जब मेरे मन की समप्रवाहित नदी में कोई पत्थर फेंकता है या वातावरण का भूगोल कोई उछाल लाता है तब स्वमेव वहाँ भावों के प्रपातों की सृष्टि होने लगती है। तब भीतर शब्द बजने लगते हैं नगाड़े की तरह और विवश हो उठता हूँ मैं अभिव्यक्ति के लिये। तब ही कहीं शब्द मुझे रच पाते हैं...।
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Sunday, January 10, 2010

मैं तिनका हूँ (दलित-कविता)

[सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता से प्रेरित होकर...]


मैं तिनका हूँ
तुम्हारी देहरी का
पैरों तले रौंदा हुआ


तिनकना न मुझे देखकर
तुम्हारे जूतों की ठोकर से
बेचैन हो उड़ूँगा अंधड़ बन
तुम्हारे ही आकाश में
और जा गिरूँगा तुम्हारी
आँख में


किरकिरी बनाओगे आँख की अपनी
तो घनेरी पीड़ बन जाऊँगा
आँख की तुम्हारी



ऐसी कोई जगह नहीं
जहाँ पहुँच न सकूँ मैं
ऐसा कोई हुआ नहीं
जो रोक ले मुझे कहीं जाने से...
आखिर मैं एक तिनका हूँ !



जा मिलूँगा
अन्य तिनकों से तब,
ढूँढ नहीं पाओगे तुम मुझे
तिनकों की ढ़ेर में और
तुम्हें तिनके के बल का
अहसास भी करा दूँगा।
* * * * *
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Sunday, December 27, 2009

इस शहर में रोज़

नींद इस शहर को
मयस्सर नहीं, रात होने की
महज़ मजबूरी है

वर्ना पलकें गिराकर भी जगे रहना
लोगों की आदतों में शुमार है यहाँ !


और अलार्म-घड़ियों का बजना तो
सिर्फ़ एक बहाना है,
फिर से लोगों का
शहर की ठंढी दिनचर्या में
वापस लौट आने का

देखता हूँ,
ऊब भरी अलसायी सुबह
नश्तर बनकर गड़ती है जब
देह के पोर-पोर में,
झख़मार कर आदमी को
उठना पड़ता है
इस शहर में रोज़
दिन के सरकस के लिये।

और इस सरकस में
उसकी खोली से दफ़्तर के बीच
रोज़ एक दुनिया
बनती है - बिगड़ती है

और हाँ, जैसे-जैसे दिन उठता है
इस दुनिया में
सड़कें अपनी रफ़्तार पकड़ती हैं
और तमाम चीजें सड़कों पर
हरक़त में आने लगती हैं


सड़क के हर
नुक्कड़,
गली
चौराहे पर
कशमकश
गिरती-पड़ती,
दौड़ती-हाँफती
भीड़ की आपाधापी में, सुनो
गौर से...
गहरे सन्नाटे का
जंगल पसरा होता है

जिसके शोर में
घिरनी-सी घूमती हुई
पर एक जगह ठहरी-अँटकी
हजारों-हजार जिंदगियाँ होती हैं
जिनके दीदों में
ढरकते-सूखते
आँसूओं के सैलाब होते हैं


जिनमें बर्फ़ बनती
रिश्तों की तासीर होती है
जो चेहरों से उनके झाँकते हुए
एक और दिन के
बेरंग और
आहत हो जाने का
लुब्बे-लुबाब बताते हैं


जहाँ सपने टूटते हैं, भरोसे
भाँप बनकर उड़ जाते हैं और
दिलों में रह-रहकर हुकें उठती हैं,


फिर भी न जाने क्यों? कैसे तो...
होंठ मुस्कुराहटों की झूठी लाली
फेंकते हैं, पर


तन्य त्रासद आँखें
शह देती हुई उनमें खोब से
साँझ की तरह ढल जाती है
और नींद के वहम में
शामिल होने को
अपनी खोली का
रुख करती है


जहाँ काँखते घोड़ों को
अपनी देह से उतार
समय के खूँटों से आदमी
देर रात गये बांध देता है
रोज़ इस मायानगरी में


जैसे-जैसे रात गहराती है
जिस्म कसकता है, रूहें रोती हैं
आहें भरती हैं अदृश्य लिपियों
की मौन भाषा में कितनी ही साँसें
इस शहर में रोज़ देर रात तक !
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Sunday, December 13, 2009

