेकर चली गईं। अज्ञेय ने मुक्तिबोध की कविताओं की संरचना का सवाल उठाया और उसे अपूर्ण कहा। वे कहते हैं – “समग्र रूपाकार का कोई भी बोध मानो उन्हें है ही नहीं – उनकी शायद ही कोई कविता संरचना की दृष्टि से सम्पूर्ण हो, शायद ही किसी में सघन संरचनात्मक गठन दिखाई पड़े। उनकी अधिकतर कविताएँ मानों चलती चली जाती है और फिर रुक जाती हैं, पूरी या समाप्त नहीं होतीं“ (कवि-दृष्टि, भूमिका, पृ -18)। यह भी मुक्तिबोध के आलोचकीय अंतर्विरोध का एक बहुत अहम सवाल है कि अज्ञेय जैसे कवि ने मुक्तिबोध की कविता का इतना तिरस्कार किया ! लेकिन बक़ौल अशोक वाजपेयी, ‘गजानन माधव मुक्तिबोध का समकालीन हिन्दी संसार में इतना आतंक है कि यह बात भूला-सी दी गई है कि अपने जीवन काल में उनका एक भी कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया था।‘ इस अवधूत कवि की लंबी-लंबी कविताओं को भला कौन प्रकाशक छापता? यह संभवत: पहले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने जीते-जी अपना कोई काव्य-संकलन नहीं देखा। सन 1962 में मुक्तिबोध की पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर मध्य प्रदेश सरकार के प्रतिबंध के बाद वे पहली बार अंदर से पूरी तरह टूट गए थे और उनकी जीवटता ने जबाव दे दिया था। इस कहर का असर हुआ कि उन पर 'मेनिन्जाइटिस' की घातक बीमारी का प्रहार हुआ, जिसने उनके मस्तिष्क को शंकालु और कमज़ोर कर दिया। भय, असुरक्षा और षड्यंत्र- जैसे नकारात्मक भावों और जीर्ण रोग से लड़ते हुए जीवन के अंतिम पग पर उन्होंने जिस कालजयी कृति को रचा, उसी का नाम ‘अँधरे में’ है । 'हॉरर', विसंगति, रहस्यमयता और वीभत्स अर्थशून्यता के गहरे तनाव के बीच मुक्तिबोध के भयानक अंतर्द्वंद्व की शब्द-सृष्टि है, उनकी कृति ‘अँधरे में’। उनका जिया हुआ खालिस क्षण है: अंधेरे में। यह जितनी वैयक्तिक है उतनी ही निर्वैयक्तिक। वस्तुत: मुक्तिबोध का आत्मपक्ष उनके कृती-व्यक्तित्व को जाने बिना समझा नहीं जा सकता, क्योंकि उनके काव्य को उनके व्यक्तित्व से अलग नहीं किया जा सकता बल्कि कहना चाहिए कि उनके समूचे व्यक्तित्व के संदर्भ में ही उनके काव्य को देखा-परखा जा सकता है, उसकी शक्ति और सौंदर्य को व्याख्यायित किया जा सकता है। उनके जीवन से ही उनकी कृति की निर्मिति हुई है। मुक्तिबोध का काव्य-व्यक्तित्व उनके निजी व्यक्तित्व से नाटकीय रूप से जुदा नहीं था, उनकी कविता में उनके जीवन का ही प्रतिबिम्बन हुआ है पर यहाँ यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि मुक्तिबोध का काव्य-नायक स्वयं मुक्तिबोध ही हैं। उनके काव्य-नायक को कवि का ‘मैं’ समझकर डा. रामविलास शर्मा बहुत बड़ी और ऐतिहासिक भूल कर चुके हैं, जिसे मुक्तिबोध के गंभीर अध्येता और आने वाली पीढ़ियाँ कभी माफ नहीं करेंगी। मुक्तिबोध के जीवन के भयंकर तनाव और उनके आत्मसंघर्ष को उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि में नहीं देखकर जो पाठक उनकी चेतना को आत्मबद्ध चेतना समझते हैं, वे मुक्तिबोध का कुपाठ ही करते हैं। वे उनकी मार्क्सवादी अवधारणा नहीं समझ सकते ! डॉ. नन्द किशोर नवल कहते हैं कि “डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह में यह विवाद चलता रहा है कि उनका आत्मसंघर्ष उनका अपना संघर्ष है या पूरे मध्यवर्ग का है। दोनों