तुम्हारी कलम उनके पास रेहन है

तुम्हारे शब्दों के जंगल से छूटते ही
वे आँखें मुझमें वापस लौट आयी हैं
जिसने व्यवस्था के अंधेरे में बजबजाती
उन तवारीखों को पढ़ ली हैं
जिसे चरित्रहीनता और लालच की स्याही से
तुम्हारी सियासी कलम ने
हमें पालतु बनाए रखने की नीयत से गढ़ी है


यह जानते हुए भी कि
हमारे पुरखों को आदिम पशुता ने नोंच खायी थी,
तुमने लिखा - ‘आदमखोर चिताओं ने।’


राजप्रासाद से बुर्ज़ों तक समूची रियासत की शान
हमारे पूर्वजों की घट्ठायी उंगलियों पर टिकी थी
फिर भी कसाईयों ने उन्हें कोड़ों से पीटा
हाथ तक काट डाले, पिरामीडों में राजाओं के
शवों के साथ ज़िन्दा दफ़न कर दिया

पर तुम्हारी कलम ने कभी खिलाफ़त नहीं की उनकी,
उल्टे उनके नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कर दिये

चुप्पियों की मानिंद तुम्हारी यह हत्यारी हरक़त
अब संसद से राजपथों को होती हुई,
पगडंडियों से गाँवों तक चली आती है
और उन झुर्रीदार चेहरों के हूक में समा जाती है
जो सन ‘47 के पन्द्रह अगस्त की मध्यरात्रि से
सपनों को अपनी पीठ पर लादे
नंगे पाँव उकडूँ होकर चल रहा है
जनतंत्र के पथ पर


मुझे मालुम है यह सब तुम्हें सुनना भाता नहीं
क्योंकि जनता के सुख-स्वप्न सब
पान की गिलौरियाँ बनाकर
जिन लोगों ने चबा ली हैं, उसी ने तुम्हारी
बुद्धि भी खा ली है, क्या तुम...


बता सकते हो, बासठ साल के आज़ाद
मुल्क के इस बूढ़े आदमी के भीतर इतनी आग क्यों है,
उसकी आँखों में इतना धुआँ, इतनी राख, इतना मलाल क्यों है ?


नहीं...तुम चुपचाप अपनी रुसवाई सुनते रहोगे
और सुनकर भी अनसुनी करोगे
और, ‘यह देश विविधता में समरसता का देश है’
- लिखते रहोगे क्योंकि
तुम्हारी कलम आज भी उनके पास रेहन है
* * *
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Sunday, November 29, 2009

घर और घर

वह मेरे भीतर-कहीं से निकलकर
मेरे सामने खड़ा हो गया
और बुदबुदाने लगा -
घर वह नहीं
जहाँ आदमी रहता है
घरों में आदमी अब कहाँ रहता है
जिसे तुम घर कहते हो
वह तो एक तबेला है
लानतों के सामान यहाँ
लीदों की तरह पसरे रहते हैं

हाँ, काँखते घोड़ों को अपनी देह से उतार
जिन खूँटों से आदमी
देर रात गये रोज़ बांधता है
सहुलियत के लिये उस जगह को
तुम घर कह सकते हो

क्योंकि तब उसके रोशनदानों से दरवाजों तक
अँधेरा परदे की तरह गिरता है
और ऊब और तनाव से लिपटे
सन्नाटे के साये में
कुछ देर के लिये वह जगह
एकान्त-निकेतन में तब्दील हो जाती है
जहाँ औरतें काम से निबरती हैं
बच्चे सपने बुनते हैं और
बुड्ढे अपने दाँत किटकिटाते हैं

ठीक इसी वक्त गगनचुंबी महलातों
की बत्तियाँ बुझा दी जाती है
और रात निर्वस्त्र होकर ‘हिपॉक्रिटिक’ चेहरों
को अपनी आगोश में ले लेती है
जिसके अँधेरे में लावारिस कुत्ते
डरावनी आवाज़ में भौंकते हैं
(तो कभी तेज स्वर में रोते हैं)


पर यह सब महज़ चंद घंटों का खेल है !


सहमति में मैंने सिर हिला दिया,
कहा - हाँ, घर अब फक़त
बूढे़ जवान बच्चे... सबकी
नींद की ख्वाहिशें हैं
जो उनके कल के घर की वसीयतें हैं
जहाँ रात कहीं सुनसान होती है कहीं बदनाम

यह सुनकर वह बिगड़ गया -
उसे घर मत समझो
न नींद को उसके घर की वसीयत...
दरअसल वह कोई सराय जैसा है
या बनजारों के डेरा सा
या फिर रात की खुमारी में डूबे
उन महलों सा जहाँ
दिगम्बराओं की बाँहों में
कितने ही झक्क सफ़ेद कामदेव
झूलते नज़र आते हैं !

‘और नींद ...?’ - मैंने घबराकर पूछा ।

वह तो लोगों के दिमाग में
पलता एक वहम है
अब न घर सोता है
न धड़
क्योंकि घर बेहद डरा-सहमा
एक इंसान है
जो मुर्गे की पहली बांग पर
तिलमिला उठता है और
सुबह होने तक
तिनका सा बिखर जाता है


क्या तुम्हें मालुम नहीं कि
ख्यालों में कई-कई घर होते हैं लोगों के
जिन्हें ढोते फिरते हैं अपने भीतर दिन-भर ?


एक घर माँ की कोख़ थी
पर वह एक था, सुख-शांति की
छाया फैली थी उस घर में
पर अब ...?
अब तो आदमी अपने घरों में नाशाद रहता है !
जितना नाशाद रहता है
उतने ही नये घरों की कामना करता है

हाँ, यह बात अलग है कि
जिनके घर नहीं होते
वे राह-बाट.. कहीं भी अपना घर बना लेते हैं
पर तुम उसे घर कहने से सकुचाते हो
क्योंकि उन घरों में दीवारें नहीं होती
न परदे ही झूलते हैं वहाँ
लाज की दीवारों से बनी इन घरों
को कोई कब उजाड़ दे, पता नहीं
फिर भी घर न होने का दु:ख
उन्हें सालता नहीं
जितना सालता है मौके़-बेमौके़
अपनी आबरू की दीवारें दरकने का दर्द

बिलों में कन्दराओं में
मांदों में घोंसलों में
पेड़ों पर भी इसी दुनिया के जीव
बसेरा डालते हैं
पर तुम उन्हें ‘घर’ की संज्ञा नहीं देते
जहाँ उनकी संततियाँ जनमती है
और पलती है
पर यह आदमी ही है सिर्फ़
जो दीवारें बनाता है
घर बनाने के नाम पर
और अपने सिर पर छतें
ढोता है घर रचने के खेल में
और एक साथ कई-कई घरों के बोझ तले
कहीं नहीं रहता है !
...और रात को दाग़दार करता है !!

उसकी बातें सुन मैं
हक्का-बक्का होने लगता हूँ, तभी
वह फिर मुझे झिंझोरता है-
सदियों से अपने को
स्थापित करने के उपक्रम में
आदमी अपने घर की तलाश में
रोज़ भटकता है
और आजीवन निर्वासन भोगता हुआ
एक दिन सो जाता है चिर-निद्रा में कहीं भी...
इतिहास के पन्ने पर अगर कहीं नाम भी
दर्ज कर जाता है
तो कहाँ होता है उसका पता-ठिकाना ?
कहाँ होता है तब घर उसका ? ?
- कहता हुआ वह फिर
मुझमें प्रवेश कर जाता है।
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Sunday, November 15, 2009

बंदगाँव की निर्मम घाटियाँ

भरी दुपहरी है जेठ की, घाटी में
जन-जानवर दीख नहीं रहे कहीं
न पक्षियों की चहचहाहटें ही सुनता हूँ
झाड़-जंगल झूलस गये हैं जंगल-जीव
पानी बिन हाँफ रहे हैं,
परिंदे दम मार रहे हैं
कुँआ,चहबच्चे,जोड़िया,तालाब सब सूख गये हैं
नदी-पनाले-डबरे रेत से पट गये हैं

सामने सड़क पर पिघले कोलतार पर
टायरों के निशान बनातीं
उदास मौन को भेदती बसें बीच-बीच में
हॉर्न बजाती तेज गति से
घाटियों को पार कर रही हैं
या फिर नक्सलियों के शिनॉख्त पर जाती
पुलिस की गाड़ियों की घर्घराहटों
से ही जब -तब घाटियों की नीरवता टूट रही है

जी हाँ, यह बंदगाँव की विकराल घाटियाँ हैं
कभी जगंलों का सुरम्य प्रदेश रही
ये घाटियाँ अब नक्सलियों का वास-स्थल है
बीस कोस लम्बी और बीहड़, सुनसान
और जिलेबीनुमा घाटी

जब-तब रेत के चक्रवात
उठ रहे हैं यत्र-तत्र यहाँ
डोगरों में टाड़ों पर
झरना का सोता भी सूख गया है
और प्यास से कई मौतें हो चुकी हैं
अब तक इस इलाके में

जहाँ-तहाँ बसें रुकती हैं
पहाड़ी औरतें अपनी गिदरे* को
पीठ से बाँधे सवार होती हैं
बसें खचाखच भरी होती हैं
जितने बैठी होती हैं ये
उतने ही खड़ी होती हैं
और हिचकोलें खाती हुई
घाटियों के टेढ़े-मेढ़े रास्ते
तय करती हैं

पहाड़ तो पहले ही बहुत दु:खी है,
इसके सीने में उत्पीड़न की न जाने
कितनी कहानियाँ दफ़न हैं!
पर यह गर्मी तो घाटी के लोगों में और ही
बर्बादी का सबब लेकर आया है!
जंगल तो पहले ही नेस्तनाबूद हो गये
जड़ीबूटी,फलमूल, महुआ भी ओराने लगे हैं
भूख का जलजला आ गया है
घाटी की बस्तियों में

न जंगल न धान न बरबट्टी न पानी
काम की खोज में घाटी से पहाड़ी
मजदूरिन शहर को कूच कर रही हैं

यह कैसा मंजर है कि
शहर के बाबु और महाजन
सरकार और प्रतिपक्ष के लोग
दल-बल के साथ
घाटी में अपनी योजनाएँ लेकर
पहूँच रहे हैं चिल्ला रहे हैं
नोट पर वोट का खेल खेल रहे हैं
जबकि गाँव और टोलों के लोग
अपनी इज्जत अपनी जान बचाकर
घाटी को छोड़कर कहीं और जा रहे हैं!
* * * * *
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Sunday, November 1, 2009

हमें अपने घर लौटना है

हम मादरजाद बहरे-अंधे-गूंगे नहीं हैं

हमारे कान उनके भाषणों से पक गए हैं

हमारे दीदे उनकी करतूतें देख-देख फूट गए हैं

उनके तमंचों ने हमारे मुँह पर ताले जड़ दिए हैं

हम इतने ऊबे हुए और उदास हैं कि

हमें अपने घर लौटना है साथियों



वे चाहते हैं कि हमारी आशाओं का सूरज सर्वदा के लिए डूब जाए

हमसब फ़िर अपने रास्ते भूल बैठें उनकी आदिम पशुता के जंगल में

जहाँ खूंखार जानवरों से फिर हमारा सामना हो




उनके विष-दाँतों के चमक उठने के पहले

उनके चोखे पंजों की हरकतों और नीली गुर्राहटों से बच-बचा कर

रात गिरने से पहले ही

अपने-अपने घर लौट आना चाहते हैं हम सब

लेकिन अपनी मिसरी घुली बातों में वे फँसाए रखना चाहते हैं हमें



उनके शब्द जब-जब हमारे कानों में पडे़ हैं

हम सम्मोहित, विपथगामी, पतित हुए हैं और

मतिमंद हो उनके पक्ष में अपने हाथ खडे़ किए हैं



पर उनके जादुई शब्दों की तह में धँसो तो जानो,

आदमखोर जानवरों की हुंफ सुनाई देगी

इसलिए उनकी बातों के तिलस्म में मत पड़ना मेरे भाई

सिर्फ़ अपने हॄदय की सुनना

कैवल्य भाव से अपनी कोठी लौट आना

कोई तुम्हें बुला रहा है, वही तुम्हारा अपना है

बाकी धोखा है, सपना है।



दुनिया में चाहे जितनी गहरी रात पसरी हो

हमारे घरों में निरंतर आशा के दीप जलते रहते हैं

साँसों के ढोल बजते रहते हैं

ठीक वहीं लौटना है हमें, अपने शांतिनिकेतन में।

वहाँ अपने दुखों को फाँककर हम फ़कीर हो जाएँगे

और अलमस्ती के गीत गाएँगे



वहाँ से स्वयं मे जीवन भरकर

जब उनकी दुनिया मे वापस लौटेंगे हम,

उस रात के खिलाफ़ बची हुई लडा़ई की घोषणा करेंगे

जो उसने अपने शब्दों और संगीनों के साये मे

हमारे लिए रचे हैं।
*****
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Sunday, October 18, 2009