विद्वानों ने दो छोरों पर जाकर बात की है। हमारा निष्कर्ष यह है कि मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष उनका अपना संघर्ष होते हुए भी पूरे सचेत प्रगतिशील मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी समुदाय का संघर्ष है और उसका संघर्ष होते हुए भी वह उनका अपना संघर्ष है। यह संघर्ष वस्तुत: वर्ग-संघर्ष की छाया है, जिसकी द्वन्द्वात्मकता उनके यथार्थ-बोध के साथ बढ़ती गई। उनका उद्देश्य आत्मसंघर्ष के माध्यम से एक ‘सृजनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करना था, जिससे कि समाज मे परिवर्तन घटित हो सके।“ (ज्ञान और संवेदना / भूमिका पृ – 10) मुक्तिबोध के आत्म-पक्ष को समझने का जो दूसरा सही तरीका हो सकता है वह उनकी अपनी आलोचना-कृति और उनका गद्य-साहित्य से गुजरना है, जहां उनका लेखकीय व्यक्तित्व पूरी सचाई और निज सोच के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होता है। कविता के बाहरी प्रतिमानों या टूल्स से समझने के बजाए उनके ही बनाए टूल्स से कहीं ज्यादा सुघड़ तरीके से उनके आत्मपक्ष को समझा जा सकता है। इससे हम गलती की संभावना से भी बच सकते हैं। मुक्तिबोध ने ज्ञान और संवेदना के विभिन्न ‘लेयरों’ पर अपने गद्य में विस्तार से बातचीत की है, जो उनकी अंतर्दृष्टि को समझने में कारगर है। यहाँ उन्होंने ज्ञान-पक्ष को संवेदना से अंतर्गुम्फित करने पर विशेष बल दिया है और कविता में उसी ज्ञानात्मक संवेदना को फैंटेसी के शिल्प में अभिव्यक्त किया है। कविता में वस्तु और रूप को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने साफ शब्दों में कहा है- “ ज्ञानपक्ष संवेदना से हटकर काव्योपयोगी नहीं रहेगा। यह तथ्य स्वीकृत करने पर भी इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज की नई कविता के प्रगल्भ विकास के लिए कवि की मूलभूत संवेदन-शक्ति में विलक्षण विश्लेषण-प्रवृति चाहिए।“ साथ ही, मुक्तिबोध ने कवि के त्रिविध संघर्ष – तत्व, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने और दृष्टि-विकास के लिए संघर्ष – में हृदय-पक्ष के साथ बौद्धिक पक्ष के संतुलन और मेल को जिस सूझ-बुझ और वैज्ञानिक दृष्टि से ‘नई कविता के आत्मसंघर्ष ‘ में व्यक्त किया है, वह उनकी कविता के परिवेश के द्वंद्व और तनाव को समझने के लिए बहुत जरूरी उपादान सिद्ध होता है। यह जानी हुई बात है कि मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में फैंटेसी का प्रयोग किया। पर मुक्तिबोध की रचनाओं में फैन्टेसी और रहस्यात्मकता जासूसी किताबों से इस मायने में भिन्न है कि इसमें जिंदगी की एक अनिमेष पुकार है, हाहाकार है, बेचैनी है, निनाद है। मनोरंजन नहीं, मन की किलकार है, यथार्थ के गहन सन्नाटे की दुर्दमनीय अबूझ-सी एक चीत्कार है। लड़ने और टूटने, टूटने और फिर उठने का दुर्धर्ष संघर्षरत मानवीय प्रयत्न है। इसलिए यह फैन्टेसी उनकी रचना को अजेय बनाता है, मन के उच्चतम (क्लासिक) भावों का बोध कराता है। उन्होंने इसका प्रयोग कई प्रकार से किया है। कहीं यह हल्का है तो कहीं घनीभूत। उनके द्वारा कविता में फैंटेसी-शिल्प का प्रयोग इस अर्थ में सार्थक है कि वह यथार्थ के अत्यंत सन्निकट है, गोया कि स्वभुक्त सामाजिक यथार्थ की गहरी छवि के प्रतिबिम्बन के कारण सफल हुआ है। उन्होंने यथार्थ संसार के भीषण अंतर्द्वंद्व और उसकी बहुस्तरीयता को उभारने के लिए फैंटेसी का एक औज़ार के रूप में प्रयोग किया। इसमें विशेषता यह है कि उनका फैंटेसी धीरे-धीरे कविता में परत-दर–परत खुलता है, जिसमें सत्य में स्वप्न और स्वप्न में सत्य का भास होता है। स्वप्न के भीतर भी निहित एक स्वप्न में यथार्थ के प्रतिदर्श का बोध कराता है जो जितना तीव्र है, उतना ही मर्मभेदी। ‘अंधेरे में’ कविता इसका जीवंत उदाहरण है। इसकी जटिलता का कारण यह है कि यह प्रखर यथार्थबोध और गहन जीवनानुभव से संपृक्त है। इस क्रम में यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक है कि ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में मुक्तिबोध का एक आलेख है – तीसरा क्षण । इसमें उन्होंने ‘फैंटेसी’ जैसे जटिल शिल्प पर गहराई से लिखा है जो मुक्तिबोध की काव्य-बुनावट को समझने में बहुत सहायक होता है। वे फैंटेसी में विद्यमान संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की उपस्थिति का महत्व बताते हैं। फैंटेसी के माध्यम से काव्य की सृजन-प्रक्रिया का इतना विस्तृत और सारगर्भित विवेचन मुक्तिबोध की अंतर्दृष्टि की गहन पैठ का प्रतीक है। सतही तौर पर देखने से भास होता है कि फैंटेसी एक शिल्प मात्र है, काव्यानुभूति को अभिव्यंजित करने की एक शैली भर। लेकिन उनके विचार की गहराई में जाने से प्रतीत होता है कि वे फैंटेसी का कविता के व्यापक अर्थों में प्रयोग करते हैं। इसमें कभी-कभी रूपक और प्रतीक का अद्भुत मिश्रण दिखलाई देता है। ‘सूखे कतार नंगे पहाड़’ कविता इसका एक अप्रतिम उदाहरण हो सकता है, जहां पहाड़ पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतीक है। इसी काले विवर-अंधकार मे पूंजीवादी विचारधारा वाले पूंजीपति तांत्रिक के रूप में रहते हैं, जिसने मानव-आत्मा को श्वानों, स्यारों और चमगादड़ों के तन में बंदी बना रखा है : “निज अंध गुहा की छत में तांत्रिक ने, असंख्य आत्माएँ लटका दीं चिमगादड़ के समूह-सी उलटी लटका नीचे सिर, ऊपर करके घृणित पैर ढीले फैलाकर रात्रि श्याम असगुनी पंख उलटी लटकी हैं पराजिता दयनीया आत्माएँ असंख्य ! भूखे स्यारों की मलिन देह में अगिन मानवात्माएँ कर दीं, हाय! कैद जो इधर-उधर पशु रहे घूम मुख को नत कर, वे श्वान और अतिवृद्ध सिंह (सरकस के पशु) भूखे शृंगाल इत्यादि जीव – थे एक जमाने में ये भी मनुष्य, पर थोड़े से आराम हेतु, अपनी आत्माएँ बेच, हाय ! हो गए आज काले तांत्रिक की महादुष्ट जागीर घोर के क्षुद्र जन्तु।“ इस तरह के उदाहरणों से मुक्तिबोध की कविताएं भरी पड़ी हैं, जो उनकी कविताओं में फैंटेसी के सफल प्रयोग को दर्शाते हैं। पर अहम सवाल यह है कि मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में फैंटेसी की शैली क्यों अपनाया। उनका मानना था कि बहुत बार दुनिया जैसी दिखलाई पड़ती है वैसी नहीं होती। उसके दिखलाई पड़ने के रूप और असली रूप में चकित कर देने वाला अंतर्विरोध होता है। तथ्य यथार्थ को छिपा लेते हैं। ऐसी स्थिति में फैंटेसी के जरिए ही उसके असली रूपों को दिखलाया जा सकता है। इस बात को दार्शनिक अर्नेस्ट फिशर के इस कथन से समझा जा सकता है कि “कल्पना द्वारा यथार्थ का उद्घाटन पाठकों को बिजली के झटके की तरह लगता है, लेकिन बिना उस झटके के उन्हें ‘अवास्तविक’ दुनिया की वास्तविकता का ज्ञान नहीं कराया जा सकता।