श्रद्धांजलि : दिवंगत बेटाधन मुर्मू को

[संताल-विद्रोह (1855) के शहीद वीर-सपूत सिदो-कान्हु की पाँचवी पीढ़ी के वंशज बेटाधन मुर्मू के (14.07.07 को) असामयिक निधन पर]

कई बार गिरे और उठे बेटाधन मुर्मू तुम
उनकी चोट अपनी अदम्य छाती पर सहकर,
पर इस बार उठ गये हो सर्वदा के लिये।

रात से ही सुकी, दुली,जोबना, मंगल सभी
तुम्हारे शव पर पछाड़ें खा रहे हैं
हाँक रहे हैं,तुम्हें जगा रहे हैं

सुराज के सपने और
विकास का सब्जबाग़ दिखाकर
तुम्हारी तालियाँ बटोरने वाले
तुम्हारे ही भाई-बंधु
तुम जैसी चमड़ी के रंग वाले
तुम्हारी ही बिरादरी की भाषा बोलते
तुम्हारे भीतर पैठकर
शासन करते हैं तुम्हारे उपर
और तुम्हारी दूर्बल स्नायुओं में
बाहरी-भीतरी के भेद का ज़हर घोलकर
तुम्हें तोड़ लेते हैं हर बार
अपने पक्ष में अक्षर-अक्षर।

झारखंड बने आठ साल हो गये
कितनी पर बदल पायी, बेटाधन
झाड़-झाँखड़ झारखंडी भाई-बहनों की तस्वीर ?
पहले तो बिहार पर तोहमत लगाते थे
और अलग प्रदेश की लड़ाई में तुम्हारा साथ लेते थे।

पर कितने सुखी हो पाये
झारखंड अलगने के बाद ?
तुम्हारे पूर्वजों की आँखें तो
घुटन-शोषण से मुक्ति का सपना देखते-देखते
पथरा गयीं थीं, पीठ उनकी उकड़ूँ हो गयी थी
कंधे झुक गये थे ...
और उनके जाने के बाद...
तुम भी बराबर लड़ते रहे
अपने बाप-दादों की वह लड़ाई
(जो विरासत में मिली तुम्हें।)

दु:ख है, तुम्हारी ज़मीन पर अंधेरा
अब भी कायम है !
समय बदला शासन बदला
मुद्दे बदले लड़ने के ढंग बदले
पर कितनी बदल पाये तुम अपनी तक़दीर
और कितना बदल सका जंगल का कानून ?

भोगनाडीह* के भूखे-नंगे लोग
चिथड़ों में लिपटे तुम्हारे शव को घेरे खड़े हैं
कातर नज़रों से निहार रहे हैं कि
इलाज़ की आस में
कैसे कराहते हुये ख़ून की उल्टियाँ करते
आखिरकार तुम्हारे साँस की डोर टूट गयी !

सुकी के पास इतने भी पैसे नहीं कि
अपने पति के अंत्येष्टि के वास्ते
दो गज कफ़न का इंतजा़म कर सके !

कुछ ही दिन हुए ,
हूल-दिवस (तीस जून) पर
झक्क सफ़ेद कुरते वालों का
जमावड़ा था तुम्हारे गाँव में
वादों और घोषणाओं की झड़ी लगा दी थी
उसने आकर भोगनाडीह* में
और पक्का भरोसा दिया था कि
तुम्हें मरने नहीं दिया जायेगा
बेहतर इलाज के लिए बाहर भेजा जायेगा
पर हुआ वही जो
हर हूल-दिवस पर होते आया है, यानि
वक्ष तक वीर शहीद सिदो-कान्हु की प्रतिमा को
पुष्प-मालाओं से लाद, मत्था टेक
बखानते रहे घंटों
उनके वीरता की गाथाएँ ,फिर
जेड श्रेणी की सूरक्षा-कवचों के बीच
चमचमाती गाड़ियों में बैठ
भोगनाडीह की कच्ची सड़कों पर
धूल उड़ाते हुये राँची कूच कर गये।

बेटाधन, तुम उसी वंशज के
पाँचवी पीढ़ी के संतान हो
जिसने तीरों से बिंद्ध दिये थे
जुल्मी महाजनों को
अठारह सौ पचपन के हूल में,याद करो।
तुम्हारे हिस्से की लड़ाई
अभी खत्म नहीं हुई है बेटाधन

तुम्हारी ठंढी मौत ने
प्रदेश के जन-मन को मथ दिया है।
भोगनाडीह*= वीर सिदो-कान्हु का जन्म स्थली।
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Sunday, October 4, 2009

डर की दुनिया

इस दुनिया में

कई-कई दुनियाएँ गुप्त हैं जैसे,

सपनों की दुनिया यादों की दुनिया

या फिर मन में बैठी डर की दुनिया



जैसी भी दुनिया,

गहराई तक धँसती है आदमी में

और उसका अपना अलग चेहरा गढ़ती है



वह चेहरा आदमी को पहनता है हौले-हौले

और गायब होने लगता है

आदमी का अपना बेलौस असली चेहरा !



यह सब पर यकायक नहीं होता

लेकिन जब होता है तो

लुंड-मुंड इस चेहरे पर

वक़्त की राख जमने लगती है

पेशानी पर चिंता की

आरी-तिरछी लकीरें खिंचने लगती हैं



गोया कि अपनी दुनिया से निकलकर आदमी

एक अप्रत्याशित दुनिया में दाखिल हो जाता है

जहाँ दिन-रात दोजख़ की आग जलती है

जिसमें रोज़ उसका नया चेहरा चटकता है।



फिलहाल मसला यह नहीं कि

इस दुनिया में ऐसी कितनी दुनियाएँ हैं

जिसके आगोश में चेहरों की रौनकें बिगड़ रही है

बल्कि ज़रूरी है फिलवक़्त

उन चेहरों की शिनाख़्त

जो दुनिया को एक स्याह डर में

बदल देने पर आमादा हैं



बेरंग होते इस चमन में ढूँढ़नी है हमें

सियासत के वे झमाठ दरख़्त

जिनकी शाखाओं पर

अपराध की अमरलतायें फैलती हैं

जिनकी शिराएँ आदमी के मगज़ में घुसकर

डर और चुप्पियों का एक गुबार बनाती है

जो आदमी के खुशफ़हम इरादों की दुनिया को

अपनी धूल से ढक लेता है।
*****
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Sunday, September 20, 2009

बाँसलोय में बहत्तर ऋतु - भाग- २

[भाग-१ पिछले रविवार को प्रकाशित हुई थी।]

(२) दो-

नदी माँ, तुम्हारी ममता में
बहत्तर ऋतुओं को जिया है मैंने

देखता हूँ, तिल-तिल जलती हो
दिक्कुओं के पाप से तुम
दिन-दिन सूखती हो
क्षण-क्षण कुढ़ती हो निर्मोही महाजनों से
मन ही मन कोसती हो जंगल के सौदागरों को
रेत के घूँघट में मुँह ढाँप
रात-रात भर रोती हो

तुम्हारी जिन्दगी दुःख का पहाड़ है
सचमुच पहाड़ की छंदानुगामिनी हो तुम!
बूढ़े पहाड़ की तरह ही तुम्हें भी
शहर लीलता है हर साल थोड़ा-थोड़ा
इसीलिए इतनी बीहड़, उदास, कृशा हो तुम!

तुम्हारा जन्म
किसी हिमालय की गंगोत्री में नहीं,
पहाड़ी ढलानों में अनचाहे उग आये
बाँस की झुरमुटों से हुआ है
मुझे डर है,
आदिम सभ्यता की आखिरी निशानी
जोग रही हो
पर बचा नहीं पा रही अपनी अस्मिता तुम अब

सारे पत्ते गिराकर जंगल नंगे हो रहे हैं
दम तोड़ रहे हैं
पंछी अपने नीड़ छोड़ रहे हैं
नित तुम्हारा सर्वांग हरण हो रहा है
और मानवीय पशुता के बीच
गहरी उसांसें भरती हुई नित
मैली हो रही हो तुम ।