“ लेकिन हिन्दी के परवर्ती कवियों ने मुक्तिबोध की फैंटेसी शिल्प का अनुसरण नहीं किया (क्यों?) । इसका सर्वप्रमुख कारण तो यह हो सकता है कि यह कविता का अत्यंत जटिल और देर से सधने वाला शिल्प है, जिसे मुक्तिबोध-जैसा कोई प्रतिबद्ध और समर्पित कवि ही साध सकता है, क्योंकि कविता में जिस संवेदना को फैंटेसी में बदलने का काम किया जाता है, उसका उतना ही बौद्धिक और ज्ञानात्मक होना उसकी पहली अनिवार्य शर्त है। अधिकतर वैसे कवि इसमें चूक सकते हैं, जिसने फैंटेसी को यथार्थ में बदलने की वैश्विक अंतर्दृष्टि और सामाजिक चेतना अर्जित न की हो । कहना न होगा कि यह जनवादी काव्य-कला का अन्यतम रूप है। उसे साधना सब कवियों के वश की बात नहीं। यह केवल विश्व के गिने-चुने महान कवियों ने ही किया है। इसमें अथक श्रम के साथ सघन जीवन-दृष्टि की जरूरत होती है। मुक्तिबोध की कविताओं को लेकर समालोचना में आलोचकों के बीच मतभिन्नता होने का एक कारण यह भी रहा कि इनकी कविताएं सुबोध और सरल नहीं हैं। इनकी कविताएं न तो अज्ञेय की तरह रत्न-जड़ित है, न नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन की तरह ‘सिम्पल’। यह आकार में जितनी बड़ी होती है, उतनी ही संश्लिष्ट और अर्थगर्भी। इस जटिलता का कारण कविता में पिरोया सघन बहुस्तरीय विचार है, जो ‘प्रसाद’ और ‘निराला’ के बाद केवल मुक्तिबोध में ही गोचर होता है। वह आज के भी किसी कवि में शायद नहीं मिलता। इस वैचारिक गहनता का प्रमुख कारण है – ‘कविता का फैंटेसी शिल्प’, जो जितनी संवेदनात्मक है उतनी ही ज्ञानात्मक, जहां मार्क्सवाद की प्रच्छन्न, किन्तु मजबूत नींव पड़ी हुई है। उनके काव्य-नायक की वर्गीय स्थिति, आत्मसंघर्ष और वर्ग-संघर्ष में अविच्छिन्न संबंध, जनसंघर्ष के बदलते चरित्र, श्रमिक वर्ग का हाहाकार और क्रान्तिकारिता, शोषणमुक्त समाज का स्वप्न और तनाव की सघनता आदि ऐसे पहलू हैं जो मुक्तिबोध की फैंटेसी में विराट आकार लेते है। ऐसा लगने लगता है कि किसी जानी हुई संवेदना और ज्ञान को वे कविता में नहीं लाते, बल्कि उसे जानने के लिए कविता की गहरी, बीहड़ यात्रा करते हैं। यही समालोचना में मुक्तिबोध के काव्य-कर्म और आत्मपक्ष को जानने की सार्थकता है, जो उनको कविता में तोड़कर एक नई संवेदना की सृष्टि करती है, जैसे कि ( स्वयं मुक्तिबोध की कविता से ) - –“फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँ विष से अप्रसन्न हूँ इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए वह मेहतर मैं हो नहीं पाता पर, रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है कि कोई काम बुरा नहीं बशर्ते कि आदमी खरा हो फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता। रिफ्रिजरेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रेमों के बाहर की गतियों की दुनिया में मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है छाती के कोषों में रहितों की व्रीड़ा है” (कवितांश : मैं तुम लोगों से दूर हूँ)• संपर्क : सहायक निदेशक, प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, एम डी आई भवन, धुर्वा, रांची – 834004 मोबाईल (0 9006740311)

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