मुझे दुःख है कि,
अपनी छायाओं में फली-फूली
आदिम सभ्यता के मनोहर चित्र
रेत के वबंडरों से पाटती हुई
लोक-कथाओं में
तुम स्वयं एक दिन
किवदन्ती बनकर दर्ज हो जाओगी।
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Sunday, September 6, 2009

बाँसलोय में बहत्तर ऋतु

(संथाल परगना की एक पहाड़ी नदी की व्यथा-कथा)
१) एक-

संथाल परगना के जंगल
पहाड़ और बियावानों में
भटकती हुई
एक रजस्वला नदी हो तुम
नाम तुम्हारा बाँसलोय है
बाँस के झाड़-जंगलों से
निकली हो

रेत ही रेत है तुम्हारे गर्भ में
काईदार शैलों से सजी हो
तुम्हारे उरोज पर
रितु किलकती है केवल
बरसात में
तब अपने कुल्हे थिरकाती तुम
पहाड़ी बालाओं के संग
गीत गाती
अहरह बहती हो

पहाड़ी बच्चे तुम्हारी गोद में खेलते,
टहनियों की ढेर चुनते हैं तब,
भोजन-भात पकता है
पहाड़ियों के गेहों में
उनके उपलों से।

कलकल निनाद का निमंत्रण पाकर
दक्षिणी छोर से
क्रीड़ा करती हुई
मछलियाँ
मछलियाँ भी आ जाती हैं
और पत्थरों की चोट से
अधमरी होकर
रेत के खोह में समा जाती हैं
या फिर, मछुआरों के जाल में फंस जाती हैं

इतनी चंचला, आवेगमयी होती हो
आषाढ़ में तुम कि,
कोई नौकायन भी नहीं कर सकता
ठूँठ जंगलों से रूठकर
कठकरेज मेघमालाएँ पहाड़ से उतरकर
फिर जाने कहाँ बिला जाती हैं
और तुम अबला-सी मंद पड़ जाती हो !

जेठ के आते-आते
क्षितिज तक फैली हुई पतली-सी
रेत की वक्र रेखा भर रह जाती हो
तब लगता है तुम्हारे तट पर
ट्रक-ट्रैक्टरों का मेला
आदिवासी औरतें अपने स्वेद-कणों से
सींचती हुई तुम्हें
कठौती सिर पर लिये
उमस में बालू ढोती जाती हैं।

सूर्य की तपिश में हो जाती हो
तवे की तरह गर्म तुम।
उनके पैर सीझ जाते हैं तुम्हारे अंचल में
चल-चल कर।
(भाग -२ अगले रविवार को पढ़ें।)
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लोकचेतना और जनबातों की कविताओं की पाक्षिक प्रस्तुति...
-:लेखा-जोखा:-

__________

______________

big adaa-
 

कविताओं की कड़ियाँ यहाँ स्क्रॉल पट्टी में -

* बाँसलोय में बहत्तर ऋतु

* मन-पाँखी

* यहाँ कभी बसंत नहीं आता

* पहाड़ी लड़कियाँ

* तमस के साये

* भूख तुम्हारी

* नंगे होते लोग-बाग

* ठूँठ होते पहाड़

* वैलेनटाईन की रात

* पहाड़ का दु:ख

* तुम्हारे शब्दों के खिलाफ़

* मैं पहाड़ की बेटी

* बीज

* हृदय भी मेरा हाथ है

* पहाड़ी नदी के बारे में

* यह महुआ के फूलने का मौसम है

* अधूरी शब्द-यात्रायें

* तुम्हारे शब्दों से अलग

* पहाड़ पर भोर

* ढीली पड़ती मुठ्ठियाँ

* तुम्हारे हाथ

* नये रंग की तलाश में

* कोशी शोक में डूबी एक नदी का नाम है

* जड़ें

* जनतंत्र एक डैश है

* तंत्र में सेंध लगाते कायरों के विरूद्ध

* यह चुप्पियों का शहर है

* नहीं लोकूँगा एक भी शब्द तुम्हारे

* भूख तुम्हारी

* आतंकवाद

* समय के सच में आदमी का व्याकरण

* भीड़तंत्र

यहाँ आगंतुकगण -

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साईट पर पधारे महानुभावों का पूरा आँकड़ा -

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